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  • हीटवेव ने बढ़ाई ठंडी हवा की मांग, 80% घर अब भी बिना AC, फिर भी यूरोप में एयर कंडीशनर बाजार ने पकड़ी रिकॉर्ड रफ्तार

    हीटवेव ने बढ़ाई ठंडी हवा की मांग, 80% घर अब भी बिना AC, फिर भी यूरोप में एयर कंडीशनर बाजार ने पकड़ी रिकॉर्ड रफ्तार

    नई दिल्ली । लगातार बढ़ते तापमान और बार-बार पड़ रही भीषण हीटवेव ने यूरोप में रहने के तौर-तरीकों को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है। लंबे समय तक ऐसा माना जाता रहा कि यूरोप की जलवायु एयर कंडीशनर पर निर्भर रहने वाली नहीं है, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। रिकॉर्ड स्तर की गर्मी ने न केवल लोगों की दिनचर्या प्रभावित की है, बल्कि एयर कंडीशनिंग उद्योग के लिए भी नए अवसर पैदा कर दिए हैं। यही वजह है कि दुनिया के सबसे कम एसी उपयोग वाले क्षेत्रों में शामिल यूरोप अब सबसे तेज़ी से बढ़ते एयर कंडीशनर बाजार के रूप में उभर रहा है।

    यूरोप के अधिकांश देशों में दशकों तक गर्मियों का मौसम अपेक्षाकृत हल्का रहा। इसी कारण यहां के घरों, कार्यालयों और सार्वजनिक भवनों का निर्माण ठंडी जलवायु को ध्यान में रखकर किया गया। मोटी दीवारें, सीमित वेंटिलेशन और गर्मी को भीतर रोकने वाली संरचनाएं पहले उपयोगी थीं, लेकिन बदलती जलवायु में यही डिज़ाइन अब बड़ी चुनौती बन गए हैं। लगातार बढ़ती गर्मी के बीच घरों के भीतर तापमान लंबे समय तक बना रहता है, जिससे लोगों के लिए सामान्य जीवन भी कठिन हो जाता है।

    यूरोप के करीब 80 प्रतिशत घरों में आज भी एयर कंडीशनर उपलब्ध नहीं हैं। इसके पीछे ऐतिहासिक जलवायु, ऊंची बिजली दरें, महंगा इंस्टॉलेशन, पुराने भवनों पर निर्माण संबंधी प्रतिबंध और पर्यावरण संरक्षण जैसी कई वजहें रही हैं। कई देशों में ऐतिहासिक इमारतों पर बाहरी एसी यूनिट लगाने की अनुमति भी नहीं मिलती, जिससे नई व्यवस्था स्थापित करना आसान नहीं होता।

    हालांकि पिछले कुछ वर्षों में लगातार रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने लोगों की सोच बदल दी है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों में गर्मियों के दौरान तापमान कई बार 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। ऐसे हालात में एयर कंडीशनर अब विलासिता नहीं बल्कि स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी आवश्यकता के रूप में देखा जाने लगा है। इसी बदलाव ने पूरे यूरोप में एसी की मांग को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है।

    बाजार में इस परिवर्तन का असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। रिटेल स्टोर, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां लगातार बढ़ती मांग का सामना कर रही हैं। कई स्थानों पर स्टॉक तेजी से समाप्त हो रहे हैं और पोर्टेबल एयर कंडीशनर, कूलिंग डिवाइस तथा पंखों की बिक्री में कई गुना वृद्धि दर्ज की जा रही है। निर्माताओं ने भी यूरोपीय बाजार के लिए विशेष मॉडल तैयार करने शुरू कर दिए हैं, ताकि बदलती जरूरतों के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध कराए जा सकें।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा जलवायु रुझान जारी रहे तो आने वाले वर्षों में यूरोप में एयर कंडीशनर की संख्या कई गुना बढ़ सकती है। हालांकि इसके साथ ऊर्जा खपत, बिजली आपूर्ति और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर बहस भी तेज हो रही है। एक वर्ग का मानना है कि भीषण गर्मी से लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, जबकि दूसरा पक्ष ऊर्जा दक्ष भवनों और टिकाऊ कूलिंग तकनीकों को अधिक उपयुक्त समाधान मानता है।

    बदलते मौसम ने स्पष्ट कर दिया है कि यूरोप अब केवल ठंडी जलवायु वाला महाद्वीप नहीं रह गया है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने वहां रहने की परिस्थितियों को तेजी से बदला है और एयर कंडीशनर उद्योग को अभूतपूर्व विस्तार का अवसर दिया है। आने वाले वर्षों में कूलिंग तकनीक, ऊर्जा दक्षता और टिकाऊ निर्माण मॉडल यूरोप की नई शहरी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की संभावना है।

  • एशिया से लेकर यूरोप तक…. रिकॉर्डतोड़ गर्मी से लोग परेशान….ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन में भी लू का कहर

    एशिया से लेकर यूरोप तक…. रिकॉर्डतोड़ गर्मी से लोग परेशान….ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन में भी लू का कहर


    नई दिल्ली।
    दुनिया इस समय भीषण गर्मी (Extreme heat) और लगातार बढ़ते तापमान की चुनौती का सामना कर रही है। भारत (India) में जहां कई राज्यों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच रहा है, वहीं यूरोप, एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी रिकॉर्डतोड़ गर्मी (Record Breaking Heat) ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो (El Niño) और जलवायु परिवर्तन (Climate change) के कारण हीटवेव (Heatwaves) अब पहले से ज्यादा खतरनाक, लंबी और जल्दी आने लगी हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, जो गर्मी पहले जून-जुलाई में देखने को मिलती थी, अब वह मई महीने में ही रिकॉर्ड तोड़ रही है। कई देशों में स्कूलों, खेल आयोजनों और सार्वजनिक गतिविधियों पर असर पड़ा है। कुछ जगहों पर मौतों और स्वास्थ्य संकट की घटनाएं भी सामने आई हैं।


    ब्रिटेन में गर्मी ने तोड़े पुराने रिकॉर्ड

    ब्रिटेन में मई महीने का अब तक का सबसे गर्म दिन रिकॉर्ड किया गया। देश के मौसम विभाग के अनुसार लंदन के क्यू गार्डन्स में तापमान 34.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसने 1922 और 1944 के पुराने रिकॉर्ड को तोड़ दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी गर्मी आमतौर पर जुलाई या अगस्त में देखने को मिलती है, लेकिन इस बार मई में ही लोगों को झुलसा देने वाली गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। गर्मी से बचने के लिए लोग पार्कों, फव्वारों और स्विमिंग पूल का सहारा लेते नजर आए।


    फ्रांस में 350 से ज्यादा शहरों में तापमान का रिकॉर्ड टूटा

    फ्रांस में भी स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। देश के 350 से ज्यादा शहरों में मई महीने के तापमान के रिकॉर्ड टूट गए हैं। कई इलाकों में तापमान 37 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया। सरकार ने कई क्षेत्रों में हाई टेम्परेचर अलर्ट जारी किया है और लोगों को दोपहर के समय घरों में रहने की सलाह दी गई है। पेरिस में एक रनिंग इवेंट के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अधिकारियों का मानना है कि तेज गर्मी इसका एक बड़ा कारण हो सकती है।


    स्पेन में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पहुंचने का अनुमान

    स्पेन भी इस समय भीषण हीटवेव का सामना कर रहा है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। हालात ऐसे हैं कि रात में भी तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं जा रहा, जिससे लोगों को राहत नहीं मिल रही। विशेषज्ञों के मुताबिक यह स्थिति स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है, खासकर बुजुर्गों और बच्चों के लिए।


    वियतनाम में हाल बेहाल

    एशिया में वियतनाम भी गर्मी की मार झेल रहा है। कई इलाकों में तापमान 39 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। मौसम विभाग ने हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ने की चेतावनी दी है। लोगों को दोपहर 10 बजे से शाम 4 बजे तक घर से बाहर न निकलने की सलाह दी गई है।


    इन देशों में भी गर्मी का कहर

    थाईलैंड – बैंकॉक और अन्य इलाकों में अत्यधिक गर्मी के कारण स्वास्थ्य अलर्ट जारी किए गए हैं।
    फिलीपींस – स्कूलों को ऑनलाइन मोड में चलाने तक की नौबत आई क्योंकि तापमान बेहद ज्यादा बढ़ गया।
    मेक्सिको – लगातार हीटवेव के कारण कई राज्यों में लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं।
    चीन – उत्तरी और मध्य चीन के कई हिस्सों में रिकॉर्डतोड़ गर्मी दर्ज की गई है।
    पाकिस्तान – सिंध और पंजाब के कई इलाकों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच चुका है।


    क्या है भारत का हाल?

    देश में नौतपा के पहले दिन सोमवार को उत्तर-पश्चिम से लेकर मध्य भारत तक प्रचंड गर्मी के साथ उमस से लोग बेहाल रहे। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में चिलचिलाती धूप के साथ गर्म लू चलती रही। दिन के साथ रातें भी गर्म रहीं। अभी 4-5 दिन झुलसा देने वाली गर्मी के आसार हैं। वहीं तमिलनाडु में मौसम ने एक बार फिर करवट ली है। चेन्नई स्थित क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (RMC) ने मंगलवार को राज्य के आठ जिलों में भारी बारिश की संभावना जताई है। मौसम विभाग के अनुसार बंगाल की खाड़ी से दक्षिण-पूर्व अरब सागर तक बने वायुमंडलीय परिसंचरण तंत्र का असर राज्य के कई हिस्सों में देखने को मिलेगा।

  • यूरोप में बढ़ता जलवायु संकट: रिकॉर्ड गर्मी और हीटवेव का खतरा, WMO ने जारी किया अलर्ट

    यूरोप में बढ़ता जलवायु संकट: रिकॉर्ड गर्मी और हीटवेव का खतरा, WMO ने जारी किया अलर्ट


    नई दिल्ली । यूरोप में जलवायु परिवर्तन की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है और ताजा रिपोर्ट्स ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया है विश्व मौसम विज्ञान संगठन और कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है जहां तापमान वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार से हो रही है

    डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने यूरोपियन स्टेट ऑफ द क्लाइमेट रिपोर्ट 2025 पेश करते हुए कहा कि 1980 के बाद से यूरोप में तापमान में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह स्थिति अब पर्यावरण से लेकर मानव जीवन तक हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हालात और भयावह हो सकते हैं

    रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में यूरोप के लगभग 95 प्रतिशत हिस्से में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया गया इसमें मेडिटेरेनियन क्षेत्र से लेकर आर्कटिक सर्कल तक लंबे समय तक गर्मी का असर बना रहा कई क्षेत्रों में रिकॉर्ड हीटवेव देखने को मिली खासतौर पर सब आर्कटिक क्षेत्र फेनोस्कैंडिया में जुलाई के महीने में लगातार 21 दिन तक हीटवेव चली जो अब तक की सबसे लंबी और गंभीर मानी जा रही है

    स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आर्कटिक सर्कल के आसपास तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया जो सामान्य परिस्थितियों में बेहद असामान्य है इसके अलावा बढ़ती गर्मी और सूखे हालात ने जंगल की आग के खतरे को भी कई गुना बढ़ा दिया है रिपोर्ट के अनुसार 2025 में यूरोप में लगभग 1.034 मिलियन हेक्टेयर जमीन आग की चपेट में आई जो साइप्रस देश के कुल क्षेत्रफल से भी ज्यादा है

    जंगल की आग के कारण उत्सर्जन में भी भारी वृद्धि हुई है जिसमें स्पेन का योगदान सबसे अधिक रहा इस तरह की घटनाओं ने न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है बल्कि जैव विविधता पर भी गंभीर प्रभाव डाला है समुद्री हीटवेव के कारण भूमध्य सागर में सीग्रास जैसे संवेदनशील इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है वहीं पीटलैंड क्षेत्रों में आग लगने से कार्बन उत्सर्जन और बढ़ गया है

    जलवायु परिवर्तन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल रहा है Food and Agriculture Organization और डब्ल्यूएमओ की संयुक्त रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक गर्मी वैश्विक खाद्य प्रणाली को प्रभावित कर रही है जिससे एक अरब से ज्यादा लोग जोखिम में आ सकते हैं इसके अलावा हीट स्ट्रेस के कारण हर साल दुनिया भर में लगभग 500 अरब काम के घंटे का नुकसान हो रहा है

    विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की समस्या बन चुका है और इससे निपटने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की जरूरत है यूरोपीय देशों ने 2030 और 2050 के लिए कई लक्ष्य तय किए हैं लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन प्रयासों की गति को और तेज करने की आवश्यकता है कुल मिलाकर यह रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी है कि यदि दुनिया ने अभी कदम नहीं उठाए तो जलवायु संकट आने वाले समय में और भी विनाशकारी रूप ले सकता है

  • यूरोप का ब्रिक्स को लेकर भारत से दूरी बनाना बड़ी भूल थी… जर्मन विदेश मंत्री ने जयशंकर के सामने स्वीकारी गलती

    यूरोप का ब्रिक्स को लेकर भारत से दूरी बनाना बड़ी भूल थी… जर्मन विदेश मंत्री ने जयशंकर के सामने स्वीकारी गलती


    नई दिल्ली।
    जर्मनी (Germany) के विदेश मंत्री जोहान वेडफुल (Foreign Minister Johan Wadephul) ने भारत को लेकर यूरोप की रणनीति में की गई गलती को स्वीकार किया है। उन्होंने माना कि यूरोप ने उस वक्त गलती की थी, जब उसने उभरती वैश्विक शक्तियों को केवल ब्रिक्स देशों (BRICS Countries) के ढांचे में होने की वजह से दूरी बनाई थी। उन्होंने कहा कि यह तरीका गलत था, इस नीति की वजह से भारत जैसे देशों के साथ अनावश्यक रूप से दूरी बन गई थी।

    म्यूनिक सुरक्षा सम्मलेन में विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ मिलकर एक इंटरव्यू दे रहे वेडफुल ने यूरोप की बदलती रणनीति का भी जिक्र किया। वेडफुल ने कहा कि यूरोप अब इन देशों के साथ अपने रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। भारत और ब्राजील जैसे साझेदार देशों के साथ साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और समान हितों पर अधिक ध्यान दे रहा है। यूरोप अब मानता है कि भारत जैसे देशों के साथ उनके रिश्ते अब केवल इसलिए प्रभावित नहीं होने चाहिए, क्योंकि भारत रूस और चीन के किसी समूह का सदस्य है।


    चीन और रूस के साथ तनाव

    वेडफुल ने यहां पर रूस और चीन के साथ यूरोप के तनाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि मॉस्को के साथ यूरोप का तनाव बहुत बुनियादी है। इसके अलावा चीन के साथ भी मतभेद हैं। उन्होंने कहा, “भारत और ब्राजील जैसे देशोंके साथ हमारे कई साझा हित और मूल्य हैं। क्यों न हम इन साझा हितों और मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करें। चीन और रूस के साथ हमारे मतभेद हैं, वह अलग बात है।”


    भारत, चीन से अलग साझेदार

    वेडफुल ने कहा कि चीन की तुलना में भारत की स्थिति एक विशिष्ट साझेदार के रूप में है। दोनों देशों के आपसी संबंधों में भरोसे को उजागर करते हुए उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि भारत कहां खड़ा है, वह भरोसेमंद है, हम उन पर भरोसा कर सकते हैं, और शायद वह भी हम पर भरोसा कर सकते हैं।” बकौल वेडफुल वैश्विक राजनीति में भारत चीन से ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद साथी है।

    इसके इतर जर्मन विदेश मंत्री ने भारत और जर्मनी के साझा मूल्यों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, “हम दोनों ही लोकतंत्र हैं, हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। हमारे यहां कानून का शासन है और हमारे लिए यह बहुत मायने रखता है।”

    आपको बता दें, अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप का शासन आने के बाद से यूरोप अपनी वैश्विक रणनीति में बदलाव करता नजर आया है। पहले अमेरिका का पिछलग्गू बनकर यूरोप के देश अपनी विदेश नीति को अमेरिका को केंद्र में रखकर बनाते थे। लेकिन ट्रंप के आने और फिर यूरोपीय देशों के साथ उनके सलूक को देखते हुए यूरोपीय देश अब दूसरे विकल्पों की तरफ देखने लगे हैं। एक मजबूत और लोकतांत्रिक साझेदार के रूप में भारत उनकी सभी जरूरतों को पूरा करता है, इसकी वजह से यूरोपीय देश लगातार भारत के करीब आने की कोशिश में लगे हुए हैं।

    हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच में हुआ व्यापारिक समझौता इस बात का उदाहरण है। यह समझौता कई वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ था। लेकिन अब यह समझौता हो चुका है और यूरोपीय देशों में यह जीत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते से भारत को ज्यादा फायदा होगा।

  • ग्रीनलैंड को लेकर लामबंद होने लगा यूरोप, सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर जोर…

    ग्रीनलैंड को लेकर लामबंद होने लगा यूरोप, सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर जोर…


    लंदन।
    यूरोपीय देशों का एक समूह ग्रीनलैंड (European Countries group Greenland) में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की योजना पर चर्चा कर रहा है। इसकी अगुवाई यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) और जर्मनी (Germany) कर रहे हैं। ग्रुप का उद्देश्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) को यह संदेश देना है कि यूरोप और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) आर्कटिक सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं। साथ ही स्वयं-शासित डेनिश क्षेत्र ग्रीनलैंड को लेकर वाशिंगटन की कब्जे संबंधी धमकियों का भी जवाब देना इसका मकसद है।

    ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि जर्मनी आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक संयुक्त NATO मिशन प्रस्तावित करने जा रहा है। इस मिशन का नाम आर्कटिक सेंट्री रखा जा सकता है, जो बाल्टिक सागर में महत्वपूर्ण ठिकनों की रक्षा के लिए शुरू किए गए बाल्टिक सेंट्री मिशन की तर्ज पर होगा।


    यूरोपीय कूटनीतिक सक्रियता

    ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने सहयोगी देशों से हाई नॉर्थ यानी आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा उपस्थिति बढ़ाने की अपील की है। हाल के दिनों में उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज समेत कई नेताओं से इस मसले पर बातचीत की।

    यूरोपीय नेतृत्व का मानना है कि क्षेत्र में NATO की मजबूत और स्पष्ट भूमिका दिखाकर ट्रंप के उस तर्क को कमजोर किया जा सकता है, जिसके तहत वे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लेने की बात कर रहे हैं।

    ट्रंप के बयान और बढ़ती चिंता
    हाल की घटनाओं ने यूरोप की चिंता बढ़ा दी है। इस महीने अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने की कार्रवाई के बाद ट्रंप प्रशासन की आक्रामक बयानबाजी फिर चर्चा में आ गई। खासकर ग्रीनलैंड पर सैन्य बल के इस्तेमाल की संभावना ने सहयोगी देशों को अपने विकल्पों पर तेजी से काम करने को मजबूर किया है।

    रविवार रात ट्रंप ने दोहराया कि अमेरिका ग्रीनलैंड का मालिक बनेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका वहां मौजूद अपने सैन्य अड्डे पर फोर्स बढ़ा सकता है, लेकिन वास्तविक स्वामित्व जरूरी है। उनके मुताबिक, अगर अमेरिका ऐसा नहीं करता तो रूस या चीन कर सकते हैं- और यह उनके रहते नहीं होगा।

    NATO की भूमिका पर चर्चा
    इस बीच जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेफुल इस सप्ताह अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मुलाकात करेंगे। बातचीत में ग्रीनलैंड और आर्कटिक स्थिरता में NATO की भूमिका प्रमुख विषय होगी।

    वेडेफुल ने कहा- आर्कटिक की सुरक्षा लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। रूस और चीन के साथ पुराने और नए प्रतिद्वंद्वों को देखते हुए हमें NATO के भीतर मिलकर जिम्मेदारी निभाने के तरीकों पर चर्चा करनी चाहिए।


    ब्रिटेन बनाम फ्रांस का दृष्टिकोण

    सूत्रों के मुताबिक, स्टारमर का रुख यह है कि ब्रिटेन और यूरोप को अमेरिका के लिए अपनी ‘सॉफ्ट और हार्ड पावर’ की उपयोगिता दिखाकर ट्रंप को साथ लेना चाहिए- चाहे वह यूक्रेन युद्ध में रूस का प्रतिरोध हो या यूरोप के करीब अमेरिकी सुरक्षा हित। यह फ्रांस जैसे देशों की अपेक्षाकृत मुखर आलोचनात्मक लाइन से अलग है, जिन्होंने हाल ही में अमेरिकी दबाव से यूरोप के लिए खतरे की चेतावनी दी है। पिछले हफ्ते स्टारमर और ट्रंप के बीच हुई बातचीत में यूरो-अटलांटिक सुरक्षा और हाई नॉर्थ में रूस के बढ़ते आक्रामक रवैये को रोकने पर सहमति बनी।


    डेनमार्क की कूटनीतिक कोशिश

    उधर, डेनमार्क अब भी उम्मीद कर रहा है कि वॉशिंगटन की आगामी कूटनीतिक यात्रा से ट्रंप के रुख में नरमी आएगी। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री- लार्स लोके रासमुसेन और विवियन मोट्जफेल्ड्ट उन तथ्यात्मक भूलों और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए सुरक्षा दावों को चुनौती देने की तैयारी में हैं, जिनके आधार पर ग्रीनलैंड को लेकर बहस तेज हुई है। हालांकि ट्रंप ने सैन्य बल के इस्तेमाल से इंकार नहीं किया है, लेकिन रूबियो ने सांसदों से कहा कि उद्देश्य हस्तक्षेप नहीं, बल्कि ग्रीनलैंड को खरीदने का है- ताकि NATO की एकता पर सवाल न खड़े हों।