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  • सीएम योगी ने जनता दर्शन में सुनीं लोगों की समस्याएं, गोपालन के लिए महिला को मदद और दिव्यांग को न्याय का भरोसा

    सीएम योगी ने जनता दर्शन में सुनीं लोगों की समस्याएं, गोपालन के लिए महिला को मदद और दिव्यांग को न्याय का भरोसा

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को आयोजित जनता दर्शन में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से पहुंचे लोगों की समस्याएं सुनीं और अधिकारियों को उनके समयबद्ध निस्तारण के निर्देश दिए। इस दौरान सीतापुर की रहने वाली पूनम देवी ने मुख्यमंत्री के सामने गोपालन के जरिए आत्मनिर्भर बनने की इच्छा जताई। उनकी मांग पर मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों को नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

    सीतापुर के गुरुदेव नगर हरगांव की निवासी पूनम देवी ने जनता दर्शन में मुख्यमंत्री को दिए प्रार्थना पत्र में बताया कि वह गोपालन के माध्यम से अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत करना चाहती हैं। उनके पास पहले से पांच गाय हैं और उन्होंने बताया कि अन्य गोवंश रखने के लिए उनके पास पर्याप्त स्थान भी उपलब्ध है। उन्होंने सरकार से अतिरिक्त गाय उपलब्ध कराने की मांग रखी, ताकि दूध और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री के माध्यम से परिवार की आय बढ़ाई जा सके।

    पूनम देवी की बात सुनने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपर मुख्य सचिव पशुधन को निर्देश दिया कि उन्हें नियमानुसार निराश्रित गाय उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाए। साथ ही मुख्यमंत्री सहभागिता योजना के तहत गोवंश की देखभाल के लिए मिलने वाली आर्थिक सहायता का लाभ भी दिलाने को कहा गया। मुख्यमंत्री ने महिला की गोपालन के प्रति रुचि और आत्मनिर्भर बनने की इच्छा की सराहना करते हुए उनका उत्साह बढ़ाया।

    जनता दर्शन के दौरान मुख्यमंत्री ने लोगों से एक-एक करके उनकी समस्याएं पूछीं और प्रार्थना पत्रों को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाते हुए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए। पूनम देवी से बातचीत के दौरान उन्होंने गोसेवा के महत्व का उल्लेख किया और कहा कि सरकार की ओर से उन्हें नियमानुसार योजनाओं का लाभ दिलाने का प्रयास किया जाएगा। महिला ने अपनी मांग पर तत्काल संज्ञान लिए जाने के लिए मुख्यमंत्री के प्रति आभार भी जताया।

    इसी दौरान जनता दर्शन में पहुंचे एक दिव्यांग व्यक्ति ने अपनी भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायत मुख्यमंत्री के सामने रखी। पीड़ित ने बताया कि उसकी जमीन पर किसी अन्य व्यक्ति ने कब्जा कर लिया है, जिसके कारण उसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को जमीन की जांच कराने और नियमानुसार समस्या का समाधान करने का निर्देश दिया।

    मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि जनता दर्शन में आने वाले लोगों की शिकायतों का समयबद्ध और प्रभावी तरीके से निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए फरियादियों की समस्याओं पर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए। जनता दर्शन में सामने आए मामलों में सरकारी योजनाओं का लाभ, भूमि विवाद और अन्य स्थानीय समस्याएं शामिल रहीं।

    इस दौरान मुख्यमंत्री का जोर इस बात पर रहा कि पात्र लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने में अनावश्यक देरी न हो और शिकायतों का समाधान संबंधित विभागों के स्तर पर प्रभावी ढंग से किया जाए। महिला की गोपालन संबंधी मांग और दिव्यांग की भूमि से जुड़े मामले में तत्काल निर्देश दिए जाने से जनता दर्शन में शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया पर प्रशासनिक सक्रियता का संदेश गया।

  • भारत का 'जैसे को तैसे' वाला जवाब…. पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहरी अतिक्रमण पर चलाया बुलडोजर

    भारत का 'जैसे को तैसे' वाला जवाब…. पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहरी अतिक्रमण पर चलाया बुलडोजर


    नई दिल्ली।
    भारत और पाकिस्तान (India and Pakistan) के बीच पहले से ही तनावपूर्ण रिश्ते हैं। इस बीच पाकिस्तान (Pakistan) ने फिर कुछ ऐसा कर दिया जिससे भारत (India) को ‘जैस को तैसे’ वाला जवाब देने पड़ा। नई दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन (Pakistan High Commission) के बाहर बनी कुछ अनधिकृत संरचनाओं और अतिक्रमण को बुलडोजर चलाकर हटा दिया गया है। बताया जा रहा है कि ये ढांचे पाकिस्तानी मिशन के वीजा सेक्शन के पास थे और हाई कमीशन के तय परिसर की सीमा के बाहर बने हुए थे। संबंधित एजेंसियों ने कार्रवाई करते हुए इन्हें साफ कर दिया।

    WION की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में हुई इस कार्रवाई को पाकिस्तान की ओर से इस्लामाबाद में भारतीय हाई कमीशन के बाहर की गई हालिया कार्रवाई के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ दिन पहले पाकिस्तानी अधिकारियों ने भारतीय हाई कमीशन के बाहर लगे पार्किंग पोल हटा दिए थे। भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में लंबे समय से चली आ रही तनातनी के बीच दोनों देशों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई पहले भी होती रही है।


    पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर क्या हुआ?

    नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर, खास तौर पर उसके वीजा सेक्शन के आसपास कुछ ऐसी संरचनाएं थीं जो निर्धारित परिसर की सीमा के बाहर थीं। इनको अनधिकृत माना गया और संबंधित एजेंसियों ने इन्हें हटा दिया।

    यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच राजनयिक रिश्ते बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। हालांकि कार्रवाई का सीधा कारण अतिक्रमण और निर्धारित सीमा से बाहर बनी संरचनाएं होना बताया गया है, लेकिन इसका समय इसे दोनों देशों के बीच चल रही पारस्परिक कार्रवाई से जोड़कर देखा जा रहा है।


    इस्लामाबाद में भारत के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई थी?

    नई दिल्ली की कार्रवाई से कुछ दिन पहले पाकिस्तान ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय हाई कमीशन के बाहर लगे पार्किंग पोल हटा दिए थे। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में जब भी तनाव बढ़ा है, दोनों देशों ने कई बार एक-दूसरे के खिलाफ समान या जवाबी प्रशासनिक कदम उठाए हैं। इनमें राजनयिक कर्मचारियों की संख्या घटाना, आवाजाही और पहुंच पर पाबंदियां लगाना तथा मिशन से जुड़ी सुविधाओं को सीमित करना जैसे कदम शामिल रहे हैं। इसलिए पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर दिल्ली में हुई ताजा कार्रवाई को भी इसी व्यापक सिलसिले की कड़ी माना जा रहा है।


    भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इतने खराब क्यों हैं?

    भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव की सबसे बड़ी वजह सीमा पार आतंकवाद है। पाकिस्तान की जमीन से भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन मिलता है। पिछले साल केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के रिश्ते और ज्यादा खराब हो गए। अप्रैल 2025 में हुए इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारत ने आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। भारतीय कार्रवाई में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकी ढांचों को निशाना बनाया गया।

    इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कई दिनों तक गंभीर सैन्य तनाव रहा। यह संघर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकरावों में से एक माना गया। आखिरकार पाकिस्तान की ओर से संपर्क किए जाने के बाद संघर्ष विराम की स्थिति बनी।


    ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्या बदला?

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सामान्य स्थिति वापस नहीं आ सकी है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध लगभग ठप हैं और प्रमुख जमीनी सीमा मार्ग भी बंद है। वीजा व्यवस्था भी पहले की तुलना में काफी सीमित कर दी गई है। दोनों देशों में स्थित हाई कमीशन पहले की तुलना में कम कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं। यानी दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संपर्क पूरी तरह खत्म तो नहीं हुआ है, लेकिन रिश्तों में सामान्य गर्मजोशी फिलहाल दिखाई नहीं देती।


    सिंधु जल संधि भी बनी बड़ा मुद्दा

    भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को भी फिलहाल स्थगित रखा है। नई दिल्ली का कहना है कि यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और पूरी तरह समाप्त करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता। सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चली आ रही एक महत्वपूर्ण जल समझौता है। ऐसे में इसका स्थगन दोनों देशों के रिश्तों में तनाव की गंभीरता को दिखाता है।

  • गोरखपुर में सीएम योगी की रवि किशन पर हल्की चुटकी, अतिक्रमण हटाने की सलाह के साथ विकास कार्यों पर दिया जोर

    गोरखपुर में सीएम योगी की रवि किशन पर हल्की चुटकी, अतिक्रमण हटाने की सलाह के साथ विकास कार्यों पर दिया जोर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार को गोरखपुर दौरे के दौरान 429 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित शहर के पहले सिक्सलेन फ्लाईओवर का उद्घाटन किया। इसके साथ ही उन्होंने लगभग 995 करोड़ रुपये की विभिन्न विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी किया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने फ्लाईओवर का निरीक्षण किया और अधिकारियों के साथ परियोजनाओं की प्रगति की जानकारी ली। जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने विकास कार्यों के साथ स्वच्छता, अतिक्रमण हटाने और जनभागीदारी पर विशेष जोर दिया।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने गोरखपुर के सांसद रवि किशन का उल्लेख करते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि हाल ही में बारिश के दौरान रवि किशन को पानी में उतरकर नाली साफ करते देखा गया था। इस पर मुख्यमंत्री ने मुस्कुराते हुए कहा कि नाली साफ करने से बेहतर है कि नालों पर हुए अतिक्रमण को हटाया जाए, क्योंकि इससे पानी का निकास स्वतः बेहतर हो जाएगा। मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी पर कार्यक्रम स्थल पर मौजूद लोगों ने भी मुस्कुराते हुए प्रतिक्रिया दी।

    मुख्यमंत्री ने इसी दौरान सांसद रवि किशन की ओर से आयोजित भोज का भी जिक्र किया। उन्होंने उपस्थित लोगों से पूछा कि भोजन कार्यक्रम में कितने लोग शामिल हुए थे। जब सीमित संख्या में लोगों ने हाथ उठाया तो मुख्यमंत्री ने मजाकिया लहजे में कहा कि लगता है केवल चार-पांच लोगों को ही भोजन मिला। इस पर रवि किशन ने जवाब देते हुए कहा कि पूरे क्षेत्र के लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई थी। दोनों नेताओं के बीच हुई इस सहज बातचीत ने कार्यक्रम का माहौल हल्का बना दिया।

    अपने संबोधन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य सरकार की विकास योजनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में लगातार सड़क, पुल, फ्लाईओवर और अन्य आधारभूत ढांचे का विस्तार किया जा रहा है ताकि लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। उनका कहना था कि मजबूत बुनियादी ढांचा किसी भी क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है और सरकार इसी दिशा में लगातार कार्य कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर भी निशाना साधते हुए कहा कि वर्ष 2017 से पहले प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति चुनौतीपूर्ण थी, जबकि अब राज्य में अपराध और अराजकता पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया है। उन्होंने दावा किया कि सरकार ने बीते वर्षों में युवाओं के लिए रोजगार और नौकरी के अनेक अवसर उपलब्ध कराए हैं तथा विकास को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ाया जा रहा है।

    योगी आदित्यनाथ ने लोगों से स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदारी की अपील भी की। उन्होंने कहा कि नालों और जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण नहीं होना चाहिए तथा सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग से बचना आवश्यक है। उन्होंने जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि विकास कार्य तभी लंबे समय तक प्रभावी रहेंगे जब जनता भी उनकी देखभाल और संरक्षण में अपनी जिम्मेदारी निभाएगी।

    गोरखपुर दौरे के दौरान मुख्यमंत्री का संबोधन विकास परियोजनाओं, आधारभूत संरचना, स्वच्छता अभियान और जनभागीदारी जैसे विषयों पर केंद्रित रहा। वहीं सांसद रवि किशन के साथ उनका हल्का-फुल्का संवाद भी कार्यक्रम की प्रमुख चर्चा बना रहा, जिसे उपस्थित लोगों ने सहज और सकारात्मक माहौल का हिस्सा माना।

  • पीएम आवास और बिजली सुविधा वाली जमीन पर चला बुलडोजर, ग्रामीणों ने वन विभाग पर लगाए गंभीर आरोप, जांच शुरू

    पीएम आवास और बिजली सुविधा वाली जमीन पर चला बुलडोजर, ग्रामीणों ने वन विभाग पर लगाए गंभीर आरोप, जांच शुरू

    मध्य प्रदेश:के सिंगरौली जिले के चितरंगी तहसील अंतर्गत ग्राम भुईधरवा में वन विभाग की कार्रवाई के बाद भूमि अधिकार और बेदखली को लेकर नया विवाद सामने आया है। वन विभाग द्वारा कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान कई परिवारों के आशियाने प्रभावित हुए, जिसके बाद ग्रामीणों ने प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग करते हुए न्याय की गुहार लगाई है। प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे कई दशकों से संबंधित भूमि पर निवास और खेती करते आ रहे हैं तथा अब अचानक की गई कार्रवाई से उनके सामने आवास और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।

    ग्रामीणों का दावा है कि उनके परिवार वर्ष 1969 से इस भूमि पर रह रहे हैं और पीढ़ियों से खेती-बाड़ी कर जीवनयापन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिस जमीन को अब वन विभाग अतिक्रमित बता रहा है, उसी क्षेत्र में सरकारी योजनाओं के तहत प्रधानमंत्री आवास बनाए गए, हैंडपंप स्थापित किए गए और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गईं। ग्रामीणों के अनुसार इन परिस्थितियों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि उनका निवास और खेती वैध प्रक्रिया के दायरे में है।

    मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब कुछ ग्रामीणों ने वन विभाग के एक बीट गार्ड पर पट्टा दिलाने के नाम पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया। आरोप है कि एक ग्रामीण से नकद राशि और एक बकरा कथित रूप से लिए गए, लेकिन इसके बावजूद भूमि का पट्टा नहीं मिला। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि ग्रामीणों ने इसकी निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। विभाग की ओर से आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    प्रभावित परिवारों का कहना है कि खेती ही उनकी आय का मुख्य साधन है और बेदखली की कार्रवाई के बाद उनके सामने रोजगार और आवास दोनों का संकट उत्पन्न हो गया है। उन्होंने प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय तक समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे चितरंगी तहसील कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन शुरू करेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी मांग केवल स्थायी समाधान और भूमि अधिकार से जुड़े मामलों के निष्पक्ष निपटारे की है।

    विवाद बढ़ने के बाद जिला प्रशासन सक्रिय हुआ है। अधिकारियों ने बताया कि मामले की जांच के लिए राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीम गठित की गई है। जांच पूरी होने तक संबंधित कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगाने का निर्णय लिया गया है ताकि सभी तथ्यों का निष्पक्ष परीक्षण किया जा सके। प्रशासन का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    प्रशासन ने यह भी आश्वासन दिया है कि यदि जांच में कोई व्यक्ति वास्तव में भूमिहीन पाया जाता है और पात्रता की शर्तें पूरी करता है तो नियमानुसार उसे भूमि से संबंधित लाभ दिलाने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। जिन परिवारों के मकान कार्रवाई के दौरान क्षतिग्रस्त हुए हैं, उनके पुनर्वास और वैकल्पिक आवास की व्यवस्था पर भी विचार किया जा रहा है। साथ ही बरसात के मौसम को देखते हुए प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी रहने और भोजन की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर कराने के निर्देश दिए गए हैं।

    यह मामला अब केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी योजनाओं के लाभ, वन भूमि पर निवास, प्रशासनिक कार्रवाई और कथित भ्रष्टाचार जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ गया है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि सभी पक्षों के दावों और उपलब्ध अभिलेखों की जांच के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा, ताकि किसी भी पात्र व्यक्ति के अधिकार प्रभावित न हों और कानून के अनुरूप उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

  • सरकारी भवनों पर कब्जे का शिकंजा 38 लाख की लैब में बस गया परिवार आंगनबाड़ी पर 6 साल से दबंग का ताला

    सरकारी भवनों पर कब्जे का शिकंजा 38 लाख की लैब में बस गया परिवार आंगनबाड़ी पर 6 साल से दबंग का ताला


    मध्यप्रदेश । सरकारी जमीनों और भवनों को अतिक्रमण मुक्त कराने के दावे करने वाला प्रशासन शिवपुरी जिले में अपनी ही संपत्तियों को कब्जे से मुक्त नहीं करा पा रहा है। हालात यह हैं कि बदरवास में लाखों रुपए की लागत से बनी मृदा परीक्षण प्रयोगशाला पिछले सात वर्षों से एक परिवार के कब्जे में है जबकि कोलारस क्षेत्र के एक गांव में आंगनबाड़ी केंद्र पर छह साल से ताला लटका हुआ है। इन दोनों मामलों ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    बदरवास तहसील कार्यालय के पीछे वर्ष 2018 में मंडी बोर्ड द्वारा कृषि विभाग के लिए आधुनिक मृदा परीक्षण प्रयोगशाला का निर्माण कराया गया था। करीब 38 लाख रुपए की लागत से तैयार इस भवन का उद्देश्य किसानों को मिट्टी की जांच की सुविधा उपलब्ध कराना था ताकि वे अपनी फसलों के लिए वैज्ञानिक सलाह प्राप्त कर सकें। लेकिन प्रयोगशाला शुरू होने से पहले ही भवन पर एक परिवार ने कब्जा जमा लिया और धीरे-धीरे उसे अपने आवास में तब्दील कर दिया। आज स्थिति यह है कि जिस भवन में किसानों के हित से जुड़ी अत्याधुनिक सुविधाएं शुरू होनी थीं वहां घरेलू गतिविधियां संचालित हो रही हैं।

    कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि भवन खाली कराने के कई प्रयास किए गए लेकिन सफलता नहीं मिली। विभाग का आरोप है कि कब्जाधारी के खिलाफ कार्रवाई करने में कई तरह की बाधाएं सामने आती रही हैं। इस संबंध में राजस्व विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार अवगत कराया गया लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। परिणामस्वरूप लाखों रुपए की सरकारी संपत्ति वर्षों से बेकार पड़ी हुई है और किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा।

    दूसरी ओर कोलारस विकासखंड के ग्राम सेसईखुर्द में स्थित शासकीय आंगनबाड़ी केंद्र भी वर्षों से अपने मूल उद्देश्य से भटका हुआ है। जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 में आए एक तेज तूफान के बाद एक स्थानीय व्यक्ति ने आंगनबाड़ी भवन का ताला तोड़कर उसमें अपना सामान रख लिया और धीरे-धीरे पूरे भवन पर कब्जा कर लिया। बताया जाता है कि बाद में भवन की संरचना में भी बदलाव कर दिया गया। इसके चलते आंगनबाड़ी केंद्र का संचालन प्रभावित हो गया और बच्चों तथा गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली कई महत्वपूर्ण योजनाओं का लाभ बाधित हो गया।

    स्थानीय स्तर पर आंगनबाड़ी केंद्र का संचालन वैकल्पिक व्यवस्था के तहत किया जा रहा है लेकिन सरकारी भवन पर कब्जा होने से व्यवस्थाएं पूरी तरह सुचारू नहीं हो पा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतें करने के बावजूद अब तक स्थायी समाधान नहीं निकला है।

    इन दोनों मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी भवनों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो करोड़ों रुपए की सार्वजनिक संपत्तियां इसी तरह अतिक्रमण और लापरवाही की भेंट चढ़ती रहेंगी। प्रशासनिक अधिकारियों ने कार्रवाई का भरोसा जरूर दिया है लेकिन अब लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि जमीन पर परिणाम कब दिखाई देते हैं।

  • 230 अधिकारियों की कार्रवाई बेअसर! हटाए गए कब्जे के बाद फिर बस गई टपरियां, वन भूमि पर दोबारा अतिक्रमण

    230 अधिकारियों की कार्रवाई बेअसर! हटाए गए कब्जे के बाद फिर बस गई टपरियां, वन भूमि पर दोबारा अतिक्रमण


    नई दिल्ली। तीन साल से जारी अतिक्रमण के खिलाफ 27 फरवरी को प्रशासन ने 230 कर्मचारियों की मौजूदगी में कार्रवाई कर टपरियां हटाईं और जमीन पर गड्ढे खोदे थे। बावजूद इसके, कुछ ही दिनों में फिर से उसी जगह पर टपरियां बनाकर दोबारा कब्जा कर लिया गया।

    तीन साल से वन भूमि पर जारी अतिक्रमण के खिलाफ प्रशासन ने 27 फरवरी को बड़ी कार्रवाई करते हुए सख्त संदेश देने की कोशिश की थी, लेकिन हालात फिर वहीं के वहीं नजर आ रहे हैं। वन विभाग, राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीम ने उस दिन मौके पर पहुंचकर कब्जा हटाया था। कार्रवाई में वन विभाग के एसडीओ अनिल विश्वकर्मा, तहसीलदार कीर्ति प्रधान, एसडीओपी महेंद्र चौहान और थाना प्रभारी सुधाकर बारस्कर मौजूद रहे। करीब 230 वनकर्मी, पुलिस जवान और राजस्व अमले ने मिलकर अवैध कब्जे हटाए थे।

    कार्रवाई के दौरान अतिक्रमणकारियों द्वारा बनाई गई अस्थायी टपरियों को तोड़ा गया और जमीन को दोबारा खेती या कब्जे से बचाने के लिए बड़े-बड़े गड्ढे भी खोदे गए थे। प्रशासन का मकसद साफ था—वन भूमि को पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त कर भविष्य में दोबारा कब्जा न होने देना। उस समय अधिकारियों ने दावा किया था कि अब दोबारा यहां कब्जा नहीं होने दिया जाएगा और क्षेत्र की नियमित निगरानी की जाएगी।

    लेकिन कार्रवाई के कुछ ही दिनों बाद तस्वीर बदलती दिख रही है। उसी जमीन पर फिर से टपरियां खड़ी कर दी गई हैं। इससे साफ है कि अतिक्रमणकारियों के हौसले अब भी बुलंद हैं और प्रशासनिक सख्ती का असर लंबे समय तक नहीं टिक पाया। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर लगातार निगरानी और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वन भूमि पर कब्जे का सिलसिला फिर से बढ़ सकता है।

    यह सवाल भी उठ रहा है कि जब इतनी बड़ी संयुक्त कार्रवाई की गई थी, तो उसके बाद क्षेत्र की निगरानी क्यों कमजोर पड़ गई। वन भूमि पर बार-बार कब्जा होना न केवल पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। अब देखना होगा कि प्रशासन दोबारा सख्ती दिखाता है या अतिक्रमण का यह खेल यूं ही चलता रहेगा।

  • शिवपुरी में बेखौफ गुंडागर्दी: सरकारी शौचालय बचाने गई नपा टीम पर हमला, FIR न होने से पुलिस पर सवाल

    शिवपुरी में बेखौफ गुंडागर्दी: सरकारी शौचालय बचाने गई नपा टीम पर हमला, FIR न होने से पुलिस पर सवाल


    शिवपुरी । मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाली घटना सामने आई है। देहात थाना क्षेत्र की महल सराय आदिवासी बस्ती में शासकीय शौचालय को तोड़कर अतिक्रमण किए जाने की सूचना पर पहुंची नगर पालिका टीम पर बदमाशों ने हमला कर दिया। कर्मचारियों के साथ न केवल धक्का-मुक्की की गई बल्कि जमकर मारपीट भी की गई। घटना के बाद से नगर पालिका अमले में आक्रोश है और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

    जानकारी के अनुसार महल सराय आदिवासी बस्ती में बने सरकारी शौचालय को कुछ लोग तोड़कर उस पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे। शिकायत मिलने पर नपा अतिक्रमण दस्ता प्रभारी अशोक खरे अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने बताया कि मौके पर कुछ लोग शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे। जब टीम ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो आरोपियों ने अचानक हमला कर दिया। कर्मचारियों के साथ मारपीट की गई और उन्हें मौके से खदेड़ने की कोशिश की गई।

    घटना के बाद घायल कर्मचारियों ने देहात थाना पहुंचकर लिखित शिकायत दी। पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में स्पष्ट रूप से मारपीट और हंगामा दिखाई दे रहा है। इसके बावजूद अब तक आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज न किए जाने की बात सामने आ रही है जिससे देहात थाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।

    नगर पालिका कर्मचारियों का कहना है कि जब शासकीय संपत्ति को बचाने गए कर्मचारियों पर खुलेआम हमला होता है और उसके बाद भी त्वरित कार्रवाई नहीं होती तो इससे असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद होते हैं। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने फिलहाल केवल आवेदन लिया है लेकिन प्रकरण दर्ज करने में देरी की जा रही है।

    स्थानीय लोगों का भी कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में ऐसी घटनाएं बढ़ सकती हैं। प्रशासन के सामने अब चुनौती यह है कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और कर्मचारियों की सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जाएं।

  • तुर्कमान गेट ऐतिहासिक दरवाजा संघर्षों का गवाह और विवादों का केंद्र

    तुर्कमान गेट ऐतिहासिक दरवाजा संघर्षों का गवाह और विवादों का केंद्र


    नई दिल्ली । दिल्ली का तुर्कमान गेट हाल ही में फिर सुर्खियों में है। 6 और 7 जनवरी 2025 की रात को यहां हुए हिंसक संघर्ष ने एक बार फिर इस इलाके को चर्चा का केंद्र बना दिया। घटना उस समय घटी जब दिल्ली पुलिस और MCD की टीम ने अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास बुलडोजर चलाया। इसके खिलाफ स्थानीय लोगों ने विरोध शुरू किया और स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। इस घटना ने तुर्कमान गेट के इतिहास सामाजिक संघर्षों और राजनीतिक विवादों के पुराने अध्यायों को फिर से जीवित कर दिया है।

    तुर्कमान गेट का ऐतिहासिक महत्व

    तुर्कमान गेट जिसे 17वीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल में बनाया गया था पुरानी दिल्ली का एक प्रमुख दरवाजा था। इसे शाहजहां बाद पुरानी दिल्ली के प्रमुख दरवाजों में से एक माना जाता है। यह दरवाजा प्रसिद्ध सूफी संत शाह तुर्कमान की दरगाह के पास स्थित होने के कारण इस दरवाजे का नाम तुर्कमान गेट पड़ा। शाह तुर्कमान की याद में हर साल उर्स का आयोजन भी किया जाता है जिससे इस इलाके की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बनी रहती है।इसकी वास्तुकला में तीन मेहराबी प्रवेश द्वार और दो मंजिला बुर्ज शामिल हैं जो मुग़ल काल की शानदार निर्माण शैली का प्रतीक हैं। तुर्कमान गेट की संरचना और इतिहास इसे दिल्ली के अहम ऐतिहासिक धरोहरों में से एक बनाती है।

    1976 में पहली बार चला बुलडोजर

    तुर्कमान गेट का नाम पहली बार बड़े पैमाने पर 13 अप्रैल 1976 को चर्चा में आया जब संजय गांधी के नेतृत्व में आपातकाल के दौरान दिल्ली में झुग्गी हटाओ अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत तुर्कमान गेट क्षेत्र में झुग्गियां हटाई गईं जिसके बाद इलाके में असंतोष और गुस्सा फैल गया। शुरूआत में यह विरोध सीमित था लेकिन जब 19 अप्रैल 1976 को फिर से बुलडोजर चलने लगे तो स्थिति बेकाबू हो गई। जामा मस्जिद चांदनी चौक और तुर्कमान गेट जैसे इलाकों में जबरदस्त विरोध हुआ। इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया और पुलिस को लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। यही वह समय था जब तुर्कमान गेट इलाके में संघर्ष ने व्यापक रूप ले लिया।

    तुर्कमान गेट और औरंगजेब

    एक सवाल जो अक्सर उठता है वह है तुर्कमान गेट और औरंगजेब के बीच संबंध। हालांकि तुर्कमान गेट का निर्माण शाहजहां के शासनकाल में हुआ था और औरंगजेब शाहजहां का पुत्र था लेकिन इसका कोई सीधा ऐतिहासिक संबंध औरंगजेब से नहीं है। यह भ्रम अक्सर सोशल मीडिया और अधूरी जानकारी के कारण फैलता है जबकि तुर्कमान गेट की वास्तुकला और इतिहास सीधे तौर पर शाहजहां के समय से जुड़ी हुई है।

    2025 में फिर हुआ विवाद

    करीब 50 साल बाद तुर्कमान गेट फिर से चर्चा का विषय बना और इसका कारण था फैज-ए-इलाही मस्जिद के आसपास का अतिक्रमण। सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण और कब्जे ने इस ऐतिहासिक स्थल को फिर से विवादों में घेर लिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि इस इलाके से अवैध कब्जे हटाए जाएं। इसके बाद 6 जनवरी 2025 को एक बार फिर से बुलडोजर तुर्कमान गेट के आसपास के क्षेत्र में चले जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय लोगों ने भारी विरोध शुरू कर दिया। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा और पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया। तुर्कमान गेट का इतिहास सिर्फ एक दरवाजे का नहीं है बल्कि यह दिल्ली के सामाजिक राजनीतिक और प्रशासनिक संघर्षों का गवाह रहा है आपातकाल से लेकर आज तक इस स्थल ने कई आंदोलन और संघर्ष देखे हैं। 1976 में हुए झुग्गी हटाओ अभियान से लेकर आज तक तुर्कमान गेट एक बार फिर से यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र न सिर्फ ऐतिहासिक महत्व रखता है बल्कि आज भी विवादों और संघर्षों का केंद्र है।

  • ग्वालियर हाईकोर्ट ने 48 साल पुराने भूमि विवाद में किया फैसला, कब्जा अवैध, नगर निगम को कार्रवाई की अनुमति

    ग्वालियर हाईकोर्ट ने 48 साल पुराने भूमि विवाद में किया फैसला, कब्जा अवैध, नगर निगम को कार्रवाई की अनुमति



    ग्वालियर।
    ग्वालियर के तानसेन रोड पर नेचुरोपैथी अस्पताल के सामने की जमीन को लेकर 48 साल से चल रहे विवाद में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लीज की अवधि समाप्त होने के बाद जमीन पर कब्जा रखना पूरी तरह गैरकानूनी है। हाईकोर्ट ने कहा कि लीज खत्म होते ही उसका स्वतः अंत हो जाता है और उसके बाद जमीन पर बने रहना अतिक्रमण माना जाएगा।

    हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए अपीलकर्ताओं की दूसरी अपील खारिज कर दी।

    कोर्ट ने साथ ही नगर निगम ग्वालियर को जमीन पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने की पूरी अनुमति दे दी है। अब नगर निगम इस जमीन पर उचित कार्रवाई कर सकता है और भविष्य में ऐसे मामलों को नियंत्रित कर सकेगा।

    यह विवाद तानसेन रोड पर स्थित नेचुरोपैथी अस्पताल के सामने की 3161.6 वर्गफुट जमीन को लेकर था। अपीलकर्ता, डॉ. मणिकांत शर्मा के वारिस, नगर निगम के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर रहे थे। उनका दावा था कि यह जमीन उनके पिता को लीज पर दी गई थी और बाद में इसका नवीनीकरण भी हुआ।

    सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि लीज केवल 31 मार्च 1977 तक वैध थी और उसके बाद कोई वैध नवीनीकरण नहीं हुआ।

    अपीलकर्ताओं के वकील ने भी कोर्ट में माना कि लीज बढ़ाने से जुड़े कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर मान भी लिया जाए कि 1976 में लीज को 30 साल के लिए बढ़ाया गया था, तो वह 2007 में समाप्त हो चुकी थी।

    इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि बिना वैध लीज के जमीन पर कब्जा अवैध है, और अब नगर निगम को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार है। इस निर्णय से ग्वालियर में भूमि विवादों को लेकर प्रशासनिक स्पष्टता बढ़ेगी और भविष्य में ऐसे मामलों में कानून के पालन को मजबूती मिलेगी।

    हाईकोर्ट का यह फैसला यह संदेश देता है कि जमीन पर कब्जा कानून और दस्तावेजों के आधार पर ही वैध माना जाएगा और किसी भी प्रकार का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 48 साल पुराने इस विवाद का यह निपटारा ग्वालियर के भूमि विवाद मामलों में नियम और अनुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।