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  • एलआरएस के तहत विदेशी शेयर-बॉन्ड में भारतीयों का निवेश 111% बढ़ा, अगस्त में 321.53 मिलियन डॉलर पहुंचा

    एलआरएस के तहत विदेशी शेयर-बॉन्ड में भारतीयों का निवेश 111% बढ़ा, अगस्त में 321.53 मिलियन डॉलर पहुंचा


    नई दिल्ली । विदेशी शेयर और बॉन्ड बाजारों में भारतीयों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के अक्टूबर 2026 बुलेटिन के अनुसार, उदारीकृत प्रेषण योजना (एलआरएस) के तहत अगस्त 2026 में विदेशी इक्विटी और डेट बाजारों में भारतीयों का निवेश सालाना आधार पर 111 प्रतिशत बढ़कर 321.53 मिलियन डॉलर पहुंच गया। अगस्त 2025 में यह आंकड़ा 152.18 मिलियन डॉलर था। एक साल के भीतर निवेश में दोगुने से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारतीय निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी को दर्शाती है।

    हालांकि, मासिक आधार पर विदेशी इक्विटी और डेट में निवेश में लगभग सात प्रतिशत की गिरावट आई। इससे पहले जून 2026 में इस श्रेणी में निवेश 460 मिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। इस लिहाज से अगस्त में दर्ज आंकड़ा जून के उच्चतम स्तर से कम रहा, लेकिन पिछले वर्ष के मुकाबले इसमें उल्लेखनीय वृद्धि बनी रही।

    आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान उदारीकृत प्रेषण योजना के तहत कुल बाहरी प्रेषण 28.98 अरब डॉलर रहा। अगस्त 2026 में विदेशी इक्विटी और डेट बाजारों में निवेश का हिस्सा कुल एलआरएस प्रेषण का लगभग 11.7 प्रतिशत था। अगस्त 2025 में यह अनुपात केवल 5.8 प्रतिशत रहा था। यानी कुल प्रेषण में विदेशी वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश की हिस्सेदारी एक साल में दोगुने से अधिक हो गई।

    एलआरएस के तहत सभी श्रेणियों में किए गए कुल बाहरी प्रेषण में भी वृद्धि दर्ज की गई। अगस्त 2026 में यह राशि बढ़कर 2.74 अरब डॉलर हो गई, जबकि अगस्त 2025 में 2.64 अरब डॉलर थी। इस तरह सालाना आधार पर कुल प्रेषण में 3.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जुलाई 2026 के 2.58 अरब डॉलर के मुकाबले अगस्त में यह लगभग छह प्रतिशत अधिक रहा।

    विदेश यात्रा एलआरएस के तहत खर्च की सबसे बड़ी श्रेणी बनी हुई है। अगस्त 2026 में भारतीयों ने विदेश यात्रा पर 1.63 अरब डॉलर खर्च किए, जो कुल बाहरी प्रेषण का करीब 59 प्रतिशत था। यह खर्च पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक प्रतिशत और जुलाई 2026 के मुकाबले 11.4 प्रतिशत अधिक रहा। आंकड़े बताते हैं कि विदेश यात्रा से जुड़े भुगतान कुल प्रेषण में सबसे बड़ा हिस्सा बनाए हुए हैं।

    कारोबारी यात्रा पर खर्च में सबसे तेज मासिक बढ़ोतरी देखने को मिली। जुलाई 2026 में इस मद में 10.9 मिलियन डॉलर भेजे गए थे, जबकि अगस्त में यह राशि बढ़कर 51 मिलियन डॉलर हो गई। इस प्रकार एक महीने के भीतर कारोबारी यात्रा से संबंधित प्रेषण लगभग पांच गुना बढ़ गया।

    अन्य श्रेणियों में उपहार के रूप में विदेश भेजी गई राशि अगस्त में 215.72 मिलियन डॉलर रही। निकट संबंधियों के भरण-पोषण के लिए 275.43 मिलियन डॉलर भेजे गए। वहीं, विदेश में अचल संपत्ति खरीदने के लिए 39.59 मिलियन डॉलर और विदेशी बैंकों में जमा करने के लिए 50.78 मिलियन डॉलर का प्रेषण दर्ज किया गया।

    विदेश में चिकित्सा उपचार के लिए भेजी गई राशि में भी वृद्धि हुई। अगस्त 2026 में इस उद्देश्य से किया गया प्रेषण सालाना आधार पर 21.3 प्रतिशत बढ़कर 4.84 मिलियन डॉलर पहुंच गया। कुल आंकड़ों से स्पष्ट है कि एलआरएस के तहत भारतीयों का पैसा विदेश यात्रा, परिवार के भरण-पोषण, संपत्ति खरीद और विदेशी वित्तीय बाजारों में निवेश जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए भेजा जा रहा है। इनमें विदेशी इक्विटी और डेट में निवेश की बढ़ती हिस्सेदारी अगस्त के आंकड़ों का एक प्रमुख पहलू रही।

  • गोल्ड ईटीएफ में सितंबर के दौरान निवेश 71.4 प्रतिशत बढ़कर 4,451 करोड़ रुपये पहुंचा, इक्विटी फंड और एसआईपी में भी निवेशकों की मजबूत भागीदारी

    गोल्ड ईटीएफ में सितंबर के दौरान निवेश 71.4 प्रतिशत बढ़कर 4,451 करोड़ रुपये पहुंचा, इक्विटी फंड और एसआईपी में भी निवेशकों की मजबूत भागीदारी

    नई दिल्ली ।सितंबर 2026 में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है। इस दौरान गोल्ड ईटीएफ में शुद्ध निवेश अगस्त के 2,597 करोड़ रुपये से बढ़कर 4,451 करोड़ रुपये हो गया। महीने-दर-महीने आधार पर इसमें 71.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि निवेशकों का रुझान सोने से जुड़े निवेश विकल्पों की ओर बढ़ा है। हालांकि, सोने में निवेश बढ़ने के बावजूद व्यापक म्यूचुअल फंड उद्योग को सितंबर में शुद्ध निकासी का सामना करना पड़ा।

    सितंबर के दौरान पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग से कुल 1.33 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी दर्ज की गई। इसके विपरीत, अगस्त में उद्योग में 41,353 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया था। इस बड़े बदलाव की प्रमुख वजह फिक्स्ड इनकम से जुड़ी म्यूचुअल फंड योजनाओं से भारी निकासी रही। खासतौर पर डेट म्यूचुअल फंड से निवेशकों ने बड़ी रकम निकाली, जिससे उद्योग के कुल निवेश प्रवाह पर दबाव पड़ा।

    सितंबर में डेट म्यूचुअल फंड योजनाओं से शुद्ध निकासी बढ़कर 1.83 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा 8,127 करोड़ रुपये था। डेट फंड से इतनी बड़ी निकासी का असर म्यूचुअल फंड उद्योग की कुल प्रबंधन अधीन परिसंपत्तियों यानी एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) पर भी दिखाई दिया। अगस्त में उद्योग का कुल एयूएम 87.08 लाख करोड़ रुपये था, जो सितंबर में घटकर 82.64 लाख करोड़ रुपये रह गया। इस तरह एक महीने में कुल एयूएम में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।

    दूसरी ओर, इक्विटी म्यूचुअल फंड योजनाओं में निवेशकों की भागीदारी मजबूत बनी रही। सितंबर में इक्विटी फंड में शुद्ध निवेश 30.6 प्रतिशत बढ़कर 38,307 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि अगस्त में यह 29,328 करोड़ रुपये था। इक्विटी श्रेणी में स्मॉल-कैप फंड निवेशकों की पसंद बने रहे। इन योजनाओं में सितंबर के दौरान 9,039 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया, जो अगस्त के 7,973 करोड़ रुपये से अधिक था।

    मिड-कैप फंड में भी निवेश बढ़ा। सितंबर में इन योजनाओं में 7,835 करोड़ रुपये का निवेश दर्ज किया गया, जबकि अगस्त में यह 6,989 करोड़ रुपये था। इसी तरह फ्लेक्सी-कैप फंड में शुद्ध निवेश अगस्त के 5,059 करोड़ रुपये से बढ़कर सितंबर में 6,702 करोड़ रुपये हो गया। सेक्टोरल और थीमैटिक फंड में भी निवेशकों की भागीदारी बढ़ी। इन योजनाओं में सितंबर में 3,640 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया, जबकि पिछले महीने यह 1,713 करोड़ रुपये था।

    लार्ज-कैप फंड भी सितंबर में सकारात्मक स्थिति में लौट आए। अगस्त में इन योजनाओं से 1,147 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी हुई थी, लेकिन सितंबर में इनमें 859 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया। वहीं, मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड में निवेश लगभग स्थिर रहा। सितंबर में इन योजनाओं को 3,667 करोड़ रुपये मिले, जबकि अगस्त में यह राशि 3,671 करोड़ रुपये थी।

    नियमित निवेश के मामले में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए योगदान मजबूत बना रहा। सितंबर में मासिक एसआईपी निवेश बढ़कर रिकॉर्ड 32,490 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि अगस्त में यह 32,297 करोड़ रुपये था। इस तरह गोल्ड ईटीएफ और इक्विटी फंड में बढ़ते निवेश के साथ एसआईपी योगदान ने भी निवेशकों की निरंतर भागीदारी को दर्शाया। वहीं, डेट फंड से भारी निकासी सितंबर के दौरान म्यूचुअल फंड उद्योग की सबसे प्रमुख वित्तीय गतिविधियों में शामिल रही।

  • सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश 30.61 प्रतिशत बढ़कर 38,306 करोड़ रुपये पहुंचा, उद्योग का कुल एयूएम 82.64 लाख करोड़ रुपये हुआ

    सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश 30.61 प्रतिशत बढ़कर 38,306 करोड़ रुपये पहुंचा, उद्योग का कुल एयूएम 82.64 लाख करोड़ रुपये हुआ

    नई दिल्ली ।भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग में सितंबर 2026 के दौरान इक्विटी योजनाओं में निवेश में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड में 38,306.55 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया, जो अगस्त में दर्ज 29,328.62 करोड़ रुपये के मुकाबले 30.61 प्रतिशत अधिक है। इस दौरान पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग की कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) 82.64 लाख करोड़ रुपये रही। हालांकि, इक्विटी योजनाओं में निवेश बढ़ने के बावजूद डेट फंड से भारी निकासी के कारण उद्योग का कुल शुद्ध निवेश नकारात्मक रहा।

    सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, ओपन-एंडेड इक्विटी योजनाओं में कुल 74,831.96 करोड़ रुपये का निवेश हुआ, जबकि 36,525.41 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई। निवेश और निकासी के अंतर के आधार पर इन योजनाओं में शुद्ध निवेश 38,306.55 करोड़ रुपये रहा। इक्विटी योजनाओं का कुल शुद्ध एसेट्स अंडर मैनेजमेंट 37.54 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया। वहीं, सितंबर के दौरान इन योजनाओं का औसत एयूएम 38,50,660.61 करोड़ रुपये रहा।

    इक्विटी फंड की अलग-अलग श्रेणियों में स्मॉल कैप फंड निवेश के मामले में सबसे आगे रहे। इस श्रेणी में सितंबर के दौरान 9,038.57 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। स्मॉल कैप योजनाओं में कुल 13,025.13 करोड़ रुपये का निवेश हुआ, जबकि 3,986.56 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई। इस श्रेणी में निवेशकों के कुल 3.03 करोड़ फोलियो दर्ज किए गए। फोलियो से आशय निवेशकों के म्यूचुअल फंड खातों से है।

    अन्य इक्विटी श्रेणियों में मिड कैप फंड में 7,834.84 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। फ्लेक्सी कैप फंड में 6,701.80 करोड़ रुपये, लार्ज एंड मिड कैप फंड में 4,271.22 करोड़ रुपये और मल्टी कैप फंड में 3,859.55 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि सितंबर में स्मॉल कैप के साथ मिड कैप और फ्लेक्सी कैप योजनाओं में भी निवेशकों की अच्छी भागीदारी रही।

    थीमैटिक फंड में 1,800.07 करोड़ रुपये और सेक्टोरल फंड में 1,840.02 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। इसके अलावा फोकस्ड फंड में 1,390.84 करोड़ रुपये, वैल्यू फंड में 1,290.89 करोड़ रुपये और लार्ज कैप फंड में 859.47 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया। दूसरी ओर, कॉन्ट्रा फंड से 97.88 करोड़ रुपये और ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड से 662.14 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी हुई।

    पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग की स्थिति देखें तो सितंबर में कुल 1,33,375.57 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी दर्ज की गई। इसका प्रमुख कारण डेट फंड से 1,83,155.76 करोड़ रुपये का भारी आउटफ्लो रहा। इस तरह इक्विटी योजनाओं में मजबूत निवेश के बावजूद डेट श्रेणी से निकासी ने उद्योग के कुल आंकड़ों को प्रभावित किया। सितंबर में उद्योग का कुल एयूएम 82.64 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि अगस्त में यह 87.08 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था।

    एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी ईटीएफ में सितंबर के दौरान निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही। इस श्रेणी में कुल 15,501.40 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। इक्विटी ईटीएफ में 9,959.96 करोड़ रुपये का निवेश दर्ज किया गया, जबकि गोल्ड ईटीएफ में 4,450.61 करोड़ रुपये और सिल्वर ईटीएफ में 1,974.32 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। अगस्त में इक्विटी फंड में 29,328.62 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश हुआ था, जो जुलाई की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत अधिक था। सितंबर में यह निवेश और बढ़कर 38,306.55 करोड़ रुपये पहुंच गया।

  • भारत का मजबूत बॉन्ड बाजार बना भरोसे का आधार, आर्थिक मजबूती से शेयरों में लौट सकती है तेजी

    भारत का मजबूत बॉन्ड बाजार बना भरोसे का आधार, आर्थिक मजबूती से शेयरों में लौट सकती है तेजी


    नई दिल्ली ।
    भारतीय बॉन्ड बाजार ने हाल के वर्षों में घरेलू परिस्थितियों के साथ-साथ वैश्विक वित्तीय दबावों के बीच भी मजबूत प्रदर्शन किया है। भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता के अनुसार, देश के बॉन्ड बाजार की मजबूती केवल पिछले प्रदर्शन की तुलना में ही बेहतर नहीं रही है, बल्कि दुनिया के कई प्रमुख बाजारों की तुलना में भी इसका प्रदर्शन मजबूत रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती का असर आगे चलकर शेयर बाजार में भी दिखाई दे सकता है।

    उन्होंने बताया कि अमेरिका में बॉन्ड यील्ड लंबे समय के ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार ने अपेक्षाकृत मजबूती बनाए रखी। इसके पीछे केंद्र सरकार की राजकोषीय अनुशासन के प्रति प्रतिबद्धता और आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास की बेहतर संभावनाओं को महत्वपूर्ण आधार माना गया है। वित्तीय स्थिति में सुधार और भविष्य में राजकोषीय परिणामों के बेहतर रहने की उम्मीद ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है।

    मौद्रिक नीति की विश्वसनीयता और महंगाई से जुड़े संरचनात्मक दबावों में कमी को भी बॉन्ड बाजार के लिए सकारात्मक माना गया है। इन परिस्थितियों ने भारतीय ऋण बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के बॉन्ड बाजार की मजबूती और सार्वजनिक वित्त को संतुलित रखने की नीति को महत्वपूर्ण माना गया है।

    हालांकि, शेयर बाजार में बॉन्ड बाजार जैसी मजबूती अभी पूरी तरह दिखाई नहीं दी है। इसके पीछे वैश्विक स्तर पर निवेशकों की बदलती प्राथमिकताओं को एक वजह माना जा रहा है। खासतौर पर कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कंपनियों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़ी विकास संभावनाएं निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

    पूनम गुप्ता के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार ने जून 2022 से सितंबर 2024 के बीच उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। इसके बाद कुछ दूसरे देशों के बाजारों में तेजी का दौर देखने को मिला। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती लंबे समय में शेयर बाजार के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है और भारतीय इक्विटी दोबारा निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बन सकती है।

    उन्होंने भारत के भुगतान संतुलन और रुपये की स्थिति पर भी चर्चा की। उनके अनुसार, भारत लंबे समय से सीमित चालू खाता घाटे और अपेक्षाकृत मजबूत पूंजी प्रवाह की स्थिति में रहा है। समय के साथ सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले चालू खाता घाटे में कमी आई है, जिससे देश के बाहरी क्षेत्र की मजबूती बढ़ी है।

    उन्होंने कहा कि भारत का चालू खाता घाटा उन स्तरों से काफी नीचे है, जिन्हें आमतौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए सुरक्षित माना जाता है। देश के लिए शुद्ध सेवा निर्यात और विदेशों में रहने वाले भारतीयों से मिलने वाला रेमिटेंस महत्वपूर्ण संरचनात्मक ताकत बने हुए हैं।

    सेवा क्षेत्र से होने वाली आय और रेमिटेंस लगातार मजबूत रहने के कारण वस्तुओं के व्यापार में होने वाले घाटे की भरपाई करने में मदद मिलती है। इसी वजह से भारत का चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से नीचे नियंत्रित रहने में सफल रहा है। यह स्थिति देश की बाहरी आर्थिक स्थिरता और भविष्य की विकास संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण आधार मानी जा रही है।

  • अगस्त में म्यूचुअल फंड SIP निवेश रिकॉर्ड 32,297 करोड़ रुपए पहुंचा, गोल्ड ETF में भी 67 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी दर्ज

    अगस्त में म्यूचुअल फंड SIP निवेश रिकॉर्ड 32,297 करोड़ रुपए पहुंचा, गोल्ड ETF में भी 67 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी दर्ज

    नई दिल्ली ।अगस्त 2026 में म्यूचुअल फंड में निवेश का रुझान मजबूत बना रहा। एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया यानी एम्फी के आंकड़ों के अनुसार, इस महीने सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी के जरिए निवेश बढ़कर रिकॉर्ड 32,297 करोड़ रुपए पहुंच गया। जुलाई में यह आंकड़ा 31,961 करोड़ रुपए था। अगस्त का एसआईपी निवेश अब तक का सबसे ऊंचा स्तर रहा।

    अगस्त का आंकड़ा मार्च में दर्ज 32,087 करोड़ रुपए और पहले दर्ज किए गए 31,781 करोड़ रुपए के उच्च स्तर से भी अधिक रहा। एसआईपी खातों में योगदान भी सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचकर 10.2 करोड़ हो गया, जबकि इससे पहले यह संख्या 9.9 करोड़ थी। अगस्त में नए एसआईपी खातों की संख्या 66.39 लाख रही, जो पिछले आंकड़े 61.44 लाख से अधिक है। वहीं बंद किए गए खातों की संख्या 53.82 लाख रही, जबकि पहले यह 50.30 लाख थी। इसके साथ कुल सक्रिय एसआईपी खातों की संख्या 10.62 करोड़ हो गई।

    अगस्त में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी गोल्ड ईटीएफ में भी निवेश में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। आंकड़ों के मुताबिक, गोल्ड ईटीएफ में शुद्ध निवेश बढ़कर 2,596.70 करोड़ रुपए हो गया। जुलाई में यह 1,559 करोड़ रुपए था। इस तरह एक महीने में गोल्ड ईटीएफ निवेश में करीब 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

    गोल्ड ईटीएफ में यह लगातार तीसरा महीना रहा, जब सकारात्मक निवेश प्रवाह दर्ज किया गया। सोने की कीमतों में बढ़ोतरी और सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ते रुझान के बीच निवेशकों की दिलचस्पी इस श्रेणी में बनी रही। अगस्त के दौरान मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स पर सोने की कीमत करीब 7.7 प्रतिशत बढ़ी।

    इसी अवधि में चांदी आधारित निवेश उत्पादों में भी निवेशकों की रुचि दिखाई दी। अगस्त में सिल्वर ईटीएफ में 1,270.63 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश दर्ज हुआ। औद्योगिक मांग और निवेश मांग दोनों के मजबूत रहने के कारण चांदी निवेशकों के लिए आकर्षक विकल्प बनी रही।

    अगस्त में सक्रिय रूप से प्रबंधित इक्विटी म्यूचुअल फंड योजनाओं में भी निवेश बढ़ा। इन योजनाओं में 29,328.62 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश आया, जबकि जुलाई में यह 24,697.39 करोड़ रुपए था। इस तरह निवेश में करीब 19 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद इक्विटी में लगातार निवेश से लंबी अवधि की निवेश रणनीति के प्रति भरोसा दिखाई दिया।

    इक्विटी योजनाओं में स्मॉलकैप फंड सबसे अधिक पसंद किए गए। इनमें 7,973 करोड़ रुपए का निवेश आया। इसके बाद मिडकैप फंड में 6,989 करोड़ रुपए, फ्लेक्सीकैप फंड में 5,059 करोड़ रुपए और लार्ज एंड मिडकैप फंड में 3,873 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया। आंकड़ों से पता चलता है कि निवेशकों की रुचि अलग-अलग इक्विटी श्रेणियों में बनी हुई है।

    दूसरी ओर, अगस्त में डेट म्यूचुअल फंड योजनाओं से 8,127.32 करोड़ रुपए की शुद्ध निकासी हुई। इसके विपरीत हाइब्रिड योजनाओं में 10,045 करोड़ रुपए का निवेश आया। हाइब्रिड श्रेणी में मल्टी एसेट एलोकेशन फंड में 3,671 करोड़ रुपए और आर्बिट्रेज फंड में 3,789 करोड़ रुपए का निवेश दर्ज हुआ।

    लिक्विड फंड्स में 19,934 करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश आया, जबकि ओवरनाइट फंड्स से 30,654 करोड़ रुपए की निकासी हुई। अगस्त के आंकड़ों में एसआईपी, इक्विटी और गोल्ड ईटीएफ में मजबूत निवेश के साथ निवेशकों की अलग-अलग परिसंपत्ति श्रेणियों में बदलती प्राथमिकताएं भी दिखाई दीं।

  • इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में अगस्त में 29,329 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो, एयूएम बढ़कर 87.07 लाख करोड़ रुपये हुआ

    इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में अगस्त में 29,329 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो, एयूएम बढ़कर 87.07 लाख करोड़ रुपये हुआ

    मुंबई, 10 सितंबर। इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में अगस्त में नेट इनफ्लो मासिक आधार पर 4,631.23 करोड़ रुपये बढ़कर 29,328.62 करोड़ रुपये हो गया है, जो कि जुलाई में 24,697.39 करोड़ रुपये था। यह जानकारी एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) की ओर से गुरुवार को जारी किए गए डेटा में दी गई।

    अगस्त में सबसे अधिक 7,973.33 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो स्मॉलकैप फंड्स में दर्ज किया है। इस कैटेगरी में जुलाई में 7,767.50 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया था।

    वहीं, मिडकैप फंड्स में 6,989.40 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया है, जो कि पहले 6,192.31 करोड़ रुपये था। फ्लेक्सी कैप फंड्स में 5,059.42 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया है, जो कि पहले 4,709.08 करोड़ रुपये था।

    इसके अलावा, लार्जकैप फंड्स में नेट इनफ्लो -1,147.36 करोड़ रुपये रहा है। जुलाई में भी इस कैटेगरी में -1,321.69 करोड़ रुपये की निकासी देखी गई थी।

    लार्ज एंड मिडकैप फंड्स में अगस्त में 3,872.79 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया है, जबकि जुलाई में यह आंकड़ा 3,425.37 करोड़ रुपये था।

    इसके अलावा, अगस्त में मल्टीकैप फंड्स में 3,732.77 करोड़ रुपये, कॉन्ट्रा फंड्स में 1,328.01 करोड़ रुपये और फोकस्ड फंड्स में 994.74 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया है।

    अगस्त में इक्विटी ईटीएफ में 7,237.49 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया है।

    अगस्त में म्यूचुअल फंड्स इंडस्ट्री का कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) बढ़कर 87.07 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो जुलाई में 85.75 लाख करोड़ रुपये पर था।

    इस हफ्ते की शुरुआत में, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) के डेटा में बताया गया कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद म्यूचुअल फंड में नेट एसआईपी इनफ्लो वित्त वर्ष 26 में रिकॉर्ड 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

    वित्त वर्ष 26 में कुल 3.5 लाख करोड़ रुपये के एसआईपी निवेश में नेट एसआईपी इनफ्लो का हिस्सा लगभग 56 प्रतिशत था, जो तीन सालों में सबसे उच्चतम स्तर है। वित्त वर्ष 25 में यह हिस्सा 54 प्रतिशत था।

  • आईपीओ, फिर भी मजबूत निवेश, एसएमई कंपनियों ने छह महीने में 3,752 करोड़ रुपये जुटाकर दिखाया भरोसा

    आईपीओ, फिर भी मजबूत निवेश, एसएमई कंपनियों ने छह महीने में 3,752 करोड़ रुपये जुटाकर दिखाया भरोसा

    नई दिल्ली । देश के लघु एवं मध्यम उद्यम (एसएमई) पूंजी बाजार के माध्यम से निवेश जुटाने में लगातार सक्रिय बने हुए हैं। वर्ष 2026 की पहली छमाही के दौरान 78 एसएमई कंपनियों ने प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के जरिए कुल 3,752 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई। आईपीओ की संख्या पिछले दो वर्षों की समान अवधि की तुलना में कम रही, लेकिन निवेश जुटाने का स्तर मजबूत बना रहा। इससे संकेत मिलता है कि निवेशक अब गुणवत्ता आधारित कंपनियों में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं और मजबूत कारोबारी मॉडल वाली कंपनियों को बाजार से पर्याप्त समर्थन मिल रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार जुटाई गई कुल राशि में सबसे बड़ा योगदान फ्रेश इश्यू का रहा। नई इक्विटी जारी कर कंपनियों ने लगभग 3,555 करोड़ रुपये जुटाए, जो कुल इश्यू आकार का करीब 95 प्रतिशत है। दूसरी ओर, ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के जरिए केवल 197 करोड़ रुपये जुटाए गए। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में काफी कम है। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनियां मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी बेचने के बजाय अपने विस्तार, नई परियोजनाओं और कारोबार को बढ़ाने के लिए ताजा पूंजी जुटाने पर अधिक जोर दे रही हैं।

    हालांकि आईपीओ की संख्या में कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में 88 और वर्ष 2024 की पहली छमाही में 116 एसएमई आईपीओ आए थे, जबकि इस वर्ष यह संख्या घटकर 78 रह गई। इसके बावजूद कुल जुटाई गई राशि में केवल मामूली गिरावट आई है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में एसएमई कंपनियों ने 4,004 करोड़ रुपये जुटाए थे। यह अंतर दर्शाता है कि बाजार में कम लेकिन अपेक्षाकृत बड़े और मजबूत आईपीओ आ रहे हैं, जिन्हें निवेशकों का अच्छा समर्थन मिल रहा है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही, यानी अप्रैल से जून के बीच 38 एसएमई कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुईं। इन कंपनियों ने लगभग 1,891 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में जुटाई गई 1,644 करोड़ रुपये की राशि से अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि बाजार में निवेशकों की रुचि अभी भी बनी हुई है और विकास की संभावनाओं वाली कंपनियों को पूंजी जुटाने में अपेक्षाकृत आसानी हो रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले वर्ष की तीसरी और चौथी तिमाही में एसएमई आईपीओ गतिविधियों में असाधारण तेजी देखने को मिली थी, जबकि मौजूदा वर्ष में बाजार अपेक्षाकृत संतुलित स्थिति में पहुंच गया है। अब निवेशकों का ध्यान केवल बड़ी संख्या में आने वाले आईपीओ पर नहीं, बल्कि उन कंपनियों पर है जिनकी वित्तीय स्थिति, विकास की योजना और कारोबारी संभावनाएं मजबूत हैं। यही कारण है कि कम लिस्टिंग के बावजूद पूंजी जुटाने की क्षमता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।

    विश्लेषकों के अनुसार एसएमई क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है और पूंजी बाजार तक इसकी आसान पहुंच आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। मजबूत आईपीओ बाजार से इन कंपनियों को विस्तार, तकनीकी उन्नयन और रोजगार सृजन के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध होते हैं। मौजूदा आंकड़े संकेत देते हैं कि निवेशकों का भरोसा गुणवत्ता वाली एसएमई कंपनियों पर कायम है और आने वाले महीनों में भी यह रुझान जारी रहने की संभावना है।

  • टाटा स्टील समेत चुनिंदा शेयरों पर विशेषज्ञों की नजर, निवेशकों को खरीद स्तर और लक्ष्य पर मिली अहम सलाह

    टाटा स्टील समेत चुनिंदा शेयरों पर विशेषज्ञों की नजर, निवेशकों को खरीद स्तर और लक्ष्य पर मिली अहम सलाह

    नई दिल्ली । पहली तिमाही के कारोबारी माहौल और बदलते वैश्विक संकेतों के बीच शेयर बाजार में निवेशकों की नजर प्रमुख कंपनियों के प्रदर्शन और भविष्य की संभावनाओं पर बनी हुई है। इसी क्रम में बाजार विशेषज्ञों ने कई चर्चित शेयरों पर अपनी रणनीति साझा की है। उनके अनुसार, मेटल, बैंकिंग, ज्वेलरी और उपभोक्ता क्षेत्र के कुछ शेयर आने वाले समय में निवेशकों के लिए अवसर प्रदान कर सकते हैं, हालांकि निवेश से पहले जोखिम प्रबंधन और उचित स्तरों का ध्यान रखना आवश्यक होगा।

    विशेषज्ञों के अनुसार मेटल सेक्टर फिलहाल सकारात्मक संकेत दे रहा है। वैश्विक बाजार में धातुओं की कीमतों में सुधार और मांग में संभावित मजबूती का लाभ भारतीय कंपनियों को मिल सकता है। इसी वजह से टाटा स्टील को इस समय प्रमुख पसंद के रूप में देखा जा रहा है। उनका मानना है कि लगभग 183 रुपये के आसपास यह शेयर निवेश के लिए उपयुक्त स्तर पर माना जा सकता है। यदि किसी कारणवश इसमें और गिरावट आती है तथा यह 170 से 172 रुपये के दायरे में पहुंचता है, तो इसे चरणबद्ध तरीके से पोर्टफोलियो में जोड़ने का अवसर माना जा सकता है।

    विश्लेषकों का कहना है कि अल्पावधि में टाटा स्टील के लिए 215 से 220 रुपये का लक्ष्य संभावित माना जा रहा है। वहीं, यदि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं और मेटल सेक्टर में मजबूती जारी रहती है, तो दीर्घावधि में यह शेयर 270 रुपये तक पहुंचने की क्षमता रख सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि शेयर 170 रुपये के नीचे साप्ताहिक आधार पर बंद होता है, तो निवेशकों को अपनी रणनीति की समीक्षा करनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर जोखिम सीमित करने के लिए स्टॉप लॉस का पालन करना चाहिए।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेश केवल संभावित रिटर्न को देखकर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि जोखिम और पूंजी संरक्षण को भी समान महत्व देना चाहिए। किसी भी शेयर में एकमुश्त निवेश करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश करना अधिक संतुलित रणनीति मानी जाती है। इससे बाजार में उतार-चढ़ाव का प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है और औसत खरीद मूल्य भी बेहतर बन सकता है।

    विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे आने के साथ विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रदर्शन देखने को मिल सकता है। ऐसे में निवेशकों को केवल शेयर की कीमत पर नहीं बल्कि कंपनी की आय, लाभप्रदता, कर्ज की स्थिति, भविष्य की विकास योजनाओं और उद्योग की संभावनाओं का भी मूल्यांकन करना चाहिए। मजबूत बुनियादी स्थिति वाली कंपनियां लंबी अवधि में बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना रखती हैं।

    बाजार में फिलहाल वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम, कमोडिटी कीमतों, ब्याज दरों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों का भी असर दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में निवेशकों को भावनात्मक निर्णय लेने से बचना चाहिए और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत कंपनियों में अनुशासित निवेश और तय जोखिम सीमा के साथ बनाई गई रणनीति ही अस्थिर बाजार में बेहतर परिणाम देने की संभावना रखती है। उन्होंने सलाह दी कि किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपने वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम क्षमता का आकलन अवश्य करें तथा आवश्यकता होने पर वित्तीय सलाहकार की राय भी लें।