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  • हंगरी चुनाव में टिस्जा पार्टी की निर्णायक जीत पर पीएम मोदी ने दी बधाई..

    हंगरी चुनाव में टिस्जा पार्टी की निर्णायक जीत पर पीएम मोदी ने दी बधाई..


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हंगरी के संसदीय चुनावों में पीटर मग्यार और उनकी टिस्जा पार्टी की निर्णायक जीत पर उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए भारत और हंगरी के बीच मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों को और आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। यह चुनाव परिणाम हंगरी की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है, जहां लंबे समय से सत्ता में रही सरकार को हार का सामना करना पड़ा और देश में नई राजनीतिक दिशा का मार्ग प्रशस्त हुआ।

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कहा कि भारत और हंगरी के बीच संबंध सदैव गहरी मित्रता, साझा मूल्यों और आपसी सम्मान पर आधारित रहे हैं। उन्होंने नई सरकार के साथ मिलकर कार्य करने की इच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि भारत यूरोपीय संघ के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग के नए अवसरों को और अधिक गति मिलेगी।

    हंगरी के हालिया चुनावों में रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया, जो वहां की जनता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। परिणाम आने के बाद देश की राजनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है और सत्ता परिवर्तन को विशेषज्ञ यूरोपीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देख रहे हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार इस चुनाव परिणाम का प्रभाव केवल हंगरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर यूरोपीय संघ की नीतियों और वैश्विक राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। नए नेतृत्व से यह उम्मीद की जा रही है कि वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन और सहयोग को प्राथमिकता देगा।

    भारत और हंगरी के संबंध लंबे समय से स्थिर और सौहार्दपूर्ण रहे हैं। राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बावजूद दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग की निरंतरता बनी रही है। अब नई सरकार के गठन के साथ यह अपेक्षा की जा रही है कि व्यापार, तकनीक, शिक्षा और वैश्विक साझेदारी जैसे क्षेत्रों में संबंध और अधिक सुदृढ़ होंगे।

    प्रधानमंत्री मोदी के इस संदेश को दोनों देशों के बीच भविष्य में मजबूत कूटनीतिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

  • यूरोप में नए शक्ति संतुलन का उदय: फ्रांस से बढ़ी दूरी, इटली बना जर्मनी का नया 'पावर पार्टनर'

    यूरोप में नए शक्ति संतुलन का उदय: फ्रांस से बढ़ी दूरी, इटली बना जर्मनी का नया 'पावर पार्टनर'


    नई दिल्ली।द्वितीय विश्व युद्ध की राख से उबरकर जिस फ्रांस-जर्मनी की जोड़ी ने आधुनिक यूरोप की नींव रखी थी, आज वही ऐतिहासिक धुरी डगमगाती नजर आ रही है। बर्लिन और पेरिस के बीच बढ़ते कूटनीतिक गतिरोध ने यूरोपीय संघ (EU) के भीतर एक बड़े सत्ता परिवर्तन के संकेत दे दिए हैं। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच बढ़ती तल्खी ने अब जर्मनी को इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की ओर झुकने पर मजबूर कर दिया है। दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान चांसलर मर्ज के बयानों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अब यूरोप का संचालन पुराने ढर्रे पर नहीं बल्कि नए और अलग तरीके से होगा।

    इस दरार की सबसे बड़ी वजह आर्थिक और रक्षा रणनीतियों में विरोधाभास है। जर्मनी की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ प्रस्तावित ‘मर्कोसुर’ व्यापार समझौता संजीवनी की तरह है। इसके विपरीत राष्ट्रपति मैक्रों अपने देश के नाराज किसानों को शांत करने के लिए इस डील का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। फ्रांस को डर है कि सस्ते लैटिन अमेरिकी कृषि उत्पाद उसके घरेलू बाजार को बर्बाद कर देंगे। यह आर्थिक टकराव केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। रक्षा क्षेत्र के सबसे बड़े प्रोजेक्ट फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम FCAS को लेकर भी दोनों देश आमने-सामने हैं। फ्रांस जहां इस 100 अरब यूरो के फाइटर जेट प्रोजेक्ट पर अपना एकाधिकार और तकनीकी नियंत्रण चाहता है वहीं जर्मनी बराबरी की हिस्सेदारी और अपनी कंपनी एयरबस के लिए समान अधिकारों पर अड़ा है।

    इन्हीं मतभेदों के बीच इटली एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। मेलोनी और मर्ज के बीच न केवल वैचारिक तालमेल दिख रहा है बल्कि अमेरिका के प्रति उनके व्यवहारिक नजरिए ने भी उन्हें करीब लाया है। डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के साथ संबंधों को लेकर जहां फ्रांस आक्रामक रुख अपना सकता है वहीं जर्मनी और इटली मिलकर एक बैलेंस बनाने की कोशिश में हैं। 23 जनवरी को रोम में होने वाली इटली-जर्मनी शिखर बैठक इस नए गठजोड़ की आधिकारिक मुहर बन सकती है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि फ्रांस-जर्मनी के रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं होंगे लेकिन यूरोप के नेतृत्व का वह दौर अब बीत चुका है जहां सिर्फ पेरिस और बर्लिन की मर्जी चलती थी। अब यूरोप की राजनीति की नई पटकथा रोम के रास्तों से होकर गुजरेगी।