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  • सेवा, शिक्षा और संवेदना की मिसाल: डॉ. रश्म-जो इलाज को सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी मानती हैं

    सेवा, शिक्षा और संवेदना की मिसाल: डॉ. रश्म-जो इलाज को सिर्फ पेशा नहीं, जिम्मेदारी मानती हैं


    भोपाल आज के समय में जब चिकित्सा को अक्सर सिर्फ एक पेशे के तौर पर देखा जाता है, वहीं डॉ. रश्मि जैसी चिकित्सक उम्मीद की एक अलग तस्वीर पेश करती हैं। उन्होंने अपने ज्ञान, अनुभव और संवेदना से न सिर्फ मरीजों का इलाज किया, बल्कि चिकित्सा शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी को भी समान महत्व दिया। डॉ. रश्मि ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर से जनरल मेडिसिन में एमडी की डिग्री हासिल की है। इसके अलावा उन्होंने डायबिटीज में सर्टिफिकेट कोर्स भी किया, जिससे मेटाबॉलिक और लाइफस्टाइल डिजीज़ के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता और मजबूत हुई।

    अपने करियर की शुरुआत से ही डॉ. रश्मि ने प्रतिष्ठित संस्थानों में सेवाएं दी हैं। उन्होंने एम्स भोपाल में तीन वर्षों तक सीनियर रेजिडेंट के रूप में कार्य किया। इसके बाद वे एलएन मेडिकल कॉलेज और पीएमएस भोपाल जैसे संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहीं। मेडिकल एजुकेशन के क्षेत्र में उन्हें पांच साल का टीचिंग अनुभव प्राप्त है, जहां उन्होंने सैकड़ों मेडिकल छात्रों को प्रशिक्षण दिया। वर्तमान में डॉ. रश्मि मेडिकल एजुकेशन और आईसीएमआर ICMR रिसर्च से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। वे सिर्फ क्लीनिकल प्रैक्टिस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रिसर्च और अकादमिक गतिविधियों के जरिए चिकित्सा क्षेत्र में नए आयाम जोड़ने का प्रयास कर रही हैं।

    प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी उनकी भूमिका अहम रही है। वे बेसिक लाइफ सपोर्ट BLS प्रोग्राम, नर्सिंग ट्रेनिंग सेशन TEM में फैकल्टी इंचार्ज के रूप में कार्य कर चुकी हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने इमरजेंसी स्थितियों में त्वरित और सही उपचार के लिए मेडिकल व नर्सिंग स्टाफ को प्रशिक्षित किया। डॉ. रश्मि के प्रोफेशनल इंटरेस्ट में डायबिटीज, हाइपरटेंशन, मेटाबॉलिक सिंड्रोम, पेलिएटिव केयर, इमरजेंसी मेडिसिन और इमरजेंसी केयर इंटरवेंशन शामिल हैं। विशेष रूप से गंभीर और जरूरतमंद मरीजों के लिए उनका दृष्टिकोण बेहद मानवीय रहा है।

    साथी डॉक्टरों के अनुसार, डॉ. रश्मि ने अब तक कई गरीब और असहाय मरीजों के इलाज का खर्च स्वयं उठाया है। इसके साथ ही वे मरीजों को अन्य संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक मदद दिलाने में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। उनके लिए मरीज सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि एक इंसान होता है।उनकी यही सोच उन्हें एक संवेदनशील चिकित्सक के रूप में अलग पहचान दिलाती है-जहां इलाज के साथ भरोसा, सहानुभूति और सहयोग भी उतना ही जरूरी माना जाता है। डॉ. रश्मि की यात्रा यह साबित करती है कि एक अच्छा डॉक्टर वही है जो ज्ञान के साथ करुणा भी रखे। शिक्षा रिसर्च और समाजसेवा का संतुलन उन्हें चिकित्सा क्षेत्र की प्रेरणादायक शख्सियत बनाता है।

  • इंदौर सरकारी डॉक्टरों द्वारा मरीजों को निजी अस्पताल भेजने की मामले में कार्रवाई, एक निलंबित, एक का वेतन काटा

    इंदौर सरकारी डॉक्टरों द्वारा मरीजों को निजी अस्पताल भेजने की मामले में कार्रवाई, एक निलंबित, एक का वेतन काटा

    इंदौर । इंदौर के एमवायएच अस्पताल में एक बार फिर शासकीय डॉक्टरों की लापरवाही और निजी अस्पतालों को मरीज भेजने का मामला सामने आया है। इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही को उजागर किया है जहां सरकारी अस्पतालों से लाखों रुपये की सैलरी लेने वाले डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय निजी अस्पतालों से रिश्वत लेने में व्यस्त रहते हैं।

    हाल ही में एक मरीज, जो रतलाम से न्यूरोसर्जरी विभाग में इलाज के लिए एमवायएच अस्पताल आया था, का इलाज करने के बजाय उसे निजी अस्पताल भेजने का मामला सामने आया। रात के समय ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने मरीज को इलाज के लिए भेजने के बजाय उसे जमीन पर लिटा दिया और कहा कि उसका आयुष्मान कार्ड है, इसलिए उसे इंडेक्स अस्पताल में भेजा जाए। यह सारी प्रक्रिया मरीज द्वारा लिखित शिकायत करने के बाद उजागर हुई, जिसमें यह बात सामने आई कि एमसीएच के एक विद्यार्थी ने मरीज को निजी अस्पताल भेजने का निर्णय लिया था, और इसके बदले उसे निजी अस्पताल से रकम मिलती थी। इस मामले की जांच के बाद डॉक्टर का 15 दिन का वेतन काटा गया है।

    इतना ही नहीं एमवाय अस्पताल में डॉक्टरों की लापरवाही की यह घटना अकेली नहीं है। अस्पताल में ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण मरीजों को इमरजेंसी इलाज देने में भी परेशानी होती है। हाल ही में सिमरोल सड़क हादसे के बाद घायलों को इलाज के लिए एमवाय अस्पताल भेजा गया था, लेकिन इमरजेंसी मेडिसिन विभाग में कोई ड्यूटी डॉक्टर मौजूद नहीं था। कलेक्टर के अस्पताल पहुंचने पर यह लापरवाही सामने आई। दो घंटे बाद जब महिला सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर आईं, तो उन्होंने बताया कि वह घर पर आराम कर रही थीं। इस लापरवाही के लिए डीन ने महिला डॉक्टर को बर्खास्त कर दिया।

    अस्पताल में भर्ती मरीजों की कमी के पीछे भी इन डॉक्टरों की लापरवाही और निजी अस्पतालों के साथ सांठगांठ मुख्य कारण मानी जा रही है। एमवायएच अस्पताल के हड्डी रोग विभाग, पेट रोग विभाग, मेडिसिन विभाग और न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉक्टर भी मरीजों को निजी अस्पताल भेजने के इस गिरोह में शामिल हैं। इन गिरोहों के संरक्षण में ही ड्यूटी डॉक्टर और जूनियर डॉक्टर यह कृत्य कर रहे हैं। इसके अलावा एंबुलेंस संचालक स्टाफ और आउटसोर्स कंपनियों के कर्मचारी भी इन गतिविधियों में शामिल हैं। इस कारण से सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या घटती जा रही है, और निजी अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

    एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए कहा कि मरीजों के इलाज में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस घटना में एक डॉक्टर का 15 दिन का वेतन काटा गया है, और ड्यूटी पर अनुपस्थित रहने वाली सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर को बर्खास्त किया गया है।

    यह घटना इंदौर के सरकारी अस्पतालों में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही की गंभीर समस्या को उजागर करती है। मरीजों की जान से खेलने वाले इन डॉक्टरों और उनके गिरोह के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता है ताकि जनता को उचित इलाज मिल सके और सरकारी अस्पतालों में विश्वास पुनः बहाल हो।