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  • संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    नई दिल्ली । देश की चुनावी और संसदीय व्यवस्था से जुड़े बड़े सुधारों को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर सक्रिय हो गई है। परिसीमन विधेयक को संसद में पहले मिले झटके के बाद सरकार इसे नए रूप में दोबारा पेश करने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ व्यवस्था लागू करने की दिशा में भी तेजी से काम किया जा रहा है। इन दोनों प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और विपक्षी दलों ने सरकार से व्यापक परामर्श और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने की मांग की है।

    सरकारी स्तर पर गृह मंत्रालय द्वारा परिसीमन से संबंधित नए विधेयक का मसौदा तैयार किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इस पहल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन से जुड़े नियमों को अद्यतन करना बताया जा रहा है, ताकि जनसंख्या बदलाव और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर प्रतिनिधित्व को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। इससे पहले संसद में इस विधेयक को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी, जिसके बाद सरकार ने रणनीति में बदलाव करते हुए इसे फिर से पेश करने का निर्णय लिया है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि हाल के विधानसभा चुनावों में कुछ राज्यों में मिले परिणामों के बाद सत्ता पक्ष अपने संसदीय समीकरणों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इस बीच प्रमुख विपक्षी दल Indian National Congress ने सरकार पर आरोप लगाया है कि बिना व्यापक सहमति और सभी दलों से विचार-विमर्श के किसी भी बड़े चुनावी सुधार को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

    वहीं सत्तारूढ़ दल Bharatiya Janata Party इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक और संसदीय रणनीति को और मजबूत करने में जुटा है। पार्टी नेतृत्व, जिसमें Narendra Modi और Amit Shah जैसे शीर्ष नेता शामिल हैं, चुनावी सुधारों को दीर्घकालिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बता रहे हैं। सरकार का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से न केवल खर्च कम होगा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी अधिक प्रभावी बनेगी।

    इसके समानांतर ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ प्रस्ताव पर भी काम तेज कर दिया गया है। इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करने में जुटी है और इसके कार्यकाल को आगे बढ़ाया गया है। समिति द्वारा किए जा रहे अध्ययन में चुनावी प्रक्रियाओं के समन्वय, राज्यों और केंद्र के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवहारिकता और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन दोनों प्रस्तावों का असर केवल चुनावी प्रणाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की संघीय संरचना और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी दलों, जिनमें All India Trinamool Congress और Dravida Munnetra Kazhagam शामिल हैं, ने भी इन प्रस्तावों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं और कहा है कि क्षेत्रीय संतुलन और राज्यों के अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

    कुल मिलाकर, परिसीमन विधेयक और एक राष्ट्र-एक चुनाव जैसे प्रस्तावों के चलते देश की राजनीतिक दिशा एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। आने वाले महीनों में संसद और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर और अधिक बहस और निर्णय की संभावना है, जिससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकता है।

  • राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    नई दिल्ली । देश में राज्यसभा की 24 रिक्त सीटों पर चुनाव की घोषणा के बाद राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार यह मतदान 10 राज्यों में कराया जाएगा, जिससे संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व और शक्ति संतुलन पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की संभावना है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर रणनीति बनानी शुरू कर दी है और संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन तेज हो गया है। इस चुनाव को आगामी संसदीय समीकरणों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्यसभा में दलों की स्थिति में बदलाव संभव है।

    सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार कई राज्यों में वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं के नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल किए जा रहे हैं। इनमें पूर्वोत्तर के प्रमुख नेता बीरेन सिंह, पंजाब के नेता रवनीत बिट्टू और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। हालांकि अंतिम निर्णय संबंधित दलों के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा राज्यवार राजनीतिक परिस्थितियों और विधायकों की संख्या के आधार पर लिया जाएगा। उम्मीदवार चयन में क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठनात्मक अनुभव जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    चुनाव कार्यक्रम के अनुसार नामांकन प्रक्रिया से लेकर मतदान और मतगणना तक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। कुछ राज्यों में जहां एक दल का स्पष्ट बहुमत है, वहां निर्विरोध निर्वाचन की संभावना जताई जा रही है, जबकि कुछ अन्य राज्यों में कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां विधानसभा में बहुदलीय संतुलन है, वहां क्रॉस वोटिंग और रणनीतिक मतदान के कारण परिणाम अनिश्चित रह सकते हैं।

    राजनीतिक दलों ने इस चुनाव को गंभीरता से लेते हुए अपने विधायकों के साथ लगातार बैठकें शुरू कर दी हैं। विधायकों की संख्या और वोटिंग गणित को ध्यान में रखते हुए हर पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। इस प्रक्रिया में पार्टी अनुशासन और व्हिप जारी करने जैसे कदम भी अहम साबित हो सकते हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल रिक्त सीटों को भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे राज्यसभा में सत्ता संतुलन पर भी असर पड़ेगा। आने वाले समय में विधेयकों की मंजूरी और संसदीय बहसों में दलों की भूमिका इसी परिणाम से प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि सभी प्रमुख दल इस चुनाव को लेकर बेहद सतर्क और सक्रिय नजर आ रहे हैं।

    इसके अलावा कई राज्यों में स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी इस चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। क्षेत्रीय दलों की भूमिका उन राज्यों में खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी जहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं है। ऐसे में छोटे दल और निर्दलीय विधायक भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

    कुल मिलाकर राज्यसभा की 24 सीटों के लिए घोषित यह चुनाव देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। उम्मीदवारों की अंतिम सूची सामने आने के बाद राजनीतिक हलचल और भी तेज होने की संभावना है और सभी की नजर अब मतदान प्रक्रिया और उसके परिणामों पर टिकी हुई है।

  • बंगाल चुनाव में बड़ा उलटफेर: बूथ-स्तरीय डेटा से खुलासा, टीएमसी के कई दिग्गज अपने ही क्षेत्रों में कमजोर साबित

    बंगाल चुनाव में बड़ा उलटफेर: बूथ-स्तरीय डेटा से खुलासा, टीएमसी के कई दिग्गज अपने ही क्षेत्रों में कमजोर साबित

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में बूथ-स्तरीय आंकड़ों ने एक बार फिर चुनावी समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के प्रदर्शन से जुड़े डेटा में सामने आया है कि कई बड़े नेता अपने ही क्षेत्रों में अपेक्षित समर्थन हासिल करने में असफल रहे। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब राज्य की राजनीति में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा बनी हुई है और हर चुनावी आंकड़ा राजनीतिक विश्लेषण का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

    बूथ स्तर के विस्तृत आंकड़ों के अनुसार, कई वरिष्ठ टीएमसी नेताओं ने अपनी सीटें जीतने के बावजूद अधिकांश मतदान केंद्रों पर अपेक्षित वोट शेयर हासिल नहीं किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कुछ नेताओं को अपने ही घरेलू पोलिंग बूथों पर भी कमजोर प्रदर्शन का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी राजनीतिक पकड़ को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि कुछ नेता मजबूत समर्थन के साथ विजयी भी रहे, लेकिन समग्र तस्वीर मिश्रित परिणामों को दर्शाती है।

    विश्लेषण में यह भी देखा गया कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर केवल कुछ बूथों के प्रदर्शन पर निर्भर रहा। कुछ क्षेत्रों में उम्मीदवारों ने सीमित बूथों पर ही मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि अन्य स्थानों पर वे अपेक्षाकृत कमजोर रहे। इसके बावजूद, कुल वोटों के संतुलन ने कई नेताओं को जीत दिलाई, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चुनावी परिणाम केवल बूथ स्तर की संख्या पर निर्भर नहीं करते, बल्कि व्यापक वोट वितरण का भी बड़ा प्रभाव होता है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस तरह के बूथ डेटा से यह समझने में मदद मिलती है कि किसी पार्टी की जमीनी पकड़ कितनी मजबूत है। पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्य में बूथ स्तर का प्रदर्शन अक्सर भविष्य की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि पार्टियां अब इन आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण कर अपनी रणनीतियों को पुनर्गठित करने में लगी हुई हैं।

    हालांकि, चुनावी परिणाम यह भी दिखाते हैं कि कई सीटों पर स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों की छवि और क्षेत्रीय समीकरणों ने अंतिम नतीजों को प्रभावित किया। कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सीमित बूथों पर मजबूत प्रदर्शन के बावजूद सीट जीत ली, जबकि कुछ अन्य अपेक्षाकृत अधिक बूथों पर बढ़त के बावजूद हार गए। यह स्थिति बताती है कि चुनावी राजनीति में मतदाता व्यवहार काफी जटिल और बहुआयामी होता है।

    राज्य की राजनीति में यह डेटा आने वाले समय में रणनीतिक बदलावों का संकेत माना जा रहा है। पार्टियां अब बूथ स्तर पर संगठनात्मक मजबूती और स्थानीय संपर्क को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर सकती हैं। फिलहाल यह बूथ-स्तरीय विश्लेषण राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है और इसके आधार पर भविष्य की चुनावी रणनीतियों में बदलाव की संभावना भी जताई जा रही है।

  • फालता उपचुनाव में बदले राजनीतिक समीकरण, BJP जीत के बेहद करीब, TMC को बड़ा झटका

    फालता उपचुनाव में बदले राजनीतिक समीकरण, BJP जीत के बेहद करीब, TMC को बड़ा झटका


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की फालता विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव की मतगणना ने राज्य की राजनीति में नया संदेश देने का काम किया है। शुरुआती रुझानों से लेकर लगातार सामने आ रहे आंकड़ों तक भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह बड़ी बढ़त बनाई, उसने चुनावी तस्वीर लगभग साफ कर दी है। भाजपा उम्मीदवार ने एक लाख से अधिक वोटों की बढ़त हासिल कर जीत की ओर मजबूत कदम बढ़ा दिए हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान, जो कुछ समय पहले तक चर्चा के केंद्र में थे, चुनावी मुकाबले में चौथे स्थान पर पहुंचते दिखाई दे रहे हैं।

    फालता सीट पर हुए पुनर्मतदान के बाद यह मुकाबला पहले से ही राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। मतदान से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर खान द्वारा चुनाव से पीछे हटने की घोषणा ने पूरे चुनावी समीकरण को बदल दिया था। हालांकि तकनीकी रूप से उनका नाम और चुनाव चिन्ह मतपत्र प्रक्रिया में मौजूद रहा, लेकिन उनके इस फैसले ने राजनीतिक माहौल को पूरी तरह प्रभावित किया। इसका असर मतगणना के दौरान भी साफ दिखाई दिया, जहां अपेक्षा से बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती नजर आई।

    मतगणना के कई चरण पूरे होने के बाद भाजपा उम्मीदवार ने लगातार अपनी बढ़त मजबूत रखी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उन्हें भारी संख्या में मतदाताओं का समर्थन मिलता दिखाई दिया। वहीं दूसरे स्थान के लिए भी मुकाबला बना रहा, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर सके। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इस उपचुनाव में परिस्थितियों ने सामान्य राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया और इसका सीधा लाभ भाजपा को मिला।

    फालता विधानसभा सीट दक्षिण 24 परगना जिले के अंतर्गत आती है और राज्य की महत्वपूर्ण राजनीतिक सीटों में गिनी जाती है। वर्षों तक यह क्षेत्र अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रभाव का केंद्र रहा है। पहले इसे वामपंथी राजनीति का मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन बाद के वर्षों में तृणमूल कांग्रेस ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की और लगातार चुनावी सफलता हासिल की। हालांकि इस बार के चुनावी रुझान नए बदलाव की ओर संकेत करते दिखाई दे रहे हैं।

    राजनीतिक जानकारों की नजर अब अंतिम परिणामों पर टिकी हुई है, लेकिन मौजूदा स्थिति ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि फालता का यह चुनाव सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं रहा। इसने बंगाल की बदलती राजनीतिक दिशा और मतदाताओं के बदलते रुझानों पर भी नई बहस शुरू कर दी है। अगर अंतिम नतीजों में यही रुझान कायम रहता है तो यह भाजपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि और तृणमूल कांग्रेस के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय बन सकता है।

  • बंगाल की फाल्टा सीट पर सस्पेंस गहरा, टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटना बना चर्चा का केंद्र

    बंगाल की फाल्टा सीट पर सस्पेंस गहरा, टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटना बना चर्चा का केंद्र


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की फाल्टा विधानसभा सीट पर होने वाले पुनर्मतदान से ठीक पहले राजनीतिक घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया है, जहां सत्ताधारी दल के उम्मीदवार जहांगीर खान ने अचानक चुनावी मैदान से हटने की घोषणा कर सभी को चौंका दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में मतदान से पहले राजनीतिक गतिविधियां अपने चरम पर थीं और सभी दल अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हुए थे। जहांगीर खान ने अपने आवास पर आयोजित एक प्रेस वार्ता में यह ऐलान करते हुए कहा कि वे इस चुनावी प्रक्रिया से खुद को अलग कर रहे हैं, जिससे स्थानीय राजनीति में नए सवाल खड़े हो गए हैं। उनका यह निर्णय न केवल उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है, बल्कि फाल्टा सीट की चुनावी समीकरणों पर भी इसका सीधा असर पड़ने की संभावना है।

    फाल्टा सीट डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और इसे राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील माना जाता है, जहां हर चुनाव में मुकाबला बेहद रोचक और कड़ा रहता है। हाल ही में हुए मतदान चरण के दौरान कुछ मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से जुड़ी अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद चुनाव आयोग ने पुनर्मतदान का निर्णय लिया था। अब 21 मई को होने वाले इस दोबारा मतदान से पहले उम्मीदवार का हट जाना राजनीतिक दलों के लिए रणनीतिक चुनौती बन गया है।

    जहांगीर खान ने अपने बयान में क्षेत्र के विकास और शांति को प्राथमिकता देने की बात कही और यह भी संकेत दिया कि वे चाहते हैं कि फाल्टा क्षेत्र में स्थिरता और प्रगति बनी रहे। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय विकास योजनाओं और विशेष पैकेज जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना अधिक महत्वपूर्ण है। हालांकि उनके इस कदम के पीछे असली कारण को लेकर राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग अटकलें लगाई जा रही हैं, और विभिन्न दल इस घटनाक्रम को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं।

    इस बीच पार्टी की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया है कि उन्हें इस फैसले की जानकारी मिल चुकी है, लेकिन इसके पीछे के कारण स्पष्ट नहीं हैं। यह स्थिति संगठन के भीतर भी एक तरह की अनिश्चितता पैदा कर रही है, क्योंकि चुनाव से ठीक पहले उम्मीदवार का हटना किसी भी दल के लिए रणनीतिक झटका माना जाता है।

    दूसरी ओर, चुनावी प्रचार के दौरान जहांगीर खान का आक्रामक अंदाज भी चर्चा में रहा था, जहां वे अपने भाषणों में लोकप्रिय फिल्मी संवादों का इस्तेमाल कर समर्थकों को आकर्षित करते नजर आए थे। लेकिन अब उनके अचानक पीछे हटने से राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल गया है और विरोधी दल इसे अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

    साथ ही, कानूनी मोर्चे पर भी यह मामला सक्रिय रहा है, जहां उन्होंने गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए अदालत का रुख किया था और अग्रिम जमानत की मांग की थी। इस पूरे घटनाक्रम ने फाल्टा चुनाव को और अधिक जटिल और अनिश्चित बना दिया है, जहां अब सभी की नजरें आगामी मतदान और उसके बाद आने वाले नतीजों पर टिकी हुई हैं, जो 24 मई को घोषित किए जाएंगे।

  • Bengal: चुनाव में करारी हार के बाद TMC में घमासान…. विधायकों ने खोला आलाकमान के खिलाफ मार्चा

    Bengal: चुनाव में करारी हार के बाद TMC में घमासान…. विधायकों ने खोला आलाकमान के खिलाफ मार्चा


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal ) विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party- BJP) के हाथों मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदरखाने भारी घमासान शुरू हो गया है। इतने सालों तक पार्टी लाइन का सख्ती से पालन करने वाले कई विधायक और दिग्गज नेता अब अपनी ही लीडरशिप के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। पूर्व क्रिकेटर और मंत्री रहे मनोज तिवारी से लेकर सांसद-अभिनेता देव तक ने पार्टी आलाकमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कुछ नेताओं ने तो चुनाव में हुई इस हार का सीधा ठीकरा महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के सिर फोड़ दिया है। हार के बाद ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देने के फैसले पर भी कई विधायकों ने असहमति जताई है।


    गुटबाजी और ‘लॉबी’ को ठहराया हार का जिम्मेदार

    पार्टी के कई विधायकों ने खुलेआम गुटबाजी को हार की सबसे बड़ी वजह बताया है। मुर्शिदाबाद के हरिहरपारा से टीएमसी विधायक नियामत शेख ने सीधे तौर पर कहा, “पार्टी में सिर्फ लॉबी और गुटबाजी हावी है।” उन्होंने इसके लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है। नियामत शेख ने बताया कि उन्होंने बार-बार आलाकमान को मुर्शिदाबाद में बढ़ती गुटबाजी को लेकर चेतावनी दी थी, लेकिन उनकी बातों को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने आलाकमान पर आरोप लगाया कि जमीनी हकीकत यानी ‘ह्यूमन फैक्टर’ को नजरअंदाज कर सोशल मीडिया और तकनीक पर ज्यादा भरोसा किया गया।

    शेख ने चुनाव से ठीक पहले हुमायूं कबीर को सस्पेंड किए जाने को भी गलत फैसला बताया। हुमायूं कबीर ने बाद में अपनी नई पार्टी (AUJP) बनाई और दो सीटें जीतीं, जिससे मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो गया।


    मुस्लिम वोटों का बंटवारा और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुर्शिदाबाद के रघुनाथगंज से टीएमसी विधायक अखरुज्जमां ने भी अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में हार का कारण मुस्लिम वोटों के बंटवारे को माना है। उनका कहना था कि मुसलमानों ने टीएमसी और बीजेपी को छोड़कर बाकी सबको वोट दिया। एक अन्य टीएमसी विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमारा मुस्लिम वोट बैंक बिखर गया, जबकि हिंदू वोट पूरी तरह से एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में चला गया। इस विधायक ने चुनावी रणनीतिकार एजेंसी (I-PAC) पर अत्यधिक निर्भर रहने और उन्हें ‘बिचौलिया’ बना देने पर भी भारी नाराजगी जताई।

    ममता बनर्जी के इस्तीफे से इनकार पर अपनों के ही सवाल
    विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। अब इस फैसले पर पार्टी के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं। हावड़ा के बागनान से चार बार के विधायक अरुणभ सेन ने तंज कसते हुए कहा, “ममता बनर्जी एक बड़ा नाम हैं। लेकिन अगर मैं उनकी जगह होता, तो इतनी बड़ी हार के बाद निश्चित तौर पर इस्तीफा दे देता।”

    एक अन्य विधायक ने कहा कि हमें हार स्वीकार करनी चाहिए। हार न मानने की जिद लोगों के बीच पार्टी की छवि को और खराब कर रही है। हालांकि, वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने ममता बनर्जी का बचाव करते हुए कहा कि इस्तीफा न देने का फैसला ममता का अकेले का नहीं था, बल्कि यह सभी निर्वाचित विधायकों का सर्वसम्मत फैसला था।


    देव और मनोज तिवारी का सीधा हमला

    सांसद देव की नाराजगी: लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने वाले और विधानसभा चुनाव में प्रचार करने वाले अभिनेता देव ने मीडिया से कहा कि वह ‘घाटल मास्टरप्लान’ को लेकर अब झूठ नहीं बोलेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता और अभिषेक बनर्जी ने उन्हें झूठा भरोसा दिया था कि बाढ़ नियंत्रण से जुड़े इस लंबे समय से लटके प्रोजेक्ट को जल्द पूरा किया जाएगा।

    मनोज तिवारी के गंभीर आरोप: चुनाव परिणाम आने के महज दो दिन बाद पूर्व खेल राज्य मंत्री मनोज तिवारी ने एक फेसबुक लाइव में टीएमसी सरकार को ‘भ्रष्ट’ बताते हुए कहा कि इसे सत्ता से उखाड़ फेंकना ही सही था। उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी और पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास ने उन्हें सरकार में पूरी तरह किनारे कर दिया था। तिवारी ने बीजेपी को उसकी इस ‘प्रचंड जीत’ के लिए बधाई भी दी।

    वोटर लिस्ट में गड़बड़ी: मालदा के मालतीपुर से विधायक अब्दुर रहीम बोक्सी और केएमसी के डिप्टी मेयर अतिन घोष ने चुनाव आयोग के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के तहत वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने को हार का बड़ा कारण बताया। अतिन घोष ने राज्यभर में चल रही भारी सत्ता विरोधी लहर और धार्मिक ध्रुवीकरण को भी हार की वजह बताया।

    पार्टी के खिलाफ बढ़ती बयानबाजी को देखते हुए टीएमसी ने अपने 5 प्रवक्ताओं- रिजू दत्ता, कृष्णेंदु चौधरी, कोहिनूर मजूमदार, पापिया घोष और कार्तिक घोष को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोहिनूर मजूमदार और कृष्णेंदु चौधरी ने सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी के काम करने के तरीके की आलोचना की थी, जबकि रिजू दत्ता ने चुनाव के बाद हुई हिंसा को रोकने के लिए बीजेपी के उठाए गए कदमों की तारीफ की थी।

  • लिकर लॉकडाउन से कारोबार को बड़ा झटका, 1400 करोड़ तक नुकसान का अनुमान, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बढ़े

    लिकर लॉकडाउन से कारोबार को बड़ा झटका, 1400 करोड़ तक नुकसान का अनुमान, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बढ़े

    नई दिल्ली।  पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के चलते लागू की गई शराबबंदी ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान लगाए गए इस प्रतिबंध को लेकर सत्ताधारी दल और चुनावी व्यवस्था से जुड़े निर्णयों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। इस फैसले ने न केवल राजनीतिक बहस को तेज किया है बल्कि राज्य के कारोबारी वर्ग पर भी इसका सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    निर्णय के अनुसार राज्य में शराब की बिक्री और परोसने पर 20 अप्रैल से लेकर 29 अप्रैल तक अलग-अलग चरणों में प्रतिबंध लागू किया गया है। इस अवधि में कुल मिलाकर लगभग साढ़े नौ दिन तक शराब की बिक्री पर रोक रहेगी। मतदान के चरणों और मतगणना के आसपास के समय को देखते हुए यह प्रतिबंध लागू किया गया है, हालांकि बीच में कुछ दिनों के लिए सीमित राहत भी दी गई है।

    इस फैसले का असर राज्य के व्यापारिक ढांचे पर स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है। अनुमान के अनुसार इस अवधि में सरकार को लगभग 1400 करोड़ रुपये तक के राजस्व नुकसान की संभावना है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा राज्य की राजधानी और आसपास के क्षेत्रों से आने वाला बताया जा रहा है। पूरे राज्य में हजारों की संख्या में शराब की दुकानें और बार संचालित होते हैं, जिनका दैनिक कारोबार करोड़ों रुपये में होता है। ऐसे में लंबे समय तक पाबंदी से कारोबार ठप होने की स्थिति बन गई है।

    इस निर्णय का असर केवल शराब उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। खासकर वे व्यवसाय जो बार और खाद्य सेवाओं पर निर्भर हैं, उन्हें ग्राहकों की कमी और बिक्री में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है।

    शराब कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि पहले से ही स्टॉक और बिक्री को लेकर कई तरह की पाबंदियां लागू थीं और अब लंबे समय की बंदी से उनका व्यापार बुरी तरह प्रभावित होगा। उनका यह भी कहना है कि अलग-अलग चरणों में लागू नियमों के कारण स्थिति और अधिक जटिल हो गई है।

    वहीं इस पूरे मामले पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। सत्ताधारी दल के नेताओं का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया के नाम पर ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं जो आम जनता और छोटे कारोबारियों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। उनका कहना है कि यह निर्णय राजनीतिक रूप से प्रभावित प्रतीत होते हैं और इसका असर चुनावी माहौल पर भी पड़ सकता है।

    दूसरी ओर विपक्षी दलों का कहना है कि यह प्रतिबंध निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोका जा सके।

     पश्चिम बंगाल में लागू यह शराबबंदी अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गई है बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। इससे जहां एक ओर राज्य का राजस्व प्रभावित होने की आशंका है, वहीं दूसरी ओर चुनावी माहौल और भी अधिक गर्म हो गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और अधिक तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती नई दिल्ली।

  • West Bengal. चुनाव से पहले TMC ने किया SIR में काटे गए 90 लाख नाम फिर जोड़ने का ऐलान

    West Bengal. चुनाव से पहले TMC ने किया SIR में काटे गए 90 लाख नाम फिर जोड़ने का ऐलान


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal.) में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) की तारीखें नजदीक आती जा रही है, वैसे-वैसे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सियासी हमले तेज होते दिख रहे हैं। भाजपा (BJP) ने जहां आज चुनावी घोषणा पत्र (Election Manifesto) में लोक लुभावन वादे कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बड़े वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की है, वहीं TMC महासचिव और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister Mamata Banerjee) के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने भाजपा के हिन्दू कार्ड पर नया दांव चल दिया है। इतना ही नहीं बनर्जी ने चुनावों से पहले एक बड़ा ऐलान भी कर दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर उनकी पार्टी टीएमसी फिर से सत्ता में आती है तो SIR में काटे गए सभी 90 लाख लोगों के नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़े जाएंगे।

    एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में अभिषेक बनर्जी ने इसका ऐलान किया। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम जानबूझकर मतादाता सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग और भाजपा यह कहे कि जिन 90 लाख लोगों के नाम काटे गए हैं, वे सभी बांग्लादेशी थे।


    63% नाम हिंदुओं के काटे गए

    AITC के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कहा, “…मैं यह भरोसा दिलाता हूँ कि जब TMC फिर जीतेगी, तो वोटर लिस्ट से हटाए गए सभी लोगों के नाम वापस जोड़ दिए जाएँगे।” उन्होंने कहा, “BJP और चुनाव आयोग को यह कहना चाहिए कि जिन 90 लाख लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे सभी बांग्लादेशी थे।” बनर्जी ने कहा, “उनके बयानों के अनुसार, इनमें से 63% नाम हिंदुओं के थे, तो फिर वे भी ज़रूर बांग्लादेशी या रोहिंग्या होंगे…यानी 90 में से 57 लाख हिन्दू बांग्लादेशी रोहिंग्या हैं।”


    6 माह में UCC लागू करेंगे: BJP

    बता दें कि बनर्जी का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने पर छह महीने के भीतर राज्य में समान नागरिक संहिता लागू (यूसीसी) लागू की जाएगी और ‘बंगाल के सपूत’ को मुख्यमंत्री बनाने के साथ ही ‘राम राज्य’ स्थापित किया जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा का ‘संकल्प पत्र’ जारी करते हुए कहा कि घुसपैठ और तुष्टीकरण के खिलाफ भाजपा के रुख को कल्याणकारी प्रयासों से जोड़ा जाएगा। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के इस आरोप को भी खारिज किया कि भाजपा पश्चिम बंगाल के लोगों की खान-पान की आदतों में दखल देगी। दूसरी तरफ, अभिषेक बनर्जी 63 फीसदी हिन्दू मतदाताओं के नाम काटे जाने के बहाने भाजपा को हिन्दू विरोधी ठहराने की कोशिश कर रहे हैं और टीएमसी के पक्ष में ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं।

  • भोपाल में साढ़े चार लाख में से 1.30 लाख मतदाताओं को नोटिस, नाम काटने की प्रक्रिया तेज

    भोपाल में साढ़े चार लाख में से 1.30 लाख मतदाताओं को नोटिस, नाम काटने की प्रक्रिया तेज


    भोपाल । भोपाल में सात विधानसभा क्षेत्रों में एक सप्ताह पहले शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण SIR के बाद मतदाता सूची में नाम कटने वालों की संख्या में वृद्धि हो गई है। वर्तमान में, इन मतदाताओं की संख्या बढ़कर 4 लाख 45 हजार 32 हो गई है जिसमें हर 24 घंटे में करीब 1500 और मतदाताओं का नाम कटने का आंकड़ा सामने आ रहा है। अब इन नामों को बिना किसी नोटिस के सीधे मतदाता सूची से हटा दिया जाएगा। यह प्रक्रिया जिले के चुनाव कार्यालय के निर्देशों के अनुसार चल रही है।

    इस विशेष पुनरीक्षण के दौरान मुख्य रूप से मृतक अनुपस्थित स्थानांतरित या दोहरी पंजीकरण के कारण नाम कटने की संभावना है। जिले के निर्वाचन कार्यालय ने बीएलओ को यह निर्देश दिए हैं कि वे मृत, अनुपस्थित और स्थानांतरित मतदाताओं की जानकारी इकट्ठा कर सूची से बाहर करें। इसके अलावा, ‘नो मैपिंग’ वाले मतदाताओं के आंकड़े भी जुटाए जा रहे हैं और इस वर्ग के मतदाताओं के नाम सीधे अनकलेक्टेबल श्रेणी में डाले जा रहे हैं।

    यह विशेष अभियान इस उद्देश्य से चलाया जा रहा है ताकि चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और सटीक रखा जा सके। जिला निर्वाचन कार्यालय ने सभी बीएलओ से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि बिना किसी गलतफहमी के किसी का भी नाम न कटे।इस पुनरीक्षण के तहत, 85 वार्डों में मतदाताओं की सुनवाई की जाएगी। यह प्रक्रिया 18 दिसंबर तक जारी रहेगी जिसमें मतदाता अपनी नागरिकता को प्रमाणित करने के लिए दस्तावेज़ पेश करेंगे।

    जिला निर्वाचन कार्यालय ने 23 दिसंबर को ड्रॉफ्ट रोल जारी करने की तारीख तय की है जिसके बाद अंतिम नामों की सूची तैयार की जाएगी।दूसरी ओर, बैरसिया तहसील में सुनवाई की प्रक्रिया अलग से की जाएगी। जबकि शेष मतदान क्षेत्रों में वार्ड स्तर पर ही सुनवाई की जाएगी, जहां पर संबंधित मतदाता अपनी स्थिति का स्पष्टिकरण देंगे।

    यह विशेष पुनरीक्षण इस बात को सुनिश्चित करेगा कि चुनावी प्रक्रिया में शामिल हर मतदाता का नाम सही तरीके से और निष्पक्ष रूप से लिस्ट में हो। भोपाल में सात विधानसभा क्षेत्रों में एक सप्ताह पहले शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान, 1.30 लाख मतदाताओं के नाम कटने की संभावना है। बीएलओ द्वारा मृत, अनुपस्थित स्थानांतरित और अन्य कारणों से नाम हटाए जाएंगे। 18 दिसंबर तक दस्तावेज़ जमा होंगे और 23 दिसंबर को ड्रॉफ्ट रोल जारी किया जाएगा।