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  • 66 दिन पहले हुई थी शादी, अब तिरंगे में लौटा पति: जालौन में शहीद सिपाही के शव से लिपटकर रोती रही पत्नी, चारों जवानों को दी गई अंतिम सलामी

    66 दिन पहले हुई थी शादी, अब तिरंगे में लौटा पति: जालौन में शहीद सिपाही के शव से लिपटकर रोती रही पत्नी, चारों जवानों को दी गई अंतिम सलामी

    नई दिल्ली। हरियाणा में हुए दर्दनाक सड़क हादसे ने जालौन पुलिस महकमे को गहरे सदमे में डाल दिया। ड्यूटी से लौट रहे चार पुलिसकर्मियों की मौत के बाद जब उनके पार्थिव शरीर जालौन पहुंचे, तो पूरा पुलिस लाइन शोक और सन्नाटे में डूब गया। बुधवार सुबह जैसे ही ताबूत पहुंचे, हर आंख नम हो गई। गार्ड ऑफ ऑनर के बीच जब अंतिम सलामी दी जा रही थी, तभी सबसे भावुक दृश्य सामने आया। सिपाही प्रदीप कुमार की पत्नी मयूरी वर्मा अपने पति के शव से लिपटकर बिलख-बिलख कर रो पड़ीं।

    मयूरी को महिला पुलिसकर्मियों ने संभालने की कोशिश की, लेकिन उनका दर्द थमने का नाम नहीं ले रहा था। रोते-रोते वह बेहोश हो गईं। महज 66 दिन पहले ही दोनों ने सात फेरे लिए थे, और अब वही रिश्ता अचानक इस तरह टूट गया कि हर देखने वाले की आंखें भर आईं। वहां मौजूद हर शख्स इस मंजर को देखकर खुद को संभाल नहीं पा रहा था।

    चारों शहीद पुलिसकर्मियों दरोगा मोहित यादव, दरोगा सत्यभान, कॉन्स्टेबल अशोक कुमार और सिपाही प्रदीप कुमार को पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। पुलिस लाइन में डीजी आलोक सिंह, आईजी आकाश कुलहरी और डीएम राजेश पांडेय समेत कई अधिकारियों ने कंधा देकर श्रद्धांजलि अर्पित की। शहीद स्मारक पर गूंजती सलामी की आवाजें हर दिल को झकझोर रही थीं।

    बताया जा रहा है कि ये सभी पुलिसकर्मी हरियाणा में एक केस में दबिश देने गए थे। मंगलवार सुबह जब वे स्कॉर्पियो से लौट रहे थे, तभी कुंडली-मानेसर-पलवल (KMP) एक्सप्रेसवे पर ओवरटेक के दौरान वाहन अनियंत्रित हो गया और सामने चल रही गाड़ी से टकरा गया। हादसा इतना भीषण था कि मौके पर ही चारों पुलिसकर्मियों और एक अन्य व्यक्ति की जान चली गई।

    श्रद्धांजलि के बाद सभी पार्थिव शरीर उनके गृह जिलों के लिए रवाना कर दिए गए—कासगंज, कन्नौज, बांदा और रायबरेली। हर गांव और हर घर में मातम पसरा हुआ है, जहां इन जवानों का इंतजार अब कभी पूरा नहीं होगा।

    इस दुखद घटना के बीच राज्य सरकार ने परिजनों के लिए बड़ी घोषणा की है। डीजी आलोक सिंह ने प्रत्येक शहीद के परिवार को 1 करोड़ 90 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया है। यह मदद भले ही कुछ सहारा दे, लेकिन जो खालीपन इन परिवारों में आया है, उसे कोई भर नहीं सकता।

    यह हादसा एक बार फिर याद दिलाता है कि ड्यूटी पर निकले जवान हर दिन खतरे के साए में जीते हैं। उनके बलिदान के पीछे सिर्फ वर्दी नहीं, बल्कि टूटते हुए कई परिवारों की कहानी छिपी होती है।

  • अमिताभ की एक्टिंग और रफी की आवाज का जादू, चार लाइन वाले गाने ने थिएटर में कर दिया माहौल इमोशनल

    अमिताभ की एक्टिंग और रफी की आवाज का जादू, चार लाइन वाले गाने ने थिएटर में कर दिया माहौल इमोशनल


    नई दिल्ली:सदी के महानायक Amitabh Bachchan ने हिंदी सिनेमा में अपनी दमदार एक्टिंग और बेहतरीन फिल्मों से हमेशा दर्शकों का दिल जीता है। उनके करियर के शुरुआती सालों में उनकी कई फिल्में हिट रहीं और 70 के दशक में उनका नाम हर जगह था। इस दौर में उनकी आई फिल्मों में शामिल हैं Sholay, Don, Amar Akbar Anthony, Deewar, Kabhie Kabhie और Maqaddar Ka Sikandar।

    1978 में आई फिल्म Maqaddar Ka Sikandar ने दर्शकों के बीच खास जगह बनाई। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ रेखा, राखी और विनोद खन्ना जैसे सितारे भी नजर आए। लेकिन इस फिल्म से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है जिसने आज भी दर्शकों के दिलों में जगह बनाई है। दरअसल, फिल्म के एक बेहद इमोशनल सीन के लिए सिर्फ चार लाइन का गाना चाहिए था और इसके लिए विशेष रूप से मोहम्मद रफी को बुलाया गया।

    फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर Kalyanji-Anandji ने तय किया कि इस सीन में ऐसा दर्द सामने आए जो सीधे ऑडियंस की आत्मा को छू ले। हालांकि सभी गाने किशोर कुमार से रिकॉर्ड किए जा रहे थे, लेकिन रफी की आवाज में वह भावनात्मक गहराई थी जो सिर्फ चार लाइन में पूरा सीन जीवंत कर दे।

    शुरुआत में कल्याणजी-आनंदजी थोड़ा हिचक रहे थे कि क्या रफी साहब सिर्फ चार लाइन के लिए आएंगे। लेकिन जैसे ही उन्होंने रफी को अपनी बात बताई, रफी ने खुशी-खुशी इस रिक्वेस्ट को स्वीकार कर लिया। उन्होंने स्टूडियो में आकर उन चार लाइन को रिकॉर्ड किया और बिना कोई फीस लिए चले गए।

    फिल्म के अंत में जब अमिताभ के किरदार की मौत दिखाई जाती है और यह चार लाइन वाला गाना बजता है -जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी, मरके जीने की अदा जो दुनिया को सिखलाएगा वो मुकद्दर का सिकंदर कहलाएगा-तो थिएटर में हर दर्शक की आंखों में आंसू थे। रफी की दर्दभरी आवाज और अमिताभ की बेहतरीन एक्टिंग ने इस सीन को आज भी यादगार बना दिया।

    यह गाना और सीन बॉलीवुड के इतिहास में भावनाओं का सबसे प्रभावशाली उदाहरण माना जाता है। सिर्फ चार लाइन में रफी साहब ने जो दर्द और भावनाएं पेश कीं, उन्होंने दर्शकों के दिलों को छू लिया। आज भी जब कोई यह सीन देखता है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं और उस दौर के संगीत और अभिनय की ताकत याद दिला देता है।