Tag: Environment

  • ओजोन परत की रिकवरी में आ रही बाधा, फीडस्टॉक रसायनों के रिसाव से सुधार में आ सकती है देरी

    ओजोन परत की रिकवरी में आ रही बाधा, फीडस्टॉक रसायनों के रिसाव से सुधार में आ सकती है देरी

    नई दिल्ली। ओजोन परत की सुधार प्रक्रिया को लेकर अब तक मिल रहे सकारात्मक संकेतों के बीच एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है। Nature Communications में प्रकाशित शोध के अनुसार, औद्योगिक फीडस्टॉक रसायनों का छिपा हुआ रिसाव ओजोन परत की रिकवरी को धीमा कर सकता है। यह रिसाव पहले के अनुमान से कई गुना अधिक पाया गया है, जिससे 1980 के स्तर तक वापसी में अतिरिक्त समय लग सकता है।

    ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक अहम सुरक्षा परत है, जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया था कि अंटार्कटिका के ऊपर यह परत तेजी से पतली हो रही है, जिसे ओजोन छिद्र के रूप में जाना गया। इसका मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसे रसायन थे, जिनका उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और एयरोसोल उत्पादों में होता था।

    इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल लागू किया गया, जिसके तहत 197 देशों ने ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का संकल्प लिया। वैज्ञानिकों के अनुसार इन प्रयासों का असर दिख रहा है और ओजोन परत धीरे-धीरे सुधर रही है। अनुमान है कि यह 2040 से 2060 के बीच 1980 के स्तर के करीब पहुंच सकती है, जिससे त्वचा कैंसर और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों में कमी आने की संभावना है।

    हालांकि, नए अध्ययन में एक अहम खामी सामने आई है। शोधकर्ताओं ने पाया कि फीडस्टॉक रसायन जिनका उपयोग प्लास्टिक, नॉन-स्टिक कोटिंग्स और अन्य उत्पादों के निर्माण में होता है वास्तव में अपेक्षा से अधिक मात्रा में वातावरण में रिस रहे हैं। पहले जहां इनसे लगभग 0.5 प्रतिशत उत्सर्जन का अनुमान था, वहीं अब यह तीन से चार प्रतिशत तक पाया गया है। यह अतिरिक्त रिसाव ओजोन परत के सुधार की गति को प्रभावित कर रहा है।

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो ओजोन परत को 1980 के स्तर तक पहुंचने में करीब सात साल की अतिरिक्त देरी हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि औद्योगिक रसायनों के उपयोग और उनके उत्सर्जन पर सख्त निगरानी जरूरी है। साथ ही, रासायनिक उद्योग के पास मौजूद कम हानिकारक विकल्पों को अपनाकर इस जोखिम को कम किया जा सकता है।

  • सतना में मंदाकिनी नदी पर अवैध उत्खनन जल संसाधन विभाग की आड़ में हो रहा है काले कारोबार

    सतना में मंदाकिनी नदी पर अवैध उत्खनन जल संसाधन विभाग की आड़ में हो रहा है काले कारोबार


    सतना । सतना जिले में मंदाकिनी नदी जो कि धार्मिक सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आस्था की प्रतीक मानी जाती है एक बार फिर अवैध उत्खनन के चलते विवादों में आ गई है। मोहकमगढ़ पुल के नीचे भारी मशीनों से नदी का सीना छलनी किया जा रहा था जो एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। खास बात यह है कि यह उत्खनन जल संसाधन विभाग की परियोजना के नाम पर किया जा रहा था।

    सूत्रों के अनुसार जल संसाधन विभाग द्वारा मंदाकिनी नदी में घाट निर्माण के लिए सीमित खनन की अनुमति ली गई थी। लेकिन पीपीएस कंपनी के ठेकेदार ने इस अनुमति का दुरुपयोग करते हुए नदी किनारे से पत्थर और मुरुम का अवैध उत्खनन शुरू कर दिया। आरोप हैं कि यह सब कार्य जल संसाधन विभाग के एसडीओ पुष्पेंद्र खरे के मौखिक निर्देश पर हो रहा था।

    प्रशासन की कार्रवाई और संदिग्ध पहलू

    स्थानीय लोगों द्वारा सूचना मिलने पर चित्रकूट तहसीलदार मौके पर पहुंचे और खनन में लगे पोकलैंड मशीन को जप्त कर लिया। हालांकि ट्रक मौके से गायब हो गए जिससे यह संदेह पैदा हो गया कि मामले में पहले से सूचना थी और यह पूरी घटना किसी संरक्षण के तहत हो रही थी। सबसे हैरान करने वाली बात तब सामने आई जब प्रशासन के अधिकारियों के मौके पर पहुंचते ही संबंधित जिम्मेदारों के मोबाइल फोन बंद हो गए। यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि क्या यह पूरी प्रक्रिया पूर्व नियोजित और विभागीय मिलीभगत का हिस्सा है?

    इस मामले में प्रशासन की निष्क्रियता और जिम्मेदार अधिकारियों की संलिप्तता के आरोप उभर रहे हैं। यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आस्था और पर्यावरण से जुड़े इस अहम स्थान की अवैध उत्खनन के चलते हानि हो रही है? क्या सरकारी योजनाओं की आड़ में इस तरह के काले कारोबार को बढ़ावा दिया जा रहा है?

  • सिंगरौली में 6 लाख पेड़ काटे जा रहे, कांग्रेस ने अडानी पर आरोप लगाए

    सिंगरौली में 6 लाख पेड़ काटे जा रहे, कांग्रेस ने अडानी पर आरोप लगाए


    सिंगरौली । मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों को लेकर विवाद गहरा गया है। कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि सिंगरौली में करीब 6 लाख पेड़ काटे जा रहे हैं और यह सभी अडानी समूह की कंपनी के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा सरकार ने अडानी को न केवल पूरे जंगल को लूटने की अनुमति दी है बल्कि आदिवासियों की आवाज़ को दबाने के लिए पुलिस बल का भी सहारा लिया जा रहा है।

    यह विवाद अहमदाबाद की एक कंपनी मेसर्स स्ट्राटाटेक मिनरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ा हुआ है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि यह कोल ब्लॉक आवंटन आदिवासी इलाकों में हो रहा है जहां पेड़ों और जमीनों की भारी कटाई की जा रही है। इस पर विरोध करते हुए स्थानीय आदिवासी समुदाय लंबे समय से शांति पूर्वक आंदोलन कर रहे हैं लेकिन सरकार उनकी आवाज़ों को अनदेखा कर रही है।

    कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि बिना किसी वैध अनुमति के और मनमाने तरीके से पेड़ों की कटाई की जा रही है। इसके साथ ही हजारों आदिवासी परिवारों को उनके घरों से बेदखल किया जा रहा है बिना पुनर्वास की कोई व्यवस्था किए। सिंगरौली में आदिवासी परिवारों के खिलाफ पुलिस बल तैनात किया जा रहा है ताकि उनका विरोध कुचला जा सके। कांग्रेस ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया कानून के खिलाफ है और आदिवासी समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन है।

    इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए एमपी कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा। कांग्रेस ने ट्वीट किया प्रधानमंत्री मोदी एक तरफ कहते हैं कि ‘एक पेड़ मां के नाम लगाओ और दूसरी तरफ वही मोदी अडानी को हजारों पेड़ काटने की अनुमति दे रहे हैं। कांग्रेस ने यह भी दावा किया कि सरकार आदिवासियों के खिलाफ दमनात्मक नीतियां अपना रही है जबकि वही लोग अपनी ज़मीन पर काबिज होते हुए भी अन्याय का शिकार हो रहे हैं।

    ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी द्वारा गठित एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने इस मामले की जांच की और पाया कि अडानी के लिए 2672 हेक्टेयर ज़मीन आवंटित की गई है। फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने यह भी कहा कि एक ओर जहां आदिवासी समुदायों को अपनी ज़मीन पर काबिज होने के लिए परेशान किया जाता है वहीं दूसरी ओर बड़े उद्योगपतियों को विशाल भूमि और जंगल की छूट दी जा रही है।

    इस विवाद में एक और गंभीर आरोप यह है कि आदिवासी लोगों को अपने घरों से बेदखल किया जा रहा है जबकि सरकार ने किसी तरह का पुनर्वास या मुआवजा नहीं दिया है। सिंगरौली में स्थानीय लोग लंबे समय से शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन अब प्रशासन ने इन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया है। यह स्थिति और भी तनावपूर्ण हो गई है क्योंकि आदिवासी समुदाय के लोग अपनी ज़मीन और जीवन का अधिकार बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

    इस मामले को लेकर एमपी कांग्रेस ने सरकार से जवाब की मांग की है और यह सुनिश्चित करने की बात की है कि आदिवासी समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन न हो। साथ ही कांग्रेस ने यह भी कहा कि जब तक पेड़ों की कटाई और आदिवासियों का शोषण बंद नहीं होता उनका विरोध जारी रहेगा।

  • जयपुर के खेतों में फैक्ट्री का जहर, मिट्टी हो रही काली, सब्जियां बन गईं 'स्लो पॉइजन'

    जयपुर के खेतों में फैक्ट्री का जहर, मिट्टी हो रही काली, सब्जियां बन गईं 'स्लो पॉइजन'


    जयपुर । जयपुर(Jaipur) में फैक्ट्रियों से निकल रहा केमिकल (Chemical)और ब्लीच मिला पानी लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है. सवाल यह है कि जो हरी सब्जियां(green vegetables) और फल लोग सेहत के लिए खाते हैं, क्या वे सच में उन्हें स्वस्थ बना रहे हैं या धीरे-धीरे बीमार कर रहे हैं.

    अगर इन सब्जियों और फलों की खेती ऐसे पानी से हो रही हो, जिसमें फैक्ट्रियों का जहरीला कचरा और रसायन मिले हों, तो इसका सीधा असर आम लोगों की सेहत पर पड़ता है. ऐसा पानी किडनी फेल होने, दिल की बीमारियों और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है.

    स्लो पॉइजन का काम कर रही सब्जियां
    जयपुर के सांगानेर इलाके में सांगानेर से चांदलई तक करीब 20 किलोमीटर के दायरे में दो दर्जन से ज्यादा गांव आते हैं. यहां कपड़ों की रंगाई, छपाई और ब्लीच का काम करने वाली फैक्ट्रियां आसपास के जल स्रोतों में केमिकल और ब्लीच वाला पानी छोड़ रही हैं. इससे पूरे इलाके में भारी प्रदूषण फैल गया है. जानकारी के मुताबिक, इस दूषित पानी से उगाई गई फसलें धीमे जहर की तरह काम कर रही हैं, जो समय के साथ गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती हैं.

    काली हो चुकी है खेतों की मिट्टी
    मीडिया की टीम जब जयपुर की सांगानेर तहसील के शिकारपुरा और मुहाना समेत कई इलाकों में पहुंची, तो वहां काले रंग का पानी खेतों में पंप किया जा रहा था. इन खेतों में पत्तागोभी, बैंगन, पालक और लगभग हर तरह की मौसमी सब्जियों की खेती हो रही थी. कई जगहों पर इस गंदे पानी की वजह से मिट्टी का रंग भी ग्रे और काला हो चुका है. किसान सीताराम का कहना है कि इससे खाने वाली सभी फसलों को नुकसान हो रहा है, लेकिन जांच के लिए अब तक कोई अधिकारी नहीं आया है.

    ‘कई साल से छोड़ा जा रहा पानी, कोई कार्रवाई नहीं’
    जानकारी यह भी है कि कुछ फैक्ट्रियों में गंदे पानी को साफ करने की व्यवस्था जरूर है, लेकिन ज्यादातर फैक्ट्रियां बिना किसी सफाई के केमिकल और रंग मिला पानी सीधे नालों और जल स्रोतों में छोड़ रही हैं. इसका असर सीधे खेतों और फसलों पर पड़ रहा है.

    स्थानीय लोगों का कहना है कि सालों से फैक्ट्रियों का जहरीला पानी इन खेतों में छोड़ा जा रहा है, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. एक फैक्ट्री कर्मचारी सिकंदर का दावा है कि उनके यहां गंदे पानी को साफ करने की व्यवस्था है और फिल्टर के बाद ही पानी बाहर छोड़ा जाता है. हालांकि, जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं.