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  • इथेनॉल पर सरकार का अहम फैसला… पेट्रोल में मिश्रण पर फिलहाल रोक !

    इथेनॉल पर सरकार का अहम फैसला… पेट्रोल में मिश्रण पर फिलहाल रोक !


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) ने घरेलू स्तर पर चीनी (Sugar) की उपलब्धता बनाए रखने के लिए गन्ने के उत्पादों से बने इथेनॉल के पेट्रोल में मिश्रण (Petrol Sugarcane-Ethanol Blending) पर फिलहाल रोक लगाने का फैसला किया है। इसके तहत, सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम विपणन कंपनियों ने पेट्रोल में इथेनॉल (Ethanol Blending) मिलाने के लिए 2026-27 आपूर्ति वर्ष की ताजा खरीद निविदा में गन्ने के रस, चीनी की चाशनी और बी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल को शामिल नहीं किया है।


    कितना इथेनॉल खरीदने की तैयारी, क्या पेट्रोल में भी मिश्रण?

    भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने 16 अक्तूबर को पेट्रोलियम विपणन कंपनियों की ओर से जारी निविदा में नवंबर से शुरू होने वाले आपूर्ति वर्ष के लिए करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद के लिए बोलियां मांगी हैं। इसका उद्देश्य पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने की जरूरत को पूरा करना है।


    मक्के से बने इथेनॉल पर क्या फैसला हुआ?

    निविदा के अनुसार, मक्का, टूटे चावल, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा खरीदे गए अधिशेष चावल और सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल की आपूर्ति के लिए बोलियां लगाई जा सकती हैं। निविदा में मक्के से बने इथेनॉल पर प्रोत्साहन राशि भी घटाकर 68.86 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है, जो पहले 71.86 रुपये प्रति लीटर थी।


    कच्चे माल की खरीद की रणनीति में क्या बदलाव?

    गन्ने उत्पादों से बने इथेनॉल की खरीद पर पाबंदी से पेट्रोल मिश्रण कार्यक्रम के लिए कच्चे माल की खरीद की रणनीति में बदलाव होगा। इस कार्यक्रम में कच्चे तेल के आयात को कम करने व वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कटौती के लिए अनाज व गन्ने दोनों से बने इथेनॉल का इस्तेमाल किया जाता रहा है।


    क्या गन्ने का उत्पादन हो सकता है प्रभावित?

    सरकार की तरफ से यह कदम घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच उठाया गया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण उत्पादन घटने और कीमतें बढ़ने का जोखिम पैदा हुआ है।

  • कमजोर मानसून के बीच सरकार का बड़ा फैसला, चीनी और गन्ने से बनने वाले एथेनॉल की खरीद पर लगाई रोक

    कमजोर मानसून के बीच सरकार का बड़ा फैसला, चीनी और गन्ने से बनने वाले एथेनॉल की खरीद पर लगाई रोक


    नई दिल्ली ।
    केंद्र सरकार ने चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने और गन्ने से बनने वाली चीनी की उपलब्धता बनाए रखने के उद्देश्य से एथेनॉल खरीद की नीति में बदलाव किया है। नए निर्देशों के तहत सरकारी ईंधन कंपनियां एक नवंबर 2026 से शुरू होने वाले नए आपूर्ति वर्ष में चीनी और गन्ने के रस से तैयार एथेनॉल की खरीद के लिए प्रस्ताव नहीं मांगेंगी। इस फैसले के पीछे कमजोर मानसून और गन्ने के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव को प्रमुख कारण माना गया है।

    सरकारी तेल कंपनियों ने नए आपूर्ति वर्ष के लिए लगभग 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने का संयुक्त टेंडर जारी किया है। इसमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड शामिल हैं। टेंडर में एथेनॉल की खरीद के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कच्चे माल से संबंधित शर्तें भी निर्धारित की गई हैं।

    नए टेंडर के अनुसार, गन्ने के रस, चीनी, चीनी के सिरप और बी-हेवी शीरे से तैयार एथेनॉल की आपूर्ति के लिए प्रस्ताव आमंत्रित नहीं किए गए हैं। इसका मतलब है कि सरकारी तेल कंपनियां इस आपूर्ति वर्ष में इन स्रोतों से बनने वाले एथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी। हालांकि, एथेनॉल की कुल खरीद के लिए अन्य निर्धारित कच्चे माल का इस्तेमाल जारी रहेगा।

    भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। इस वर्ष देश में चीनी उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम रहने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। अल नीनो के प्रभाव के बीच एक दशक से अधिक समय में कमजोर मानसून दर्ज किया गया, जिससे गन्ने की फसल प्रभावित हुई है। गन्ने की उपलब्धता में कमी का असर चीनी उत्पादन पर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार चीनी की आपूर्ति और कीमतों को ध्यान में रखते हुए एथेनॉल खरीद के लिए उपलब्ध कच्चे माल के इस्तेमाल में बदलाव कर रही है।

    भारत अपनी आयातित तेल पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है, जिससे परिवहन क्षेत्र में पेट्रोलियम ईंधन की खपत को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके उत्पादन के लिए गन्ने के साथ-साथ अनाज और अन्य अनुमत कच्चे माल का भी उपयोग किया जाता है। नए टेंडर में भी इन वैकल्पिक स्रोतों से तैयार एथेनॉल की आपूर्ति का प्रावधान रखा गया है।

    टेंडर में भाग लेने वाले आपूर्तिकर्ता सी-हेवी शीरे, खराब हो चुके खाद्यान्न, भारतीय खाद्य निगम से खरीदे गए अतिरिक्त चावल, मक्का और राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत अनुमत अन्य कच्चे माल से उत्पादित एथेनॉल की पेशकश कर सकते हैं। इस व्यवस्था के तहत एथेनॉल की खरीद के लिए वैकल्पिक कच्चे माल के विकल्प उपलब्ध रहेंगे। इससे चीनी आधारित स्रोतों पर निर्भरता कम करते हुए निर्धारित मात्रा में एथेनॉल की खरीद की जा सकेगी।

    एथेनॉल खरीद से जुड़े बदलावों के साथ सरकार ने चीनी मिलों को अक्टूबर 2026 में उत्पादित चीनी की बिक्री के लिए भी अतिरिक्त अनुमति दी है। इसके तहत मिलें अक्टूबर में उत्पादित चीनी को अक्टूबर और नवंबर 2026 के दौरान नियमित मासिक रिलीज कोटे के अतिरिक्त बेच सकती हैं। यह अनुमति निर्धारित शर्तों के अनुसार लागू होगी।

    उदाहरण के तौर पर, यदि कोई चीनी मिल अक्टूबर में 1,000 मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन करती है, तो वह इस मात्रा को अक्टूबर और नवंबर के दौरान बेच सकेगी। यह बिक्री दोनों महीनों के नियमित मासिक रिलीज कोटे के अतिरिक्त होगी। सरकार के इन फैसलों का उद्देश्य कमजोर मानसून के कारण गन्ने की उपलब्धता पर पड़ रहे असर के बीच चीनी की आपूर्ति और एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के इस्तेमाल में संतुलन बनाए रखना है।

  • इथेनॉल बनाने में अब नहीं होगा चीनी का इस्तेमाल… दाम बढ़ने के बाद सरकार का बड़ा कदम…

    इथेनॉल बनाने में अब नहीं होगा चीनी का इस्तेमाल… दाम बढ़ने के बाद सरकार का बड़ा कदम…


    नई दिल्ली।
    भारत सरकार (India Government) ने चीनी (Sugar) की बढ़ती कीमतों (Rising Prices) पर काबू पाने और घरेलू बाजार में इसकी सप्लाई बनाए रखने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने तेल कंपनियों (Oil Companies) को निर्देश दिया है कि साल 2026-27 के सप्लाई में चीनी से इथेनॉल (Ethanol) बनाने के लिए चीनी का इस्तेमाल शून्य किया जाए। इसके तहत गन्ने के रस, चीनी, चीनी की चाशनी और बी-हैवी मोलासेस (गुड़ बनाने की प्रक्रिया में बचने वाला गाढ़ा लिक्विड पदार्थ) से बने इथेनॉल की खरीद के लिए ताजा टेंडर में बोली नहीं मांगी गई है।


    क्या है डिटेल

    शुक्रवार को जारी टेंडर के मुताबिक, तेल कंपनियां नवंबर से शुरू होने वाले सप्लाई वर्ष के लिए करीब 11 अरब लीटर इथेनॉल खरीदने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि, इस बार कंपनियां मक्का, टूटे चावल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) से खरीदे गए अतिरिक्त चावल से बने इथेनॉल की सप्लाई के लिए बोली लगा सकती हैं।


    चीनी की कीमतों पर काबू पाने की कोशिश

    भारत दुनिया में चीनी की सबसे ज्यादा खपत करने वाले देशों में शामिल है। पिछले कुछ समय से देश में चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की चिंता बनी हुई है। वहीं, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना प्रोडक्शन राज्यों में कम बारिश के कारण चीनी प्रोडक्शन प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में सरकार की कोशिश है कि गन्ने और चीनी का ज्यादा हिस्सा घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए उपलब्ध रहे। इसी वजह से इथेनॉल बनाने में चीनी के इस्तेमाल को सीमित करने का फैसला लिया गया है।


    मक्का और चावल से बने इथेनॉल को मिलेगा मौका

    सरकार के नए टेंडर में इथेनॉल बनाने के लिए मक्का, टूटे चावल और अतिरिक्त चावल के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। इससे चीनी आधारित कच्चे माल के बजाय अनाज से इथेनॉल बनाने पर जोर बढ़ सकता है। इथेनॉल पेट्रोल में मिलाया जाता है, जिससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और प्रदूषण घटाने में मदद मिल सकती है। भारत ने इसी दिशा में इस साल देशभर में पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य यानी E20 लागू किया है। हालांकि, कुछ वाहन चालकों ने चिंता जताई है कि ज्यादा इथेनॉल मिला पेट्रोल पुराने वाहनों के इंजन और उनके पुर्जों पर असर डाल सकता है।


    मक्का से बने इथेनॉल की खरीद कीमत भी घटाई

    तेल कंपनियों ने मक्का से बने इथेनॉल के लिए मिलने वाले प्रोत्साहन में भी कटौती की है। टेंडर के मुताबिक, यह प्रोत्साहन 5.79 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 2.79 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसके साथ ही मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत 71.86 रुपये प्रति लीटर से घटकर 68.86 रुपये प्रति लीटर रह गई है। इस बदलाव से इथेनॉल उत्पादकों की कमाई और उत्पादन से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है।


    पहले भी चीनी उत्पादन बढ़ाने पर हो रहा था विचार

    इससे पहले अगस्त में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन में इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले गन्ने की मात्रा सीमित करने पर विचार कर रही थी। इसका मकसद चीनी उत्पादन बढ़ाना और कीमतों को काबू में लाना था। अब ताजा टेंडर में चीनी आधारित कच्चे माल से बने इथेनॉल की खरीद को शामिल नहीं किया गया है। इससे साफ है कि फिलहाल सरकार घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने पर जोर दे रही है।

  • भारत में एथेनॉल आपूर्ति 895 करोड़ लीटर पहुंची, कुल मात्रा में अनाज आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत दर्ज हुई

    भारत में एथेनॉल आपूर्ति 895 करोड़ लीटर पहुंची, कुल मात्रा में अनाज आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत दर्ज हुई

    नई दिल्ली ।भारत में एथेनॉल सप्लाई ईयर 2025-26 के दौरान एथेनॉल की आपूर्ति में अनाज आधारित कच्चे माल की भूमिका लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। अगस्त 2026 के अंत तक देश में कुल 895 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई। यह मात्रा इस अवधि के लिए अनुबंधित 1,048 करोड़ लीटर एथेनॉल का करीब 85 प्रतिशत है।

    उपलब्ध उद्योग आंकड़ों के अनुसार, कुल 895 करोड़ लीटर आपूर्ति में अनाज आधारित फीडस्टॉक से 624 करोड़ लीटर एथेनॉल उपलब्ध कराया गया। वहीं, चीनी आधारित स्रोतों से 271 करोड़ लीटर की आपूर्ति हुई। इस तरह कुल एथेनॉल आपूर्ति में अनाज आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत रही।

    अनाज आधारित स्रोतों में मक्का सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा। अगस्त के अंत तक मक्का से 345 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की गई। इसके बाद भारतीय खाद्य निगम से प्राप्त अधिशेष चावल का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिससे 214 करोड़ लीटर एथेनॉल तैयार किया गया। इसके अलावा क्षतिग्रस्त खाद्यान्नों से 64 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ।

    उद्योग संगठन के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन में मक्का और अधिशेष चावल के बढ़ते इस्तेमाल से उत्पादन व्यवस्था को अधिक स्थिरता मिल रही है। इससे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलने के साथ किसानों के लिए कृषि उपज के नए उपयोग के अवसर भी बन रहे हैं।

    चीनी आधारित स्रोतों की भी एथेनॉल आपूर्ति में अहम भूमिका बनी हुई है। इस श्रेणी में गन्ने के रस से सबसे अधिक 149 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई। बी-हेवी शीरे से 107 करोड़ लीटर और सी-हेवी शीरे से 15 करोड़ लीटर एथेनॉल उपलब्ध कराया गया।

    उद्योग के अनुसार, अलग-अलग फीडस्टॉक से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से देश की आपूर्ति शृंखला अधिक लचीली हो रही है। इससे किसी एक फसल या कच्चे माल पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। एथेनॉल उत्पादन के लिए कई स्रोतों के इस्तेमाल को देश के कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन की उपमहानिदेशक भारती बालाजी ने कहा कि अब तक आपूर्ति किए गए 895 करोड़ लीटर एथेनॉल में करीब 70 प्रतिशत हिस्सा अनाज आधारित स्रोतों का है। इसमें मक्का और भारतीय खाद्य निगम का अधिशेष चावल प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, चीनी आधारित स्रोत भी आपूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि विभिन्न फीडस्टॉक के इस्तेमाल से भारत के एथेनॉल कार्यक्रम को मजबूती मिलती है। इससे कृषि उपज का बेहतर इस्तेमाल संभव होता है और उत्पादन से जुड़े जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।

    हालांकि, उद्योग ने एथेनॉल उत्पादन क्षमता और आपूर्ति बढ़ने के साथ स्थिर और अनुमानित मांग सुनिश्चित करने की जरूरत पर भी जोर दिया है। उद्योग का मानना है कि आने वाले वर्षों में मांग की स्थिरता का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो सकता है।

    भारत की एथेनॉल खपत का दायरा भी केवल पेट्रोल में मिश्रण तक सीमित नहीं रखने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों, कंप्रेस्ड बायोगैस, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और अन्य औद्योगिक उपयोगों में एथेनॉल की खपत बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है। ऐसे में उत्पादन के साथ विभिन्न क्षेत्रों में मांग बढ़ाना भी एथेनॉल व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने से पहले खाद्य सुरक्षा, पानी और किसानों की आय पर असर का आकलन जरूरी, विशेषज्ञ ने नीति बदलाव सुझाए

    इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने से पहले खाद्य सुरक्षा, पानी और किसानों की आय पर असर का आकलन जरूरी, विशेषज्ञ ने नीति बदलाव सुझाए

    नई दिल्ली । कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने भारत की कृषि नीति में व्यापक बदलाव की जरूरत बताते हुए कहा है कि इथेनॉल उत्पादन, उर्वरक सब्सिडी और कृषि व्यापार जैसे मुद्दों पर केवल तत्काल आर्थिक लाभ को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार नीति निर्माण में खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरणीय स्थिरता को समान प्राथमिकता देना जरूरी है।

    शर्मा ने इथेनॉल उत्पादन के तेजी से विस्तार को लेकर विशेष चिंता जताई है। उनका कहना है कि गन्ने के साथ मक्का और चावल जैसी फसलों का इस्तेमाल भी इथेनॉल उत्पादन में बढ़ रहा है। ऐसे में यह आकलन जरूरी है कि कृषि उपज का कितना हिस्सा भोजन से ईंधन की ओर सुरक्षित रूप से मोड़ा जा सकता है। उनके मुताबिक इस बदलाव का असर खाद्य उपलब्धता, पानी की मांग और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में फसल पैटर्न पर पड़ सकता है।

    उनका तर्क है कि चीनी क्षेत्र में मौजूदा परिस्थितियों को केवल मौसम, सूखे या फसल संबंधी बीमारियों से नहीं जोड़ा जा सकता। चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने की नीति को भी व्यापक तस्वीर में देखना होगा। भारत में इथेनॉल मिश्रण को ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के उपाय के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन किसानों को इससे मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ पर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

    शर्मा ने मक्का की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी कृषि उत्पाद की मांग इथेनॉल के कारण बढ़ती है, तो उसका लाभ किसानों तक पहुंचना चाहिए। उनका कहना है कि कई मौकों पर किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इसलिए इथेनॉल नीति में किसानों की आय और न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुरक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए।

    उन्होंने ब्राजील के मॉडल को भारत में बिना परिस्थितियों का आकलन किए लागू करने से सावधान किया है। उनके अनुसार भारत में जमीन, पानी और खाद्य जरूरतों की स्थिति अलग है। इसलिए ऐसी इथेनॉल रणनीति बननी चाहिए जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ खाद्य सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन को बनाए रखे।

    फर्टिलाइजर सब्सिडी को लेकर भी शर्मा ने पुनर्विचार की जरूरत बताई। उनका कहना है कि रासायनिक उर्वरकों पर लंबे समय तक निर्भरता ने पोषक तत्वों के असंतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। उनका सुझाव है कि सब्सिडी व्यवस्था को अचानक समाप्त करने के बजाय धीरे-धीरे टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती की दिशा में बढ़ाया जाए।

    उन्होंने प्रत्यक्ष आय सहायता को कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की वकालत की। हालांकि, इसके लिए किराए पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानों की पहचान और उन्हें योजनाओं का लाभ पहुंचाना बड़ी चुनौती है। उनका मानना है कि सरकारी सहायता वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए।

    न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर शर्मा ने किसानों के लिए भरोसेमंद मूल्य सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई। उनके अनुसार केवल बाजार की शक्तियों पर निर्भर रहने से किसानों की आय में स्थिरता नहीं आ सकती। उत्पादन बढ़ने के बावजूद यदि किसान को बाजार में उचित कीमत नहीं मिलती, तो रिकॉर्ड उत्पादन का लाभ उसकी आमदनी में दिखाई नहीं देता।

    उन्होंने कहा कि भारत की कृषि नीति का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन हासिल करना नहीं होना चाहिए। किसानों की वास्तविक कमाई, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और खाद्य सुरक्षा को केंद्र में रखकर नीतियां तैयार करना जरूरी है। उनके मुताबिक दीर्घकालिक कृषि विकास के लिए इथेनॉल, सब्सिडी और व्यापार नीतियों के बीच बेहतर संतुलन बनाना समय की जरूरत है।

  • अंडे की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी, पोल्ट्री फीड महंगा होने से मक्का और इथेनॉल की बढ़ती मांग बनी अहम वजह

    अंडे की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी, पोल्ट्री फीड महंगा होने से मक्का और इथेनॉल की बढ़ती मांग बनी अहम वजह

    नई दिल्ली ।अंडों की कीमतों में पिछले एक साल के दौरान तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। पोल्ट्री फार्म से निकलने वाले एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि कई खुदरा बाजारों में उपभोक्ताओं को इसके लिए 8.50 से 9 रुपये तक भुगतान करना पड़ रहा है। कीमतों में करीब 35 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने रोजमर्रा के खाद्य खर्च पर दबाव बढ़ाया है।

    अंडों की कीमत बढ़ने के पीछे पोल्ट्री फीड की बढ़ती लागत को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। मुर्गियों के चारे में मक्का प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है। इसके अलावा सोयाबीन और दूसरे फीड इनपुट की कीमतों में बदलाव भी पोल्ट्री उत्पादन की कुल लागत को प्रभावित करता है।

    मक्के की मांग इस समय केवल पोल्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं है। भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के तहत अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन का महत्व लगातार बढ़ा है। इस प्रक्रिया में मक्का प्रमुख फीडस्टॉक के रूप में तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है।

    इथेनॉल क्षेत्र में मक्के की बढ़ती मांग का सीधा असर इसकी उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है। जब एक ही कृषि उत्पाद की मांग अलग-अलग क्षेत्रों से बढ़ती है, तो बाजार में उसकी कीमत पर दबाव बनने की संभावना रहती है। इसका असर उन उद्योगों पर भी पड़ता है जो उसी कच्चे माल पर निर्भर हैं।

    पोल्ट्री उद्योग के लिए मक्का फीड का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मक्के की कीमत में बढ़ोतरी होने पर चारे की लागत बढ़ सकती है। चारे की लागत बढ़ने के बाद उसका प्रभाव मुर्गियों के पालन, उत्पादन लागत और अंततः अंडों के बाजार मूल्य पर दिखाई देता है।

    हालांकि अंडों की मौजूदा महंगाई को केवल इथेनॉल की बढ़ती मांग से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी। मक्के की कीमत पर पोल्ट्री फीड की मांग, मौसम, उत्पादन में बदलाव और दूसरे कृषि इनपुट की लागत का भी प्रभाव पड़ता है। मुर्गियों की उत्पादकता और बाजार में अंडों की उपलब्धता भी कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    आने वाले महीनों में मांग का मौसमी असर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सर्दियों के दौरान अंडों की खपत आम तौर पर बढ़ जाती है। ऐसे में यदि पोल्ट्री फीड की लागत ऊंची बनी रहती है और बाजार में आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं रहती, तो अंडों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

    सरकार की ओर से इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की उपलब्धता बढ़ाने और उत्पादन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के के इस्तेमाल में हुई वृद्धि से इस फसल की औद्योगिक मांग का महत्व बढ़ा है। ESY 2025-26 में इथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 125.78 लाख टन मक्के के इस्तेमाल का अनुमान इसी बढ़ती मांग को दर्शाता है।

    मक्के की बढ़ती औद्योगिक मांग और पोल्ट्री क्षेत्र की जरूरतों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो गया है। यदि मक्के की उपलब्धता बढ़ती है और उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है, तो पोल्ट्री उद्योग पर दबाव कम हो सकता है। वहीं, फीड लागत ऊंची रहने पर इसका असर अंडों की कीमतों में आगे भी दिखाई दे सकता है।

    फिलहाल अंडों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी उपभोक्ताओं के साथ पोल्ट्री कारोबार के लिए भी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में मक्का उत्पादन, फीड लागत, इथेनॉल की मांग, अंडों की आपूर्ति और मौसमी खपत जैसे कारक मिलकर बाजार की दिशा तय करेंगे।

  • चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    नई दिल्ली । देश में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने अलग तस्वीर पेश की है। विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा तेजी की मुख्य वजह एथेनॉल उत्पादन नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन, गुणवत्ता और चीनी रिकवरी में आई कमी है। उनका कहना है कि सरकार चीनी की घरेलू जरूरत, एथेनॉल उत्पादन और निर्यात के बीच लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है।

    नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन के अनुसार देश में हर वर्ष घरेलू खपत के लिए करीब 280 लाख टन चीनी की आवश्यकता होती है। इसके बाद उपलब्ध अतिरिक्त मात्रा में से ही एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए चीनी के इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। चालू वर्ष में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल की गई, जबकि लगभग सात लाख टन चीनी का निर्यात हुआ है।

    विशेषज्ञ के मुताबिक चालू वर्ष में देश का चीनी उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहा है और इसके साथ पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य परिस्थितियों में देश में पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाता है, ताकि उत्पादन या आपूर्ति में अचानक कमी आने की स्थिति में घरेलू बाजार प्रभावित न हो। इसलिए केवल एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन को मौजूदा कीमत वृद्धि का सीधा कारण मानना उचित नहीं है।

    प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने एथेनॉल को चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बदलाव वाला क्षेत्र बताया। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन घरेलू मांग से काफी अधिक हो जाता था, तब अतिरिक्त चीनी की वजह से बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ता था। इससे चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी और किसानों को गन्ने का भुगतान मिलने में भी परेशानी पैदा होती थी। निर्यात एक विकल्प जरूर था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों और प्रतिस्पर्धा के कारण यह हमेशा लाभदायक नहीं रहता था।

    ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने की नीति ने उद्योग को एक वैकल्पिक बाजार दिया। इससे चीनी की अधिकता को नियंत्रित करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिला और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिली। विशेषज्ञों के अनुसार सरकार उत्पादन के अनुमान और घरेलू जरूरतों को देखते हुए समय-समय पर एथेनॉल डायवर्जन तथा चीनी निर्यात से जुड़े फैसले ले सकती है।

    बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने मौजूदा स्थिति में गुणवत्तापूर्ण गन्ने के उत्पादन और चीनी रिकवरी को महत्वपूर्ण कारक बताया। उनके अनुसार उत्तर भारत में इस समय गन्ना पेराई का अपेक्षाकृत कमजोर दौर चल रहा है। मुख्य पेराई सीजन शुरू होने के बाद बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ने की संभावना है, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

    गन्ने की फसल अवधि और रिकवरी में राज्यों के बीच अंतर भी चीनी उत्पादन को प्रभावित करता है। उत्तर भारत में किसान सामान्यतः करीब 10 से 11 महीने में तैयार होने वाली फसल लेते हैं, जबकि महाराष्ट्र में गन्ना लगभग 13 से 14 महीने और तमिलनाडु में कुछ परिस्थितियों में 18 महीने तक खेत में रहता है। लंबी अवधि से गन्ने में चीनी संचय और रिकवरी बेहतर हो सकती है।

    डॉ. हरिओम के अनुसार उत्तर भारत में किसान धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करने के साथ गेहूं, सरसों, मसूर, चना और सब्जियों जैसी अंतरवर्ती फसलों का विकल्प अपना सकते हैं। इससे अतिरिक्त आय के अवसर बढ़ सकते हैं और गन्ने की खेती की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार की संभावना बन सकती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी की कीमतों को समझने के लिए केवल एथेनॉल डायवर्जन पर ध्यान देने के बजाय गन्ने के उत्पादन, रिकवरी, पेराई चक्र और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को भी समान रूप से देखना जरूरी है।

  • E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल

    E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाली E20 नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि गन्ने और अनाज के एक हिस्से का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में होने से खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ रहा है।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि लोगों को एक तरफ सड़क पर वाहन चलाने के दौरान और दूसरी तरफ रसोई में खाद्य सामग्री खरीदते समय कीमत चुकानी पड़ रही है। उन्होंने E20 नीति की दोबारा समीक्षा करने और उपभोक्ताओं को बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल उपलब्ध कराने का विकल्प देने की मांग की है।

    कांग्रेस की ओर से चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर गन्ने के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया है। पार्टी का दावा है कि लगभग 25 लाख टन चीनी बनाने में इस्तेमाल होने वाला गन्ना इथेनॉल उत्पादन की ओर गया। जयराम रमेश ने इसी संदर्भ में चीनी और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया।

    उन्होंने दावा किया कि पिछले तीन महीनों में चीनी की कीमत 48 रुपये से बढ़कर 67 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। कांग्रेस ने गुड़, चावल और मक्के के आटे जैसी कुछ अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का उल्लेख किया है। हालांकि, अलग-अलग बाजारों और क्षेत्रों में इन वस्तुओं की कीमतों में अंतर हो सकता है।

    E20 पेट्रोल को लेकर कांग्रेस ने वाहनों के माइलेज का मुद्दा भी उठाया है। पार्टी का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ने से कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता प्रभावित हो सकती है। खासकर पुराने वाहनों को लेकर भी कांग्रेस ने संभावित तकनीकी समस्याओं की चिंता जताई है।

    कांग्रेस की मांग है कि उपभोक्ताओं को उनकी जरूरत और वाहन की तकनीकी क्षमता के अनुसार बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल खरीदने का विकल्प मिलना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि ईंधन संबंधी नीतियों में उपभोक्ता हितों और वाहन मालिकों की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    दूसरी ओर, चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए केंद्र सरकार ने कदम उठाया है। सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के देश में लाने की मंजूरी दी। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों पर दबाव कम करना है।

    दिल्ली में 21 अगस्त को चीनी की कीमत करीब 65 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई। कीमतों में बढ़ोतरी और सरकार के आयात फैसले के बाद E20 नीति को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। कांग्रेस इसे खाद्य महंगाई और वाहन माइलेज से जोड़ रही है, जबकि सरकार का चीनी आयात का कदम बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में है।

    इथेनॉल मिश्रण नीति का उद्देश्य पेट्रोल में वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाना, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और किसानों के लिए गन्ने तथा अन्य फीडस्टॉक से अतिरिक्त बाजार तैयार करना रहा है। हालांकि, खाद्य वस्तुओं की कीमतों और वाहन ईंधन दक्षता पर इसके प्रभाव को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस जारी है।

    आने वाले समय में चीनी की कीमतों, घरेलू आपूर्ति और E20 ईंधन के वास्तविक प्रभाव के आंकड़े इस बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने नीति की समीक्षा और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प देने की मांग को केंद्र में रखा है, जबकि सरकार का ताजा कदम चीनी की उपलब्धता बढ़ाकर बाजार कीमतों को नियंत्रित करने पर केंद्रित है।

  • E20 पेट्रोल पर नई बहस, मुख्य आर्थिक सलाहकार ने पुरानी गाड़ियों के लिए E10 जारी रखने और E30 पर सावधानी बरतने को कहा

    E20 पेट्रोल पर नई बहस, मुख्य आर्थिक सलाहकार ने पुरानी गाड़ियों के लिए E10 जारी रखने और E30 पर सावधानी बरतने को कहा

    नई दिल्ली ।भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने पुराने दोपहिया वाहनों के लिए पेट्रोल पंपों पर E10 पेट्रोल की उपलब्धता बनाए रखने की सलाह दी है। उनका कहना है कि देश में बड़ी संख्या में पुराने बाइक और स्कूटर ऐसे हैं, जिनके इंजन E20 ईंधन के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हो सकते।

    नागेश्वरन के अनुसार, पुराने कार्बोरेटर आधारित इंजन E20 में मौजूद अधिक एथेनॉल के साथ हवा और ईंधन के मिश्रण को आधुनिक इंजनों की तरह प्रभावी तरीके से समायोजित नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में इंजन के अधिक गर्म होने और लंबे समय में रबर तथा अन्य संबंधित हिस्सों पर असर पड़ने की आशंका हो सकती है।

    मुख्य आर्थिक सलाहकार का सुझाव है कि जब तक पुराने वाहनों को E20 के अनुरूप तकनीकी रूप से अनुकूल नहीं बनाया जाता, तब तक उनके उपयोगकर्ताओं के लिए E10 पेट्रोल का विकल्प उपलब्ध रहना चाहिए। इससे पुराने वाहनों के मालिकों को अपनी जरूरत और वाहन की क्षमता के अनुसार ईंधन चुनने का अवसर मिल सकता है।

    भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और किसानों के लिए कृषि उत्पादों का अतिरिक्त बाजार तैयार करना है। एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने के साथ-साथ मक्का और कुछ अन्य कृषि उत्पादों से किया जाता है। मिश्रण की मात्रा बढ़ने के साथ इन फसलों की मांग पर भी असर पड़ता है।

    नागेश्वरन ने एथेनॉल ब्लेंडिंग के खाद्य क्षेत्र पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई है। उनके मुताबिक गन्ने, मक्का और चावल जैसी फसलों का अधिक इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में होने पर पोल्ट्री और डेयरी उद्योग के लिए उपलब्ध चारे की लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर अंडे, चिकन और दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका है।

    चीनी उद्योग पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। गन्ने से बनने वाली चीनी का एक हिस्सा यदि एथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है तो भविष्य में चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव की स्थिति बन सकती है। इसी वजह से एथेनॉल नीति को केवल ईंधन की जरूरत के नजरिये से नहीं, बल्कि खाद्य आपूर्ति और कृषि बाजार के व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत बताई जा रही है।

    जल संसाधनों को लेकर भी सवाल उठाया गया है। गन्ने की खेती में बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए गन्ने की खेती बढ़ने पर भूजल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। नागेश्वरन का कहना है कि एथेनॉल नीति का मूल्यांकन करते समय केवल कारखानों में इस्तेमाल होने वाले पानी का हिसाब पर्याप्त नहीं है। फसल उगाने में इस्तेमाल होने वाले भूजल को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

    सरकार की ओर से E20 नीति को लगातार समर्थन मिलता रहा है। नीति के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि एथेनॉल मिश्रण बढ़ने से कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिलती है और किसानों को अपनी उपज के लिए अतिरिक्त बाजार मिलता है। वाहनों पर E20 के प्रभाव को लेकर किए गए परीक्षणों में बड़े पैमाने पर इंजन क्षति के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलने की बात भी सामने आई है।

    हालांकि E10 और E20 दोनों को समानांतर रूप से उपलब्ध कराने पर भंडारण, परिवहन और वितरण व्यवस्था की अतिरिक्त लागत का मुद्दा उठता है। अलग-अलग मिश्रण वाले पेट्रोल की उपलब्धता के लिए ईंधन आपूर्ति व्यवस्था में अतिरिक्त प्रबंधन की जरूरत पड़ सकती है।

    एथेनॉल मिश्रण को लेकर मौजूदा बहस का मूल सवाल यही है कि ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता कम करने के साथ वाहन मालिकों, खाद्य कीमतों, किसानों और जल संसाधनों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। E30 की दिशा में आगे बढ़ने से पहले इन पहलुओं का व्यापक मूल्यांकन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं पुराने वाहनों के लिए E10 उपलब्ध रखने का सुझाव मौजूदा नीति में व्यावहारिक विकल्प को लेकर नई चर्चा को जन्म दे रहा है।

  • E20 पेट्रोल को लेकर AAP का विरोध तेज, केजरीवाल बोले- सरकार नीति नहीं बदलेगी तो होगा राष्ट्रीय आंदोलन

    E20 पेट्रोल को लेकर AAP का विरोध तेज, केजरीवाल बोले- सरकार नीति नहीं बदलेगी तो होगा राष्ट्रीय आंदोलन

    नई दिल्ली । पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण यानी ई20 ईंधन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार से इस नीति पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा है कि यदि फैसला वापस नहीं लिया गया तो देशभर में आंदोलन शुरू किया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि पुराने वाहनों में ई20 पेट्रोल के इस्तेमाल को लेकर लोगों की चिंताओं का अब तक स्पष्ट समाधान नहीं किया गया है।

    एक प्रेस वार्ता के दौरान केजरीवाल ने दावा किया कि उन्होंने देश की 29 ऑटोमोबाइल कंपनियों से यह पूछा था कि क्या वर्ष 2023 से पहले निर्मित वाहनों में ई20 पेट्रोल का उपयोग पूरी तरह सुरक्षित है। उनका कहना था कि इस संबंध में किसी भी कंपनी ने उन्हें लिखित जवाब नहीं दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनियां इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट रुख अपनाने से बच रही हैं।

    उन्होंने कहा कि वाहन मालिकों के मन में कई व्यावहारिक सवाल हैं, जिनका जवाब मिलना जरूरी है। यदि ई20 पेट्रोल के उपयोग से किसी वाहन में तकनीकी खराबी आती है या माइलेज प्रभावित होता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, इस पर सरकार और वाहन निर्माता कंपनियों को स्पष्ट स्थिति बतानी चाहिए। उनके अनुसार लाखों उपभोक्ताओं को अपने वाहनों के लिए उपयुक्त ईंधन की जानकारी पाने का अधिकार है।

    केजरीवाल ने यह भी दावा किया कि कई ऑटोमोबाइल कंपनियों के अधिकारियों से उनकी फोन पर बातचीत हुई, जिसमें ई20 ईंधन से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर चर्चा हुई। हालांकि उन्होंने किसी कंपनी का नाम सार्वजनिक नहीं किया। उनका आरोप था कि कंपनियां इस विषय पर खुलकर अपनी राय रखने से बच रही हैं।

    आम आदमी पार्टी प्रमुख ने ई20 नीति को लेकर व्यापक सार्वजनिक चर्चा की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर लोगों की राय जानने और विशेषज्ञों के विचार सामने लाने के लिए एक टाउनहॉल कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कार्यक्रम के आयोजन में प्रशासनिक स्तर पर बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं।

    प्रेस वार्ता के दौरान केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे अपील करते हुए कहा कि सरकार को जनता की चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने का अधिकार है और किसी भी नीति पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ई20 नीति पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को लेकर देशव्यापी जनआंदोलन शुरू करेगी।

    ई20 नीति का उद्देश्य पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना और वैकल्पिक ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना है। हालांकि इसके प्रभाव को लेकर विभिन्न पक्षों की ओर से अलग-अलग राय सामने आती रही है। इसी बीच केजरीवाल के बयान के बाद इस विषय पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

    अब इस मुद्दे पर केंद्र सरकार, ऑटोमोबाइल कंपनियों और अन्य संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि ई20 नीति को लेकर उठाए गए सवालों और आंदोलन की चेतावनी का आगे क्या असर पड़ता है।