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  • अम्मा के बाद बिखरती AIADMK! क्या 2026 में खत्म हो जाएगी MGR-जयललिता की राजनीतिक विरासत?

    अम्मा के बाद बिखरती AIADMK! क्या 2026 में खत्म हो जाएगी MGR-जयललिता की राजनीतिक विरासत?

    नई दिल्ली ।तमिलनाडु की राजनीति में कभी बेहद मजबूत मानी जाने वाली All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। 2026 विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर लंबे समय से दबा असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि पार्टी एक और बड़े विभाजन की कगार पर खड़ी नजर आ रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या एमजीआर और J. Jayalalithaa द्वारा खड़ी की गई यह राजनीतिक विरासत अब बिखरने की ओर बढ़ रही है।

    चुनावी हार के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने मौजूदा नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। पार्टी के भीतर एक बड़ा गुट खुलकर नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि मौजूदा रणनीति और फैसलों ने पार्टी को कमजोर कर दिया है, जिसका सीधा असर चुनावी परिणामों में दिखाई दिया। यही कारण है कि अब संगठन के भीतर दो अलग-अलग धड़े स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं।

    तमिलनाडु विधानसभा के हालिया सत्र के दौरान भी पार्टी के भीतर का मतभेद खुलकर सामने आ गया। विधायकों के अलग-अलग समूहों में दिखाई देने से यह साफ संकेत मिला कि अंदरूनी एकजुटता लगभग खत्म होती जा रही है। कुछ नेताओं ने खुले तौर पर मौजूदा नेतृत्व को अस्वीकार करते हुए नए चेहरे को आगे लाने की मांग की। इस घटनाक्रम ने पार्टी समर्थकों के बीच भी चिंता बढ़ा दी है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam पहले भी कई बार आंतरिक संघर्षों का सामना कर चुकी है, लेकिन इस बार स्थिति पहले से कहीं ज्यादा गंभीर मानी जा रही है। पार्टी के संस्थापक M. G. Ramachandran और बाद में J. Jayalalithaa के नेतृत्व में संगठन ने तमिलनाडु की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाई थी, लेकिन अब करिश्माई नेतृत्व की कमी साफ महसूस की जा रही है।

    विवाद की एक बड़ी वजह भविष्य की राजनीतिक रणनीति को लेकर भी बताई जा रही है। पार्टी के भीतर कुछ नेता बदलते राजनीतिक समीकरणों के अनुसार नई साझेदारी और गठबंधन की वकालत कर रहे हैं, जबकि दूसरा पक्ष पुराने ढर्रे पर आगे बढ़ना चाहता है। इसी टकराव ने संगठन के भीतर दूरी और बढ़ा दी है।

    चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के कई नेता खुलकर यह कह रहे हैं कि अगर समय रहते संगठन में बड़े बदलाव नहीं किए गए, तो पार्टी का जनाधार और कमजोर हो सकता है। समर्थकों के बीच भी निराशा का माहौल है क्योंकि वे लगातार पार्टी के भीतर बढ़ती खींचतान को देख रहे हैं।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में यदि यह विवाद और गहराया, तो पार्टी के सामने पहचान और चुनाव चिन्ह तक का संकट खड़ा हो सकता है। फिलहाल पूरा तमिलनाडु इस राजनीतिक संघर्ष पर नजर बनाए हुए है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई नया नेतृत्व इस बिखरते संगठन को संभाल पाएगा या फिर यह संघर्ष पार्टी के इतिहास का सबसे बड़ा संकट साबित होगा।

  • EPF और EPS में क्या है अंतर? रिटायरमेंट से पहले समझ लें पूरा गणित

    EPF और EPS में क्या है अंतर? रिटायरमेंट से पहले समझ लें पूरा गणित


    नई दिल्ली। नौकरीपेशा लोगों की सैलरी स्लिप में हर महीने PF यानी प्रोविडेंट फंड की कटौती जरूर दिखाई देती है, लेकिन ज्यादातर कर्मचारियों को यह नहीं पता होता कि यह पैसा आखिर कहां जमा होता है और रिटायरमेंट के समय इससे कितना फायदा मिलता है। दरअसल, PF केवल एक सेविंग स्कीम नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा और पेंशन का मजबूत आधार है। यही वजह है कि लंबे समय तक नौकरी करने वालों के लिए EPF और EPS दोनों बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और डीए का 12 प्रतिशत हिस्सा हर महीने PF के रूप में काटा जाता है। इतनी ही राशि कंपनी की ओर से भी जमा की जाती है। हालांकि, कंपनी का पूरा 12 प्रतिशत सीधे EPF खाते में नहीं जाता। यही वह हिस्सा है जिसे लेकर अधिकांश कर्मचारियों के मन में भ्रम रहता है।

    कर्मचारी के योगदान का पूरा 12 प्रतिशत Employees’ Provident Fund यानी EPF खाते में जमा होता है। वहीं कंपनी के 12 प्रतिशत योगदान में से केवल 3.67 प्रतिशत EPF में जाता है, जबकि 8.33 प्रतिशत हिस्सा Employees’ Pension Scheme यानी EPS में ट्रांसफर कर दिया जाता है। EPS का मकसद कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद हर महीने पेंशन उपलब्ध कराना होता है।

    अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 25 हजार रुपये है, तो कर्मचारी की ओर से हर महीने 3 हजार रुपये EPF में जमा होंगे। कंपनी भी 3 हजार रुपये देगी, लेकिन इसमें से करीब 1,250 रुपये EPS में चले जाएंगे और बाकी राशि EPF खाते में जुड़ जाएगी। यानी कर्मचारी के EPF अकाउंट में हर महीने कर्मचारी और कंपनी दोनों के हिस्से मिलाकर रकम जमा होती रहती है, जिस पर सालाना ब्याज भी मिलता है।

    फिलहाल EPFO कर्मचारियों के EPF बैलेंस पर करीब 8.25 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दे रहा है। यही वजह है कि लंबे समय तक लगातार नौकरी करने पर PF का फंड लाखों से बढ़कर करोड़ों तक पहुंच सकता है। कंपाउंडिंग का फायदा इसमें सबसे बड़ा रोल निभाता है।

    वहीं EPS में जमा राशि पर ब्याज नहीं मिलता, क्योंकि यह पेंशन स्कीम के तहत संचालित होती है। हालांकि, 10 साल या उससे अधिक नौकरी करने वाले कर्मचारियों को 58 साल की उम्र के बाद मासिक पेंशन का लाभ मिलता है। पेंशन की राशि नौकरी की अवधि और सैलरी के आधार पर तय की जाती है।

    आजकल सोशल मीडिया और Reddit जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी लोग EPS को लेकर सवाल पूछते नजर आते हैं। कई कर्मचारियों को लगता है कि उनका EPS बैलेंस दिखाई क्यों नहीं देता। विशेषज्ञों के मुताबिक EPS राशि सीधे पेंशन फंड में मैनेज होती है, इसलिए यह सामान्य EPF बैलेंस की तरह अलग से नहीं दिखती।

    कुल मिलाकर, PF केवल सैलरी से होने वाली कटौती नहीं, बल्कि रिटायरमेंट के बाद आर्थिक मजबूती का बड़ा सहारा है। सही जानकारी और लंबी अवधि तक नियमित निवेश से यही छोटी कटौती भविष्य में बड़ी वित्तीय सुरक्षा में बदल सकती है।