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  • 9 अगस्त को कामिका एकादशी, अनाज से लेकर दीपदान तक इन चीजों का दान करने से मिलते हैं शुभ फल

    9 अगस्त को कामिका एकादशी, अनाज से लेकर दीपदान तक इन चीजों का दान करने से मिलते हैं शुभ फल


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को कामिका एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त, रविवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही एकादशी तिथि पर जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा भी बताई गई है। मान्यता है कि श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि के संयोग बनते हैं।

    कामिका एकादशी का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ मिलता है। दान को भी इस दिन की धार्मिक साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। हालांकि दान हमेशा अपनी क्षमता और जरूरतमंद व्यक्ति की आवश्यकता को ध्यान में रखकर करना चाहिए। कामिका एकादशी पर किन वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है, इसे लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं।

    कामिका एकादशी पर छाता दान करना भी शुभ माना जाता है। श्रावण मास में बारिश का मौसम रहता है और ऐसे में किसी जरूरतमंद व्यक्ति को छाता उपलब्ध कराना उपयोगी दान माना जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन छाता दान करने से सकारात्मकता और पुण्य फल की प्राप्ति होती है। खासतौर पर जरूरतमंद लोगों की सहायता को इस अवसर पर महत्वपूर्ण माना गया है।

    एकादशी के अवसर पर अन्न दान को भी विशेष महत्व दिया जाता है। कामिका एकादशी पर सात प्रकार के अनाज का दान करने की परंपरा बताई गई है। इसमें गेहूं, बाजरा और जौ सहित अन्य अनाज शामिल किए जा सकते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार अन्न दान को महत्वपूर्ण दान माना गया है। कहा जाता है कि जरूरतमंद व्यक्ति को अनाज उपलब्ध कराने से घर में अन्न और धन की कमी नहीं रहती। इस तरह का दान समाज में जरूरतमंद लोगों की मदद का माध्यम भी बन सकता है।

    कामिका एकादशी पर मौसमी फलों का दान भी किया जा सकता है। अपनी क्षमता के अनुसार केला, सेब, नाशपाती और अनार जैसे फल जरूरतमंदों को दिए जा सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में फल दान को शुभ माना गया है और इससे परिवार में सुख-शांति बनी रहने की कामना की जाती है। किसी जरूरतमंद की सहायता करने से सेवा और परोपकार की भावना को भी बढ़ावा मिलता है।

    इसके अलावा कामिका एकादशी पर दीपदान का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। दिन और रात में दीपदान करने की परंपरा भी बताई गई है। मान्यता है कि दीपदान से पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है। कामिका एकादशी पर किए जाने वाले इन धार्मिक कार्यों का उद्देश्य केवल शुभ फल की कामना करना ही नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सहायता, सेवा और परोपकार की भावना को मजबूत करना भी है।

  • योगिनी एकादशी व्रत की तारीख और शुभ मुहूर्त घोषित: दो दिन तिथि होने से गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय के लिए अलग-अलग नियम, दशमी से ही शुरू हो जाएंगे कड़े नियम

    योगिनी एकादशी व्रत की तारीख और शुभ मुहूर्त घोषित: दो दिन तिथि होने से गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय के लिए अलग-अलग नियम, दशमी से ही शुरू हो जाएंगे कड़े नियम


    नई दिल्ली ।
    हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है, जिसमें आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘योगिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक ग्रंथों और पद्मपुराण के अनुसार, इस व्रत को विधि-विधान के साथ करने से व्रती को 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस व्रत को सच्चे मन से रखने पर व्यक्ति के समस्त संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। इस वर्ष एकादशी तिथि दो दिनों में विभाजित होने के कारण आम जनमानस में व्रत की सही तारीख को लेकर काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी, जिसे पंचांग की गणनाओं के आधार पर स्पष्ट कर दिया गया है।

    द्रिक पंचांग के विश्लेषण के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण एकादशी तिथि की शुरुआत 10 जुलाई, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर होने जा रही है। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 11 जुलाई, शनिवार को सुबह 5 बजकर 22 मिनट पर होगा। इस बार विशेष स्थिति यह बन रही है कि दोनों ही दिन एकादशी तिथि सूर्योदय के समय पूर्ण रूप से व्याप्त नहीं है। शनिवार 11 जुलाई को सुबह 5 बजकर 22 मिनट के बाद ही द्वादशी तिथि का प्रारंभ हो जाएगा, जिससे ज्योतिषीय गणना के अनुसार 11 जुलाई को एकादशी तिथि का क्षय माना गया है। शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार, जब दोनों दिन सूर्यकाल में एकादशी तिथि व्याप्त न हो, तब पहले दिन ही व्रत रखना श्रेयस्कर होता है।

    इस पंचांगीय नियम के आधार पर सभी गृहस्थ लोगों के लिए 10 जुलाई को ही योगिनी एकादशी का व्रत रखना पूरी तरह से मान्य और शास्त्रसम्मत होगा। दूसरी ओर, वैष्णव संप्रदाय से जुड़े श्रद्धालु और संत समाज के लोग अगले दिन यानी 11 जुलाई को इस एकादशी का व्रत अनुष्ठान कर सकते हैं। तिथि के इस विभाजन के कारण दोनों ही पक्षों के लिए व्रत के पारण का समय भी अलग-अलग निर्धारित किया गया है, जिसका कड़ाई से पालन करना व्रत की पूर्णता के लिए आवश्यक माना जाता है।

    जो श्रद्धालु 10 जुलाई, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का उपवास रखेंगे, वे अगले दिन 11 जुलाई को अपने व्रत का पारण करेंगे। गृहस्थों के लिए 11 जुलाई को पारण का शुभ समय दोपहर 1 बजकर 50 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 36 मिनट तक निर्धारित किया गया है। इसके विपरीत, जो वैष्णव जन 11 जुलाई, शनिवार को एकादशी का व्रत रखेंगे, उनके लिए पारण की समय अवधि अगले दिन यानी 12 जुलाई की सुबह 5 बजकर 32 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगी। व्रत खोलने के इस नियत समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत का पालन करने वाले श्रद्धालुओं को दशमी तिथि से ही कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसके तहत दशमी तिथि यानी 9 जुलाई की शाम से ही केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और भोजन में लहसुन, प्याज, बैंगन, मूंग तथा मसूर की दाल जैसी वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए। व्रत के मुख्य दिन बाल, नाखून काटना और बाल धोना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। व्रतियों को इस दिन अन्न का पूरी तरह त्याग कर केवल फलाहार करना चाहिए और पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की आराधना में समय बिताना चाहिए।

  • क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा

    क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा


    नई दिल्ली। हिंदू परंपरा में क्षौर कर्म को केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि एक शुद्धिकरण और अनुशासन से जुड़ी धार्मिक क्रिया माना गया है। इसमें बाल कटवाना, दाढ़ी-मूंछ बनवाना और नाखून काटना शामिल होता है। शास्त्रों और परंपराओं में इससे जुड़े कई नियम बताए गए हैं, जिन्हें लोग आस्था के आधार पर मानते हैं।

    क्या है क्षौर कर्म?
    क्षौर कर्म का अर्थ है शरीर की स्वच्छता से जुड़ी गतिविधियाँ जैसे

    बाल कटवाना या मुंडन कराना

    दाढ़ी और मूंछ बनवाना

    नाखून काटना

    धार्मिक दृष्टि से इसे शुद्धता और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

    किन दिनों में इसे टालने की परंपरा है?
    परंपरागत मान्यताओं में कुछ तिथियों और दिनों को क्षौर कर्म के लिए कम शुभ माना गया है, जैसे—

    एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमा

    कुछ धार्मिक पर्व और व्रत के दिन

    संक्रांति के समय

    कुछ परंपराओं में मंगलवार और शनिवार को भी इसे टालने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह सभी जगह समान नहीं है और क्षेत्रीय परंपराओं पर निर्भर करता है।

    भद्रा और मुहूर्त का महत्व
    शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य, जिसमें क्षौर कर्म भी शामिल है, करने से बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए कई लोग शुभ मुहूर्त देखकर ही यह कार्य करते हैं।

    श्राद्ध से जुड़ी परंपरा
    श्राद्ध कर्म के समय शुद्धता और नियमों का विशेष महत्व माना गया है। इसी कारण श्राद्ध करने से पहले शरीर की स्वच्छता पर ध्यान देने की परंपरा रही है, जिसमें क्षौर कर्म को भी शामिल किया जाता है।

    आयु से जुड़ी मान्यताएं
    कुछ परंपराओं में अलग-अलग दिनों में क्षौर कर्म करने को लेकर आयु बढ़ने या घटने जैसी मान्यताएं प्रचलित हैं। लेकिन यह पूरी तरह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास पर आधारित है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • Makar Sankranti 2026 : मकर संक्रांति पर कैसे पकेगी खिचड़ी, षट्तिला एकादशी ने चावल दान पर भी फंसाया पेंच, अब मकर संक्रांति पर क्या करें?

    Makar Sankranti 2026 : मकर संक्रांति पर कैसे पकेगी खिचड़ी, षट्तिला एकादशी ने चावल दान पर भी फंसाया पेंच, अब मकर संक्रांति पर क्या करें?


    नई दिल्ली। मकर संक्रांति इस बार 14 जनवरी को मनाया जाएगा। हालांकि, इस बार की मकर संक्रांति बेहद ही खास होने वाली है। क्योंकि,मकर संक्रांति पर इस बार एकादशी तिथि का संयोग बन गया है। ऐसे में मकर संक्रांति पर सूर्यदेव के साथ भगवान विष्णु की कृपा का लाभ भी मिलने वाला है। लेकिन इससे मकर संक्रांति पर एक दुविधा की स्थिति भी बन गई है जिसको लेकर लोगों में उलझन की स्थिति बनी हुई है। दरअसल मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने और दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। लेकिन, एकादशी तिथि होने के कारण अब सवाल यह उठता है कि, क्या इस बार मकर संक्रांति पर भगवान को खिचड़ी का भोग लगाना,खिचड़ी खाना और दान करना शुभ रहेगा या नहीं। आपके इन्हीं सवालों के जवाब यहां हम आपको बताने जा रहे हैं कि अबकी बार मकर संक्रांति पर एकादशी तिथि के संयोग में खिचड़ी खाने, दान करने और भगवान को भोग लगाने के संबंध में आप क्या कर सकते हैं।

    क्या मकर संक्रांति 2026 पर कर सकते हैं चावल और खिचड़ी का दान ?
    सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। सूर्य इस दिन अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हें। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं और देवताओं का दिन भी शुरू होता है। श्रीमद्भागवत गीता में भी मकर संक्रांति के दिन का बड़ा महत्व बताया गया है, इस दिन से देवलोक में दिन आरंभ होता और सूर्यदेव अपने दिए हुए वरदान के अनुसार मकर राशि में आकर धन समृद्धि और सुख लाते हैं। इसलिए भी इस दिन का विशेष महत्व है। और परंपराओं से चल मान्यता चली आ रही है कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी का भोग लगता है और खिचड़ी एवं चावल का दान भी किया जाता है। लेकिन अबकी बार मकर संक्रांति के साथ षटतिला एकादशी का संयोग होने से दुविधा की स्थिति बन गई है।

    शास्त्रों के अनुसार, एकादशी तिथि पर अन्न का सेवन और अन्न दान करना वर्जित माना गया है। खास तौर पर चावल खाने और दान करने की मनाही है। ऐसे में मकर संक्रांति पर इस बार आप तिल, गुड़ और मूंगफली आदि का दान कर सकते हैं। इस दिन आप चावल और खिचड़ी का बाकी सामान दान के निमित्त अलग से निकालकर घर के मंदिर में रख दें।
    मकर संक्रांति 14 जनवरी बुधवार के दिन और उससे अगले दिन 15 जनवरी को गुरुवार है। शास्त्रों में गुरुवार के दिन खिचड़ी का सेवन वर्जित बताया गया है। ऐसे में आप उस दिन भी खिचड़ी नहीं बना सकते हैं तो ऐसे में शनिवार का दिन यानी 17 जनवरी को आप खिचड़ी बना सकते हैं और इसी दिन आप चावल का दान भी कर सकते हैं। बता दें कि 17 जनवरी शनिवार के दिन सप्तमी उपरांत अष्टमी तिथि रहेगी जो शनि से संबंधित है और सूर्य जब तक मकर राशि में गोचर करते रहेंगे तब तक माघ मास में दान पुण्य का संयोग बना रहेगा। ऐसे में इस दिन जो भी आप चावल आदि का दान करेंगे उसका आपको उत्तम फल मिलेगा। आप 17 जनवरी को खिचड़ी का सेवन भी करेंगे तो यह शुभ रहेगा और आपके ग्रह दोष कटेंगे।

    मकर संक्रांति 2026 पर क्या दान करें ?
    मकर संक्रांति पर इस बार आप चाहें तो गुड़, तिल, तिल से बनी चीजें जैसे लड्डू आदि का दान करें। इस दिन तिल का दान करने से पापों का नाश होता है। साथ ही तिल का दान करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। इस दिन दान पुण्य करने से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।