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  • सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF

    सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF


    न्यूयार्क।
    भारत (India) की आर्थिक विकास दर (Economic Growth Rate) को लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) ने सुपर अल नीनो (Super El Niño) के संभावित खतरे के प्रति आगाह किया है। IMF के मुताबिक, मौसम में होने वाले इस बदलाव से फसलों का उत्पादन घट सकता है, खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और आम लोगों की खरीदारी करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।


    जनवरी में भारत की ग्रोथ का दोबारा आकलन करेगा IMF

    IMF की कम्युनिकेशन डायरेक्टर जूली कोजैक ने गुरुवार को कहा कि भारत के सामने सुपर अल नीनो से जुड़े कुछ खतरे हैं, लेकिन अभी तक ये हकीकत में सामने नहीं आए हैं।

    जूली कोजैक ने कहा, “IMF जनवरी में जारी होने वाले अपने अगले वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (WEO) अपडेट में भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान की दोबारा समीक्षा करेगा। यह समीक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि मौसम से जुड़े जोखिम किस तरह सामने आते हैं।”


    भारत की GDP ग्रोथ 7% रहने का अनुमान

    बता दें IMF ने इसी महीने वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% कर दिया था। इससे पहले जुलाई में IMF ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.4% और वित्त वर्ष 2027-28 के लिए 6.7% ग्रोथ का अनुमान लगाया था।

    IMF के मुताबिक, भारत में घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है और सर्विस सेक्टर में भी अच्छी गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। यही वजह है कि मौसम से जुड़े संभावित खतरों के बावजूद भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान मजबूत बना हुआ है।


    क्या है सुपर अल नीनो और भारत को इससे क्या खतरा है?

    अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु संबंधी घटना है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है और भारत में मानसून की बारिश भी प्रभावित हो सकती है। अगर अल नीनो की स्थिति ज्यादा मजबूत होती है और बारिश में कमी आती है, तो इसका असर खेती और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।


    इसके तीन बड़े संभावित असर हैं

    1. फसल उत्पादन में गिरावट: बारिश कम होने से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
    2. खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी: अनाज, दालों और दूसरी खाने-पीने की चीजों की सप्लाई घटने पर कीमतें बढ़ सकती हैं।
    3. आम लोगों के बजट पर दबाव: खाने-पीने की चीजें महंगी होने से परिवारों की खरीदारी करने की क्षमता कम हो सकती है।

    हालांकि, इन आशंकाओं का मतलब यह नहीं है कि महंगाई या आर्थिक विकास पर असर पड़ना तय है। वास्तविक प्रभाव मौसम की स्थिति और कृषि उत्पादन में होने वाले बदलाव पर निर्भर करेगा।


    भारत की अर्थव्यवस्था पर रहेगी नजर

    IMF ने फिलहाल भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में सुपर अल नीनो के संभावित असर को शामिल करके कोई नई कटौती नहीं की है। संगठन का कहना है कि घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर की मजबूती से भारत की आर्थिक विकास दर को समर्थन मिल रहा है।

  • भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत, वैश्विक अनिश्चितता के बीच अर्थव्यवस्था की मजबूती पर वित्त मंत्री सीतारमण का जोर

    भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत, वैश्विक अनिश्चितता के बीच अर्थव्यवस्था की मजबूती पर वित्त मंत्री सीतारमण का जोर

    नई दिल्ली: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को कहा कि पश्चिम एशिया संकट से पैदा हुई वैश्विक अनिश्चितता का भारत ने सफलतापूर्वक सामना किया है और देश की आर्थिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है। राष्ट्रीय राजधानी में 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 के विशेष पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत इस दौर से उल्लेखनीय रूप से बेहतर स्थिति में निकला है और उसकी आर्थिक बुनियाद में और मजबूती आई है। उन्होंने वैश्विक सार्वजनिक ऋण का जिक्र करते हुए कहा कि 2025 में यह बढ़कर वैश्विक जीडीपी के करीब 94 प्रतिशत तक पहुंच गया और 2029 तक इसके 100 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।

    उन्होंने कहा कि ऐसे समय में आर्थिक झटके व्यापक आर्थिक प्रणालियों, वितरण तंत्र और राज्य की क्षमता की परीक्षा लेते हैं। वित्त मंत्री के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ी, अगस्त 2026 में सीपीआई मुद्रास्फीति करीब 4.8 प्रतिशत रही और पहली तिमाही में चालू खाते का घाटा जीडीपी का 0.5 प्रतिशत रहा।

    सीतारमण ने कहा कि 2014 से सरकार ने सतत विकास के लिए जरूरी क्षमताओं को मजबूत करने पर काम किया है। इनमें राज्य की प्रतिक्रिया देने की क्षमता, अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता और नागरिकों तथा उद्यमों की विकास में भागीदारी शामिल है। उन्होंने पहली बुनियाद परिवारों के स्तर पर लचीलेपन को मजबूत करना बताया। उनके अनुसार सरकारी खर्च और योजनाओं को लोगों के जीवन में ठोस सुधार में बदलने, पारदर्शी तंत्र, निगरानी और योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन से परिवारों की असुरक्षा के अलग-अलग स्रोतों को कम करने में मदद मिली।

    जन धन-आधार-मोबाइल यानी जेएएम और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने लाभार्थियों तक सीधे सहायता पहुंचाने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत किया। पीएम आवास योजना, स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत और पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत किए गए कार्यों का भी उन्होंने उल्लेख किया।

    वित्त मंत्री ने दूसरी बुनियाद को आर्थिक अवसरों को उत्पादक गतिविधियों में बदलने की क्षमता बताया। उन्होंने कहा कि वित्त तक पहुंच इसका महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। पीएम मुद्रा योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक बिना गारंटी वाले ऋण स्वीकृत किए गए हैं, जिससे स्वरोजगार और छोटे उद्यमों को समर्थन मिला। पीएम स्वनिधि योजना से रेहड़ी-पटरी वालों को सहायता मिलने का भी उन्होंने उल्लेख किया। सीतारमण के अनुसार, बैंकिंग क्षेत्र में पुनर्पूंजीकरण, संकट वाली परिसंपत्तियों के समाधान, बेहतर प्रशासन और जोखिम प्रबंधन ढांचे के जरिए वित्तीय प्रणाली को मजबूत किया गया है।

    अगस्त 2026 तक के एक वर्ष में गैर-खाद्य ऋण में 18.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उन्होंने कहा कि आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना ने कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने, परिचालन और रोजगार बनाए रखने तथा व्यवधान के समय नकदी की कमी से निपटने में मदद की।

    तीसरी बुनियाद के तौर पर सीतारमण ने उस बुनियादी ढांचे को बताया, जो लोगों, कारखानों और बाजारों को जोड़ता है। उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में अकेले पूंजीगत व्यय के लिए 12.22 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। उनके अनुसार प्रभावी पूंजीगत व्यय 17.15 लाख करोड़ रुपये है, जो जीडीपी का 4.4 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि 2014 से लगातार किए गए निवेश के संचयी परिणाम दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार करीब 61 प्रतिशत हुआ है, परिचालन रेलवे मार्ग दोगुने से अधिक हो गए हैं और प्रमुख बंदरगाहों की माल ढुलाई क्षमता में करीब 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

    चौथी बुनियाद के रूप में उन्होंने मजबूत सुधारवादी सोच वाले नेतृत्व का उल्लेख किया। सीतारमण ने कहा कि सरकार ने जीएसटी, दिवाला और दिवालियापन संहिता, चार श्रम संहिताओं और जन विश्वास अधिनियमों के जरिए राष्ट्रीय स्तर के ढांचे को आगे बढ़ाया है। उन्होंने परिचालन हवाई अड्डों की संख्या दोगुने से अधिक होने और प्रमुख बंदरगाहों की माल ढुलाई क्षमता में करीब 60 प्रतिशत वृद्धि का भी उल्लेख किया।

  • ग्लोबल तनाव के बीच भारत की इकोनॉमी ने पकड़ी रफ्तार GDP 7.8% बढ़ी घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर ने संभाली विकास की कमान

    ग्लोबल तनाव के बीच भारत की इकोनॉमी ने पकड़ी रफ्तार GDP 7.8% बढ़ी घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर ने संभाली विकास की कमान


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर अपनी मजबूती का प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान देश की GDP ग्रोथ 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के 7 प्रतिशत के अनुमान से काफी बेहतर है। एक साल पहले इसी अवधि में GDP ग्रोथ 6.9 प्रतिशत रही थी। ऐसे में ताजा आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पहली तिमाही में रियल GDP बढ़कर 81.36 लाख करोड़ रुपए हो गई जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 75.46 लाख करोड़ रुपए थी। इसी दौरान रियल GVA में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और यह 73.82 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। नॉमिनल GDP भी 10.3 प्रतिशत बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपए रही। वहीं नॉमिनल GVA में 11.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    भारतीय अर्थव्यवस्था के इस मजबूत प्रदर्शन में सर्विस सेक्टर की अहम भूमिका रही है। फाइनेंस रियल एस्टेट IT और प्रोफेशनल सर्विसेज जैसे क्षेत्रों में 12 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि देखने को मिली। इन सेक्टर्स में तेजी ने आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ घरेलू मांग को भी मजबूती प्रदान की। पैसेंजर व्हीकल और हाउसहोल्ड व्हीकल रजिस्ट्रेशन में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है जो उपभोक्ताओं के बीच खर्च करने की क्षमता और आर्थिक भरोसे का संकेत देती है।

    इस प्रदर्शन को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस दौरान पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगाई और लागत दोनों को प्रभावित कर सकती हैं। इसके बावजूद पहली तिमाही में GDP की रफ्तार 7.8 प्रतिशत रहना अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती को दर्शाता है। हालांकि विशेषज्ञों के लिए आगे की तिमाहियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी क्योंकि लंबे समय तक चलने वाला वैश्विक तनाव आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल सकता है।

    GDP के आंकड़ों में इस बार एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। सरकार ने नई सीरीज के तहत 2022-23 को नया बेस ईयर बनाया है। इसके साथ अर्थव्यवस्था को मापने की प्रक्रिया में कई नए आंकड़ों को शामिल किया गया है। GST नेटवर्क ई-वाहन डेटाबेस और घरेलू सेवाओं से जुड़े आंकड़े भी नई व्यवस्था का हिस्सा बनाए गए हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की GVA गणना में डबल डिफ्लेशन अप्रोच को भी शामिल किया गया है।

    नए बेस ईयर का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में समय के साथ आए बदलावों को ज्यादा सटीक तरीके से आंकड़ों में शामिल करना है। मौजूदा अर्थव्यवस्था में डिजिटल भुगतान गिग इकोनॉमी ऑनलाइन सेवाओं और नए उपभोक्ता व्यवहार की भूमिका बढ़ी है। ऐसे में पुराने आधार वर्ष के बजाय नए आर्थिक ढांचे को ध्यान में रखकर आंकड़ों की गणना करना जरूरी माना गया है।

    हालांकि पहली तिमाही का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है लेकिन पूरे वित्त वर्ष की तस्वीर अभी बाकी है। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत रखा है। आगे की तिमाहियों में 6.4 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के बीच वृद्धि का अनुमान जताया गया है। अगर वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का दबाव लंबे समय तक नहीं रहता है तो मजबूत घरेलू मांग और निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को आगे भी बनाए रख सकते हैं।

  • वैश्विक निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ा, पीएम मोदी की यात्रा से 40 अरब डॉलर की संभावनाएं

    वैश्विक निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ा, पीएम मोदी की यात्रा से 40 अरब डॉलर की संभावनाएं


    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर एक बड़ी मजबूती उस समय मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया पांच दिवसीय विदेश यात्रा के दौरान देश में लगभग 40 अरब डॉलर के निवेश की संभावनाएं सामने आईं। यह निवेश विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार योजनाओं, नई साझेदारियों और वैश्विक कंपनियों की बढ़ती रुचि का परिणाम बताया जा रहा है। इस यात्रा ने भारत की आर्थिक स्थिति और निवेश माहौल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक आकर्षक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    इस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने सेमीकंडक्टर, लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में काम कर रही 50 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की। इन कंपनियों का संयुक्त बाजार मूल्य लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर से 3 ट्रिलियन डॉलर के बीच बताया गया, जो इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर भारत को एक प्रमुख निवेश गंतव्य के रूप में देखा जा रहा है।

    अधिकारियों के अनुसार, इनमें से कई कंपनियां पहले से ही भारत में सक्रिय हैं और यहां उनका कुल निवेश और कारोबार लगभग 180 अरब डॉलर के आसपास है। अब ये कंपनियां भारत की तेज आर्थिक वृद्धि, स्थिर नीतिगत वातावरण और बढ़ती घरेलू मांग को देखते हुए अपने संचालन को और विस्तार देने की योजना बना रही हैं। इससे रोजगार, तकनीकी विकास और औद्योगिक उत्पादन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    इस यात्रा के दौरान कई महत्वपूर्ण निवेश घोषणाएं भी सामने आईं, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात की ओर से भारत में लगभग 5 अरब डॉलर के नए निवेश का ऐलान प्रमुख रहा। इसके अलावा अन्य देशों और कंपनियों के साथ हुई चर्चाओं में भी निवेश विस्तार और सहयोग की संभावनाएं मजबूत हुई हैं, जिन्हें मिलाकर कुल अनुमानित निवेश लगभग 40 अरब डॉलर तक पहुंचता है।

    प्रधानमंत्री की यह यात्रा केवल निवेश तक सीमित नहीं रही, बल्कि इससे भारत के कई देशों के साथ रणनीतिक संबंध भी और मजबूत हुए हैं। नीदरलैंड के साथ व्यापार, रक्षा, सेमीकंडक्टर, एआई और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी रोडमैप पर सहमति बनी। वहीं स्वीडन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने पर भी सहमति बनी, जो भविष्य में तकनीकी और औद्योगिक सहयोग को नई दिशा देगी।

    नॉर्वे में आयोजित एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री की भागीदारी के दौरान नॉर्डिक देशों के साथ भारत के संबंधों को और गहरा करने पर चर्चा हुई। इसी क्रम में इटली के साथ भी विशेष रणनीतिक साझेदारी स्थापित की गई, जिससे रक्षा, ऊर्जा और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुलने की संभावना है।

    इन सभी घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि भारत वैश्विक निवेश और रणनीतिक साझेदारियों के केंद्र के रूप में तेजी से उभर रहा है। यह यात्रा न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही, बल्कि इससे भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति भी और मजबूत हुई है, जिसका असर आने वाले वर्षों में देश की विकास गति पर साफ दिखाई दे सकता है।

  • 10 अरब डॉलर के निवेश से अमेरिका में नई आर्थिक हलचल, अदाणी ग्रुप को मिली बड़ी कानूनी राहत के बाद बढ़ा भरोसा

    10 अरब डॉलर के निवेश से अमेरिका में नई आर्थिक हलचल, अदाणी ग्रुप को मिली बड़ी कानूनी राहत के बाद बढ़ा भरोसा

     नई दिल्ली । Adani Group के अमेरिका में प्रस्तावित 10 अरब डॉलर के निवेश को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय के कई प्रमुख नेताओं और व्यापारिक विशेषज्ञों ने इसे भारत और अमेरिका के आर्थिक संबंधों के लिए एक बड़ा मोड़ बताया है। उनका मानना है कि यह निवेश केवल व्यापारिक विस्तार नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक ताकत और कॉर्पोरेट प्रभाव का बड़ा संकेत है।

    भारतीय-अमेरिकी समुदाय के वरिष्ठ नेता और पूर्व सलाहकार Ajay Bhutoria ने इस निवेश को अमेरिका के इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए गेम चेंजर बताया है। उनके अनुसार यह कदम अमेरिका में रोजगार बढ़ाने, ऊर्जा ढांचे को मजबूत करने और नई तकनीकों के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस निवेश से दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को नई दिशा मिलेगी।

    हाल के घटनाक्रमों में अदाणी समूह को कानूनी मोर्चे पर भी राहत मिलने की खबरों ने निवेशकों और उद्योग जगत के बीच सकारात्मक माहौल बनाया है। इसे कंपनी के लिए बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर उसकी विश्वसनीयता और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशों के लिए कानूनी स्पष्टता बेहद महत्वपूर्ण होती है और इस घटनाक्रम से निवेश माहौल को मजबूती मिल सकती है।

    अमेरिका में यह प्रस्तावित निवेश कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर असर डाल सकता है। माना जा रहा है कि इससे हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। निर्माण, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में नई परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है। विशेष रूप से स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े क्षेत्रों में इस निवेश को भविष्य की जरूरतों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर के तेजी से विस्तार के कारण अमेरिका में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में बड़े पैमाने पर ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की जरूरत महसूस की जा रही है। इस संदर्भ में अदाणी समूह की विशेषज्ञता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि कंपनी पहले से ही ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में बड़े प्रोजेक्ट्स संचालित कर चुकी है।

    यह निवेश भारत-अमेरिका संबंधों के राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण को भी प्रभावित कर सकता है। लंबे समय से विदेशी निवेश और रोजगार को लेकर चल रही बहस के बीच इस पहल को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय कंपनियों की बढ़ती वैश्विक भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत अब केवल बाजार नहीं बल्कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने वाली ताकत के रूप में भी उभर रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह निवेश योजना पूरी तरह लागू होती है तो आने वाले वर्षों में यह दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग का एक ऐतिहासिक उदाहरण बन सकती है। इससे न केवल व्यापारिक संबंध मजबूत होंगे बल्कि तकनीकी और रणनीतिक साझेदारी को भी नया विस्तार मिलेगा। कुल मिलाकर यह घटनाक्रम वैश्विक निवेश जगत में भारत की बढ़ती भूमिका को और अधिक मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

  • भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर और सशक्त, वैश्विक चुनौतियों का प्रभाव सीमित : गौरव वल्लभ का दावा

    भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर और सशक्त, वैश्विक चुनौतियों का प्रभाव सीमित : गौरव वल्लभ का दावा


    नई दिल्ली । देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों को लेकर एक महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान अर्थशास्त्री और भाजपा नेता गौरव वल्लभ ने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह मजबूत और स्थिर बनी हुई है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि देश को किसी प्रकार की आर्थिक घबराहट की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भारत ने पिछले वर्षों में मजबूत आर्थिक आधार तैयार किया है और वैश्विक झटकों को सहने की क्षमता विकसित की है।

    उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में दुनिया तीन बड़े भू-राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है, जिनमें पश्चिम एशिया का तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-चीन के बीच व्यापारिक व कमोडिटी से जुड़े तनाव शामिल हैं। इन परिस्थितियों का असर वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ा है, लेकिन भारत अपनी नीतियों और आर्थिक संरचना के कारण इन प्रभावों को काफी हद तक संतुलित करने में सफल रहा है।

    गौरव वल्लभ ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुकी है और पिछले एक दशक से अधिक समय में देश ने आर्थिक विकास की मजबूत यात्रा तय की है। उन्होंने दावा किया कि करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में विभिन्न सरकारी योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और स्टार्टअप एवं स्वरोजगार के क्षेत्र में भी देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है।

    उन्होंने यह भी बताया कि भारत की आयात निर्भरता, विशेष रूप से कच्चे तेल और सोने जैसे क्षेत्रों में, एक चुनौती है, लेकिन सरकार इस दिशा में संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि देश के नागरिक ऊर्जा और संसाधनों की खपत में थोड़ी बचत करें तो विदेशी मुद्रा भंडार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और आर्थिक स्थिरता और मजबूत हो सकती है।

    विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय घाटा और आर्थिक विकास दर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की वित्तीय स्थिति संतोषजनक है और आने वाले समय में देश की विकास दर और भी बेहतर हो सकती है। उनके अनुसार, भारत की आर्थिक नीति का मूल उद्देश्य स्थिरता के साथ विकास को आगे बढ़ाना है, जिससे वैश्विक अस्थिरताओं का असर कम से कम हो सके।

    उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत की आपूर्ति प्रणाली मजबूत है और अंतरराष्ट्रीय तनाव के बावजूद देश में आवश्यक संसाधनों की कमी नहीं हुई है। भारत की विदेश नीति और रणनीतिक संबंधों ने भी इस स्थिरता को बनाए रखने में मदद की है।

    राजनीतिक सवालों के जवाब में उन्होंने विपक्ष पर भी टिप्पणी की और कहा कि देशहित के मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की प्रगति सभी नागरिकों के सहयोग से ही संभव है और हर वर्ग को मिलकर देश की आर्थिक मजबूती में योगदान देना चाहिए।

    अंत में उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत स्थिति में उभरेगा और विकास की गति को बनाए रखते हुए दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में अपनी स्थिति को और सुदृढ़ करेगा।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत का व्यापार मजबूत, मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में हल्की बढ़त की संभावना

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत का व्यापार मजबूत, मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में हल्की बढ़त की संभावना

    नई दिल्ली । देश के विदेशी व्यापार को लेकर एक नया आर्थिक आकलन सामने आया है, जिसमें संकेत दिया गया है कि वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत का कुल मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट लगभग 111.9 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह अनुमान पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में मामूली लेकिन सकारात्मक वृद्धि को दर्शाता है, जो वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत के व्यापारिक प्रदर्शन को मजबूत संकेत देता है।

    रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट में भी वृद्धि देखने को मिल सकती है, जिसका अनुमान लगभग 97.8 अरब डॉलर लगाया गया है। इसके अलावा नॉन-ऑयल और नॉन-जेम्स एंड ज्वेलरी निर्यात में भी लगभग 3 प्रतिशत की सालाना बढ़त की संभावना जताई गई है, जो यह दर्शाता है कि भारत का निर्यात आधार धीरे-धीरे अधिक संतुलित और विविध हो रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय निर्यात में यह सुधार कई कारकों का परिणाम है। इनमें वैश्विक बाजारों में बढ़ती मांग, व्यापारिक अवसरों का विस्तार और निर्यातकों को मिल रहे नीतिगत सहयोग शामिल हैं। इसके साथ ही सरकार द्वारा समय-समय पर किए गए आर्थिक हस्तक्षेप और वित्तीय सहायता उपायों ने भी निर्यात गतिविधियों को स्थिरता प्रदान की है।

    आर्थिक आकलन में यह भी बताया गया है कि हाल के वर्षों में भारत ने कई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत किया है, जिसका सीधा असर निर्यात क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है। इन समझौतों से विशेष रूप से नॉन-ऑयल सेक्टर को फायदा मिलने की उम्मीद है, जिससे औद्योगिक उत्पादन और निर्यात दोनों को गति मिल सकती है।

    इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में यदि मांग में सुधार आता है और मुद्रा विनिमय दरें अनुकूल बनी रहती हैं, तो भारत के निर्यात प्रदर्शन में और बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इससे भारतीय उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता भी बढ़ेगी।

    हालांकि रिपोर्ट में कुछ जोखिमों की ओर भी इशारा किया गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों में उतार-चढ़ाव ऐसे कारक हैं जो निर्यात वृद्धि की गति को प्रभावित कर सकते हैं। इन परिस्थितियों में व्यापारिक स्थिरता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

    इसके बावजूद निर्यात क्षेत्र को लेकर सकारात्मक माहौल बना हुआ है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वर्तमान नीतिगत समर्थन और वैश्विक परिस्थितियां संतुलित रहती हैं, तो भारत आने वाले समय में अपने निर्यात स्तर को और ऊंचाई तक ले जा सकता है।

  • लिथियम से लेकर टाइटेनियम तक भारत की नई खनिज नीति से आत्मनिर्भरता को मिलेगा बल

    लिथियम से लेकर टाइटेनियम तक भारत की नई खनिज नीति से आत्मनिर्भरता को मिलेगा बल


    नई दिल्ली:
    देश की आर्थिक उन्नति और भविष्य की ऊर्जा परियोजनाओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार एक और बड़ा कदम उठाने जा रही है सोमवार से खनिज ब्लॉकों की नीलामी के सातवें चरण की शुरुआत होगी इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया का शुभारंभ केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी और राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे द्वारा किया जाएगा। भारत के खान मंत्रालय के अनुसार यह नीलामी देश की खनिज सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए बेहद अहम मानी जा रही है
    आज के समय में जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत तकनीकों की ओर तेजी से बढ़ रही है तब लिथियम ग्रेफाइट दुर्लभ पृथ्वी तत्व टंगस्टन वैनेडियम और धातुओं जैसे खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है हालांकि इन खनिजों की उपलब्धता सीमित है और कुछ ही क्षेत्रों में केंद्रित होने के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बना रहता है।
    46 खनिज ब्लॉकों की नीलामी कर चुकी है जिसे उद्योग जगत से पॉजिटिव रिएक्शन मिला है इससे यह संकेत मिलता है कि भारत के खनिज क्षेत्र में निवेश और भागीदारी बढ़ रही है सातवें चरण में इस रेट को जारी रखते हुए कई राज्यों में 19 नए ब्लॉक नीलामी के लिए पेश किए जाएंगे जिनमें स्वच्छ ऊर्जा उर्वरक और खनिज उद्योगों के लिए जरूरी खनिज शामिल हैं

    नीलामी प्रक्रिया को ज्यादा उचित और असरदार बनाने के लिए सरकार ने नियमों में भी कई सुधार किए हैं 2025 और 2026 के संशोधनों के तहत प्रदर्शन सुरक्षा अग्रिम भुगतान और अन्य गतिविधियों को सरल बनाया गया है साथ ही बैंक गारंटी के विकल्प के रूप में बीमा गारंटी बॉन्ड की सुविधा भी दी गई है जिससे भारतीयों को आसानी होगी

    यह पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन दो चरणों वाली उचित नीलामी प्रणाली के तहत आयोजित की जाएगी जिसमें उच्चतम बोली लगाने वाले को खनन का अधिकार मिलेगा इस पहल से न केवल देश की खनिज आपूर्ति मजबूत होगी बल्कि भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता भी वहीं

    आने वाले समय में यह कदम भारत को स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है

  • भारत की आर्थिक वृद्धि पर हो सकता है ईरान-युद्ध का असर… ICRA ने बढ़ाई टेंशन

    भारत की आर्थिक वृद्धि पर हो सकता है ईरान-युद्ध का असर… ICRA ने बढ़ाई टेंशन


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में अगर संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो भारत की आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (Rating agency ICRA) ने एक रिपोर्ट में यह कहा। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि लगभग 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह वित्त वर्ष 2025-26 के अनुमान 7.6 प्रतिशत से थोड़ा कम है। हालांकि, पश्चिम एशिया में लंबे समय तक जारी तनाव से कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मुद्रास्फीति के दबाव के कारण वृद्धि प्रभावित हो सकती है।


    वैश्विक स्तर पर तनाव

    बता दें कि इजराइल-अमेरिका के ईरान पर हमले के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास के समुद्री मार्गों में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। यह एक अहम वैश्विक ऊर्जा गलियारा है। इससे आपूर्ति प्रभावित होने और माल ढुलाई लागत में वृद्धि को लेकर चिंता बढ़ी है। पश्चिम एशिया भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। भारत के निर्यात में इसकी लगभग 14 प्रतिशत और आयात में लगभग 21 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसे में, यदि तनाव और बढ़ता है तो व्यापार के साथ ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होगी।


    भारत के लिए जोखिम हैं ये फैक्टर

    इक्रा की रिपोर्ट में कहा गया- यह संघर्ष विशेष रूप से माल ढुलाई लागत में वृद्धि, आपूर्ति में देरी और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के रूप में भारत के व्यापार प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करता है। इक्रा के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का चालू खाते का घाटा 0.30-0.40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। साथ ही थोक और खुदरा मुद्रास्फीति भी बढ़ सकती है। ईंधन की बढ़ती लागत से उपभोग मांग कम हो सकती है और समग्र आर्थिक गतिविधि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    एजेंसी के अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल रहती हैं तो इससे चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक प्रतिशत के आसपास बना रह सकता है। हालांकि, यदि कीमतें बढ़कर 100-105 डॉलर प्रति बैरल हो जाती हैं, तो घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 1.9-2.2 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, जिससे वृहद आर्थिक दबाव बढ़ेगा।

    इक्रा ने कहा कि इस स्थिति का असर बाहर से भेजे जाने वाली राशि पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत में आने वाले रेमिंटन्स का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब शामिल हैं।

  • भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो

    भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो


    नई दिल्ली ।अमेरिका में अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो अगस्टिन कॉसिनो ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर बड़ा बयान दिया है। न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसकी विशाल आबादी है। उनके अनुसार भारत न केवल दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है बल्कि यहां के लोगों में टैलेंट और क्रिएटिव सोच की भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

    राजदूत कॉसिनो ने कहा कि जब भारत सरकार ने पाबंदियां, सीमाएं और अनावश्यक रेगुलेशन हटाए तो भारतीय लोगों की क्षमताएं खुलकर सामने आईं। यही वजह है कि पिछले दस से पंद्रह वर्षों में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसके लोग हैं और यही उसे आगे बढ़ा रही है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण पर बात करते हुए अर्जेंटीना के राजदूत ने कहा कि पीएम मोदी को बड़ी सफलता मिली है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में छह से आठ प्रतिशत की दर से बढ़ी है। उन्होंने इसे आर्थिक नीति और विनियमन में ढील का सफल उदाहरण बताया।

    कॉसिनो ने यह भी साझा किया कि जब प्रधानमंत्री मोदी अर्जेंटीना गए थे तब उन्हें राष्ट्रपति जेवियर माइली के साथ हुई बैठक में शामिल होने का अवसर मिला था। इस दौरान विनियमन में ढील अनावश्यक नियमों को हटाने और लोगों को कम से कम सरकारी हस्तक्षेप के साथ आगे बढ़ने का मौका देने जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी।भारत में विदेशी निवेश को लेकर पूछे गए सवाल पर राजदूत ने कहा कि वह भारत को यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि उसे क्या करना चाहिए क्योंकि यह एक घरेलू नीति का विषय है। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि जब देश अपनी अर्थव्यवस्था खोलते हैं और ज्यादा उत्पादों को आने की अनुमति देते हैं तो इसका फायदा उपभोक्ताओं और घरेलू खपत दोनों को मिलता है।

    उन्होंने आगे कहा कि भारत इस दिशा में अच्छा काम कर रहा है और अर्जेंटीना भारत की खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा में और अधिक योगदान देने के लिए तैयार है। उनके अनुसार भारत और अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के लिए पूरक हैं और यह रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सकती है।