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  • बड़ा कानूनी कदम: रॉबर्ट वाड्रा ने HC का दरवाजा खटखटाया, समन पर उठाए सवाल

    बड़ा कानूनी कदम: रॉबर्ट वाड्रा ने HC का दरवाजा खटखटाया, समन पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली। नई दिल्ली में एक बार फिर चर्चित जमीन सौदे से जुड़ा मामला सुर्खियों में है। इस बार मामला Robert Vadra की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिका को लेकर है। वाड्रा ने निचली अदालत द्वारा जारी समन को चुनौती देते हुए अदालत से राहत की मांग की है।

    यह पूरा मामला हरियाणा के गुरुग्राम जिले के शिकोहपुर (अब सेक्टर 83) में हुए एक जमीन सौदे से जुड़ा है, जिसे मनी लॉन्ड्रिंग जांच के दायरे में रखा गया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) का आरोप है कि इस सौदे में स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी ने कम कीमत पर जमीन खरीदकर बाद में भारी मुनाफे में उसे बेचा।

    जानकारी के अनुसार, यह सौदा 2008 में हुआ था, जब कंपनी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से लगभग 3.5 एकड़ जमीन करीब 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी थी। उस समय Robert Vadra इस कंपनी के डायरेक्टर थे।

    इसके बाद 2012 में वही जमीन रियल एस्टेट कंपनी DLF को लगभग 58 करोड़ रुपये में बेच दी गई। इस लेनदेन को लेकर बाद में गंभीर सवाल उठे और मामला जांच एजेंसियों तक पहुंच गया।

    इस केस में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 2012 में आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने इस जमीन के म्यूटेशन को रद्द कर दिया था। उन्होंने इसे भूमि चकबंदी नियमों और प्रक्रियात्मक उल्लंघन से जुड़ा मामला बताते हुए कार्रवाई की थी। इसके बाद यह सौदा विवादों के घेरे में आ गया।

    प्रवर्तन निदेशालय ने बाद में इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाते हुए आरोपपत्र दाखिल किया। ईडी का कहना है कि इस सौदे से जुड़े दस्तावेजों और शुरुआती जांच में पर्याप्त सबूत मिले हैं, जिसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई जरूरी है।

    इसी आरोपपत्र के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने 15 अप्रैल को समन जारी किया था और वाड्रा सहित अन्य आरोपियों को 16 मई को अदालत में पेश होने का आदेश दिया था। इसी आदेश को अब Robert Vadra ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

    दिल्ली हाईकोर्ट में यह याचिका जस्टिस मनोज जैन की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की गई है, जिस पर जल्द सुनवाई होने की संभावना है। वाड्रा की तरफ से दलील दी गई है कि निचली अदालत का समन कानूनी प्रक्रिया और तथ्यों के आधार पर सही नहीं है, इसलिए इसे रद्द किया जाए। वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियों का दावा है कि यह मामला गंभीर वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है और इसकी गहन जांच जरूरी है।

    फिलहाल अदालत का अगला फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि हाईकोर्ट इस समन को बरकरार रखता है या इसे रोकने का आदेश देता है।

  • मनी लॉन्ड्रिंग केस में राहत की बड़ी खबर, पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट से जमानत, दो साल बाद जेल से बाहर आने का रास्ता साफ

    मनी लॉन्ड्रिंग केस में राहत की बड़ी खबर, पूर्व मंत्री आलमगीर आलम को सुप्रीम कोर्ट से जमानत, दो साल बाद जेल से बाहर आने का रास्ता साफ

    नई दिल्ली ।  झारखंड के चर्चित टेंडर कमीशन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सोमवार को एक अहम कानूनी मोड़ सामने आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम और उनके निजी सचिव संजीव लाल को जमानत दे दी। दोनों आरोपी लंबे समय से न्यायिक हिरासत में थे और पिछले लगभग दो वर्षों से जेल में बंद थे। इस फैसले के बाद मामले की कानूनी दिशा एक नए चरण में प्रवेश कर गई है।

    सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात प्रमुखता से रखी गई कि दोनों आरोपियों को मई 2024 से हिरासत में रखा गया है और अब तक मुकदमे की सुनवाई में पर्याप्त प्रगति नहीं हो सकी है। आरोपियों की ओर से यह तर्क दिया गया कि ट्रायल में देरी का मुख्य कारण लगातार दाखिल हो रही अतिरिक्त चार्जशीटें हैं, जिसके चलते केस की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसी आधार पर लंबे समय तक जेल में रखने को अनुचित बताया गया।

    यह पूरा मामला उस समय सामने आया था जब जांच एजेंसी ने रांची में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। इस छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में नकदी बरामद होने का दावा किया गया था, जिससे जांच की गंभीरता और बढ़ गई थी। इसके अलावा एक डायरी भी बरामद हुई थी, जिसमें कथित तौर पर टेंडर कमीशन और लेन-देन से जुड़े विवरण दर्ज थे, जिसने पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया।

    जांच एजेंसियों के अनुसार यह आरोप है कि सरकारी टेंडर आवंटन के बदले एक संगठित व्यवस्था के तहत कमीशन लिया जाता था। इस व्यवस्था में टेंडर राशि का एक तय प्रतिशत वसूला जाता था और इसे अलग-अलग स्तरों पर वितरित किया जाता था। जांच में यह भी दावा किया गया कि इस प्रक्रिया में विभागीय स्तर से लेकर अन्य कई लोग शामिल थे, जो एक नेटवर्क की तरह काम कर रहे थे।

    पूर्व मंत्री के साथ-साथ उनके निजी सचिव और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं के जरिए अवैध लेन-देन को अंजाम दिया गया और इस पूरे सिस्टम को एक ढांचे के तहत संचालित किया जा रहा था। जांच में मिले दस्तावेजों और बरामद सामग्री के आधार पर मामले को मनी लॉन्ड्रिंग से भी जोड़ा गया।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल दोनों आरोपियों को राहत मिल गई है, हालांकि कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यह मामला लंबे समय से राज्य की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में चर्चा का विषय बना हुआ है और आने वाले समय में इसकी जांच और सुनवाई पर सभी की नजरें बनी रहेंगी।