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  • छठ-दिवाली से पहले बढ़ सकती है रसोई की महंगाई, खाने के तेल के दाम 7-8% तक बढ़ने की आशंका

    छठ-दिवाली से पहले बढ़ सकती है रसोई की महंगाई, खाने के तेल के दाम 7-8% तक बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली ।त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले आम लोगों की रसोई का बजट एक बार फिर प्रभावित हो सकता है। खाने पकाने में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल की कीमतों में 7 से 8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। वैश्विक बाजार में कच्चे खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों और आयात लागत में इजाफे के कारण कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा है।

    आने वाले महीनों में दशहरा, छठ पूजा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार हैं। इस दौरान खाद्य तेल की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे समय में कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है। भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का करीब 58 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले बदलाव का घरेलू कीमतों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

    अगर त्योहारों से पहले खाद्य तेल के दाम बढ़ते हैं, तो मार्च के बाद यह कीमतों में बढ़ोतरी का तीसरा दौर होगा। मार्च से शुरू हुए पिछले दो दौर में कंपनियों ने खाद्य तेल की कीमतों में करीब 5 से 6 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की थी। इसके बाद मार्च से जून के बीच कुल कीमतों में लगभग 10 से 12 प्रतिशत तक इजाफा हुआ।

    अब वैश्विक परिस्थितियों और कच्चे माल की आपूर्ति में कमी के कारण एक बार फिर 7 से 8 प्रतिशत तक कीमत बढ़ने की आशंका है। यदि यह बढ़ोतरी होती है, तो मार्च से अब तक खाद्य तेल की कुल कीमतों में करीब 18 से 20 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है।

    कीमतों पर बढ़ते दबाव की प्रमुख वजह कच्चे खाद्य तेल की बढ़ी हुई आयात लागत है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 18 सितंबर को मुंबई बंदरगाहों पर कच्चे पाम तेल की कीमत 1,265 डॉलर प्रति टन, सोयाबीन तेल की 1,314 डॉलर प्रति टन और सूरजमुखी तेल की कीमत 1,380 डॉलर प्रति टन थी।

    पाम और सोयाबीन तेल की लागत एक साल पहले की तुलना में करीब 11 प्रतिशत अधिक रही। वहीं, सूरजमुखी तेल की लागत में लगभग 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे घरेलू स्तर पर तेल को रिफाइन और प्रोसेस करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ गई है।

    इसके अलावा रुपये की कमजोरी, परिवहन लागत में बढ़ोतरी और बीमा प्रीमियम बढ़ने से भी आयातित तेल महंगा हुआ है। इन सभी कारकों का असर दुनिया भर में वनस्पति तेल की कीमतों पर पड़ा है और इसका दबाव भारतीय रिफाइनरों तथा प्रोसेसर्स पर भी बढ़ा है।

    उद्योग से जुड़े आदित्य अग्रवाल के अनुसार, कच्चे खाद्य तेल की लैंडेड कॉस्ट में करीब 8 से 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। लागत में इस वृद्धि को देखते हुए कंपनियों के सामने इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालने का विकल्प बच सकता है।

    खाद्य तेल रोजमर्रा की जरूरत की प्रमुख वस्तुओं में शामिल है। इसलिए कीमतों में संभावित वृद्धि का असर घरेलू खर्च के साथ-साथ त्योहारों के दौरान होने वाली खरीदारी पर भी पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी, यह वैश्विक बाजार, आयात लागत और कंपनियों के मूल्य निर्धारण पर निर्भर करेगा।

    ऐसे में छठ और दिवाली से पहले खाद्य तेल की कीमतों पर नजर बनी हुई है। यदि लागत का मौजूदा दबाव आगे भी कायम रहता है, तो आने वाले समय में उपभोक्ताओं को रसोई के बजट में अतिरिक्त खर्च का सामना करना पड़ सकता है।

  • चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    नई दिल्ली । देश के कई हिस्सों में रोजमर्रा की रसोई में इस्तेमाल होने वाली जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में पिछले कुछ समय से तेजी देखी जा रही है। चीनी, प्याज, दाल और खाद्य तेल के दाम बढ़ने से आम परिवारों के मासिक बजट पर दबाव बढ़ गया है। खास तौर पर चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में चीनी के दाम करीब 7 रुपये प्रति किलो तक बढ़े हैं, जबकि एक महीने में इसकी कीमत में लगभग 17 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि दर्ज की गई है। कई बाजारों में चीनी करीब 70 रुपये किलो तक बिक रही है।

    चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे आपूर्ति और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता प्रमुख कारणों में शामिल है। सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसके तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा जमाखोरी रोकने के लिए कारोबारियों के स्टॉक पर सीमा निर्धारित की गई है। घरेलू स्तर पर नई चीनी की उपलब्धता जल्दी बढ़ाने के लिए चीनी मिलों में पेराई सत्र भी सामान्य से पहले शुरू करने की तैयारी है।

    प्याज की कीमतों में भी पिछले कुछ सप्ताह में बढ़ोतरी हुई है। 21 अगस्त को प्याज का औसत खुदरा भाव करीब 40.79 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक सप्ताह पहले यह लगभग 36.56 रुपये और एक महीने पहले 34.87 रुपये प्रति किलो था। इस तरह कुछ ही समय में प्याज के दाम में 4 से 5 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि हुई है। खरीफ प्याज की नई फसल की आवक में देरी को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है। दक्षिण भारत में आवक प्रभावित होने के साथ महाराष्ट्र के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की स्थिति का भी असर पड़ा है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

    दालों की कीमतों में भी हल्की तेजी का रुख बना हुआ है। अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी प्रमुख दालों के दाम में पिछले एक महीने में लगभग 1 से 2 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी हुई है। दलहन की बुवाई के रकबे में कमी और मानसून से जुड़ी अनिश्चितता को इसकी प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है। कमजोर बारिश या फसल उत्पादन में कमी की आशंका आगे दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है।

    खाद्य तेल भी महंगाई के इस दबाव से अछूते नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल की कीमतों में तेजी आई है। उत्पादन वाले क्षेत्रों में मौसम संबंधी परिस्थितियों और वैश्विक आपूर्ति में बदलाव का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ रहा है। भारत खाद्य तेल की अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। पिछले एक महीने में खाद्य तेलों की कीमतों में करीब 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।

    इस तरह रसोई की महंगाई के पीछे किसी एक वस्तु की समस्या नहीं बल्कि आपूर्ति, मौसम, घरेलू उत्पादन, आयात लागत और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव दिखाई दे रहा है। सरकार चीनी और प्याज की उपलब्धता बढ़ाने तथा जमाखोरी पर रोक लगाने जैसे कदम उठा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतों की दिशा नई फसल की आवक, मानसून और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • पेट्रोल के बाद अब खाद्य तेल ने बढ़ाई महंगाई, आयात बिल 1.75 लाख करोड़ पार होने का अनुमान, रसोई का बजट फिर बिगड़ने के आसार

    पेट्रोल के बाद अब खाद्य तेल ने बढ़ाई महंगाई, आयात बिल 1.75 लाख करोड़ पार होने का अनुमान, रसोई का बजट फिर बिगड़ने के आसार

    नई दिल्ली। पेट्रोल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के बीच अब खाद्य तेलों की महंगाई ने आम लोगों की रसोई का बजट भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सरसों, सोयाबीन, मूंगफली और अन्य खाद्य तेलों की कीमतों में हाल के दिनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की कमजोरी, आयात लागत में बढ़ोतरी और घरेलू उत्पादन की सीमित उपलब्धता के कारण खाद्य तेलों की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। आगामी त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने की संभावना के चलते कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

    देश में खाद्य तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। उद्योग से जुड़े संगठनों के अनुसार पिछले वर्ष भारत का खाद्य तेल आयात बिल लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये रहा था, जबकि मौजूदा वित्तीय वर्ष में इसके बढ़कर 1.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आयात पर अत्यधिक निर्भरता देश के लिए आर्थिक चुनौती बनती जा रही है और इस स्थिति से निपटने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना आवश्यक है।

    बाजार में विभिन्न खाद्य तेलों की कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई है। सरसों तेल के भाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल और अन्य खाद्य तेलों के दाम भी ऊपर गए हैं। कारोबारियों के अनुसार सरसों की मांग बढ़ने और मंडियों में सीमित आवक के कारण कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना है। वहीं सोयाबीन की आवक में कमी आने से उससे जुड़े उत्पाद भी महंगे हुए हैं। इसका सीधा असर खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है।

    उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को दीर्घकालिक समाधान के रूप में तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके लिए बेहतर बीज, आधुनिक खेती, प्रसंस्करण क्षमता और किसानों को प्रोत्साहन देने जैसी योजनाओं को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो आयात पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और उपभोक्ताओं को कीमतों में स्थिरता का लाभ मिलेगा।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि वैश्विक बाजार में कच्चे खाद्य तेलों की कीमतों, शिपिंग लागत और विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है। डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आने से आयातित खाद्य तेल और महंगे हो जाते हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी घरेलू कीमतों को प्रभावित करती हैं।

    हालांकि बाजार विश्लेषकों का कहना है कि भविष्य में कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, वैश्विक आपूर्ति, मौसम और सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगी। यदि तिलहन की अच्छी पैदावार होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर रहती हैं तो खाद्य तेलों की महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण संभव है। फिलहाल उपभोक्ताओं को बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है और आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति पर सभी की नजर बनी रहेगी।