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  • पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 के लिए आप की पहली सूची जारी, 40 उम्मीदवारों को टिकट; धूरी से लड़ेंगे भगवंत मान

    पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 के लिए आप की पहली सूची जारी, 40 उम्मीदवारों को टिकट; धूरी से लड़ेंगे भगवंत मान

    नई दिल्ली । पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच आम आदमी पार्टी (आप) ने शनिवार को अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी। पार्टी ने इस सूची में 40 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की है। सबसे प्रमुख नाम पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान का है, जिन्हें धूरी विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया है। पार्टी की ओर से जारी सूची में माझा, दोआबा और मालवा क्षेत्रों की विभिन्न विधानसभा सीटों को शामिल किया गया है। इसके साथ ही कई महिला उम्मीदवारों को भी टिकट दिया गया है।

    आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव पंकज कुमार गुप्ता की ओर से 31 अक्टूबर को उम्मीदवारों की सूची जारी की गई। इसमें प्रत्याशियों के नाम के साथ उनके विधानसभा क्षेत्र और निर्वाचन क्षेत्र की संख्या का भी उल्लेख किया गया है। पार्टी ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपने उम्मीदवारों के नाम तय कर चुनावी तैयारियों की दिशा में कदम बढ़ाया है।

    माझा और दोआबा क्षेत्र में इन उम्मीदवारों को टिकट
    पार्टी की पहली सूची के अनुसार, बटाला विधानसभा सीट से अमनशेर सिंह (शेरी कलसी), अजनाला से कुलदीप सिंह धालीवाल और अमृतसर दक्षिण से डॉ. इंदरबीर सिंह निज्जर को उम्मीदवार बनाया गया है। तरनतारन सीट से हरमीत सिंह संधू और खेमकरण से सरवन सिंह धुन चुनाव लड़ेंगे।

    दोआबा क्षेत्र में नकोदर सीट से इंदरजीत कौर मान, करतारपुर से बलकार सिंह, दसूया से करमबीर सिंह घुम्मन और उर्मर से जसवीर सिंह राजा गिल को टिकट दिया गया है। होशियारपुर से ब्रह्म शंकर शर्मा जिंपा, चब्बेवाल से ईशांक कुमार चब्बेवाल, गढ़शंकर से जय किशन सिंह रौड़ी और बलाचौर से संतोष कटारिया को प्रत्याशी घोषित किया गया है।

    रूपनगर और लुधियाना की सीटों पर भी नाम तय
    रूपनगर विधानसभा सीट से दिनेश चड्ढा और एसएएस नगर से कुलवंत सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है। फतेहगढ़ साहिब से लखबीर सिंह राय, अमलोह से गुरिंदर सिंह गैरी वड़िंग और समराला से जगतार सिंह दयालपुरा चुनाव मैदान में होंगे।

    लुधियाना क्षेत्र की कई सीटों पर भी पार्टी ने प्रत्याशियों के नाम घोषित किए हैं। लुधियाना पूर्वी से दलजीत सिंह ग्रेवाल भोला, आत्म नगर से कुलवंत सिंह सिद्धू और लुधियाना केंद्रीय से अशोक प्रशार पप्पी को टिकट दिया गया है। लुधियाना पश्चिम से संजीव अरोड़ा, लुधियाना उत्तर से चौधरी मदन लाल बग्गा और पायल से मनविंदर सिंह ग्यासपुरा को उम्मीदवार बनाया गया है।

    मालवा क्षेत्र में भी उम्मीदवारों की घोषणा
    मालवा क्षेत्र की सीटों पर निहाल सिंह वाला से मनजीत सिंह बिलासपुर, बाघा पुराना से अमृतपाल सिंह सुखानंद और मोगा से अमनदीप कौर अरोड़ा को प्रत्याशी घोषित किया गया है। धर्मकोट से देविंदर जीत सिंह लाडी ढोस, जलालाबाद से जगदीप कंबोज गोल्डी और फाजिल्का से नरिंदरपाल सिंह सावना को टिकट मिला है।

    इसके अलावा मुक्तसर से जगदीप सिंह काका बराड़, कोटकपूरा से कुलतार सिंह संधवां और जैतो से अमोलक सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है। तलवंडी साबो से बलजिंदर कौर, सरदूलगढ़ से गुरप्रीत सिंह बनावाली, भदौड़ से लभ सिंह उगोके और मेहल कलां से कुलवंत सिंह पंडोरी को चुनाव मैदान में उतारा गया है।

    धूरी से भगवंत मान, पटियाला से अजीतपाल सिंह को टिकट
    सूची में अमरगढ़ विधानसभा सीट से जसवंत सिंह गज्जन माजरा को उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं धूरी से मुख्यमंत्री भगवंत मान चुनाव लड़ेंगे। पटियाला विधानसभा सीट से अजीतपाल सिंह को टिकट दिया गया है। सूची में इंदरजीत कौर मान, संतोष कटारिया, डॉ. अमनदीप कौर अरोड़ा और बलजिंदर कौर सहित महिला उम्मीदवारों को भी जगह दी गई है।

    इस तरह आम आदमी पार्टी ने पंजाब की 40 विधानसभा सीटों के लिए अपने प्रत्याशियों के नाम घोषित कर दिए हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान को धूरी से उम्मीदवार बनाए जाने के साथ पार्टी ने अपनी पहली सूची में विभिन्न क्षेत्रों और विधानसभा सीटों को प्रतिनिधित्व दिया है।

  • इस्राइल में चुनाव से पहले युवाओं की सोच में दिख रहा बदलाव… बढ़ रहा दक्षिणपंथ का आकर्षण?

    इस्राइल में चुनाव से पहले युवाओं की सोच में दिख रहा बदलाव… बढ़ रहा दक्षिणपंथ का आकर्षण?


    तेलअबीव।
    इस्राइल (Israel) में नई पीढ़ी के बीच दक्षिणपंथी राजनीति का आकर्षण बढ़ता दिखाई दे रहा है। कभी अपने कट्टर विचारों के कारण राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रहे नेता इतामार बेन-ग्विर (Leader Itamar Ben-Gvir) आज सरकार के शक्तिशाली मंत्रियों में शामिल हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उनके आसपास बड़ी संख्या में युवा समर्थक नजर आ रहे हैं। यह बदलाव केवल किसी एक नेता की लोकप्रियता की कहानी नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी की सोच को भी सामने लाता है, जिसने युद्ध, हिंसा और सुरक्षा के सवालों के बीच आंखें खोली हैं। सवाल है कि इस्राइल के युवा मतदाता (Young Voters) दक्षिणपंथ की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं और इसका देश की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है?


    पहले सेना ने ठुकराया, अब युवाओं के बीच लोकप्रिय

    एक संवाददाता लूसी विलियमसन की रिपोर्ट के मुताबिक बेन-ग्विर को युवावस्था में उनके राजनीतिक विचारों के अत्यधिक कट्टर होने के कारण इस्राइली सेना में शामिल होने के लिए अनुपयुक्त माना गया था। करीब तीन दशक बाद वही नेता राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री के पद पर हैं और चुनावी राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं।रामले शहर के एक बाजार में चुनाव प्रचार के दौरान उनके समर्थकों में बड़ी संख्या में युवा शामिल थे। 20 वर्षीय मोर्दखाई का मानना है कि बेन-ग्विर उन्हें सुरक्षा का भरोसा देते हैं। वहीं, 18 वर्षीय नदाव का कहना है कि यह नेता दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि इस्राइल एक मजबूत देश है और उसे अपनी विचारधारा व्यक्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए।इन बयानों से युवाओं की प्राथमिकताओं का संकेत मिलता है। उनके लिए केवल आर्थिक मुद्दे या रोजगार ही चुनावी पसंद तय नहीं कर रहे, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की ताकत और भविष्य को लेकर भरोसा भी महत्वपूर्ण बन गया है।


    पहली बार वोट डालने वाले युवा बन सकते हैं निर्णायक

    रिपोर्ट के अनुसार आगामी चुनाव में पांच लाख से अधिक मतदाता पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। ये युवा ऐसे समय में मतदान करने जा रहे हैं, जब इस्राइल की सुरक्षा, राष्ट्रीय पहचान और भविष्य की दिशा पर बहस तेज है।रिपोर्ट में उद्धृत एक सर्वेक्षण के मुताबिक, पहली बार मतदान करने वाले 16 प्रतिशत से अधिक युवा बेन-ग्विर की यहूदी शक्ति पार्टी या उनके सहयोगी बेजालेल स्मोट्रिच की धार्मिक जायनिज्म पार्टी का समर्थन करने की योजना बना रहे हैं। एक अन्य सर्वेक्षण में करीब तीन-चौथाई युवा मतदाताओं ने खुद को दक्षिणपंथी या मध्य-दक्षिणपंथी विचारधारा के करीब बताया।हालांकि, इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि सभी युवा दक्षिणपंथी हो गए हैं। ये सर्वेक्षणों में सामने आए रुझान हैं। फिर भी, चुनावी मुकाबले में इन नए मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर तब, जब सरकार समर्थक और विपक्षी खेमों के बीच मुकाबला कड़ा हो।


    7 अक्तूबर के हमलों ने बदली सोच

    युवाओं की राजनीतिक पसंद को समझने के लिए 7 अक्तूबर 2023 के हमलों और उसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमास के नेतृत्व में हुए हमलों ने इस्राइल में सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा की। युद्ध और हिंसा के अनुभवों ने कई युवाओं के लिए राजनीति को व्यक्तिगत सवाल बना दिया है।23 वर्षीय अति-रूढ़िवादी यहूदी युवक मेइर श्राइबर, जो लंदन में पले-बढ़े हैं, कहते हैं कि 7 अक्तूबर की घटनाओं ने उन्हें इस नतीजे पर पहुंचाया कि शांति हासिल करना आसान नहीं है। उनके अनुसार कम उम्र में देखी गई घटनाएं व्यक्ति की सोच और व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करती हैं।हालांकि, इस सोच से सभी इस्राइली युवा सहमत नहीं हैं। कुछ लोग मौजूदा सरकार की नीतियों और सुरक्षा संबंधी फैसलों पर सवाल भी उठाते हैं। इसलिए युवाओं में दक्षिणपंथ की ओर झुकाव को एक समान विचारधारा का परिणाम मानने के बजाय युद्ध के अनुभवों और भविष्य को लेकर अलग-अलग आशंकाओं के संदर्भ में देखना जरूरी है।


    कठोर नीतियां भी बन रहीं बहस का विषय

    बेन-ग्विर की राजनीति विवादों से घिरी रही है। वे कब्जे वाले पश्चिमी तट के विलय, गाजा में यहूदी बस्तियां बसाने और फलस्तीनियों के तथाकथित स्वैच्छिक पलायन जैसे विचारों का समर्थन करते रहे हैं। उदारवादी इस्राइली इन नीतियों और उनके बयानों की आलोचना करते हैं। कई पश्चिमी देशों ने बेन-ग्विर और स्मोट्रिच के खिलाफ फलस्तीनियों के प्रति भड़काऊ बयानों के मामले में प्रतिबंध या यात्रा संबंधी पाबंदियां भी लगाई हैं।राजनीतिक विश्लेषक डाहलिया शाइनडलिन के अनुसार, इस्राइल के युवा यहूदी मतदाता लगभग दो दशक से औसतन पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक दक्षिणपंथी रुझान दिखाते रहे हैं। उनके मुताबिक इन युवाओं ने कई युद्धों के बीच जीवन बिताया है और शांति की कोशिशों का उन्हें व्यक्तिगत अनुभव कम मिला है। इससे राजनीतिक बहस में कठोर विचारों को स्वीकार्यता मिलने की पृष्ठभूमि बनी है।


    टिकटॉक और इंस्टाग्राम भी बन रहे चुनावी हथियार

    इस बदलाव में सोशल मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। युवा मतदाता पारंपरिक समाचार चैनलों और अखबारों के बजाय टिकटॉक और इंस्टाग्राम से अधिक जानकारी हासिल कर रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक नेताओं के छोटे वीडियो, सीधे संवाद और आकर्षक प्रचार सामग्री मतदाताओं तक पहुंचने का प्रभावी माध्यम बन गए हैं।

    विपक्षी दल भी अब इस चुनौती को समझ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट (Former Prime Minister Naftali Bennett) के नेतृत्व वाले विपक्षी दल के युवा उम्मीदवार योनातन शालेव का कहना है कि बेन-ग्विर ने दूसरे नेताओं की तुलना में सोशल मीडिया की ताकत को पहले पहचान लिया। अब विपक्ष भी युवा मतदाताओं तक पहुंचने के लिए डिजिटल प्रचार का सहारा ले रहा है। इस्राइल की राजनीति में नई पीढ़ी का यह रुझान बताता है कि चुनाव केवल पुराने राजनीतिक समीकरणों से तय नहीं होंगे। सुरक्षा की चिंता, युद्ध की स्मृतियां और डिजिटल माध्यमों से बनने वाली राजनीतिक छवि युवा मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन इस्राइल के युवा पूरी तरह एक खेमे में बंटे नहीं हैं। असली सवाल यही है कि मतदान के दिन सुरक्षा और कठोर नेतृत्व का संदेश अधिक प्रभावी होगा या बदलाव और जवाबदेही की मांग।

  • यूपी चुनाव 2027 में ओवैसी की 200 सीटों पर तैयारी, सपा के PDA और कांग्रेस के समीकरण को मिल सकती है चुनौती

    यूपी चुनाव 2027 में ओवैसी की 200 सीटों पर तैयारी, सपा के PDA और कांग्रेस के समीकरण को मिल सकती है चुनौती

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अपनी राजनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की रणनीति के तहत राज्य में मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पार्टी करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। हालांकि, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन को लेकर बातचीत की गुंजाइश भी बनी हुई है। ऐसे में चुनाव से पहले राज्य में विपक्षी दलों के बीच सीटों और मतदाताओं के समीकरण को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।

    AIMIM की रणनीति का पहला हिस्सा उन विधानसभा क्षेत्रों पर केंद्रित है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। पार्टी ऐसे क्षेत्रों में अपना संगठन मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक आधार बढ़ाने की तैयारी में है। इसके लिए उन सीटों की पहचान की जा रही है, जहां मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। पार्टी की कोशिश है कि इन इलाकों में स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाकर चुनावी मैदान में अपनी उपस्थिति मजबूत की जाए।

    दूसरी प्राथमिकता पश्चिमी उत्तर प्रदेश को बनाया गया है। इस क्षेत्र की लगभग 65 विधानसभा सीटों पर AIMIM विशेष ध्यान दे रही है। मेरठ समेत कई जिलों में पार्टी अपनी राजनीतिक पकड़ बढ़ाने की योजना बना रही है। इस रणनीति के तहत असदुद्दीन ओवैसी की जनसभाएं भी प्रस्तावित हैं। कार्यक्रम के अनुसार, 17 अक्टूबर को रामपुर में जनसभा, 24 अक्टूबर को कैराना में सभा और 14 नवंबर को मेरठ में बड़ी रैली आयोजित करने की योजना है। इन कार्यक्रमों के जरिए पार्टी अपने समर्थकों तक पहुंचने और संगठन को सक्रिय करने का प्रयास करेगी।

    AIMIM की तीसरी योजना राज्यभर में संगठन का विस्तार करने से जुड़ी है। यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ गठबंधन पर सहमति नहीं बनती है, तो पार्टी लगभग 200 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने के विकल्प पर काम कर रही है। इस संभावित रणनीति से विपक्षी दलों के बीच चुनावी प्रतिस्पर्धा का स्वरूप प्रभावित हो सकता है। खासकर उन सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है, जहां समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी पहले से अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश करती रही हैं।

    पूर्वांचल में भी AIMIM ने कई विधानसभा क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है। पार्टी की तैयारियों में आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर, मऊ और बलिया जैसे जिले शामिल हैं। आजमगढ़ की मुबारकपुर, गोपालपुर, निजामाबाद और सदर सीटों पर पार्टी की नजर है। जौनपुर की सदर और शाहगंज सीटों के साथ मऊ की सदर तथा घोसी विधानसभा सीटों को भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके अलावा बहराइच और श्रावस्ती जैसे क्षेत्रों में भी संगठन विस्तार की योजना है।

    पार्टी की रणनीति में स्थानीय और प्रभावशाली नेताओं को शामिल करना भी अहम बताया जा रहा है। ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देने की योजना है, जिन्हें दूसरे राजनीतिक दलों में पर्याप्त अवसर नहीं मिला है। AIMIM को उम्मीद है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरों के जरिए वह अपने समर्थन का दायरा बढ़ा सकती है। हालांकि, इन प्रयासों का चुनावी परिणाम क्या होगा, यह उम्मीदवारों के चयन, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

    गठबंधन को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। AIMIM की ओर से दूसरे विपक्षी दलों के साथ संभावित समझौते की संभावना खुली रखी गई है। इस महीने के अंत तक बातचीत को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद जताई गई है। यदि गठबंधन नहीं बनता है, तो पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की तैयारी को आगे बढ़ा सकती है। ऐसे में उत्तर प्रदेश की राजनीति में AIMIM की भूमिका और उसका प्रभाव आगामी चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना रह सकता है।

  • आजमगढ़ में ओवैसी की जनसभा से उत्तर प्रदेश चुनाव की तैयारी तेज, एआईएमआईएम ने एक लाख लोगों के जुटने का किया दावा

    आजमगढ़ में ओवैसी की जनसभा से उत्तर प्रदेश चुनाव की तैयारी तेज, एआईएमआईएम ने एक लाख लोगों के जुटने का किया दावा


    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। इसी क्रम में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी 11 अक्टूबर को आजमगढ़ में एक जनसभा को संबोधित करने वाले हैं। इस कार्यक्रम के जरिए पार्टी पूर्वांचल में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। जनसभा के लिए आजमगढ़ के कोटिला के पास स्थित सिरसल क्लब ग्राउंड को चुना गया है। पार्टी की ओर से कार्यक्रम में एक लाख से अधिक लोगों के शामिल होने का दावा किया गया है।

    कार्यक्रम की तैयारियों को लगभग पूरा बताया गया है। एआईएमआईएम के जिला अध्यक्ष नदीम अहमद के अनुसार, जनसभा शाम चार बजे से शुरू होगी, जबकि असदुद्दीन ओवैसी के शाम करीब छह बजे कार्यक्रम में पहुंचने का कार्यक्रम है। नदीम अहमद ने कहा कि ओवैसी अल्लामा शिब्ली नोमानी की ऐतिहासिक धरती से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान की शुरुआत करेंगे। हालांकि, जनसभा में वास्तविक रूप से कितने लोग शामिल होते हैं, यह कार्यक्रम के बाद ही स्पष्ट होगा।

    आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर एआईएमआईएम ने राज्य में अलग राजनीतिक गठबंधन बनाने का संकेत दिया है। जिला अध्यक्ष नदीम अहमद ने कहा कि उनकी पार्टी ने खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले दलों से भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने का अनुरोध किया था। उनके मुताबिक, इन दलों ने एआईएमआईएम को अपने साथ शामिल करने में रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में पार्टी अब तीसरा मोर्चा बनाकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। उनके बयान के अनुसार, पार्टी चुनाव में गठबंधन के विकल्प पर आगे बढ़ रही है।

    आजमगढ़ की राजनीतिक स्थिति को लेकर भी नदीम अहमद ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि समाजवादी पार्टी अब जिले में पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं है। उनका कहना था कि आजमगढ़ को समाजवादी पार्टी का गढ़ मानना उचित नहीं है और पार्टी नेतृत्व ने जिले के विकास की अपेक्षा अपने गृह क्षेत्र सैफई पर अधिक ध्यान दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में आजमगढ़ के विकास के लिए पर्याप्त काम नहीं हुआ। नदीम अहमद के मुताबिक, जिले के लोग अब इन मुद्दों को समझ रहे हैं।

    नदीम अहमद ने यह भी दावा किया कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए ओवैसी के नेतृत्व में एक मजबूत गठबंधन तैयार हो चुका है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह गठबंधन आजमगढ़ की अधिकतर विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करेगा। हालांकि, यह पार्टी पदाधिकारी का चुनावी दावा है और इसके परिणाम का आकलन मतदान के बाद ही किया जा सकेगा।

    आजमगढ़ लंबे समय से समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाला क्षेत्र रहा है। वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जिले की सभी 10 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आजमगढ़ सदर और लालगंज, दोनों लोकसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विजयी रहे। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में एआईएमआईएम की जनसभा और तीसरा मोर्चा बनाने की घोषणा आगामी चुनाव से पहले जिले में पार्टी की रणनीति को सामने लाती है।

  • अभिजीत दीपके ने विपक्ष पर उठाए सवाल, कहा- चुनाव में गड़बड़ी मानते हैं तो फिर लगातार हिस्सा क्यों लेते हैं

    अभिजीत दीपके ने विपक्ष पर उठाए सवाल, कहा- चुनाव में गड़बड़ी मानते हैं तो फिर लगातार हिस्सा क्यों लेते हैं


    नई दिल्ली ।
    कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी के आरोपों को लेकर विपक्षी दलों पर निशाना साधा है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि विपक्ष को लगता है कि चुनाव सही तरीके से नहीं हो रहे हैं, तो वह लगातार ऐसे चुनावों में हिस्सा क्यों ले रहा है। दीपके ने कहा कि विपक्ष को संभवतः इस बात का डर है कि चुनाव से दूर रहने पर उसका राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो सकता है।

    दीपके ने कहा कि एक तरफ विपक्ष चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगाता है और दूसरी तरफ उन्हीं चुनावों में लगातार हिस्सा लेता है। उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में चुनावी प्रक्रिया पर लगाए जा रहे आरोपों और चुनाव में भागीदारी के बीच विरोधाभास दिखाई देता है। उन्होंने विपक्ष से देश और लोकतंत्र को राजनीतिक अस्तित्व से ऊपर रखने की अपील की।

    उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी दल को चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति है, तो उसे अपने रुख पर स्पष्टता दिखानी चाहिए। दीपके के मुताबिक, चुनावों में लगातार भाग लेने से लोगों के बीच यह संदेश जा सकता है कि चुनावी प्रक्रिया सामान्य और प्रतिस्पर्धी है, जबकि विपक्ष खुद उस पर सवाल उठा रहा है।

    दीपके ने विपक्षी दलों की आंतरिक स्थिति को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेताओं को तोड़ा जा रहा है और पार्टियों में विभाजन हो रहे हैं। उनके मुताबिक, ऐसे माहौल में केवल चुनाव लड़ते रहना राजनीतिक ताकत को बनाए रखने का पर्याप्त तरीका नहीं है। उन्होंने विपक्ष से व्यापक लोकतांत्रिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपने रुख पर विचार करने को कहा।

    अपनी बात समझाने के लिए दीपके ने चुनावों की तुलना क्रिकेट के एक फिक्स मैच से की। उन्होंने कहा कि ऐसे मैच में हर कैच जानबूझकर नहीं छोड़ा जाता। कुछ कैच पकड़े भी जा सकते हैं और मुकाबले को अंतिम ओवर तक ले जाया जा सकता है, जिससे लोगों को मुकाबला बराबरी का दिखाई दे।

    दीपके ने इसी उदाहरण के आधार पर दावा किया कि यदि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हो, तो विपक्ष को कुछ स्थानों पर जीत भी मिल सकती है। उनके मुताबिक, ऐसी जीतें विपक्ष को चुनाव लड़ते रहने के लिए पर्याप्त हो सकती हैं और इससे लोगों के बीच वास्तविक प्रतिस्पर्धा होने का विश्वास बना रह सकता है। यह उनका चुनावी प्रक्रिया को लेकर दिया गया तर्क है।

    उन्होंने कहा कि विपक्ष यदि चुनावों को कथित तौर पर तय या प्रभावित मानता है तो उसे उसी प्रक्रिया का हिस्सा बने रहने के बजाय अपने रुख पर विचार करना चाहिए। दीपके ने विपक्ष से राजनीतिक अस्तित्व की चिंता से आगे बढ़कर देश और लोकतंत्र के बारे में सोचने की अपील की।

    दीपके की यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवाद के बीच सामने आई है। इससे पहले उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी और 48 घंटे का समय देने की बात कही थी। उनका ताजा बयान भी चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों और विपक्ष की चुनावी रणनीति पर केंद्रित है।

    उन्होंने विपक्ष से कहा कि यदि उसे चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है तो उसे लगातार उसमें भाग लेने के बजाय स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। दीपके का कहना है कि चुनाव में भागीदारी जारी रखने से उस व्यवस्था को वैधता मिलती है, जिस पर विपक्ष स्वयं सवाल उठा रहा है। उन्होंने इसी आधार पर विपक्ष की चुनावी रणनीति और राजनीतिक अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

  • यूपी समेत पांच चुनावी राज्यों में अक्टूबर में वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण की तैयारी

    यूपी समेत पांच चुनावी राज्यों में अक्टूबर में वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण की तैयारी

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश समेत अगले वर्ष विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी SSR की प्रक्रिया अक्टूबर में शुरू किए जाने की संभावना है। इसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर शामिल हैं। प्रस्तावित प्रक्रिया में 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि माना जा सकता है। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव अगले वर्ष की शुरुआत में प्रस्तावित हैं, ऐसे में चुनाव से पहले मतदाता सूचियों को अपडेट करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    SSR के तहत मौजूदा मतदाता सूची को संशोधित और अपडेट किया जाता है। इसमें नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ना, विवरण में सुधार करना और जरूरी संशोधन करना शामिल होता है। इसके विपरीत SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूची का अधिक व्यापक सत्यापन किया जाता है। इसमें मतदाताओं की पात्रता और दर्ज विवरणों की विस्तृत जांच की जाती है।

    मौजूदा स्थिति में देशभर में एक साथ SSR कराने की संभावना कम बताई जा रही है। इसकी प्रमुख वजह 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के तीसरे चरण की प्रक्रिया और जनगणना से जुड़ी गतिविधियां हैं। चुनाव आयोग को विभिन्न राज्यों में चल रही इन प्रक्रियाओं के बीच मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का कार्यक्रम तय करना है।

    पांच चुनावी राज्यों में SSR कराने का संबंध आगामी विधानसभा चुनावों से भी है। चुनाव से पहले संबंधित मतदाता सूचियों को निर्धारित अर्हता तिथि के आधार पर अपडेट किया जाता है। प्रस्तावित प्रक्रिया में 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि रखा जा सकता है। इससे उन लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, जो निर्धारित तिथि तक मतदान की पात्रता हासिल कर चुके होंगे।

    इस बीच चुनाव आयोग के भीतर मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर अलग-अलग स्तर पर उठाए गए सवाल भी चर्चा में हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले कुछ समय के दौरान आयोग की प्रक्रियाओं और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं। इन मुद्दों में मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया समेत पुनरीक्षण से जुड़े विषय शामिल बताए गए हैं।

    इन आपत्तियों पर चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले एक वर्ष में लिए गए उसके आदेश और फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम रहे हैं। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों पर भी आयोग ने आंतरिक सहमति होने की बात कही है।

    देशव्यापी SSR को लेकर जनगणना की समय-सारणी भी एक महत्वपूर्ण कारक है। वर्ष 2026 में जनगणना की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ रही है। कुछ पहाड़ी और बर्फीले क्षेत्रों में इसकी समय-सारणी को अलग रखा गया है। ऐसे में पूरे देश में एक साथ मतदाता सूची पुनरीक्षण कराने के बजाय चुनावी राज्यों को प्राथमिकता देने की संभावना जताई जा रही है।

    फिलहाल अक्टूबर में पांच राज्यों में SSR के संभावित आदेश और इसकी विस्तृत समय-सारणी पर अंतिम स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। यदि प्रक्रिया शुरू होती है, तो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर की मतदाता सूचियों में नए नाम जोड़ने, गलतियों को सुधारने और आवश्यक संशोधन करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

  • BJP ने 5 राज्यों के चुनाव में खर्च किए 529.38 करोड़ रुपये, सबसे ज्यादा बंगाल में 287 करोड़

    BJP ने 5 राज्यों के चुनाव में खर्च किए 529.38 करोड़ रुपये, सबसे ज्यादा बंगाल में 287 करोड़


    नई दिल्ली
    । भाजपा (BJP) ने पांच राज्यों- असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों (Assembly elections) में कुल 529.38 करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें सबसे ज्यादा 286.99 करोड़ रुपये पश्चिम बंगाल (West Bengal) में खर्च हुए। बंगाल में पार्टी ने चुनाव प्रचार पर 217.16 करोड़ रुपए और उम्मीदवारों पर 69.83 करोड़ रुपए खर्च किए। बाकी 4 राज्यों में पार्टी ने 242 करोड़ रुपए खर्च किए। वहीं, कांग्रेस (Congress) ने कुल मिले चुनावी फंड 207.17 करोड़ रुपये में से सबसे ज्यादा केरल चुनाव में 105.34 करोड़ रुपए खर्च किए। भाजपा का बंगाल में खर्च कांग्रेस के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में किए गए कुल 248.55 करोड़ रुपए के खर्च से ज्यादा रहा। सीपीआई(एम) का कुल खर्च 39.04 करोड़ रुपए रहा। इसका खुलासा चुनाव आयोग को सौंपी गई खर्च रिपोर्ट से हुआ है। कांग्रेस ने बंगाल चुनाव में 42.08 करोड़ रुपए खर्च किए।


    बंगाल में भाजपा ने 207 सीटों पर जमाया कब्जा

    बंगाल में भाजपा ने 293 सीटों में से 207 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल को 80 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने राज्य में 293 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा और 2 सीटें जीतीं।


    कांग्रेस ने 42 करोड़ खर्चे

    कांग्रेस ने बंगाल में कुल 42.08 करोड़ रुपए खर्च किए। इसमें 12.96 करोड़ रुपए प्रचार और 29.12 करोड़ रुपए उम्मीदवारों से जुड़े खर्च पर लगाए गए। सीपीआई (एम) ने बंगाल में 197 सीटों पर चुनाव लड़ा और एक सीट जीती। पार्टी ने चुनाव में 8.23 करोड़ रुपए खर्च किए। वहीं, तृणमूल की चुनावी खर्च रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है।


    केरल में कांग्रेस खर्च में आगे

    केरल में कांग्रेस ने चुनाव में 105.34 करोड़ रुपए खर्च किए। इसमें प्रचार पर 71.30 करोड़ और उम्मीदवारों पर 34.05 करोड़ रुपए खर्च करना शामिल है। बीजेपी ने केरल में प्रचार पर 54.93 करोड़ और उम्मीदवारों पर 27.74 करोड़ रुपए खर्च किए। सीपीआई (एम) ने 26.30 करोड़ प्रचार और 2.31 करोड़ रुपए उम्मीदवारों पर लगाए।


    भाजपा को चुनाव के दौरान 1,472.8 करोड़ फंड मिला

    बीजेपी ने असम में 96.27 करोड़ रुपए, तमिलनाडु में 51.56 करोड़ रुपए, पुडुचेरी में 11.90 करोड़ रुपए खर्च किए। 5 राज्यों में चुनाव के दौरान भाजपा को 1,472.8 करोड़ रुपए मिले। वहीं, कांग्रेस को 207.17 करोड़ रुपए मिले।

  • राजस्थान में कड़ी सुरक्षा के बीच आज हो रहा निकाय प्रमुखों का चुनाव…. भारी सुरक्षा बल तैनात

    राजस्थान में कड़ी सुरक्षा के बीच आज हो रहा निकाय प्रमुखों का चुनाव…. भारी सुरक्षा बल तैनात


    जयपुर।
    राजस्थान (Rajasthan) में नगरीय निकाय प्रमुखों के चुनाव (Urban Local Bodies Heads Elections ) से पहले कई जगहों पर सामने आई हिंसा, पार्षदों पर दबाव और राजनीतिक खींचतान के बीच पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। सोमवार को होने वाले नगर निगम मेयर, नगर परिषद सभापति और नगर पालिका अध्यक्ष पदों के चुनाव को देखते हुए संवेदनशील स्थानों पर भारी पुलिस बल तैनात किया जा रहा है।

    चुनाव को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से कराने के लिए जिला पुलिस से लेकर रेंज और कमिश्नरेट स्तर तक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत के अनुसार अतिरिक्त पुलिस बल के साथ राजस्थान आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (RAC) और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की अतिरिक्त कंपनियां भी उपलब्ध कराई गई हैं।


    हिंसा और राजनीतिक खींचतान के बीच पुलिस अलर्ट

    निकाय चुनाव के वार्ड परिणाम आने के बाद कई जगहों पर बोर्ड बनाने को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच जोरदार खींचतान चल रही है। निर्दलीय पार्षदों की महत्वपूर्ण भूमिका वाले निकायों में जोड़तोड़ और क्रॉस वोटिंग की आशंका के बीच दोनों दल अपने पार्षदों को एकजुट रखने की कोशिश में जुटे हैं।

    इसी दौरान कुछ स्थानों पर पार्षदों को धमकाने, दबाव बनाने और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोप भी सामने आए हैं। ऐसे घटनाक्रम को देखते हुए पुलिस ने अध्यक्ष पद के चुनाव वाले निकायों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया है।


    एसपी, रेंज आईजी और पुलिस कमिश्नरों को विशेष निर्देश

    अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (कानून एवं व्यवस्था) वीके सिंह की ओर से सभी जिला पुलिस अधीक्षकों, रेंज आईजी और पुलिस आयुक्तों को चुनाव के लिए पुख्ता सुरक्षा प्रबंध करने के निर्देश दिए गए हैं। निर्देशों के तहत जिला स्तर पर उपलब्ध पुलिस बल की समीक्षा कर जरूरत वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त बल लगाया जा रहा है। संवेदनशील निकायों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए RAC और STF की कंपनियां भी तैनात की जा रही हैं।


    शांतिपूर्ण मतदान की अपील

    पुलिस प्रशासन ने चुनाव प्रक्रिया में किसी भी तरह की बाधा या कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा नहीं होने देने के लिए स्थानीय स्तर पर भी आवश्यक इंतजाम करने के निर्देश दिए हैं अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (कानून एवं व्यवस्था) वीके सिंह ने लोगों से शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराने में पुलिस प्रशासन का सहयोग करने की अपील की है। आज सोमवार को होने वाले निकाय प्रमुखों के चुनाव के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पर पुलिस की विशेष नजर रहेगी। संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बल की तैनाती के साथ पुलिस अधिकारी मौके की स्थिति के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ा सकेंगे।

  • रूस पर यूक्रेन का बड़ा ड्रोन हमला, मॉस्को समेत कई इलाकों में नुकसान; चुनाव के आखिरी दिन बढ़ा तनाव

    रूस पर यूक्रेन का बड़ा ड्रोन हमला, मॉस्को समेत कई इलाकों में नुकसान; चुनाव के आखिरी दिन बढ़ा तनाव

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के दौरान रविवार को रूस पर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले की खबर सामने आई। रूसी अधिकारियों के अनुसार, रातभर में यूक्रेन की ओर से एक हजार से अधिक ड्रोन भेजे गए। इनमें बड़ी संख्या में ड्रोन मॉस्को और उसके आसपास के इलाकों की ओर बढ़े। मॉस्को के मेयर सर्गेई सोब्यानिन ने इसे राजधानी पर अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला बताया।

    रूसी अधिकारियों के अनुसार, देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में ड्रोन को हवा में ही नष्ट किया गया। रक्षा मंत्रालय ने 1,100 से अधिक यूक्रेनी ड्रोन को रोकने की जानकारी दी, जबकि मॉस्को के मेयर के अनुसार राजधानी की ओर बढ़ रहे करीब 450 ड्रोन को नष्ट किया गया। बाद में सामने आई जानकारी में रूस के अलग-अलग मोर्चों पर 1,600 से अधिक ड्रोन गिराए जाने का दावा भी किया गया।

    हमले के दौरान मॉस्को की एक तेल रिफाइनरी और एक रिहायशी इमारत को नुकसान पहुंचा। रिहायशी इमारत से बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। मॉस्को क्षेत्र के अधिकारियों के मुताबिक, एक 21 मंजिला इमारत से करीब 400 लोगों को निकाला गया, जिनमें बच्चे भी शामिल थे।

    मॉस्को क्षेत्र के गवर्नर आंद्रे वोरोब्योव के अनुसार, हमले में दो लोगों की मौत हुई। मृतकों में 44 वर्षीय महिला और एक बुजुर्ग व्यक्ति शामिल बताए गए हैं। क्षेत्र में 20 लोगों के घायल होने की जानकारी भी सामने आई है। घायलों को इलाज के लिए अस्पतालों में पहुंचाया गया।

    हमले का असर ऐसे समय में सामने आया जब रूस में तीन दिन से चल रहा संसदीय चुनाव अपने अंतिम दिन में था। मतदान 18 सितंबर से शुरू हुआ था और 20 सितंबर को अंतिम चरण में पहुंचा। मॉस्को के मेयर ने आरोप लगाया कि ड्रोन हमले का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालना था। हालांकि, मतदान जारी रहा और अधिकारियों ने कहा कि हमला चुनाव को रोकने में सफल नहीं हुआ।

    रूस ने यूक्रेन के कब्जे वाले कुछ इलाकों और क्रीमिया में भी संसदीय चुनाव के लिए मतदान कराया है। यूक्रेन ने इन क्षेत्रों में रूस की ओर से कराए जा रहे मतदान को अवैध बताया है। ऐसे में चुनाव के अंतिम दिन हुआ यह बड़ा ड्रोन हमला पहले से तनावपूर्ण राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों के बीच हुआ।

    यूक्रेन की ओर से इस हमले को लेकर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। दोनों देशों के बीच युद्ध के दौरान ड्रोन हमलों का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है और ऊर्जा ढांचे तथा अन्य महत्वपूर्ण ठिकाने हमलों का लक्ष्य बनते रहे हैं।

    मॉस्को की तेल रिफाइनरी को नुकसान पहुंचना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि रूस के ऊर्जा ढांचे पर हमले युद्ध के दौरान बार-बार सामने आए हैं। अधिकारियों ने रिफाइनरी परिसर में ड्रोन पहुंचने और नुकसान की पुष्टि की है। आपातकालीन दलों को प्रभावित स्थानों पर भेजकर स्थिति संभालने का काम किया गया।

    रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष में यह हमला ऐसे समय हुआ है जब दोनों पक्षों के बीच सैन्य तनाव बना हुआ है। मॉस्को और आसपास के क्षेत्र में हुए नुकसान तथा जानमाल की हानि ने युद्ध के दौरान ड्रोन हमलों के बढ़ते प्रभाव को एक बार फिर सामने ला दिया है।

  • अभिजीत दीपके का बड़ा ऐलान, कहा- चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर बदलाव लाना है, कॉकरोच आंदोलन को जारी रखने की योजना

    अभिजीत दीपके का बड़ा ऐलान, कहा- चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर बदलाव लाना है, कॉकरोच आंदोलन को जारी रखने की योजना


    नई दिल्ली ।
    कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके ने कहा है कि उनकी पार्टी और आंदोलन का उद्देश्य केवल चुनाव लड़ना नहीं है। उन्होंने एक हालिया इंटरव्यू में अपने भविष्य के प्लान, कॉकरोच आंदोलन और CJP की आगे की दिशा को लेकर बात की। दीपके ने कहा कि अब जब वे मैदान में उतर चुके हैं तो आंदोलन को जारी रखने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।

    बीते मई महीने में देश के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के बाद 30 वर्षीय अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना की थी। उन्होंने इसे शुरुआत में एक तंज के तौर पर शुरू किया था। इसके बाद इस मुहिम से लाखों लोग जुड़ गए और दीपके की पहचान भी तेजी से बढ़ी।

    बाद में अभिजीत दीपके अमेरिका से भारत लौटे। भारत आने के बाद उन्होंने और उनकी पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों की अगुवाई की थी। अब उन्होंने एक इंटरव्यू में अपने इस फैसले और आंदोलन को आगे बढ़ाने की योजना के बारे में विस्तार से बात की है।

    अभिजीत दीपके ने बताया कि सरकार की ओर से उन्हें ‘देश के लिए खतरा’ और ‘एंटी नेशनल’ जैसे टैग दिए जाने की बात उन्हें काफी खटकी थी। उन्होंने कहा कि इन बातों से उन्हें बहुत दुख हुआ। दीपके के अनुसार उनके परिवार और वकील ने उन्हें भारत नहीं जाने की सलाह दी थी। इसके बावजूद उन्होंने अमेरिका से भारत लौटने का निर्णय लिया।

    दीपके ने कहा कि जब उनकी अपनी सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया, तभी उन्होंने भारत लौटने का फैसला किया। उनके मुताबिक इस बात ने उन्हें काफी दुख पहुंचाया। उन्होंने सवाल किया कि जब वह विदेश में थे, तब क्या उनकी सरकार को उनके साथ खड़ा नहीं होना चाहिए था।

    उन्होंने कहा कि उन्होंने देश लौटने का फैसला इसलिए किया ताकि यह साबित कर सकें कि वह देश की सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं हैं। दीपके ने यह भी कहा कि वह अपने देश से प्यार करते हैं, लेकिन उस तरीके से नहीं जिस तरीके से सरकार चाहती है।

    नीट पेपर लीक आंदोलन के बाद कॉकरोचों ने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान भी शुरू किया है। CJP के नेता सरकारी स्कूलों की बदहाली से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं। इसी संदर्भ में जब दीपके से उनकी आगे की योजना के बारे में पूछा गया तो उन्होंने आंदोलन को पार्टी या चुनावी राजनीति तक सीमित रखने से इनकार किया।

    अभिजीत दीपके ने कहा कि लोगों ने राजनीति को केवल चुनाव और राजनीतिक दलों तक सीमित कर दिया है, जबकि उनका उद्देश्य इससे आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि वे सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए नहीं हैं, बल्कि एक बड़ा बदलाव लाना चाहते हैं।

    उनके मुताबिक इस बदलाव का उद्देश्य लोगों को अपने अधिकार और कर्तव्य समझने में सक्षम बनाना है। साथ ही वे चाहते हैं कि लोग यह भी समझें कि सत्ता में कोई भी राजनीतिक पार्टी आए, उससे जवाबदेही कैसे तय कराई जा सकती है। इस तरह दीपके ने अपने आंदोलन को चुनाव से आगे ले जाने और उसे व्यापक बदलाव से जोड़ने की योजना सामने रखी है।