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  • यूपी समेत पांच चुनावी राज्यों में अक्टूबर में वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण की तैयारी

    यूपी समेत पांच चुनावी राज्यों में अक्टूबर में वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण की तैयारी

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश समेत अगले वर्ष विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण यानी SSR की प्रक्रिया अक्टूबर में शुरू किए जाने की संभावना है। इसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर शामिल हैं। प्रस्तावित प्रक्रिया में 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि माना जा सकता है। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव अगले वर्ष की शुरुआत में प्रस्तावित हैं, ऐसे में चुनाव से पहले मतदाता सूचियों को अपडेट करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    SSR के तहत मौजूदा मतदाता सूची को संशोधित और अपडेट किया जाता है। इसमें नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ना, विवरण में सुधार करना और जरूरी संशोधन करना शामिल होता है। इसके विपरीत SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूची का अधिक व्यापक सत्यापन किया जाता है। इसमें मतदाताओं की पात्रता और दर्ज विवरणों की विस्तृत जांच की जाती है।

    मौजूदा स्थिति में देशभर में एक साथ SSR कराने की संभावना कम बताई जा रही है। इसकी प्रमुख वजह 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के तीसरे चरण की प्रक्रिया और जनगणना से जुड़ी गतिविधियां हैं। चुनाव आयोग को विभिन्न राज्यों में चल रही इन प्रक्रियाओं के बीच मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का कार्यक्रम तय करना है।

    पांच चुनावी राज्यों में SSR कराने का संबंध आगामी विधानसभा चुनावों से भी है। चुनाव से पहले संबंधित मतदाता सूचियों को निर्धारित अर्हता तिथि के आधार पर अपडेट किया जाता है। प्रस्तावित प्रक्रिया में 1 जनवरी 2027 को अर्हता तिथि रखा जा सकता है। इससे उन लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, जो निर्धारित तिथि तक मतदान की पात्रता हासिल कर चुके होंगे।

    इस बीच चुनाव आयोग के भीतर मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर अलग-अलग स्तर पर उठाए गए सवाल भी चर्चा में हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले कुछ समय के दौरान आयोग की प्रक्रियाओं और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं। इन मुद्दों में मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया समेत पुनरीक्षण से जुड़े विषय शामिल बताए गए हैं।

    इन आपत्तियों पर चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले एक वर्ष में लिए गए उसके आदेश और फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम रहे हैं। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों पर भी आयोग ने आंतरिक सहमति होने की बात कही है।

    देशव्यापी SSR को लेकर जनगणना की समय-सारणी भी एक महत्वपूर्ण कारक है। वर्ष 2026 में जनगणना की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ रही है। कुछ पहाड़ी और बर्फीले क्षेत्रों में इसकी समय-सारणी को अलग रखा गया है। ऐसे में पूरे देश में एक साथ मतदाता सूची पुनरीक्षण कराने के बजाय चुनावी राज्यों को प्राथमिकता देने की संभावना जताई जा रही है।

    फिलहाल अक्टूबर में पांच राज्यों में SSR के संभावित आदेश और इसकी विस्तृत समय-सारणी पर अंतिम स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। यदि प्रक्रिया शुरू होती है, तो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर की मतदाता सूचियों में नए नाम जोड़ने, गलतियों को सुधारने और आवश्यक संशोधन करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

  • सोनिया गांधी के वोटर लिस्ट मामले में कोर्ट का बड़ा आदेश, पुराना फैसला रद्द; 29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई

    सोनिया गांधी के वोटर लिस्ट मामले में कोर्ट का बड़ा आदेश, पुराना फैसला रद्द; 29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई

    नई दिल्ली । कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से जुड़े पुराने मतदाता सूची मामले में दिल्ली की विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के पहले के आदेश को रद्द कर दिया है। इस आदेश में पुलिस जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग को खारिज किया गया था। अब मामले को संबंधित एसीजेएम अदालत के पास वापस भेज दिया गया है, जहां शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई होगी। अगली सुनवाई 29 सितंबर को निर्धारित की गई है।

    यह मामला सोनिया गांधी का नाम 1980 की नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज होने के आरोपों से जुड़ा है। शिकायत में कहा गया है कि सोनिया गांधी को भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी। ऐसे में नागरिकता हासिल करने से करीब तीन साल पहले 1980 की मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज होने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

    शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए कथित तौर पर जाली या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। शिकायत में 1980, 1982 और 1983 के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया गया है कि 1980 में नाम दर्ज होने के बाद 1982 में उसे क्यों हटाया गया और 1983 में नागरिकता मिलने के बाद नाम दोबारा किस आधार पर शामिल किया गया।

    इन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस से जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी। हालांकि, मजिस्ट्रेट अदालत ने पहले इस मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने उस आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर की।

    विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने अब निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उसमें मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था। अदालत ने पुराने आदेश को ऐसा आदेश माना जिसमें निष्कर्ष के पीछे पर्याप्त कारण स्पष्ट नहीं किए गए थे।

    अदालत ने यह भी कहा कि एफआईआर की मांग पर फैसला लेने से पहले संबंधित पुलिस अधिकारी की बात सुनी जानी चाहिए थी और पुलिस थाने से स्थिति रिपोर्ट मंगाई जानी चाहिए थी। सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि मजिस्ट्रेट को पहले यह देखना था कि शिकायत में किसी संज्ञेय अपराध के होने का आधार बनता है या नहीं।

    विशेष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह स्वयं मजिस्ट्रेट की भूमिका निभाकर सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती। इसी कारण मामले को वापस एसीजेएम अदालत भेजा गया है। अब संबंधित अदालत शिकायत में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध दस्तावेजों और पुलिस के पक्ष पर नए सिरे से विचार करेगी।

    एसीजेएम अदालत को दोनों पक्षों को सुनने के बाद कारणों सहित नया आदेश पारित करना होगा। पुलिस से स्थिति रिपोर्ट और संबंधित पक्षों की दलीलों पर भी विचार किया जाएगा। इसके बाद तय होगा कि मामले में एफआईआर दर्ज करने या आगे की जांच के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं।

    महत्वपूर्ण रूप से, ताजा अदालत के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं। अदालत ने फिलहाल पुराने आदेश को रद्द कर मामले की दोबारा सुनवाई का रास्ता खोला है। अब 29 सितंबर की सुनवाई में आगे की कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट होगी।

  • दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण की अवधि बढ़ी, अब 19 अक्टूबर को जारी होगी अंतिम वोटर लिस्ट, सत्यापन को मिला अतिरिक्त समय

    दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण की अवधि बढ़ी, अब 19 अक्टूबर को जारी होगी अंतिम वोटर लिस्ट, सत्यापन को मिला अतिरिक्त समय

    नई दिल्ली । निर्वाचन आयोग ने दिल्ली में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन-एसआईआर) कार्यक्रम की समयसीमा में संशोधन करते हुए पूरी प्रक्रिया को दस दिन आगे बढ़ा दिया है। संशोधित कार्यक्रम के अनुसार अब राजधानी की अंतिम मतदाता सूची 19 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी। आयोग का कहना है कि इस निर्णय का उद्देश्य अधिक से अधिक पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने, जानकारी अद्यतन कराने और सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने का पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना है।

    दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान 30 जून से शुरू किया गया था। इसके तहत बूथ लेवल अधिकारियों को घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करने, आवश्यक प्रपत्र उपलब्ध कराने तथा उन्हें वापस एकत्र करने की जिम्मेदारी दी गई थी। पहले यह अभियान 29 जुलाई तक पूरा होना था, लेकिन अब इसकी अंतिम तिथि बढ़ाकर 8 अगस्त कर दी गई है। इसी अवधि में मतदान केंद्रों के पुनर्गठन और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी पूरी की जाएंगी ताकि संशोधित मतदाता सूची अधिक सटीक और अद्यतन बन सके।

    निर्वाचन आयोग के संशोधित कार्यक्रम के अनुसार मतदाता सूची का प्रारंभिक मसौदा अब 17 अगस्त को प्रकाशित किया जाएगा। पहले इसे 5 अगस्त को जारी किया जाना था। मसौदा सूची जारी होने के बाद नागरिकों को अपने नाम जोड़ने, हटाने या किसी प्रकार की त्रुटि में सुधार कराने का अवसर मिलेगा। इसके लिए 17 अगस्त से 16 सितंबर तक दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाएंगी। इसके बाद संबंधित अधिकारी सभी आवेदनों की जांच करेंगे और आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन करते हुए उनका निपटारा करेंगे।

    आयोग ने स्पष्ट किया है कि दावों और आपत्तियों की जांच की प्रक्रिया 17 अगस्त से 15 अक्टूबर तक चलेगी। इस दौरान पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करने, गलत प्रविष्टियों में सुधार करने तथा आवश्यक संशोधन करने का कार्य पूरा किया जाएगा। सभी प्रक्रियाएं समाप्त होने के बाद 19 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी, जिसे आगामी चुनावी प्रक्रियाओं के लिए आधिकारिक आधार माना जाएगा।

    विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान अब तक सामने आए प्रारंभिक आंकड़े भी महत्वपूर्ण संकेत दे रहे हैं। सत्यापन के दौरान 30,907 ऐसे मतदाताओं की पहचान हुई है जिनका निधन हो चुका है। इसके अलावा 1,20,450 से अधिक मतदाता ऐसे मिले हैं जिन्होंने अपना निवास स्थान बदल लिया है। वहीं 12,160 मतदाता ऐसे पाए गए जो घर-घर सत्यापन के समय अपने पंजीकृत पते पर उपलब्ध नहीं थे। इन आंकड़ों के आधार पर आयोग मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाने की दिशा में आवश्यक कार्रवाई कर रहा है।

    निर्वाचन आयोग के अनुसार दिल्ली में चल रहा यह अभियान देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम के तीसरे चरण का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत 14 मई को की गई थी। इस चरण के पूरा होने के बाद हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। आयोग का मानना है कि नियमित अंतराल पर इस प्रकार का व्यापक सत्यापन लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने और मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

    दिल्ली के अलावा पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक सहित कई राज्यों में भी विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम की समयसीमा बढ़ाई गई है। आयोग का कहना है कि विभिन्न राज्यों से प्राप्त प्रशासनिक आवश्यकताओं और सत्यापन कार्य की प्रगति को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है। इससे अधिक से अधिक पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने का अवसर मिलेगा और अंतिम सूची पहले की तुलना में अधिक सटीक तथा व्यापक रूप से अद्यतन हो सकेगी।

  • मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान का व्यापक असर, ओडिशा सहित चार राज्यों से लाखों नाम हटे, निर्वाचन प्रक्रिया पर बढ़ी राजनीतिक हलचल

    मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान का व्यापक असर, ओडिशा सहित चार राज्यों से लाखों नाम हटे, निर्वाचन प्रक्रिया पर बढ़ी राजनीतिक हलचल

    नई दिल्ली । देश के चार राज्यों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान के बाद मतदाता सूचियों में बड़े स्तर पर बदलाव दर्ज किए गए हैं। ओडिशा, मणिपुर, मिजोरम और सिक्किम में अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद 22 लाख से अधिक नाम सूची से हटाए गए हैं। संशोधित सूची जारी होने के साथ ही राजनीतिक दलों के बीच इस विषय को लेकर चर्चा तेज हो गई है, जबकि निर्वाचन प्राधिकरण का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निर्धारित नियमों और सत्यापन के आधार पर पूरी की गई है।

    इस अभियान का सबसे अधिक प्रभाव ओडिशा में देखने को मिला, जहां मतदाता सूची से 21 लाख से अधिक नाम हटाए गए। संशोधन के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3.25 करोड़ रह गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इनमें पुरुष और महिला मतदाताओं की संख्या लगभग संतुलित बनी हुई है तथा मतदाता लिंगानुपात में भी सुधार दर्ज किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि सूची से वे नाम हटाए गए हैं जो सत्यापन के दौरान मृत, स्थानांतरित या दोहराव वाले पाए गए।

    पूर्वोत्तर के राज्यों में भी विशेष पुनरीक्षण का असर दिखाई दिया। मणिपुर में हजारों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिसके बाद राज्य की संशोधित मतदाता संख्या 20 लाख से अधिक दर्ज की गई। इसी प्रकार मिजोरम में भी व्यापक सत्यापन के बाद हजारों नाम हटाए गए। राज्य की नई मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नए युवा मतदाताओं को भी शामिल किया गया है, जिससे चुनावी भागीदारी में नई पीढ़ी की हिस्सेदारी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

    देश के सबसे कम आबादी वाले राज्य सिक्किम में भी पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत हजारों नाम सूची से हटाए गए। हालांकि कुल संख्या अन्य राज्यों की तुलना में कम रही, लेकिन निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि उद्देश्य सभी राज्यों में मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना था। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सत्यापन अभियान चलाया गया और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर आवश्यक संशोधन किए गए।

    इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद राजनीतिक दलों के बीच विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ विपक्षी दलों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता और सत्यापन के मानकों को लेकर सवाल उठाए हैं तथा प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। वहीं निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि प्रत्येक संशोधन विधिक प्रावधानों के अनुरूप किया गया है और केवल उन्हीं नामों को हटाया गया है जो निर्धारित मानकों पर पात्र नहीं पाए गए।

    निर्वाचन प्राधिकरण का मानना है कि समय-समय पर मतदाता सूची का अद्यतन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे मृत, स्थानांतरित और डुप्लिकेट नामों को हटाकर वास्तविक और पात्र मतदाताओं की सूची तैयार की जा सकती है। अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्य किसी भी पात्र मतदाता को वंचित करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि संशोधित मतदाता सूची का प्रभाव आगामी चुनावों की रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक दल अब नई मतदाता संरचना के आधार पर अपनी चुनावी तैयारियों और बूथ स्तर की रणनीति की समीक्षा कर सकते हैं। आने वाले समय में इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा जारी रहने की संभावना है, जबकि अंतिम उद्देश्य निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

  • कर्नाटक में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर उठा विवाद, NDA ने चुनाव आयोग से की शिकायत; सत्यापन प्रक्रिया में अनियमितताओं का लगाया आरोप

    कर्नाटक में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर उठा विवाद, NDA ने चुनाव आयोग से की शिकायत; सत्यापन प्रक्रिया में अनियमितताओं का लगाया आरोप

    नई दिल्ली । कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता दिखाई दे रहा है। नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) के नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर पुनरीक्षण प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की शिकायत की है। प्रतिनिधिमंडल का आरोप है कि निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा, जिससे मतदाता सूची की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    शिकायत में कहा गया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बूथ स्तर के अधिकारियों को प्रत्येक घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करना चाहिए, लेकिन कई स्थानों पर इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है। आरोप लगाया गया कि घर-घर जाकर जानकारी एकत्र करने के बजाय सामुदायिक भवनों, अन्य सार्वजनिक स्थानों तथा कुछ निजी परिसरों में लोगों को बुलाकर सामूहिक रूप से फॉर्म भरवाए जा रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि इससे वास्तविक सत्यापन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

    NDA नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ क्षेत्रों में लोगों को व्हाट्सएप समूहों और अन्य माध्यमों से विशेष शिविरों में बुलाया गया, जहां एक साथ बड़ी संख्या में आवेदन पत्र भरे गए। उनका दावा है कि इस तरह की प्रक्रिया चुनाव आयोग के निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है और इससे मतदाता सूची में त्रुटियों या अनियमितताओं की आशंका बढ़ सकती है।

    ज्ञापन में नेताओं ने मांग की है कि अब तक भरे गए सभी गणना प्रपत्रों का दोबारा घर-घर जाकर सत्यापन कराया जाए। साथ ही यदि जांच में किसी अधिकारी या अन्य संबंधित व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आधारशिला है और इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि या लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।

    प्रतिनिधिमंडल ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि उन्हें राज्य के विभिन्न हिस्सों से ऐसी कई शिकायतें प्राप्त हुई हैं। उनका दावा है कि इन कथित अनियमितताओं से जुड़े कुछ वीडियो और अन्य सामग्री सोशल मीडिया पर भी साझा की गई है। नेताओं ने आग्रह किया कि इन शिकायतों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनी रहे।

    शिकायत के दौरान NDA नेताओं ने राज्य सरकार पर भी आरोप लगाए और कहा कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है। उनका कहना है कि यदि निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया तो इसका असर चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता पर पड़ सकता है। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित पक्ष की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।

    मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चुनावी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जिसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं का सही पंजीकरण सुनिश्चित करना और सूची को अद्यतन रखना होता है। ऐसे में इस प्रक्रिया को लेकर उठे आरोपों ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। अब नजर चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई पर रहेगी कि शिकायतों की जांच किस प्रकार की जाती है और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो उसके समाधान के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

  • SIR विवाद पर विपक्ष की न्यायपालिका से दखल की मांग, 23 राजनीतिक दल और एक निर्दलीय सांसद एकजुट, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर जताई गहरी चिंता


    नई दिल्ली । देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन- SIR) अभियान को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। विपक्षी गठबंधन ‘INDIA जनबंधन’ से जुड़े 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को संयुक्त पत्र भेजकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची के सत्यापन की वर्तमान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और संवैधानिक मानकों के अनुरूप बनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी पात्र मतदाता के अधिकार प्रभावित न हों।

    विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है और इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि या विवाद चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर सकता है। इसी कारण सभी दलों ने एकजुट होकर सर्वोच्च न्यायपालिका का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करने का निर्णय लिया है। उनका मानना है कि इस विषय पर न्यायिक स्तर पर आवश्यक मार्गदर्शन और निगरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इस मुद्दे को लेकर विपक्ष ने पहले भी आपसी स्तर पर कई दौर की चर्चा की थी। हाल ही में आयोजित बैठक में विभिन्न दलों ने चुनाव आयोग द्वारा संचालित SIR प्रक्रिया और उससे जुड़े अन्य चुनावी विषयों पर साझा रणनीति तैयार की। बैठक में यह सहमति बनी कि इन चिंताओं को औपचारिक रूप से देश के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए। बाद में इस पहल को व्यापक समर्थन मिला और संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले दलों की संख्या बढ़कर 23 हो गई।

    संयुक्त पत्र को कई प्रमुख विपक्षी नेताओं और राजनीतिक दलों का समर्थन मिला है। इसमें विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के दल भी शामिल हैं। एक निर्दलीय सांसद ने भी इस पहल का समर्थन करते हुए हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का कहना है कि यह कदम किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    विवाद का केंद्र चुनाव आयोग द्वारा संचालित स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन अभियान है। इस प्रक्रिया के तहत घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जा रहा है। साथ ही परिवार आधारित विवरण का मिलान, रिकॉर्ड का अद्यतन तथा फर्जी या डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम हटाने की कार्रवाई भी की जा रही है। चुनाव आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना बताया जा रहा है, ताकि भविष्य में चुनाव प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय हो सके।

    हालांकि विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान कई स्थानों पर वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। उनका कहना है कि यदि सत्यापन अभियान पूरी पारदर्शिता और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के साथ नहीं चलाया गया तो बड़ी संख्या में पात्र नागरिक अपने मतदान अधिकार से वंचित हो सकते हैं। विपक्ष ने यह भी कहा है कि ऐसे मामलों की स्वतंत्र समीक्षा और प्रभावी निगरानी आवश्यक है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बहस का विषय बन सकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजे गए इस संयुक्त पत्र पर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है और चुनाव आयोग इस संबंध में उठाई गई चिंताओं पर किस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया देता है। आने वाले समय में यह मुद्दा चुनावी सुधार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़ी चर्चा का प्रमुख केंद्र बना रह सकता है।

  • भाषा, दस्तावेज और डेटा विसंगतियों को लेकर ओवैसी का सवाल, कहा- लोकतांत्रिक अधिकारों से किसी को वंचित न किया जाए

    भाषा, दस्तावेज और डेटा विसंगतियों को लेकर ओवैसी का सवाल, कहा- लोकतांत्रिक अधिकारों से किसी को वंचित न किया जाए

    नई दिल्ली । तेलंगाना में चल रही विशेष मतदाता सत्यापन प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती जा रही है। इसी क्रम में AIMIM प्रमुख और सांसद Asaduddin Owaisi ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण और सत्यापन से जुड़े कई मुद्दों पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी वास्तविक मतदाता का नाम तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से सूची से बाहर न हो जाए।

    ओवैसी ने विशेष रूप से चुनाव अधिकारियों के पास पहले से उपलब्ध मतदाता डेटा के उपयोग का मुद्दा उठाया। उनका तर्क है कि जिन मतदाताओं की जानकारी पहले ही सफलतापूर्वक सत्यापित और रिकॉर्ड में दर्ज है, उनसे दोबारा वही जानकारी मांगने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार पहले से उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग करने से प्रक्रिया अधिक सरल, तेज और प्रभावी बन सकती है। इससे मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति कम होगी और प्रशासनिक स्तर पर भी अनावश्यक बोझ घटेगा।

    उन्होंने सत्यापन फॉर्म की भाषा को लेकर भी सवाल उठाए। ओवैसी का कहना है कि यदि फॉर्म केवल एक भाषा में उपलब्ध होंगे तो बड़ी संख्या में मतदाताओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने मांग की कि फॉर्म को अंग्रेजी और उर्दू सहित अन्य आवश्यक भाषाओं में भी उपलब्ध कराया जाए ताकि अधिक से अधिक लोग बिना किसी कठिनाई के प्रक्रिया में भाग ले सकें। उनका मानना है कि भाषा की सुलभता लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

    AIMIM प्रमुख ने मतदाता रिकॉर्ड में दर्ज तथाकथित विसंगतियों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नामों की वर्तनी में अंतर, उम्र संबंधी मामूली असमानता या पारिवारिक विवरण में छोटी-मोटी त्रुटियों को मतदाता की पात्रता पर संदेह का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार ऐसी अनेक गलतियां वर्षों पहले हुई डेटा एंट्री त्रुटियों का परिणाम हो सकती हैं और इनके कारण किसी नागरिक के मतदान अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

    उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया में पूर्व में हुई गलतियों का खामियाजा आम नागरिकों को नहीं भुगतना चाहिए। यदि किसी मतदाता की जानकारी में तकनीकी त्रुटि पाई जाती है तो उसे सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए, न कि सीधे संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। ओवैसी के अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात में है कि प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अवसर मिले।

    सत्यापन प्रक्रिया में स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेजों को लेकर भी उन्होंने सुझाव दिए। उनका कहना है कि पहचान और पते के प्रमाण के रूप में अधिक दस्तावेजों को मान्यता दी जानी चाहिए ताकि नागरिकों को अपनी पात्रता साबित करने में कठिनाई न हो। उन्होंने कहा कि कई बार निर्धारित दस्तावेज सभी लोगों के पास उपलब्ध नहीं होते, जिससे वास्तविक मतदाताओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    ओवैसी ने सभी राजनीतिक दलों से भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि कोई पात्र नागरिक तकनीकी, प्रक्रियागत या प्रशासनिक कमियों के कारण अपने मतदान अधिकार से वंचित न हो।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सत्यापन प्रक्रिया को लेकर उठी ये चिंताएं आने वाले समय में व्यापक राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकती हैं। फिलहाल यह मुद्दा चुनावी पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित कर रहा है।