Tag: Economic Crisis

  • सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें

    सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें



    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का महत्वाकांक्षी ‘NEOM’ प्रोजेक्ट अब गंभीर आर्थिक चुनौतियों के बीच घिरता नजर आ रहा है। कभी भविष्य के सबसे बड़े और आधुनिक शहर के रूप में पेश किए गए इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर अब खर्चों में कटौती, निर्माण की रफ्तार धीमी करने और योजनाओं को सीमित करने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    ‘विजन-2030’ के तहत शुरू किए गए NEOM प्रोजेक्ट का मकसद तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर सऊदी अरब को तकनीक, पर्यटन और वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनाना था। इस योजना में रेगिस्तान के बीच करीब 170 किलोमीटर लंबी भविष्यवादी “लाइन सिटी” बनाने की परिकल्पना की गई थी, जिसमें शीशे की दीवारों वाले आधुनिक ढांचे, हाईटेक ट्रांसपोर्ट और लग्जरी सुविधाएं शामिल थीं।

    हालांकि अब वैश्विक आर्थिक दबाव, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश में कमी के कारण प्रोजेक्ट की रफ्तार प्रभावित हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई हिस्सों को फिलहाल सीमित किया जा रहा है और शुरुआती चरण में सिर्फ छोटे हिस्से के निर्माण पर फोकस किया जाएगा।

    बताया जा रहा है कि सऊदी सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंसी कंपनियों के नए कॉन्ट्रैक्ट रोक दिए हैं और कुछ भुगतान भी होल्ड पर डाल दिए गए हैं। वहीं, कुछ बड़े खेल और मनोरंजन निवेशों की गति भी धीमी पड़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही सऊदी अरब को अपने बढ़ते बजट घाटे और भारी खर्चों को संतुलित करने के लिए अब ज्यादा व्यावहारिक रणनीति अपनानी पड़ रही है।

    फिलहाल NEOM पूरी तरह बंद होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना साफ है कि सऊदी अरब अब अपने बड़े सपनों को आर्थिक वास्तविकताओं के हिसाब से दोबारा आकार देने की कोशिश कर रहा है।

  • ईरान युद्ध के बीच अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण 39 ट्रिलियन डॉलर पार, आम नागरिकों पर बढ़ सकता है दबाव

    ईरान युद्ध के बीच अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण 39 ट्रिलियन डॉलर पार, आम नागरिकों पर बढ़ सकता है दबाव


    नई दिल्ली । ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका पर दोहरे आर्थिक दबाव की चिंता बढ़ गई है। एक तरफ युद्ध पर लगातार बढ़ता खर्च है तो दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण रिकॉर्ड स्तर 39 ट्रिलियन डॉलर पार कर गया है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका इस्राइल और ईरान के बीच टकराव जारी है।

    सरकारी जवाबदेही कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ता ऋण सीधे अमेरिकी नागरिकों पर असर डाल सकता है। इसका मतलब है घर कार और अन्य जरूरतों के लिए लोन महंगे हो सकते हैं निजी व्यवसायों के पास निवेश की रकम घट सकती है जिससे मजदूरी में कमी आए और वस्तुएं व सेवाएं महंगी हो सकती हैं। संतुलित बजट के समर्थक चेतावनी देते हैं कि उच्च उधारी और बढ़ते ब्याज भुगतान की प्रवृत्ति भविष्य में आम अमेरिकियों को कठिन वित्तीय निर्णय लेने पर मजबूर करेगी।

    पीटर जी. पीटरसन फाउंडेशन के अध्यक्ष माइकल पीटरसन ने कहा कि इस तरह की ऋण वृद्धि से अगली पीढ़ी पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। उनके अनुसार अगर यही रफ्तार जारी रही तो इस शरद ऋतु के चुनावों से पहले राष्ट्रीय ऋण 40 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। व्हाइट हाउस के आर्थिक सलाहकार केविन हैसेट के मुताबिक ईरान युद्ध पर अब तक लगभग 12 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं और यह स्पष्ट नहीं कि संघर्ष कब समाप्त होगा।

    ऋण में तेजी केवल वर्तमान प्रशासन तक सीमित नहीं है। संघीय ऋण रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों के कार्यकाल में बढ़ा है और हाल के वर्षों में युद्ध महामारी राहत पैकेज और कर कटौती ने इसे और बढ़ावा दिया है। पांच महीने पहले अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण 38 ट्रिलियन और दो महीने पहले 37 ट्रिलियन डॉलर था जिससे पता चलता है कि यह तेजी से बढ़ रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के साथ साथ बढ़ते राष्ट्रीय ऋण ने अमेरिका की आर्थिक स्थिरता पर गंभीर दबाव डाल दिया है। आने वाले समय में सरकार को यह संतुलन बनाना होगा कि सुरक्षा खर्च और आर्थिक स्थिरता के बीच कैसे फैसले लिए जाएं ताकि आम नागरिकों पर असर कम से कम पड़े।

  • जबलपुर के चार परिवार दुबई में फंसे, युद्ध और रद्द उड़ानों ने बढ़ाई मुश्किलें, केंद्र सरकार से सुरक्षा वापसी की अपील

    जबलपुर के चार परिवार दुबई में फंसे, युद्ध और रद्द उड़ानों ने बढ़ाई मुश्किलें, केंद्र सरकार से सुरक्षा वापसी की अपील



    नई दिल्ली। जबलपुर के चार व्यापारी परिवार दुबई में फंस गए हैं। शैलेश जैन, प्रशांत विश्वकर्मा, संजय सिंघई और प्रवीण जैन अपने परिवारों के साथ 21 फरवरी को दुबई घूमने गए थे और 28 फरवरी को लौटने वाले थे, लेकिन ईरान-इजराइल तनाव और मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के कारण उनकी वापसी अनिश्चित हो गई।

    व्यापारियों ने वीडियो संदेश जारी कर बताया कि फिलहाल वे सुरक्षित हैं, लेकिन एयरपोर्ट का संचालन और उड़ानों का समय तय नहीं होने से तनाव बना हुआ है। होटल्स ने किराया तीन गुना तक बढ़ा दिया, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ गया। बच्चों और बुजुर्गों के साथ यात्रा करने की वजह से मानसिक चिंता भी अधिक है।

    व्यापारियों ने केंद्र सरकार से विशेष विमान या सुरक्षित व्यवस्था के माध्यम से जल्दी स्वदेश लौटने की गुहार लगाई। इंदौर के पूर्व विधायक संजय शुक्ला सहित कई यात्री अब लौटने लगे हैं, लेकिन एयर इंडिया एक्सप्रेस की शारजाह-इंदौर उड़ान IX-256 लगातार कैंसिल हो रही है, जिससे स्थिति और जटिल बनी हुई है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों में फंसे नागरिकों के लिए सरकार को त्वरित राहत, आर्थिक मदद और सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करनी चाहिए। व्यापारियों ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार जल्द ही उनके परिवार सहित सुरक्षित लौटने का इंतजाम करेगी।

  • पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार

    पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार


    फैसलाबाद।
    पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) की आर्थिक बदहाली (Economic Distress) की खबरें नई नहीं हैं। खस्ताहाल पाकिस्तान दुनिया की कई वैश्विक संस्थानों (Global Institutions) से कर्ज लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहा है। अब हाल ही में यह खबरें सामने आई हैं कि पाकिस्तान में दाल (Lentils) के लिए हाहाकार मचा हुआ है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान अब अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर हो चुका है। पाकिस्तान में दाल का उत्पादन लगातार घट रहा है, जिससे देश को जरूरतें पूरी करने के लिए हर साल करीब 98 करोड़ डॉलर आयात पर खर्च करने पड़ रहे हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक कृषि विशेषज्ञों ने इस हालात पर गंभीर चिंता जताई है और कहा है कि अगर उत्पादन नहीं बढ़ा तो आयात पर निर्भरता और बढ़ेगी। पंजाब पल्सेज इंपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और ग्रेन मार्केट के चेयरमैन राणा मुहम्मद तैय्यब ने बताया कि 1998 से पहले पाकिस्तान दाल का प्रमुख निर्यातक देश था। लेकिन परवेज मुशर्रफ के दौर में लगाए गए निर्यात बैन के बाद किसानों का उत्साह कम हो गया, क्योंकि दाल कम मुनाफे वाली फसल बन गई। जानकारों के मुताबिक देश में हर साल करीब 16.2 लाख टन दाल की खपत होती है, जिसमें से लगभग 10.7 लाख टन आयात की जाती है। यानी पाकिस्तान को देश में खपत होने वाली करीब 80 प्रतिशत दाल आयात करनी पड़ती है।


    बारिश ने भी तरसाया

    तैय्यब ने जलवायु परिवर्तन के असर का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि थल जैसे वर्षा आधारित इलाकों में समय पर बारिश हो जाए तो पैदावार 35 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, लेकिन बारिश कम होने पर भारी नुकसान होता है और किसान अगले सीजन में दाल बोने से हिचकते हैं।

    जानकारों ने जताई चिंता
    ये मुद्दे विश्व दाल दिवस के मौके पर आयूब एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के पल्सेज रिसर्च इंस्टीट्यूट में आयोजित एक सेमिनार में उठाए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि पाकिस्तान की सालाना जरूरत करीब 15 लाख टन है, लेकिन लोकल उत्पादन इसका सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही पूरा कर पा रहा है। इसी कारण हर साल करीब 10 लाख टन दाल आयात करनी पड़ती है।

    AARI के पल्सेज सेक्शन के चीफ साइंटिस्ट खालिद हुसैन ने कहा कि दाल मानव पोषण और मिट्टी की उर्वरता दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन सीमित मुनाफा और निर्यात बैन के कारण किसान इसकी खेती से बच रहे हैं। दाल उत्पादन बढ़ाने के मकसद से एक प्रस्ताव तैयार कर संबंधित अधिकारियों को भेजा गया है, लेकिन उसे अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।

  • एमपी बजट पर सियासी संग्राम: PCC चीफ जीतू पटवारी ने बजट को ‘ठग-गुब्बारा और धांधलियों का बजट’ कहा, भ्रष्टाचार की नसबंदी की मांग

    एमपी बजट पर सियासी संग्राम: PCC चीफ जीतू पटवारी ने बजट को ‘ठग-गुब्बारा और धांधलियों का बजट’ कहा, भ्रष्टाचार की नसबंदी की मांग


    भोपाल । मध्य प्रदेश में वित्त वर्ष 2026-27 के बजट पेश होने के साथ ही सियासी तनाव भी तेज़ हो गया है। बुधवार को वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा द्वारा पेपरलेस बजट विधानसभा में पेश किया गया, जिसमें किसानों, महिलाओं, युवाओं और गरीबों के लिए बड़े प्रावधान किए गए हैं। इस दौरान विपक्ष खासकर कांग्रेस ने बजट पर तीखी टिप्पणी की, इसे जनता के साथ धोखा, ठग, गुब्बारा और धांधलियों का बजट करार दिया।
    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि यह बजट भ्रष्टाचार की नसबंदी करने की बजाय सरकार का ढोंग बजट है। उन्होंने कहा कि सरकार सदन में कुत्तों की नसबंदी जैसी बातों पर समय बर्बाद कर रही है, जबकि असल मुद्दों भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट पर काम होना चाहिए। पटवारी ने दावा किया कि पिछले वित्त वर्ष में केंद्र से मिलने वाला ₹50,000 करोड़ नहीं मिला, जिसके कारण सरकार अब तक अपने बजट का सिर्फ़ आधा ही खर्च कर सकी है और यह बजट फर्जी तथा खोखला है।

    पटवारी ने कर्ज बढ़ने का मुद्दा भी उठाया और कहा कि सरकार रोज़ाना ₹213 करोड़ कर्ज ले रही है तथा इस वित्त वर्ष में लगभग ₹72,000 करोड़ का उधार लिया गया है, जिससे राज्य गंभीर आर्थिक संकट के कगार पर है। उन्होंने कहा कि बजट को वास्तविकता के साथ पेश करना चाहिए और मुख्यमंत्री मोहन यादव को राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। विपक्ष ने बजट को गुब्बारा एवं धांधलियों का बजट बताया, जिसमें सिर्फ वाढ़ती व्यय और घोषणाओं का फोकस है लेकिन जमीन पर कोई ठोस योजना या क्रियान्वयन नहीं दिख रहा। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने आरोप लगाया कि बजट में निवेश वाले वादे सिर्फ़ शोरगरबा हैं और वास्तव में जनता को इससे कोई ठोस लाभ नहीं मिलेगा।

    पटवारी ने सवाल उठाया कि यदि प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है, तो क्यों गरीबी बनी हुई है और राशन की लंबी कतारें आज भी चल रहीं हैं? उन्होंने कहा कि बजट में रोज़गार और महंगाई जैसे मुद्दे पर कोई ठोस प्रावधान नहीं है और सरकार का आर्थिक समझ बिल्कुल जीरो है। इसके अलावा कांग्रेस ने न्यायिक जांच की मांग भी की, विशेष रूप से बेटियों की सुरक्षा और एेसी अन्य भयावह स्थितियों पर जहाँ प्रतिदिन लड़कियों के लापता होने और बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं। पीसीसी चीफ ने कहा कि यह मामला सिर्फ़ प्रदेश का नहीं है इसके लिए केंद्रीय गृह एवं विदेश मंत्रालय को भी तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।

    वहीं, बजट सत्र के दौरान वित्त मंत्री ने सत्तापक्ष की ओर से बजट को गरीबों, महिलाओं और युवाओं के हित का बताया और कहा कि इसमें कोई नया टैक्स नहीं लगाया गया है। लेकिन विपक्ष इस बात पर अड़ा है कि बजट सिर्फ़ प्रचार का औज़ार है और आर्थिक वास्तविकताओं से इसका कोई वास्ता नहीं है।  इस बीच बजट को सरकार की लंबी-अगली रणनीति के रूप में देखा जा रहा है और समर्थन तथा विरोध दोनों तरफ से इसका सियासी विश्लेषण जारी है।

  • यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    Russia Ukraine War
    नई दिल्ली/रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब अपने चौथे वर्ष में प्रवेश करने वाला है। बीते लगभग चार वर्षों में इस संघर्ष ने न केवल हजारों सैनिकों और आम नागरिकों की जान ली हैबल्कि अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचे को भी तबाह कर दिया है। अब अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक रूस को आगाह कर रहे हैं कि इस युद्ध की कीमत उसे लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही युद्ध आज समाप्त हो जाएरूस को आर्थिक रूप से इससे उबरने में कई साल लग सकते हैं। विश्लेषकों के अनुसारयूक्रेन युद्ध के चलते रूस के सैन्य खर्च में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। रक्षा बजट में 30 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि ने सरकारी वित्त पर जबरदस्त दबाव डाला है। इसके साथ ही पश्चिमी देशोंखासकर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने रूस की आमदनी के प्रमुख स्रोतों-तेल और गैस-को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ऊर्जा निर्यात से होने वाली कमाई में गिरावट ने रूस की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है।

    बढ़ते खर्च और घटती आय के बीच रूसी सरकार की कर्ज पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। हाल ही में रूसी सरकार ने बॉन्ड जारी कर करीब 108.9 अरब रूबल का कर्ज उठाया। इसके साथ ही 2025 में अब तक कुल कर्ज जारी करने का आंकड़ा 7.9 ट्रिलियन रूबल तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि सरकार के पास बजट घाटा पाटने के लिए सीमित विकल्प रह गए हैं। रूस की एक और बड़ी चिंता उसका नेशनल वेल्थ फंड या आपातकालीन रिजर्व है। रिपोर्ट्स के मुताबिकइस रिजर्व का आधे से ज्यादा हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका है। ऐसे में भविष्य में किसी बड़े आर्थिक झटके से निपटने की रूस की क्षमता कमजोर होती जा रही है। बजट घाटा लगातार बढ़ रहा है और इसकी मुख्य वजह सैन्य अभियानों पर हो रहा भारी खर्च माना जा रहा है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में रूस के सामने कई और चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। अगर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें दबाव में रहींरूबल मजबूत बना रहा और आर्थिक विकास अनुमान से कम रहातो सरकार की मुश्किलें और बढ़ेंगी। मजबूत रूबल निर्यात को महंगा बना देता हैजिससे विदेशी मुद्रा कमाने में दिक्कत आती हैजबकि ऊंची ब्याज दरें कर्ज को और महंगा कर देती हैं।विश्लेषकों के अनुसारयदि तेल और गैस से होने वाली आय में और गिरावट आती है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैंतो रूस के सामने केवल तीन ही विकल्प बचेंगे। पहलासरकार टैक्स बढ़ा सकती हैजिससे आम जनता और उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। दूसरासामाजिक कल्याण और विकास से जुड़े अन्य जरूरी खर्चों में कटौती की जा सकती हैजिसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। तीसरा विकल्प है और अधिक कर्ज लेनाजो भविष्य में आर्थिक संकट को और गहरा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर दिया है। लंबे समय तक चले इस संघर्ष ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है और विदेशी निवेश लगभग ठप हो चुका है। ऐसे में युद्ध के बाद भी रूस के लिए आर्थिक स्थिरता हासिल करना आसान नहीं होगा।कुल मिलाकरयूक्रेन युद्ध रूस के लिए सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नहींबल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है-इस जंग की कीमत रूस को आने वाले कई वर्षों तक चुकानी पड़ सकती है।