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  • भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं, व्यापार समझौते पर भी नजरें

    भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं, व्यापार समझौते पर भी नजरें

    नई दिल्ली । भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं, तकनीक और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। भारत में एस्टोनिया की राजदूत क्रिस्टी कारेलसोहन ने 21 अक्टूबर 2026 को कहा कि दोनों देशों के बीच खासकर सेवा क्षेत्र में व्यावसायिक संबंधों को आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता इस साल के अंत तक लागू हो सकता है। उनके अनुसार, इस समझौते से कारोबार में आने वाली कई बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

    कारेलसोहन ने कहा कि एस्टोनिया की कंपनियां भारतीय कंपनियों की तुलना में आकार में अपेक्षाकृत छोटी हैं। देश में बड़े पैमाने पर विनिर्माण भी सीमित है। ऐसे में भारत जैसे विशाल बाजार में बड़े स्तर पर वस्तुओं का व्यापार और निर्यात करना एस्टोनियाई कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एस्टोनिया का घरेलू बाजार भी छोटा है, इसलिए वहां की कंपनियों के लिए भारत में अपने कारोबार का विस्तार करने के लिए उपयुक्त क्षेत्रों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

    राजदूत के मुताबिक, एस्टोनिया की कंपनियों की प्रमुख ताकत सेवाओं के क्षेत्र में है। डिजिटल सेवाओं, तकनीकी समाधान और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच साझेदारी की अच्छी संभावनाएं हैं। इन क्षेत्रों में भारतीय बाजार की जरूरतों के अनुरूप सेवाएं और समाधान उपलब्ध कराकर व्यावसायिक संबंधों को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि एस्टोनिया की कंपनियां इन क्षेत्रों में आगे विकास और सहयोग की संभावनाएं तलाश रही हैं।

    वस्तुओं के व्यापार के संबंध में उन्होंने बताया कि एस्टोनिया की कुछ कंपनियां भारत में लकड़ी से बने उत्पाद, खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति करती हैं। देश में कुछ उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं, लेकिन उनकी कीमतें प्रतिस्पर्धी स्तर पर नहीं होतीं। इसके बावजूद गुणवत्ता को प्राथमिकता देने वाले ग्राहकों के बीच ऐसे उत्पादों की मांग हो सकती है। इस वजह से भारत में एस्टोनिया के उत्पादों के लिए सीमित लेकिन संभावित बाजार मौजूद है।

    भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया। एस्टोनिया यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में शामिल है। कारेलसोहन ने उम्मीद जताई कि समझौता वर्ष 2026 के अंत तक लागू हो सकता है। उनके अनुसार, इससे मौजूदा सीमा शुल्क में कमी लाने के साथ-साथ गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करने में भी मदद मिल सकती है। ऐसी बाधाएं विशेष रूप से छोटी कंपनियों के लिए दूसरे देशों के बाजारों में कारोबार करना कठिन बनाती हैं।

    राजदूत ने कहा कि भारत एस्टोनिया के लिए व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण बाजार है। कई देशों की तरह एस्टोनिया की भी प्राथमिकता भारत के साथ व्यावसायिक संबंधों को मजबूत करना है। वह दोनों देशों के बीच व्यापारिक संपर्कों को और विकसित करना चाहती हैं। भारत का बड़ा बाजार एस्टोनियाई कंपनियों के लिए अपनी सेवाओं और उत्पादों की पहुंच बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।

    कुल मिलाकर, भारत और एस्टोनिया के बीच सहयोग की संभावनाएं केवल पारंपरिक वस्तु व्यापार तक सीमित नहीं हैं। डिजिटल सेवाएं, तकनीक और साइबर सुरक्षा ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें दोनों देशों के व्यावसायिक संबंध आगे बढ़ सकते हैं। प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से भी कारोबार की परिस्थितियों में बदलाव आने की उम्मीद है। हालांकि, समझौते के लागू होने और उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन आगे होने वाले निर्णयों तथा व्यापारिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।

  • भारत की डिफेंस कंपनी से 768 करोड़ की डील में चूक, गई एस्टोनिया के रक्षा मंत्री की कुर्सी

    भारत की डिफेंस कंपनी से 768 करोड़ की डील में चूक, गई एस्टोनिया के रक्षा मंत्री की कुर्सी


    नई दिल्ली। यूक्रेन के लिए गोला-बारूद खरीदने की 70 मिलियन यूरो यानी करीब ₹768.50 करोड़ से अधिक की डिफेंस डील विवादों में घिर गई है। इस मामले की राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। पेवकुर 2022 से रक्षा मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

    विवाद उस समय सामने आया, जब डील में भारत के स्वामित्व वाली एक ऐसी कंपनी को शामिल किया गया, जिसका इससे पहले आर्टिलरी शेल्स बेचने का कोई रिकॉर्ड नहीं था। पेवकुर ने बुधवार को इस्तीफे की घोषणा करते हुए कहा कि वह इस डिफेंस डील की जिम्मेदारी ले रहे हैं।

    इटली की कंपनी से हुआ था करार
    मामला 2024 में हुए उस समझौते से जुड़ा है, जिसे एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इनवेस्टमेंट्स ने इटली में रजिस्टर्ड Datasel SRL नाम की कंपनी के साथ किया था। इसी साल Datasel को भारत की Neco Defence Munitions ने खरीद लिया था।

    इस डील का उद्देश्य यूक्रेन के लिए तोपखाने के गोले उपलब्ध कराना था। एस्टोनिया यूक्रेन का मजबूत समर्थक रहा है और उस समय यूक्रेनी सेना को गोला-बारूद की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा था।

    एस्टोनिया ने इस खरीद के लिए यूरोपीय संघ की European Peace Facility से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल किया। डील के तहत कंपनी को बड़ी रकम एडवांस में भी दी गई थी।

    डिलीवरी में होती रही देरी, क्वालिटी पर भी सवाल
    करार के बाद उम्मीद थी कि कुछ ही महीनों में गोला-बारूद यूक्रेन पहुंच जाएगा। हालांकि, उत्पादन से जुड़ी कथित समस्याओं के चलते डिलीवरी लगातार टलती रही। आखिरकार 2025 में जब गोला-बारूद की आपूर्ति हुई तो उसकी गुणवत्ता को लेकर भी सवाल खड़े हो गए।

    एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इनवेस्टमेंट्स के डायरेक्टर ने भी माना कि यह सौदा नहीं किया जाना चाहिए था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “अगर मैं एक घर बनाना शुरू करूं और ऐसी कंपनी को काम पर रखूं, जिसने पहले कभी घर नहीं बनाया हो, तो यह संदेह होना स्वाभाविक है कि वह घर पूरा नहीं कर पाएगी।”

    रक्षा मंत्री बोले- हर डील की निगरानी संभव नहीं
    हालांकि, हन्नो पेवकुर ने रक्षा मंत्रालय के भीतर जिम्मेदारियों के बंटवारे का बचाव किया। उनका कहना था कि रक्षा मंत्री व्यक्तिगत रूप से हर डिफेंस डील की निगरानी नहीं करता।

    एस्टोनिया के प्रधानमंत्री Kristen Michal ने भी कहा कि उन्हें इस मामले में पेवकुर की कोई व्यक्तिगत गलती नजर नहीं आती। इसके बावजूद राजनीतिक जिम्मेदारी तय किए जाने की स्थिति में रक्षा मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

    इस्तीफे के बाद पेवकुर ने कहा कि उन्होंने यह कदम इस विश्वास के साथ उठाया है कि एस्टोनिया ने अपनी राष्ट्रीय रक्षा को मजबूत करने के लिए सही फैसले लिए हैं।