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  • पंजाब चुनाव से पहले AAP में बगावत, 40 उम्मीदवारों की सूची आते ही दो विधायकों ने छोड़ी पार्टी..

    पंजाब चुनाव से पहले AAP में बगावत, 40 उम्मीदवारों की सूची आते ही दो विधायकों ने छोड़ी पार्टी..

    नई दिल्ली । पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्य की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) को लगातार दो दिनों में बड़ा झटका लगा है। पार्टी की ओर से 31 अक्टूबर को 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी किए जाने के अगले ही दिन उसके दो मौजूदा विधायकों ने प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने वाले नेताओं में पटियाला जिले की सनौर विधानसभा सीट से विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा और समाना सीट से विधायक चेतन सिंह जौड़ामाजरा शामिल हैं। दोनों के फैसले से चुनाव से पहले पार्टी के भीतर असंतोष और राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

    दोनों विधायकों के इस्तीफे की जानकारी 1 नवंबर को सामने आई। हरमीत सिंह पठानमाजरा ने अपना इस्तीफा पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को भेजा है। वहीं चेतन सिंह जौड़ामाजरा ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की घोषणा की। दोनों विधायकों के नाम 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए जारी की गई आम आदमी पार्टी की पहली सूची में शामिल नहीं थे। इस घटनाक्रम के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

    दोनों नेताओं ने चंडीगढ़ में रविवार शाम 4:30 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाने की जानकारी दी थी। इसमें उनके पार्टी छोड़ने के फैसले और इसके पीछे के कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद जताई गई। उनके भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की भी चर्चा सामने आई, हालांकि इस्तीफे के समय तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। इसलिए उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।

    हरमीत सिंह पठानमाजरा और आम आदमी पार्टी के नेतृत्व के बीच पिछले कुछ समय से मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं। सितंबर 2025 में पंजाब में आई बाढ़ और उनके विधानसभा क्षेत्र में नदी-नालों की सफाई के मुद्दे पर उन्होंने सरकार तथा पार्टी नेतृत्व के कामकाज पर सवाल उठाए थे। इस घटनाक्रम के बाद उनके और भगवंत मान सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनने लगी थी। इसके बाद उनकी सरकारी सुरक्षा वापस लिए जाने का मामला भी चर्चा में आया था।

    चेतन सिंह जौड़ामाजरा समाना विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह भगवंत मान सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं। हालांकि, सितंबर 2024 में मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल के दौरान उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया था। इसके बाद समाना क्षेत्र में पार्टी की संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर भी बदलाव हुए। पूर्व अकाली नेता सुरजीत सिंह रखड़ा को आम आदमी पार्टी में शामिल करने और उन्हें समाना विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी बनाए जाने के बाद जौड़ामाजरा की राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हुई थीं।

    दूसरी ओर, हरमीत सिंह पठानमाजरा लंबे समय से पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों को लेकर चर्चा में रहे हैं। सितंबर 2025 में बाढ़ की स्थिति और अपने क्षेत्र में जल निकासी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने सरकार के सामने सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि क्षेत्र में नदी-नालों की सफाई और बाढ़ से बचाव के लिए पर्याप्त कदम उठाने की जरूरत है। इस मुद्दे पर उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद सामने आए थे। बाद के घटनाक्रम में उनकी सरकारी सुरक्षा वापस लिए जाने की बात भी सामने आई थी।

    पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव को देखते हुए आम आदमी पार्टी ने पहले ही उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। 31 अक्टूबर को घोषित पहली सूची में 40 विधानसभा क्षेत्रों के उम्मीदवारों के नाम शामिल किए गए थे। पार्टी ने चुनाव से काफी पहले उम्मीदवारों की घोषणा करके अपनी तैयारियों को गति देने की कोशिश की है। हालांकि, सूची जारी होने के अगले ही दिन दो मौजूदा विधायकों के इस्तीफे ने पार्टी के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

    पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं और 2027 में होने वाले चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी के दो विधायकों का पार्टी छोड़ना चुनावी तैयारियों के बीच महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में दोनों नेताओं की आगे की राजनीतिक गतिविधियों और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी।

  • रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक का शक्ति प्रदर्शन, राहुल गांधी की अपील से गरमाई दिल्ली, SIR पर चुनाव आयोग से आर-पार

    रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक का शक्ति प्रदर्शन, राहुल गांधी की अपील से गरमाई दिल्ली, SIR पर चुनाव आयोग से आर-पार


    नई दिल्ली ।
    दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में रविवार, 1 नवंबर को विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक की महारैली आयोजित की जा रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित इस कार्यक्रम में 19 विपक्षी दलों के नेता और कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं। विपक्ष ने इसे ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान का हिस्सा बताते हुए लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई करार दिया है।

    रैली से पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर विपक्षी नेताओं की बैठक हुई। इसमें प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई प्रमुख नेता शामिल हुए। इसके बाद सभी प्रमुख नेताओं के मिंटो रोड-कनॉट प्लेस जंक्शन से रामलीला मैदान तक पैदल मार्च करने की योजना बनाई गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लोगों से इस मार्च और महारैली में शामिल होने की अपील की। उन्होंने कहा कि लोग कनॉट प्लेस पहुंचकर उनके साथ पैदल चलें या सीधे रामलीला मैदान आएं, लेकिन कार्यक्रम में जरूर शामिल हों।

    रैली में 10 लाख लोगों के पहुंचने का दावा विपक्षी नेताओं की ओर से किया गया है। वहीं, दिल्ली पुलिस का अनुमान लगभग 50 हजार लोगों के आने का है। मंच, कुर्सियों और सुरक्षा व्यवस्था के कारण मैदान में 30 से 40 हजार लोगों के बैठने की क्षमता रहने की बात सामने आई है। सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस ने पूरे क्षेत्र को अलग-अलग जोन में बांटकर निगरानी की व्यवस्था की है।

    कांग्रेस और सहयोगी दलों के नेताओं ने रैली को लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा आंदोलन बताया। सांसद सुखदेव सिंह भगत ने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों से लोग दिल्ली पहुंच रहे हैं और उनके आने से होटल, दुकान तथा खानपान से जुड़े स्थानीय कारोबार को भी लाभ मिल सकता है। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने बताया कि निर्धारित समय से पहले ही सुबह 9 बजे से कार्यकर्ताओं का मैदान में पहुंचना शुरू हो गया था। प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल ने भी तैयारियों का जायजा लिया।

    टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति के हित के लिए नहीं, बल्कि युवाओं, महिलाओं, किसानों और मजदूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद में विपक्ष को जनता के मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलने पर नेताओं को सड़क पर उतरना पड़ रहा है। सीपीआई सांसद पी. संतोष ने भी बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने का दावा किया।

    दूसरी ओर, भाजपा और एनडीए नेताओं ने रैली के आयोजन तथा विपक्ष के आरोपों पर सवाल उठाए। भाजपा की दिल्ली इकाई ने सोशल मीडिया पर एक पोस्टर जारी कर INDIA ब्लॉक की रैली को निशाना बनाया। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना विपक्ष की आदत बन गई है। केशव प्रसाद मौर्य ने राहुल गांधी के नेतृत्व और रैली पर टिप्पणी करते हुए इसे लोकतंत्र तथा संविधान का मजाक बताया।

    बिहार में जेडीयू महासचिव श्याम रजक ने 10 लाख लोगों के जुटने के दावे को खोखला बताया। पार्टी प्रवक्ता राजीव रंजन ने विपक्ष पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाया। बिहार के मंत्री राम कृपाल यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी रैली के मुद्दों तथा समय पर सवाल उठाए। पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने विपक्ष पर व्यापारियों को परेशान करने और लोगों को रैली में लाने के लिए पैसे देने का आरोप लगाया।

    रैली के समय को लेकर व्यापारियों की चिंताओं पर भी राजनीतिक बयानबाजी हुई। शिवसेना (शिंदे गुट) के प्रवक्ता कृष्ण हेगड़े ने कहा कि त्योहारों के दौरान राजनीतिक आयोजनों से कारोबार प्रभावित हो सकता है। उत्तर प्रदेश के मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने भी आरोप लगाया कि रैली से व्यापारियों की आजीविका पर असर पड़ सकता है। इस तरह SIR और चुनाव आयोग के मुद्दे पर आयोजित महारैली में विपक्ष के शक्ति प्रदर्शन के साथ भाजपा और एनडीए के विरोधी बयान भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    नई दिल्ली ।इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान कराया गया। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2023 में हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए सैन्य अभियान के साथ ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार की आलोचना होती रही है। ऐसे में चुनाव के परिणाम देश की राजनीति और आने वाली सरकार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

    इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र थे। नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख और मध्यमार्गी नेता गादी आइजेनकोट प्रमुख चुनौती के रूप में मैदान में हैं। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी उनके राजनीतिक गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षणों में दोनों पक्षों के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिले थे। हालांकि, इजरायल की गठबंधन आधारित राजनीतिक व्यवस्था के कारण किसी एक दल या गठबंधन के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

    77 वर्षीय बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। चुनाव में इन मुद्दों का असर राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

    गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी विपक्षी खेमे में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। इस तरह नेतन्याहू के सामने अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं का संयुक्त मुकाबला है।

    चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू के समर्थन में बयान दिया था। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर ट्रंप की प्रशंसा की थी। उन्होंने दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता होने की बात कही। चुनाव के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति का यह समर्थन भी राजनीतिक चर्चा का विषय रहा।

    इजरायल में संसदीय चुनाव की प्रक्रिया भारत से अलग है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर मतदान होता है। पूरे देश को एक ही चुनाव क्षेत्र माना जाता है। मतदाता किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल की सूची के पक्ष में वोट डालते हैं। इसी प्रक्रिया के जरिए संसद यानी नेसेट के 120 सदस्यों का चयन किया जाता है।

    संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए किसी राजनीतिक दल को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत प्राप्त करना जरूरी है। इस व्यवस्था के कारण कई छोटे दल भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं और संसद में उनकी मौजूदगी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना सकता। चुनाव के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की संभावना होती है।

    इसके बाद राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन बनाने को लेकर बातचीत होती है। यदि कोई दल या गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। ऐसी स्थिति में छोटे दलों और गठबंधन सहयोगियों की भूमिका निर्णायक बन जाती है।

    इस चुनाव के परिणामों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी। नई सरकार की संरचना का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, गाजा और ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों तथा अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। अंतिम राजनीतिक तस्वीर मतदान के परिणाम और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं से स्पष्ट होगी।

  • कर्नाटक MLC चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ, चारों सीटों पर हारी पार्टी; बैलेट पेपर पर भी उठे सियासी सवाल

    कर्नाटक MLC चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ, चारों सीटों पर हारी पार्टी; बैलेट पेपर पर भी उठे सियासी सवाल


    नई दिल्ली। कर्नाटक विधान परिषद सदस्य यानी MLC चुनाव के नतीजों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। राज्य में सरकार होने के बावजूद पार्टी चारों सीटों पर हार गई। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की जबकि जनता दल सेक्युलर यानी JDS को एक सीट मिली। इन नतीजों के बाद विपक्षी दलों ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। खास तौर पर बैलेट पेपर से हुए चुनाव में कांग्रेस की हार को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस लंबे समय से चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के इस्तेमाल पर सवाल उठाती रही है और बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग करती रही है। ऐसे में कर्नाटक के नतीजों को लेकर भाजपा और JDS ने कांग्रेस पर तंज कसा है।

    कर्नाटक में भाजपा और JDS ने मिलकर चुनाव लड़ा था। परिणाम में भाजपा ने उत्तर पूर्व शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र दक्षिण पूर्व स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल की। वहीं बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट JDS के खाते में गई। चारों सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। इन नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।

    बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में JDS के एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के पुट्टन्ना को हराया। रंगनाथ को 10 हजार 810 वोट मिले जबकि पुट्टन्ना को 9 हजार 902 वोट प्राप्त हुए। इस सीट पर जीत के बाद JDS नेताओं ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति और बैलेट पेपर से मतदान को लेकर उसके रुख पर सवाल उठाए। पार्टी नेता निखिल कुमारस्वामी ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि इस बार कांग्रेस EVM को लेकर आरोप नहीं लगा सकती क्योंकि चुनाव बैलेट पेपर से हुआ था। उन्होंने भाजपा और JDS के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जीत की बधाई भी दी।

    उत्तर पूर्व शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के मौजूदा विधान परिषद सदस्य शशिल जी नामोशी ने कांग्रेस के शरणप्पा मट्टूर को हराया। नामोशी को 15 हजार 596 वोट मिले जबकि मट्टूर को 12 हजार 299 वोट प्राप्त हुए। इस तरह भाजपा उम्मीदवार ने 3 हजार 297 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। इस सीट पर भाजपा ने अपना प्रभाव बरकरार रखा।

    दक्षिण पूर्व स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के केएम सुरेश ने कांग्रेस उम्मीदवार शशि हुलिकुंते मठ को बड़े अंतर से पराजित किया। वहीं पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के एसवी संकनूर ने कांग्रेस के मोहन लिंबिकई को हराया। इन दोनों सीटों पर भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा ने अपना प्रदर्शन मजबूत किया।

    बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मतदान का आंकड़ा भी उल्लेखनीय रहा। यहां 81.98 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। कुल 27 हजार 405 मतदाताओं में से 22 हजार 468 लोगों ने मतदान किया। इनमें 21 हजार 56 मत वैध पाए गए जबकि 1 हजार 857 मत अवैध घोषित किए गए।

    कर्नाटक के इन नतीजों को कांग्रेस के लिए राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। राज्य में सत्ता में होने के बावजूद पार्टी विधान परिषद की चारों सीटें नहीं जीत सकी। दूसरी ओर भाजपा और JDS गठबंधन ने सभी सीटों पर जीत हासिल की। विपक्ष अब इन परिणामों को कांग्रेस के चुनावी दावों पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि विधान परिषद के इन चुनावों के नतीजों से पूरे राज्य के मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा क्योंकि इन निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग आम विधानसभा चुनाव से अलग है।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए 61 सीटों का आंकड़ा अहम

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए 61 सीटों का आंकड़ा अहम

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट की चुनौती है। चुनाव से पहले सामने आए ओपिनियन पोल में दोनों पक्षों के बीच कड़े मुकाबले के संकेत मिले हैं। कुछ सर्वेक्षणों में आइजनकोट की यशार पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में दिखाया गया है, लेकिन किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान नहीं है। ऐसे में चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए छोटे दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है।

    इजरायल की संसद में 120 सीटें, बहुमत के लिए 61 जरूरी

    इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। देश की चुनाव व्यवस्था में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में सीटें आवंटित होती हैं।

    नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके सहयोगी दलों का मुकाबला विपक्षी खेमे से है। विपक्ष में गादी आइजनकोट की यशार पार्टी के साथ नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाला टुगेदर गठबंधन तथा अन्य दल भी शामिल हैं। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए इन दलों के बीच समर्थन जुटाने और गठबंधन तैयार करने की प्रक्रिया अहम होगी।

    ओपिनियन पोल में क्या संकेत मिले?

    चुनाव से पहले जारी सर्वेक्षणों में अलग-अलग दलों और गठबंधनों की स्थिति को लेकर अंतर दिखाई दिया है। 23 अक्टूबर तक के एक सर्वे औसत में नेतन्याहू के गठबंधन को लगभग 52 सीटें और उनके विरोधी जियोनिस्ट दलों को करीब 50 सीटें मिलने का अनुमान था। दूसरी ओर, कुछ अन्य सर्वेक्षणों में आइजनकोट की पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में दिखाया गया।

    हालांकि, किसी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलना और उसके गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत मिलना अलग-अलग बातें हैं। चुनाव के बाद छोटे दलों का समर्थन और राजनीतिक गठबंधन की बातचीत निर्णायक हो सकती है। इसलिए केवल ओपिनियन पोल के आधार पर नेतन्याहू की विदाई या आइजनकोट के प्रधानमंत्री बनने को तय नहीं माना जा सकता।

    चुनाव के चार प्रमुख मुद्दे

    पहला मुद्दा 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से जुड़ी सुरक्षा चूक है। उस हमले के बाद इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों की तैयारियों पर सवाल उठे थे। विपक्षी नेताओं ने सरकार से जवाबदेही की मांग की है। इस चुनाव में मतदाताओं के लिए यह अहम सवाल है कि भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए किस तरह की सुरक्षा नीति अपनाई जाएगी।

    दूसरा बड़ा मुद्दा अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट है। इजरायल में अधिकांश यहूदी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है, लेकिन धार्मिक अध्ययन करने वाले हरेदी समुदाय के कई लोगों को इससे छूट मिलती रही है। इस व्यवस्था को लेकर देश में विवाद है। आइजनकोट सहित विपक्ष के कई नेता सैन्य सेवा की जिम्मेदारी अधिक व्यापक रूप से लागू करने के पक्ष में हैं, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को हरेदी दलों का समर्थन मिलता रहा है।

    तीसरा मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और न्यायपालिका में सुधार का है। नेतन्याहू सरकार के न्यायिक बदलावों के प्रस्तावों के विरोध में देश में बड़े प्रदर्शन हुए थे। विरोधियों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई, जबकि सरकार के समर्थकों ने बदलावों को सुधार की जरूरत से जोड़ा।

    चौथा प्रमुख विषय युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों का भविष्य है। मतदाताओं के सामने सुरक्षा सुनिश्चित करने, लंबे संघर्ष की कीमत और भविष्य की सैन्य रणनीति से जुड़े सवाल हैं। नेतन्याहू ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, जबकि विपक्ष ने सरकार के फैसलों और युद्ध प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं।

    नेतन्याहू और आइजनकोट की सैन्य पृष्ठभूमि

    बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायली सेना की विशेष इकाई सायरेट मटकल में सेवा दी थी। उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू की 1976 में युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के अभियान के दौरान मौत हो गई थी।

    गादी आइजनकोट ने 1978 में गोलानी ब्रिगेड में सैनिक के रूप में अपना सैन्य करियर शुरू किया। करीब चार दशक की सेवा के बाद वह 2015 में इजरायली सेना के प्रमुख बने और 2019 तक इस पद पर रहे। दिसंबर 2023 में गाजा में युद्ध के दौरान उनके बेटे गैल की मौत हो गई थी। अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी दक्षिणी गाजा में लड़ाई के दौरान मारे गए थे।

    चुनाव के बाद सरकार बनाने की चुनौती

    मतदान के बाद तस्वीर इस बात से स्पष्ट होगी कि कौन-से दल कितनी सीटें हासिल करते हैं और कौन बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाता है। यदि कोई गठबंधन 61 सीटों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। छोटे दलों और अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, हालांकि अलग-अलग दलों के बीच राजनीतिक मतभेद गठबंधन की राह में बाधा बन सकते हैं।

    इसलिए इजरायल के चुनाव का परिणाम केवल सबसे बड़ी पार्टी तय नहीं करेगा। सरकार किसकी बनेगी, यह संसद में बहुमत जुटाने और चुनाव के बाद होने वाली राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगा।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता पर नजर, गाजा युद्ध और ईरान संघर्ष के बीच विपक्ष से कड़ी चुनौती

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता पर नजर, गाजा युद्ध और ईरान संघर्ष के बीच विपक्ष से कड़ी चुनौती

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले और उसके बाद गाजा में सैन्य कार्रवाई तथा ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार आलोचनाओं का सामना करती रही है। चुनाव में मतदाताओं का रुख यह तय करने में अहम होगा कि देश की सत्ता मौजूदा नेतृत्व के पास रहती है या विपक्ष को सरकार बनाने का अवसर मिलता है।

    इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र हैं। नेतन्याहू को पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट से चुनौती मिल रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में मुकाबला कड़ा रहने के संकेत दिए गए हैं। हालांकि, इजरायल की चुनाव प्रणाली में किसी एक दल के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना आसान नहीं होता। इसलिए चुनावी नतीजों के साथ-साथ अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन की बातचीत भी अगली सरकार का स्वरूप तय करेगी।

    77 वर्षीय नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण बताते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी जवाबदेही पर सवाल उठाते हैं। चुनाव के दौरान इन मुद्दों का राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है।

    गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, नफ्ताली बेनेट भी मौजूदा प्रधानमंत्री के गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। विपक्षी दलों के बीच सहयोग सरकार बनाने की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

    चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू का समर्थन किया। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी ट्रंप की तारीफ करते हुए दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता का उल्लेख किया। अमेरिका और इजरायल के संबंध चुनावी चर्चा के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल हैं।

    इजरायल में संसदीय चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत होते हैं। पूरे देश को एक ही चुनावी क्षेत्र माना जाता है और मतदाता संसद यानी नेसेट की 120 सीटों के लिए राजनीतिक दलों की सूची पर वोट डालते हैं। मतदाता सीधे किसी व्यक्तिगत सांसद का चुनाव नहीं करते। संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत हासिल करना जरूरी है। इस व्यवस्था में छोटी पार्टियां भी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

    सरकार बनाने के लिए संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना आवश्यक है। सबसे अधिक सीटें हासिल करने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना लेता। मतदान के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके बहुमत जुटाने की संभावना हो। इसके बाद गठबंधन बनाने के लिए बातचीत होती है। यदि कोई नेता 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।

    इस चुनाव के नतीजों का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, क्षेत्रीय संघर्षों और दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। गाजा में युद्ध और ईरान के साथ टकराव के बीच नई सरकार के सामने सुरक्षा तथा कूटनीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे रहेंगे। चुनाव परिणामों के बाद गठबंधन का स्वरूप तय करेगा कि आने वाले समय में देश की नीतियों को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा।

  • मध्य प्रदेश में राज्यसभा उपचुनाव के लिए भाजपा बनाएगी 4-5 नामों का पैनल, वनथी श्रीनिवासन समेत कई नेता चर्चा में

    मध्य प्रदेश में राज्यसभा उपचुनाव के लिए भाजपा बनाएगी 4-5 नामों का पैनल, वनथी श्रीनिवासन समेत कई नेता चर्चा में

    मध्य प्रदेश: में राज्यसभा की खाली हुई एक सीट पर उपचुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। भोपाल में मुख्यमंत्री निवास पर हुई भाजपा कोर ग्रुप की बैठक में संभावित उम्मीदवारों के नामों पर विचार किया गया। बैठक में 4 से 5 नामों का पैनल तैयार कर केंद्रीय नेतृत्व को भेजने पर चर्चा हुई। हालांकि, पार्टी ने अभी तक उम्मीदवार के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।

    संभावित नामों में तमिलनाडु भाजपा की पूर्व विधायक वनथी श्रीनिवासन का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। इसके अलावा मध्य प्रदेश भाजपा के कुछ नेताओं के नामों पर भी चर्चा हो रही है। उम्मीदवार के चयन को लेकर अंतिम फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व करेगा। बैठक में राज्यसभा उपचुनाव के साथ संगठनात्मक गतिविधियों और आने वाले राजनीतिक कार्यक्रमों की तैयारियों पर भी मंथन हुआ।

    यह सीट केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन के राज्यसभा से इस्तीफे के बाद खाली हुई है। वह अप्रैल 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे और उनका कार्यकाल अप्रैल 2030 तक निर्धारित था। उनके इस्तीफे के बाद इस सीट पर उपचुनाव के जरिए नए सदस्य का चयन किया जाना है। इसी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए भाजपा संभावित उम्मीदवारों के नामों पर विचार कर रही है।

    मध्य प्रदेश भाजपा के जिन नेताओं के नाम संभावित दावेदारों के रूप में चर्चा में हैं, उनमें पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया, प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी, राष्ट्रीय मीडिया समन्वयक आशीष अग्रवाल, पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष विनोद गोटिया, प्रदेश उपाध्यक्ष शैलेंद्र बरुआ और पूर्व मंत्री रंजना बघेल शामिल हैं। हालांकि, इन नामों को लेकर भी पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    राज्यसभा उपचुनाव में विधानसभा के विधायकों की संख्या महत्वपूर्ण होगी। मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा मतदान में हिस्सा नहीं ले सकेंगे, इसलिए चुनावी गणित में 229 विधायकों की भूमिका का आकलन किया जा रहा है। बीना विधायक निर्मला सप्रे की स्थिति पर भी नजर रहेगी। वह खुद को कांग्रेस में बताती हैं, जबकि भाजपा के कार्यक्रमों में भी नजर आती रही हैं। ऐसे में उनकी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही दोनों दलों की प्रभावी संख्या का सटीक आकलन हो सकेगा।

    बैठक में भाजपा ने आगामी राजनीतिक अभियानों को लेकर भी योजना बनाई। ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान के तहत भोपाल, इंदौर और जबलपुर में बड़ी रैलियां आयोजित करने पर चर्चा हुई। इन कार्यक्रमों में एक लाख लोगों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर भी कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी है।

    केंद्र सरकार की योजनाओं और मध्य प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया। इसके लिए मंत्रियों के नेतृत्व में विशेष टीमें गठित करने और केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों से सांसदों को जोड़ने की व्यवस्था पर विचार हुआ। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार के तीन साल के कामकाज को जनता के सामने रखने की रणनीति भी चर्चा का हिस्सा रही। मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के कामकाज को सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराने के प्रस्ताव पर भी मंथन किया गया।

    बैठक में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मुद्दे और 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा पर भी चर्चा हुई। इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर की गई टिप्पणी के विरोध में निंदा प्रस्ताव पारित किए जाने की जानकारी भी सामने आई। राज्यसभा उम्मीदवार के चयन के साथ भाजपा ने संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक कार्यक्रमों की तैयारियों पर भी ध्यान केंद्रित किया।

  • चुनाव में जीत के लिए भी ट्रंप के भरोसे नेतन्याहू, समर्थन बढ़ाने के लिए तीन दिन में दो बार किया फोन

    चुनाव में जीत के लिए भी ट्रंप के भरोसे नेतन्याहू, समर्थन बढ़ाने के लिए तीन दिन में दो बार किया फोन


    तेल अवीव।
    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर चुनावी जीत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन की उम्मीद कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में पिछड़ने के अनुमानों के बीच नेतन्याहू ने पिछले तीन दिनों में ट्रंप से दो बार फोन पर बात कर समर्थन बढ़ाने की मांग की। हालांकि, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने इन दावों से इनकार किया है। व्हाइट हाउस ने भी इस संबंध में पूछे गए सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

    एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, मामले की जानकारी रखने वाले एक अमेरिकी और एक इजरायली सूत्र ने नेतन्याहू की ओर से अतिरिक्त समर्थन मांगे जाने की जानकारी दी है। अमेरिकी सूत्र के मुताबिक, व्हाइट हाउस ने इस कोशिश को नेतन्याहू की ‘हताशा की निशानी’ के रूप में देखा। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि इजरायली प्रधानमंत्री को चुनावी मुकाबले में अपनी स्थिति कमजोर होने की चिंता है।

    हालांकि, लिकुड पार्टी की प्रवक्ता नेटा मोल्चो ने इन दावों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने हाल के दिनों में या ट्रंप के समर्थन वाले बयान से पहले उनसे मदद नहीं मांगी थी।

    ट्रंप पहले ही कर चुके हैं नेतन्याहू का समर्थन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर नेतन्याहू के समर्थन में बयान दे चुके हैं। उन्होंने इजरायली मतदाताओं को आगाह करते हुए कहा था कि नेतन्याहू की चुनावी हार का असर अमेरिका और इजरायल के संबंधों पर पड़ सकता है।

    एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बावजूद नेतन्याहू की ओर से ट्रंप से और समर्थन देने का अनुरोध किया गया। इजरायली सूत्र ने बताया कि नेतन्याहू की ओर से सुझाव दिया गया था कि ट्रंप इजरायली पत्रकारों से फोन पर बातचीत करें और चुनाव अभियान के प्रति अपना समर्थन जाहिर करें।

    इसी दौरान नेतन्याहू ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी फोन पर बातचीत की थी। हालांकि, इस बातचीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी की ओर से इजरायल के चुनाव को लेकर कोई समर्थन संदेश जारी नहीं किया गया।

    पहले भी विदेशी नेताओं के साथ दिखा चुके हैं नजदीकी

    नेतन्याहू इससे पहले भी चुनाव प्रचार के दौरान विदेशी नेताओं के साथ अपने संबंधों को प्रमुखता देते रहे हैं। पिछले चुनावों में इजरायल की इमारतों पर प्रधानमंत्री मोदी, डोनाल्ड ट्रंप और अन्य विदेशी नेताओं के साथ उनकी तस्वीरों वाले पोस्टर लगाए गए थे। इन तस्वीरों के जरिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नेताओं के साथ अपने संबंधों को चुनाव प्रचार में जगह दी थी।

    सर्वेक्षणों में बहुमत से दूर दिख रहा नेतन्याहू का गठबंधन

    नेतन्याहू की चिंता की एक प्रमुख वजह चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुमान हैं। रिपोर्ट के अनुसार, तीन सर्वेक्षणों में 120 सदस्यीय इजरायली संसद नेसेट में उनके गठबंधन को बहुमत के आंकड़े से पीछे रहने का अनुमान जताया गया है।

    इन सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 50 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। यह उनके मौजूदा गठबंधन की सीटों की संख्या से 17 कम है। उनकी प्रमुख पार्टी लिकुड, जिसके पास वर्तमान में 32 सीटें हैं, के घटकर करीब 20 सीटों पर सिमटने का अनुमान लगाया गया है।

    हालांकि, नेतन्याहू समर्थक चैनल 14 के सर्वेक्षण में तस्वीर अलग दिखाई गई है। सप्ताह की शुरुआत में जारी इस सर्वेक्षण में नेतन्याहू के गठबंधन को 60 सीटें और लिकुड पार्टी को 30 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था।

    इस तरह अलग-अलग सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन की संभावनाओं को लेकर अंतर दिखाई दे रहा है। चुनाव में उनकी पार्टी और सहयोगी दलों का प्रदर्शन ही तय करेगा कि वे सत्ता में बने रह पाते हैं या नहीं।

  • चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर मतदान जारी, उत्तर प्रदेश में दोपहर 12 बजे तक 24.09 प्रतिशत वोटिंग

    चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर मतदान जारी, उत्तर प्रदेश में दोपहर 12 बजे तक 24.09 प्रतिशत वोटिंग

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए शुक्रवार, 23 अक्टूबर को मतदान जारी है। इन सीटों पर स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। चुनाव के नतीजे 27 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे। उत्तर प्रदेश में दोपहर 12 बजे तक 24.09 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। चारों राज्यों में हो रहे इस चुनाव को राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसके परिणाम संबंधित क्षेत्रों में उनके संगठनात्मक प्रभाव और मतदाताओं के समर्थन का संकेत दे सकते हैं।

    उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों के लिए मतदान कराया जा रहा है। मतदान सुबह आठ बजे शुरू हुआ और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शाम चार बजे तक चलेगा। औरैया, हरदोई, जालौन, चित्रकूट और गौतमबुद्ध नगर सहित राज्य के 72 जिलों में मतदान की व्यवस्था की गई है। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला प्रमुख है। कुछ सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।

    उत्तर प्रदेश की सीटों में गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र पर विशेष ध्यान है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र से जुड़ी इस सीट पर भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति के तहत सक्रियता बढ़ाई है। वहीं समाजवादी पार्टी ने शिक्षकों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी है। पार्टी की ओर से मानदेय, पुरानी पेंशन योजना और सेवा सुरक्षा जैसे विषय उठाए गए हैं। स्थानीय असंतोष और बागी उम्मीदवारों की भूमिका भी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।

    बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों के लिए मतदान हो रहा है। इनमें पटना, दरभंगा, तिरहुत और कोसी के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र तथा पटना, दरभंगा, तिरहुत और सारण के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। पटना स्नातक सीट पर राजनीतिक गतिविधियों पर खास नजर है। यहां जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी नीरज कुमार के मुकाबले को लेकर चर्चा है। खबर में दिए गए विवरण के अनुसार, विधायक अनंत सिंह द्वारा जन सुराज के उम्मीदवार का समर्थन किए जाने से चुनावी माहौल प्रभावित हुआ है।

    महाराष्ट्र में विधान परिषद की पांच सीटों के लिए चुनाव हो रहा है। इनमें औरंगाबाद, पुणे और नागपुर के तीन स्नातक निर्वाचन क्षेत्र तथा अमरावती और पुणे के दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। राज्य में महायुति और महाविकास अघाड़ी के बीच मुकाबला है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन सीटों पर कुल 182 उम्मीदवार मैदान में हैं और दस लाख से अधिक मतदाता मतदान के पात्र हैं।

    कर्नाटक में चार सीटों पर मतदान कराया जा रहा है। इनमें कर्नाटक दक्षिण-पूर्व और कर्नाटक पश्चिम के दो स्नातक निर्वाचन क्षेत्र तथा कर्नाटक उत्तर-पूर्व और बेंगलुरु के दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। यहां सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के बीच मुकाबला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    चारों राज्यों में मतदान बैलेट पेपर के माध्यम से कराया जा रहा है। इन निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता वरीयता क्रम के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करते हैं। मतदान केंद्रों पर निष्पक्षता बनाए रखने के लिए मोबाइल फोन और कैमरों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में समाजवादी पार्टी ने प्रशासनिक पक्षपात की आशंका जताई है। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा और निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    मतदान पूरा होने के बाद मतपेटियों को सुरक्षा व्यवस्था के बीच स्ट्रांग रूम में रखा जाएगा। इसके बाद 27 अक्टूबर को मतगणना होगी और चारों राज्यों की संबंधित सीटों के परिणाम घोषित किए जाएंगे। नतीजों से यह स्पष्ट होगा कि स्नातक और शिक्षक मतदाताओं के बीच किस दल और उम्मीदवार को कितना समर्थन मिला है।

  • रामपुर जेल में आजम खान से मिले अखिलेश यादव, एक घंटे की मुलाकात के बाद 2027 चुनाव को लेकर भाजपा पर साधा निशाना

    रामपुर जेल में आजम खान से मिले अखिलेश यादव, एक घंटे की मुलाकात के बाद 2027 चुनाव को लेकर भाजपा पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुरुवार को रामपुर जिला जेल में पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। मुलाकात के बाद जेल से बाहर आए अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा और कहा कि समाजवादी पार्टी का लक्ष्य भाजपा को सत्ता से हटाना है। इस मुलाकात को उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों और पार्टी के राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में अहम माना जा रहा है।

    अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि समाजवादी पार्टी का उद्देश्य स्पष्ट है और पार्टी के कार्यकर्ता भाजपा को हराने के लिए मजबूती से काम कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि सत्ताधारी दल का जनाधार कमजोर हो रहा है और आगामी चुनावों में उसे जनता के विरोध का सामना करना पड़ेगा। अखिलेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता भाजपा को सत्ता से बाहर करने का फैसला करेगी। ये बयान सपा अध्यक्ष की राजनीतिक रणनीति और आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के रुख को दर्शाते हैं।

    सपा प्रमुख ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन परिणामों से जनता का संदेश सामने आ चुका है। अखिलेश यादव के मुताबिक, 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की रणनीति में पीडीए की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। पीडीए से आशय पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों से है। पार्टी इस सामाजिक समीकरण के साथ सामाजिक न्याय और जमीनी मुद्दों को भी अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाने पर जोर दे रही है।

    मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों से जुड़े मुद्दों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन संस्थानों की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से वंचित और पीडीए समुदायों को आगे बढ़ने का अवसर देना रहा है। उनके बयान में शिक्षा, सामाजिक न्याय और संस्थानों पर हो रही कार्रवाई से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। हालांकि, इन कार्रवाइयों के विशिष्ट मामलों और उनके कानूनी पहलुओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।

    आजम खान समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे हैं और रामपुर की राजनीति में उनका लंबे समय से प्रभाव रहा है। ऐसे में अखिलेश यादव की उनसे जेल में हुई मुलाकात को पार्टी के भीतर संपर्क और राजनीतिक एकजुटता के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। मुलाकात के दौरान किन विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि, जेल से बाहर आने के बाद अखिलेश यादव की टिप्पणियों में भाजपा के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष और 2027 के चुनाव की तैयारी प्रमुख रही।

    रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज होने की संभावना है। समाजवादी पार्टी के समर्थकों के लिए यह मुलाकात वरिष्ठ नेताओं के बीच संवाद का संकेत है, जबकि इसके राजनीतिक प्रभाव का आकलन आगामी घटनाक्रम और पार्टी की रणनीति के आधार पर किया जा सकेगा। फिलहाल अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से भाजपा को हराने और पीडीए के मुद्दों को आगामी विधानसभा चुनाव में केंद्र में रखने का संदेश दिया है।