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  • भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूती, कैप्टिव और कमर्शियल खदानों से कोयला उत्पादन 14.78 मिलियन टन पहुंचा

    भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूती, कैप्टिव और कमर्शियल खदानों से कोयला उत्पादन 14.78 मिलियन टन पहुंचा


    नई दिल्ली ।
    भारत के कैप्टिव और वाणिज्यिक कोयला खदानों से उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। जुलाई 2026 में इन खदानों से कोयला उत्पादन सालाना आधार पर 9.6 प्रतिशत बढ़कर 14.78 मिलियन टन (एमटी) तक पहुंच गया है। कोयला मंत्रालय ने सोमवार को जारी जानकारी में बताया कि यह वृद्धि देश के कोयला क्षेत्र में बेहतर परिचालन क्षमता, उत्पादन दक्षता और खनन संसाधनों के प्रभावी इस्तेमाल को दर्शाती है।

    मंत्रालय के अनुसार जुलाई के दौरान कैप्टिव और वाणिज्यिक खदानों से कोयले की आपूर्ति भी बढ़कर 17.49 मिलियन टन हो गई। उत्पादन और आपूर्ति में यह वृद्धि ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब देश लगातार ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहा है। सरकार का लक्ष्य कोयला क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाकर आयात पर निर्भरता को कम करना है।

    कोयला मंत्रालय ने बताया कि चालू वित्त वर्ष की शुरुआत से जुलाई तक कैप्टिव और वाणिज्यिक खदानों से कुल उत्पादन 63.16 मिलियन टन दर्ज किया गया है। यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में हुए 59.42 मिलियन टन उत्पादन की तुलना में 6.2 प्रतिशत अधिक है। इसी अवधि में कोयले की संचयी आपूर्ति भी बढ़कर 70.14 मिलियन टन हो गई, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 66.02 मिलियन टन था। इस तरह आपूर्ति में करीब 5.8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है।

    मंत्रालय ने कहा कि कैप्टिव और वाणिज्यिक खदानों से उत्पादन में लगातार सुधार होने से देश में आयातित कोयले की आवश्यकता कम होगी। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को भी मजबूती मिलेगी। कोयला देश के बिजली उत्पादन और कई औद्योगिक क्षेत्रों के लिए एक प्रमुख कच्चा माल है, इसलिए घरेलू उत्पादन में वृद्धि को आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

    सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत कोयला क्षेत्र में उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नई खदानों को सक्रिय करने और निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मंत्रालय ने कहा कि कैप्टिव और वाणिज्यिक कोयला खनन क्षेत्र की पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए नीतिगत सुधारों, बेहतर निगरानी व्यवस्था और हितधारकों के सहयोग के माध्यम से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

    मंत्रालय के मुताबिक आने वाले समय में कोयला उत्पादन और आपूर्ति से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए कई स्तरों पर काम जारी रहेगा। इसका उद्देश्य देश की बढ़ती ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त कोयला उपलब्ध कराना है। उत्पादन में यह वृद्धि भारत को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

  • हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में हॉर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से गहराते टकराव का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा चलता है तो भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को महंगे तेल, बढ़ती महंगाई, कमजोर रुपये और ऊंचे आयात बिल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव आम लोगों की रसोई से लेकर परिवहन, उद्योग और अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जा सकता है।

    हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के बड़े हिस्से और बड़ी मात्रा में एलएनजी की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही में बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों को तेजी से प्रभावित करती है। हाल के दिनों में कई जहाजों ने सुरक्षा कारणों से इस मार्ग पर संचालन सीमित किया है, जिससे समुद्री परिवहन और बीमा लागत भी बढ़ी है।

    भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है। इनमें से बड़ी मात्रा हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते देश तक पहुंचती है। यदि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे परिवहन लागत और आयात व्यय दोनों बढ़ेंगे। इसका प्रभाव पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

    रसोई गैस को लेकर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इन आयातों का अधिकांश भाग हॉर्मुज मार्ग से होकर आता है। यदि आपूर्ति प्रभावित होती है या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज वृद्धि होती है तो घरेलू गैस सिलेंडर की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने सब्सिडी बढ़ाने या उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त कीमत का बोझ डालने जैसे विकल्प सामने आ सकते हैं।

    महंगे कच्चे तेल का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमतों में वृद्धि से माल ढुलाई महंगी होती है, जिसका प्रभाव फल, सब्जियां, दूध, अनाज, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। इससे खुदरा महंगाई बढ़ने की संभावना रहती है। साथ ही तेल आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होने से रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।

    ऊंची तेल कीमतों का असर सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू स्तर पर कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की जाती, तो कंपनियों पर लागत का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। वहीं तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को ऊंचे वैश्विक दामों का लाभ मिलने की संभावना रहती है, जबकि विमानन, परिवहन, रसायन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है।

    ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए भारत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार भी कर रहा है। सरकार भविष्य में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित करने और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर बढ़ता तनाव केवल भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और आम नागरिकों के दैनिक खर्च से भी जुड़ा हुआ है।

  • ईरान अमेरिका तनाव के बीच भारत तैयार कच्चे तेल एलपीजी और गैस का पर्याप्त भंडार संकट से देगा सुरक्षा

    ईरान अमेरिका तनाव के बीच भारत तैयार कच्चे तेल एलपीजी और गैस का पर्याप्त भंडार संकट से देगा सुरक्षा


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में एक बार फिर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव के बीच भारत के लिए राहत की खबर यह है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के मामले में पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में खड़ा है। ईरान और अमेरिका के बीच फिर से बढ़े सैन्य तनाव तथा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने समय रहते आवश्यक तैयारियां कर ली हैं। इसी कारण संभावित आपूर्ति संकट का असर फिलहाल सीमित रहने की उम्मीद है।

    हाल के घटनाक्रम में अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने 11 जुलाई को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट को फिर से बंद करने का ऐलान किया। इसके बाद इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई। यह समुद्री रास्ता दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति का प्रमुख माध्यम है इसलिए इसके प्रभावित होने का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत दिखाई देने लगा।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो सितंबर और अक्टूबर के दौरान कच्चे तेल की आपूर्ति लागत बढ़ सकती है। हालांकि भारत ने पहले से ही अगस्त तक के लिए कच्चे तेल और एलपीजी के आयात की व्यवस्था सुरक्षित कर ली है। यही वजह है कि निकट भविष्य में देश के भीतर ईंधन की उपलब्धता को लेकर किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां जरूर सामने आ सकती हैं लेकिन उन्हें भी प्रभावी तरीके से संभाला जा सकता है।

    मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड करीब पांच प्रतिशत की बढ़त के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी लगभग पांच प्रतिशत बढ़कर 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के बीच पहुंच सकती हैं।

    हालांकि इस बार वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि गैर ओपेक देशों ने अपना उत्पादन पहले ही बढ़ा दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति का दबाव कुछ हद तक कम हुआ है और संभावित कमी की भरपाई करने की क्षमता भी बनी हुई है। यही कारण है कि कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका के बावजूद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति पहले जैसी गंभीर नहीं मानी जा रही।

    भारत सरकार भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर लगातार सतर्क बनी हुई है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि देश के पास लगभग 60 दिनों के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है जबकि एलपीजी का करीब 45 दिनों का स्टॉक सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा वैकल्पिक आयात स्रोतों और रणनीतिक भंडारण की व्यवस्था भी लगातार मजबूत की जा रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति में आम लोगों और उद्योगों पर असर कम से कम पड़े।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर जो काम किया है उसका फायदा अब दिखाई दे रहा है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबा भी खिंचता है तो भारत के पास स्थिति से निपटने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत तैयारी मौजूद है। यही कारण है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद देश की ऊर्जा सुरक्षा फिलहाल सुरक्षित मानी जा रही है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान में बढ़े मतभेद, सैन्य नेतृत्व और सरकार के अलग-अलग रुख से पश्चिम एशिया में तनाव गहराने के संकेत

    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान में बढ़े मतभेद, सैन्य नेतृत्व और सरकार के अलग-अलग रुख से पश्चिम एशिया में तनाव गहराने के संकेत

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान के भीतर नीतिगत मतभेदों की चर्चाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा है। विश्लेषकों का मानना है कि एक ओर ईरान के सैन्य प्रतिष्ठान का रुख अधिक सख्त दिखाई दे रहा है, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक नेतृत्व कूटनीतिक प्रयासों के जरिए तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ने की वकालत कर रहा है। इन अलग-अलग संकेतों के कारण क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। ऐसे में इस जलमार्ग से जुड़ी किसी भी संभावित बाधा का प्रभाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया, यूरोप और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ईरान के भीतर सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना देश की सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं दूसरा पक्ष क्षेत्रीय तनाव को कम करने, संवाद को प्राथमिकता देने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की आवश्यकता पर जोर देता है ताकि व्यापक संघर्ष की आशंका को टाला जा सके।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है तथा समुद्री व्यापार प्रभावित होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आने की संभावना रहती है। इसका असर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था, परिवहन लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है।

    अमेरिका पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है और इसके निर्बाध संचालन को बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अधिकांश देश इस समुद्री मार्ग में किसी प्रकार की बाधा से बचने और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं।

    भारत जैसे देशों के लिए भी यह जलमार्ग विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। पश्चिम एशिया से आने वाला पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल और गैस इसी समुद्री मार्ग से भारत सहित अन्य एशियाई देशों तक पहुंचता है। ऐसे में यदि किसी कारण से आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका असर घरेलू ईंधन कीमतों, उद्योगों और आर्थिक गतिविधियों पर भी देखने को मिल सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में सभी पक्षों के लिए संवाद और कूटनीतिक प्रयास सबसे प्रभावी विकल्प हो सकते हैं। यदि बातचीत के जरिए तनाव कम करने की दिशा में प्रगति होती है तो क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। वहीं किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव या समुद्री मार्ग में व्यवधान वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।

  • होर्मुज संकट की वापसी से वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल, अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत के लिए रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की सलाह

    होर्मुज संकट की वापसी से वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल, अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत के लिए रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की सलाह

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तेज हुए सैन्य संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताओं को बढ़ा दिया है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य पर आवाजाही प्रभावित किए जाने के बाद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक पर संकट गहरा गया है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है और तेल तथा गैस की वैश्विक आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इस स्थिति का असर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों, विशेषकर भारत, पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की कुल समुद्री तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा वहन करता है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है, जिससे पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसी आवश्यक ईंधन वस्तुओं की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

    अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इस स्थिति को भारत के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी बताया है। उनका कहना है कि देश को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का तेजी से विस्तार करना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी वैश्विक आपूर्ति संकट का प्रभाव सीमित किया जा सके। उनके अनुसार सीमित आपूर्ति मार्गों और कम आपातकालीन भंडार पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करती है।

    उन्होंने कहा कि पिछले होर्मुज संकट ने यह स्पष्ट कर दिया था कि केवल एक या दो आपूर्ति मार्गों पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। भारत को विभिन्न देशों से ऊर्जा आयात बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू भंडारण क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि करनी होगी। वर्तमान में देश के रणनीतिक कच्चे तेल भंडार की क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जिसे विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर स्थित भंडारण केंद्रों में सुरक्षित रखा जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछली बार उत्पन्न संकट के दौरान भारत ने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और सरकार द्वारा अपनाई गई रणनीतियों के कारण स्थिति को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से संभाला था। ऊर्जा आयात के विविधीकरण, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और आपूर्ति श्रृंखला को लचीला बनाने जैसे कदमों ने संभावित संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया। यही अनुभव भविष्य की रणनीति तैयार करने में भी उपयोगी माना जा रहा है।

    ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार केवल तेल ही नहीं, बल्कि हर महत्वपूर्ण संसाधन के लिए आपूर्ति के अनेक स्रोत विकसित करना समय की आवश्यकता है। किसी एक क्षेत्र या मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता भू-राजनीतिक तनाव के समय आर्थिक जोखिम को बढ़ा सकती है। इसलिए भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का सबसे प्रभावी रास्ता रणनीतिक भंडार का विस्तार और आयात स्रोतों का व्यापक विविधीकरण माना जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए समय रहते ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े दीर्घकालिक निवेश और रणनीतिक तैयारी को प्राथमिकता देना आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • वैश्विक तेल बाजार में मांग सुधार के संकेत, आईईए ने कहा- खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति से ही लौटेगी कच्चे तेल बाजार की स्थिरता

    वैश्विक तेल बाजार में मांग सुधार के संकेत, आईईए ने कहा- खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति से ही लौटेगी कच्चे तेल बाजार की स्थिरता

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने अपनी ताजा ऑयल मार्केट रिपोर्ट में वैश्विक कच्चे तेल की मांग में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिए हैं। एजेंसी का कहना है कि गर्मियों के दौरान यात्रा गतिविधियों में वृद्धि और पहले से दबे उपभोक्ता मांग के बाजार में लौटने से आने वाले महीनों में तेल की खपत बढ़ने की संभावना है। हालांकि एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया है कि कच्चे तेल के वैश्विक बाजार को पूरी तरह सामान्य स्थिति में लाने के लिए खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति और समुद्री आपूर्ति मार्गों का निर्बाध संचालन अत्यंत आवश्यक होगा।

    रिपोर्ट के अनुसार मई में वैश्विक तेल मांग घटकर लगभग 9.79 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गई थी, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में काफी कम थी। इसके बावजूद आईईए का अनुमान है कि अक्टूबर तक मांग में उल्लेखनीय सुधार होगा और यह फरवरी के बाद पहली बार पिछले वर्ष के स्तर से ऊपर पहुंच सकती है। एजेंसी का मानना है कि पर्यटन गतिविधियों और परिवहन क्षेत्र में बढ़ती ईंधन खपत इस सुधार की प्रमुख वजह बनेगी।

    आईईए ने वर्ष 2026 और 2027 के लिए भी तेल मांग का आकलन प्रस्तुत किया है। एजेंसी के अनुसार 2026 में वैश्विक तेल मांग में कुछ कमी देखने को मिल सकती है, जबकि उसके बाद 2027 में मांग दोबारा मजबूत वृद्धि दर्ज कर सकती है। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार मध्यम अवधि में फिर से संतुलन की ओर बढ़ सकता है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष के अंत तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति मांग से अधिक हो सकती है। हालांकि यह स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले प्रमुख समुद्री मार्गों, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल टैंकरों की आवाजाही कितनी तेजी से सामान्य होती है। यदि परिवहन पूरी तरह बहाल होता है तो तेल उत्पादक देश उत्पादन बढ़ाने के साथ वैश्विक बाजार में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित कर सकेंगे।

    आईईए ने हाल के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि खाड़ी क्षेत्र में फिर से बढ़ा तनाव यह दर्शाता है कि स्थायी शांति के बिना ऊर्जा बाजार में दीर्घकालिक स्थिरता संभव नहीं होगी। एजेंसी के अनुसार किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या आपूर्ति मार्गों में व्यवधान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और आपूर्ति दोनों को प्रभावित कर सकता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक जून के दौरान वैश्विक तेल भंडार में चार महीने बाद पहली बार वृद्धि दर्ज की गई। समुद्र में मौजूद भंडार बढ़ने से कुल स्टॉक में इजाफा हुआ, हालांकि कई देशों में भूमि आधारित भंडार में गिरावट भी देखने को मिली। विशेष रूप से कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सरकारी और वाणिज्यिक भंडार दोनों में कमी दर्ज की गई, जिससे बाजार की स्थिति मिश्रित बनी रही।

    आईईए ने यह भी बताया कि जून में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन हाल के तनावपूर्ण घटनाक्रमों के बाद कीमतों में फिर तेजी देखी गई। एजेंसी का मानना है कि भले ही कच्चे तेल की उपलब्धता बढ़ रही हो, लेकिन रिफाइनरियों का संचालन और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है। ऐसे में आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार की दिशा काफी हद तक भू-राजनीतिक परिस्थितियों, समुद्री आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा और प्रमुख उत्पादक देशों की उत्पादन रणनीति पर निर्भर करेगी।

  • शुद्ध पेट्रोल से सस्ता क्यों नहीं है E20 ईंधन? केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने भ्रांतियों को दूर कर तार्किक और आर्थिक कारणों से उठाया पर्दा

    शुद्ध पेट्रोल से सस्ता क्यों नहीं है E20 ईंधन? केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने भ्रांतियों को दूर कर तार्किक और आर्थिक कारणों से उठाया पर्दा

    नई दिल्ली । देश के ईंधन बाजार में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) की अनिवार्य उपलब्धता और इससे जुड़े उपभोक्ताओं के विभिन्न सवालों पर केंद्र सरकार ने अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने आम जनता और वाहन मालिकों के बीच व्याप्त चिंताओं तथा भ्रामक सूचनाओं का खंडन करते हुए तथ्यों पर आधारित विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है। सरकार ने तार्किक, आर्थिक और परिचालन संबंधी कारणों का हवाला देते हुए बताया है कि क्यों पेट्रोल पंपों पर उपभोक्ताओं को E10 या शुद्ध पेट्रोल चुनने का अलग से विकल्प नहीं दिया जा सकता है।

    मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, देश भर के फ्यूल स्टेशनों पर पेट्रोल के कई अलग-अलग ग्रेड्स को एक साथ बनाए रखना तार्किक और परिचालन के दृष्टिकोण से एक बेहद जटिल और बड़ी चुनौती होगी। भारत का E20 ईंधन की ओर बढ़ना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि यह वाहन निर्माताओं, ऑटोमोबाइल क्षेत्र की विभिन्न परीक्षण एजेंसियों और तेल विपणन कंपनियों के साथ लंबे समय तक किए गए व्यापक विचार-विमर्श का परिणाम है। इस सुनियोजित रणनीति के तहत ही बुनियादी ढांचे को अपग्रेड किया गया है।

    सरकार ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें यह कहा जा रहा था कि भारत ने इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को लागू करने में जल्दबाजी दिखाई है। मंत्रालय ने याद दिलाया कि देश में इथेनॉल मिश्रण की शुरुआत वर्ष 2001 में ही हो चुकी थी और यह कार्यक्रम पिछले दो दशकों से निरंतर विकास के दौर से गुजर रहा है। ब्राजील और अमेरिका जैसे वैश्विक उदाहरणों का अध्ययन करने के बाद ही भारतीय उद्योगों को इस परिवर्तन के हर चरण में शामिल किया गया। ऐसे में इतनी बड़ी क्षमता के निर्माण के बाद दोबारा E10 पर वापस लौटने से भारी-भरकम औद्योगिक निवेश को नुकसान पहुंचेगा।

    उपभोक्ताओं के मन में यह सवाल भी प्रमुखता से उठ रहा था कि जब E20 में बीस फीसदी इथेनॉल मिलाया जाता है, तो यह शुद्ध पेट्रोल की तुलना में सस्ता क्यों नहीं बिक रहा है। इसके आर्थिक पहलू को स्पष्ट करते हुए मंत्रालय ने बताया कि सरकार किसानों को उचित मुआवजा देने के लिए लाभकारी कीमतों पर इथेनॉल की खरीद करती है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय बाजार परिदृश्य में जब कच्चा तेल लगभग 70 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, तब E20 का उत्पादन शुद्ध पेट्रोल से अधिक महंगा पड़ता है। यदि कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें 120 से 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तब इथेनॉल का मिश्रण आर्थिक रूप से अधिक सस्ता साबित होता है।

    मंत्रालय ने साफ किया कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य किसी विशेष दिन ईंधन की कीमतों को कम करना नहीं है, बल्कि भारत की विदेशी तेल आयात पर निर्भरता को कम करना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाना है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस दूरदर्शी नीति के चलते अब तक देश की 1.97 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हो चुकी है। इसके अलावा, पर्यावरण के मोर्चे पर 952 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई है, जबकि देश के किसानों के बैंक खातों में 1.66 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे स्थानांतरित की गई है।

    पुराने वाहनों के इंजनों पर E20 पेट्रोल के पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही भ्रामक सूचनाओं पर भी सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। मंत्रालय ने उपभोक्ताओं को आश्वस्त करते हुए कहा है कि भारत की इथेनॉल आपूर्ति श्रृंखला देश की सबसे कड़ाई से विनियमित और वैज्ञानिक रूप से परीक्षित ईंधन प्रणालियों में से एक है। वाहनों को नुकसान पहुंचने के दावे किसी भी वैज्ञानिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं, इसलिए नागरिकों को बिना किसी प्रामाणिक आधार के फैलाए जा रहे अनावश्यक भय और अफवाहों से गुमराह नहीं होना चाहिए। E20 ईंधन न केवल स्वच्छ है बल्कि यह इंजन के दहन को बेहतर कर कार्बन फुटप्रिंट को 40 प्रतिशत तक कम करता है।

  • रणनीतिक तैयारी और लगातार राजनयिक प्रयासों से खाड़ी संकट का असर रहा सीमित, पूर्व पेट्रोलियम सचिव ने भारत की ऊर्जा नीति को सराहा

    रणनीतिक तैयारी और लगातार राजनयिक प्रयासों से खाड़ी संकट का असर रहा सीमित, पूर्व पेट्रोलियम सचिव ने भारत की ऊर्जा नीति को सराहा

    नई दिल्ली । खाड़ी क्षेत्र में उत्पन्न संकट के दौरान भारत ने समय पर लिए गए नीतिगत निर्णयों, मजबूत ऊर्जा अवसंरचना और निरंतर कूटनीतिक प्रयासों के बल पर देश में ईंधन आपूर्ति को प्रभावित नहीं होने दिया। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पूर्व सचिव विवेक कुमार ने कहा कि सरकार की सक्रिय रणनीति के कारण आम उपभोक्ताओं पर संकट का व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा और ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पूरे समय स्थिर बनी रही।

    उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार अत्यंत जटिल और परस्पर जुड़ा हुआ है, जहां किसी भी क्षेत्र में उत्पन्न तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। इसके बावजूद भारत ने अपनी पूर्व तैयारी, नीति-निर्माण और रणनीतिक समन्वय के जरिए स्थिति को प्रभावी ढंग से संभाला। उनके अनुसार सरकार ने ऐसे कदम उठाए जिनसे ईंधन की उपलब्धता बनी रही और खुदरा स्तर पर आपूर्ति में किसी बड़े व्यवधान की स्थिति नहीं बनने दी गई।

    विवेक कुमार ने कहा कि संकट के शुरुआती चरण में ही सरकार ने परिस्थितियों का आकलन करते हुए आवश्यक प्रशासनिक और परिचालन संबंधी कदम उठाने शुरू कर दिए थे। उनका कहना था कि समय रहते किए गए हस्तक्षेपों ने संभावित आपूर्ति संकट को सीमित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके परिणामस्वरूप पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता सामान्य बनी रही तथा उपभोक्ताओं को व्यापक असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा।

    उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा को किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में कोई भी राष्ट्र पूरी तरह ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। वैश्विक तेल और गैस व्यापार आयातकों तथा निर्यातकों के व्यापक नेटवर्क पर आधारित है, इसलिए किसी भी देश की सफलता उसकी रणनीतिक तैयारी, भंडारण क्षमता और परिवहन अवसंरचना पर निर्भर करती है।

    पूर्व सचिव के अनुसार पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए व्यापक निवेश किया है। सरकार के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। तेल भंडारण क्षमता, परिवहन नेटवर्क, रिफाइनिंग सुविधाओं और आपूर्ति तंत्र में हुए विस्तार ने संकट के समय देश की ऊर्जा व्यवस्था को मजबूती प्रदान की। उनका कहना था कि इसी दीर्घकालिक निवेश का लाभ खाड़ी संकट के दौरान देखने को मिला।

    उन्होंने यह भी बताया कि ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने में कूटनीतिक प्रयासों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। भारत ने संबंधित देशों और विभिन्न पक्षों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा ताकि समुद्री मार्गों के माध्यम से तेल की आपूर्ति निर्बाध बनी रहे। अधिकारियों ने लगातार समन्वय स्थापित करते हुए यह सुनिश्चित किया कि भारतीय तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित न हो और आवश्यक ऊर्जा संसाधन समय पर देश तक पहुंचते रहें।

    विवेक कुमार ने कहा कि वैश्विक संकटों के समय केवल आर्थिक संसाधन पर्याप्त नहीं होते, बल्कि प्रभावी कूटनीति, त्वरित निर्णय क्षमता और मजबूत प्रशासनिक समन्वय भी उतना ही आवश्यक होता है। उनके अनुसार भारत ने इन सभी क्षेत्रों में संतुलित रणनीति अपनाई, जिससे ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था सुरक्षित रही और बाजार में अनिश्चितता का असर सीमित रखा जा सका।

    उन्होंने विश्वास जताया कि ऊर्जा क्षेत्र में निरंतर निवेश, आधुनिक अवसंरचना का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नीति भविष्य में भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उनका कहना था कि बदलते वैश्विक हालात के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक योजना ही देश को संभावित ऊर्जा संकटों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम बनाएगी।

  • हॉर्मुज संकट के बीच भारत को बड़ी राहत: तीन महीने बाद 62,370 मीट्रिक टन एलएनजी लेकर दहेज पहुंचा टैंकर ‘दिशा’, ऊर्जा आपूर्ति को मिली नई मजबूती

    हॉर्मुज संकट के बीच भारत को बड़ी राहत: तीन महीने बाद 62,370 मीट्रिक टन एलएनजी लेकर दहेज पहुंचा टैंकर ‘दिशा’, ऊर्जा आपूर्ति को मिली नई मजबूती

    नई दिल्ली । मध्य-पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत के लिए एक महत्वपूर्ण राहत भरी खबर सामने आई है। लगभग तीन महीने से अधिक समय तक अनिश्चित परिस्थितियों का सामना करने के बाद एलएनजी टैंकर ‘दिशा’ सफलतापूर्वक हॉर्मुज स्ट्रेट पार करते हुए गुजरात के दहेज एलएनजी टर्मिनल पहुंच गया। यह जहाज 62,370 मीट्रिक टन तरलीकृत प्राकृतिक गैस लेकर भारत लौटा है, जिसे देश की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

    शुक्रवार सुबह दहेज टर्मिनल पर पहुंचे इस टैंकर का आगमन ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार मध्य-पूर्व की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। हॉर्मुज स्ट्रेट को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है और यहां किसी भी प्रकार का तनाव तेल तथा गैस की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति को सीधे प्रभावित कर सकता है। ऐसे में ‘दिशा’ का सुरक्षित रूप से भारत पहुंचना रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, यह एलएनजी कार्गो कतर के रास लाफान टर्मिनल से लोड किया गया था। जहाज को भारत तक पहुंचने में सामान्य समय से कहीं अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी। क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताओं और समुद्री मार्गों पर बढ़ती संवेदनशीलता के कारण इसकी यात्रा लंबे समय तक प्रभावित रही। हालांकि सभी आवश्यक सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन करते हुए जहाज ने अंततः अपनी यात्रा पूरी की और निर्धारित गंतव्य तक पहुंच गया।

    ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सफल आवाजाही भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सकारात्मक संकेत है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में एलएनजी आपूर्ति में किसी भी प्रकार की रुकावट का असर उद्योगों, बिजली उत्पादन और अन्य गैस आधारित गतिविधियों पर पड़ सकता है। ‘दिशा’ का आगमन इस बात का संकेत है कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के प्रयास जारी हैं।

    यह जहाज शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम द्वारा संचालित किया जा रहा है और इसे पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड के लिए चार्टर किया गया है। भारत में एलएनजी आयात और वितरण के क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में इस कार्गो की सुरक्षित डिलीवरी ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हितधारकों के लिए भी राहत की खबर मानी जा रही है।

    दहेज एलएनजी टर्मिनल देश का सबसे बड़ा एलएनजी आयात केंद्र माना जाता है। यहां पहुंचने वाली गैस को विभिन्न राज्यों और औद्योगिक क्षेत्रों तक पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से पहुंचाया जाता है। इसलिए इस टर्मिनल पर आने वाले प्रत्येक बड़े कार्गो का सीधा संबंध देश की गैस उपलब्धता और मांग-आपूर्ति संतुलन से जुड़ा होता है।

    हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले भारतीय एलएनजी जहाजों की गतिविधियों पर हाल के महीनों में विशेष नजर रखी जा रही थी। क्षेत्रीय तनाव के कारण ऊर्जा बाजार में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएं लगातार व्यक्त की जा रही थीं। ऐसे माहौल में ‘दिशा’ का सुरक्षित रूप से भारत पहुंचना न केवल एक सफल समुद्री अभियान माना जा रहा है, बल्कि यह देश की ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली की स्थिरता और लचीलापन भी दर्शाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर ध्यान और बढ़ेगा। फिलहाल ‘दिशा’ का दहेज पहुंचना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, जिसने ऊर्जा क्षेत्र को राहत और भरोसे का संदेश दिया है।

  • होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादलों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने घरेलू ऊर्जा उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने असम और नागालैंड सरकारों के साथ हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल को देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक रणनीतिक प्रयास माना जा रहा है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों, विशेषकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी प्रकार का व्यवधान देश की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर असर डाल सकता है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार घरेलू तेल और गैस उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है। पूर्वोत्तर भारत को इस रणनीति का प्रमुख केंद्र बनाया जा रहा है, जहां प्राकृतिक संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में खोज और उत्पादन गतिविधियों के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि देश के कुल कच्चे तेल भंडार का लगभग 22 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस भंडार का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा अकेले असम में मौजूद है। ऐसे में इस क्षेत्र का विकास भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

    नागालैंड को लेकर भी सरकार काफी आशावादी नजर आ रही है। विशेष रूप से असम-अराकान बेसिन की नागा-शुपेन बेल्ट में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की बड़ी संभावनाएं बताई जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में कई ऐसे भंडार मौजूद हैं जिनका अभी तक पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। नई नीतिगत पहल और निवेश के माध्यम से इन संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है।

    सरकार के अनुसार, नए समझौते से तेल उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। वर्तमान में कुछ क्षेत्रों में प्रतिदिन लगभग 1000 से 1500 बैरल उत्पादन हो रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में कई गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह योजना अपेक्षित परिणाम देती है तो देश के घरेलू उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस समझौते को पूर्वोत्तर के विकास से जोड़ते हुए कहा कि इससे तेल एवं गैस क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल क्षेत्रीय आर्थिक विकास, औद्योगिक गतिविधियों और रोजगार सृजन को नई गति प्रदान करेगी। पूर्वोत्तर राज्यों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से और अधिक मजबूती से जोड़ने में भी यह कदम उपयोगी साबित हो सकता है।

    पेट्रोलियम मंत्रालय का मानना है कि यह समझौता केवल संसाधनों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेशकों के लिए भरोसेमंद माहौल तैयार करने में भी मदद करेगा। स्पष्ट नीतिगत ढांचा, बेहतर समन्वय और नियामकीय सहयोग के कारण निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां दीर्घकालिक निवेश के लिए अधिक उत्साहित हो सकती हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने की योजनाएं सफल रहती हैं तो इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा और देश की आयात निर्भरता कम करने के लक्ष्य को भी बल मिलेगा। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह पहल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।