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  • 100 साल में तीसरा सबसे सूखा रहा जून…. अल नीनो के असर से देश में बारिश में 42% की कमी

    100 साल में तीसरा सबसे सूखा रहा जून…. अल नीनो के असर से देश में बारिश में 42% की कमी


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में इस साल जून (June) का महीना पिछले 100 सालों में तीसरा सबसे सूखा जून (Third-driest June) साबित होने जा रहा है। महीने के खत्म होने में सिर्फ एक दिन बचा है और देशभर में बारिश में 42% की भारी कमी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा इस बात का सीधा संकेत है कि भारत में मॉनसून (Monsoon) को कमजोर करने में ‘अल नीनो’ (‘El Niño’) का प्रभाव शुरू हो चुका है।


    आंकड़ों में समझें सूखे की स्थिति

    देशभर में अब तक जून महीने में औसतन 92.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जबकि सामान्य बारिश का आंकड़ा 157.7 मिमी होना चाहिए। अगर महीने के आखिरी दिन यानी मंगलवार को अच्छी बारिश हो भी जाती है, तो भी जून में कुल बारिश 100 मिमी के आसपास ही रहने का अनुमान है।

    पिछले 100 वर्षों (1927-2026) के इतिहास में, जून में इससे कम बारिश केवल दो बार हुई है- साल 2009 में (87.5 मिमी) और 2014 में (92.1 मिमी)। ये दोनों ही वर्ष पिछले दो दशकों के भीतर के हैं।

    4 जून को केरल में मॉनसून की कमजोर दस्तक के बाद से अब तक यह जोर नहीं पकड़ सका है। पूरे जून के दौरान देशभर में केवल एक ही दिन ऐसा रहा, जब रोजाना होने वाली बारिश का आंकड़ा सामान्य से अधिक दर्ज किया गया हो।


    मध्य भारत में सबसे ज्यादा बुरा हाल

    देश के सभी चार प्रमुख क्षेत्रों में बारिश की इतनी बड़ी कमी दर्ज होना एक दुर्लभ घटना है, जो अल नीनो के प्रभाव की ओर इशारा कर रही है। मध्य भारत के हालात सबसे ज्यादा खराब हैं और बारिश में 54% की कमी दर्ज की गई है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 41% कम बारिश हुई है। उत्तर-पश्चिम भारत क्षेत्र में बारिश में 30% की कमी रही। दक्षिण भारत में 28% कम बारिश रिकॉर्ड की गई है।


    अल नीनो का बढ़ता असर और जुलाई से उम्मीदें

    अल नीनो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में सतह के पानी के गर्म होने की एक प्रक्रिया है, जिसका असर दुनिया भर के मौसम और विशेषकर भारतीय मॉनसून पर पड़ता है। अमेरिकी एजेंसी ‘इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी’ ने पिछले हफ्ते अपने एक अपडेट में बताया था कि भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे तापमान के बीच अल नीनो ‘मध्यम ताकत’ तक पहुंचने के करीब है। अगले कुछ महीनों में इसके और मजबूत होने का अनुमान है, जिससे भारतीय मानसून पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

    हालांकि, इन सबके बीच एक राहत भरी खबर भी है। मौसम विभाग (IMD) के अनुमानों के मुताबिक, जुलाई के पहले हफ्ते में देश के ज्यादातर हिस्सों में अच्छी और व्यापक बारिश होने की उम्मीद है। इसका सबसे ज्यादा फायदा मध्य भारत को मिल सकता है, जहां अब तक बारिश की सबसे ज्यादा कमी रही है।

  • मानसून पर मंडराया संकट मजबूत हो रहा ,अल नीनो भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर

    मानसून पर मंडराया संकट मजबूत हो रहा ,अल नीनो भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर


    नई दिल्ली ।देश के कई हिस्सों में मानसून की दस्तक के बावजूद अपेक्षित बारिश नहीं होने से चिंता बढ़ रही है। इसी बीच प्रशांत महासागर से सामने आए नए वैज्ञानिक संकेतों ने मौसम विशेषज्ञों और किसानों की बेचैनी और बढ़ा दी है। अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े ताजा आंकड़ों के अनुसार प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली अल नीनो प्रणाली विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो रही है। यदि यह और मजबूत होती है तो इसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न के साथ भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है।

    वैज्ञानिकों के अनुसार भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कई हिस्सों में समुद्र की सतह सामान्य से अधिक ऊंची दर्ज की गई है। यह स्थिति इस बात का संकेत मानी जाती है कि समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है। जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है तो वह फैलता है और समुद्र की सतह का स्तर बढ़ जाता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर अल नीनो की स्थिति को जन्म देती है।

    अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। इसके प्रभाव केवल समुद्री क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहते बल्कि यह दुनिया के कई देशों में मौसम के स्वरूप को बदल सकती है। कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी पड़ सकती है तो कुछ स्थानों पर सामान्य से कम या अधिक वर्षा देखने को मिल सकती है।

    मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां वर्ष 1997 में बने अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो से कुछ हद तक मेल खाती हैं। उस समय विकसित हुई प्रणाली को गॉडजिला अल नीनो कहा गया था क्योंकि उसके प्रभाव व्यापक और बेहद गंभीर थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं तो आने वाले महीनों में इसका असर और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

    विशेषज्ञों ने समुद्र में बनने वाली गर्म पानी की विशाल लहरों पर भी ध्यान दिलाया है। इन्हें केल्विन वेव कहा जाता है जो हजारों किलोमीटर तक फैल सकती हैं और समुद्री तापमान में तेजी से बदलाव लाती हैं। ऐसी गतिविधियां आमतौर पर अल नीनो के मजबूत होने का संकेत मानी जाती हैं।

    भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। यदि अल नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ता है या वर्षा का वितरण असंतुलित होता है तो खेती और जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है। इससे खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।

    हालांकि मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्रारंभिक संकेतों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। आने वाले हफ्तों में समुद्री तापमान और मौसमीय गतिविधियों की लगातार निगरानी की जाएगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अल नीनो कितना मजबूत होगा और उसका वास्तविक प्रभाव किन क्षेत्रों पर पड़ेगा।

    फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय की नजर प्रशांत महासागर की बदलती परिस्थितियों पर टिकी हुई है, क्योंकि इनके परिणाम आने वाले महीनों में वैश्विक मौसम और भारत के मानसून की दिशा तय कर सकते हैं।

  • अल नीनो और बदलते मौसम के बीच किसानों के लिए अलर्ट: तैयारी ही बनेगी सबसे बड़ी ताकत

    अल नीनो और बदलते मौसम के बीच किसानों के लिए अलर्ट: तैयारी ही बनेगी सबसे बड़ी ताकत


    मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश के किसानों के लिए खरीफ सीजन हमेशा उम्मीदों और चुनौतियों का संगम लेकर आता है। खेती की सफलता काफी हद तक मानसून पर निर्भर रहती है और यही वजह है कि भारतीय कृषि को अक्सर मानसून का जुआ कहा जाता है। इस वर्ष भी मौसम का मिजाज सामान्य नहीं दिख रहा है। प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो की स्थिति और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने किसानों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश में मानसून 20 जून के बाद दक्षिण-पूर्वी हिस्सों से प्रवेश कर सकता है, लेकिन बारिश का वितरण सामान्य रहेगा या नहीं, इस पर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।

    ऐसे हालात में किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सलाह यही है कि वे जल्दबाजी में बुवाई न करें। मानसून की पहली बारिश होते ही खेतों में बीज डाल देना कई बार भारी नुकसान का कारण बन जाता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खेत में कम से कम तीन से चार इंच अच्छी वर्षा होने और मिट्टी के भीतर पर्याप्त नमी पहुंचने के बाद ही बोनी की जानी चाहिए। यदि मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होगी तो बीज अंकुरित नहीं होंगे या सड़ सकते हैं, जिससे दोबारा बुवाई की नौबत आ सकती है।

    किसानों को अपनी मिट्टी की प्रकृति को समझना भी बेहद जरूरी है। मध्य प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में काली मिट्टी पाई जाती है, जो नमी को लंबे समय तक रोककर रख सकती है। अच्छी बारिश के बाद यह मिट्टी 15 से 20 दिनों तक फसल को नमी प्रदान कर सकती है। वहीं दोमट मिट्टी में यह क्षमता 7 से 10 दिनों तक सीमित रहती है, जबकि रेतीली मिट्टी केवल 3 से 5 दिन तक ही नमी बनाए रख पाती है। इसलिए बोनी और सिंचाई की रणनीति मिट्टी की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही बनाई जानी चाहिए।

    अल नीनो के प्रभाव वाले इस सीजन में फसल विविधीकरण भी किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पूरे खेत में एक ही किस्म की फसल लगाने के बजाय अलग-अलग अवधि में पकने वाली किस्मों का चयन किया जाए। यदि किसी एक किस्म को मौसम की मार झेलनी पड़े तो दूसरी किस्म उत्पादन देकर नुकसान की भरपाई कर सकती है। सोयाबीन, मक्का और दलहनी फसलों में यह रणनीति विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है।

    इसके साथ ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ लेना भी जरूरी है। मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए बीमा किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। यदि सूखा, कम वर्षा या अन्य प्राकृतिक आपदा के कारण फसल प्रभावित होती है तो बीमा योजना राहत का आधार बन सकती है।

    जल संरक्षण भी इस सीजन की सबसे बड़ी जरूरत है। खेतों में मजबूत मेड़बंदी, रिज-फरो पद्धति और मल्चिंग जैसी तकनीकों का उपयोग कर वर्षा जल को खेत में रोका जा सकता है। इससे न केवल मिट्टी में नमी बनी रहती है बल्कि फसल को लंबे समय तक पानी उपलब्ध होता है। सब्जी उत्पादक किसानों के लिए प्लास्टिक मल्च या सूखी घास का उपयोग भी लाभकारी साबित हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम विभाग के पूर्वानुमान, कृषि मौसम सलाह और डिजिटल एप्स की जानकारी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आज के दौर में खेती केवल अनुभव नहीं बल्कि वैज्ञानिक जानकारी और तकनीक पर भी निर्भर है। बदलते मौसम और अल नीनो की चुनौती के बीच वही किसान सफल होगा जो समय रहते तैयारी करेगा और परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बदलेगा। इस खरीफ सीजन में सावधानी, वैज्ञानिक सोच और सही प्रबंधन ही बेहतर उत्पादन की कुंजी साबित होंगे।