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  • कोफोर्ज के बोर्ड मूल्यांकन में सामने आई खामियों के बाद चेयरमैन ओपी भट्ट ने इस्तीफा दिया, शेयर करीब नौ प्रतिशत तक टूटा

    कोफोर्ज के बोर्ड मूल्यांकन में सामने आई खामियों के बाद चेयरमैन ओपी भट्ट ने इस्तीफा दिया, शेयर करीब नौ प्रतिशत तक टूटा

    नई दिल्ली । मिडकैप आईटी कंपनी कोफोर्ज के इंटरनल ऑडिट में बोर्ड मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर चिंताएं सामने आने के बाद कंपनी के नॉन-एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर और चेयरमैन ओपी भट्ट ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। भट्ट के इस्तीफे की जानकारी सामने आने के बाद बुधवार को कंपनी के शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिली और कारोबार के दौरान स्टॉक करीब नौ प्रतिशत तक नीचे चला गया।

    कारोबार के दौरान कोफोर्ज के शेयर ने 1,780.70 रुपये का इंट्राडे निचला स्तर दर्ज किया। यह स्तर कंपनी के पिछले बंद भाव 1,950 रुपये की तुलना में करीब 8.71 प्रतिशत कम था। हालांकि बाद में शेयर में कुछ सुधार दिखाई दिया। सुबह 10:45 बजे तक कोफोर्ज का शेयर 4.50 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 1,862 रुपये पर कारोबार कर रहा था।

    कंपनी की रेगुलेटरी फाइलिंग के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही के इंटरनल ऑडिट प्लान के तहत इंटरनल ऑडिटर ने बोर्ड इवैल्यूएशन प्रक्रिया की समीक्षा की। इसके साथ ही उस प्रक्रिया से तैयार की गई बोर्ड इवैल्यूएशन रिपोर्ट यानी बीईआर की भी जांच की गई। यह पूरी प्रक्रिया ओपी भट्ट की देखरेख में हुई थी।

    ऑडिट के दौरान बोर्ड के मूल्यांकन से संबंधित जानकारी को प्रोसेस करने और उसके डिस्क्लोजर से जुड़ी कुछ कमियां सामने आईं। इन कमियों में चेयरमैन के प्रदर्शन के मूल्यांकन से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जब बोर्ड इवैल्यूएशन रिपोर्ट को बोर्ड के सामने रखा गया, तब उसमें मौजूद या उससे संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां बोर्ड के सदस्यों के सामने पूरी तरह प्रस्तुत नहीं की गई थीं।

    इंटरनल ऑडिटर की रिपोर्ट सामने आने के बाद बोर्ड ने ओपी भट्ट से इस मामले को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। भट्ट ने अपने पक्ष का बचाव करते हुए कहा कि बोर्ड के मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौरान उन्होंने नेक नीयत से काम किया था। हालांकि, बोर्ड की ओर से उनके स्पष्टीकरण की समीक्षा पूरी होने और मामले पर कोई अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया।

    ओपी भट्ट ने 8 सितंबर को अपने पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद कंपनी ने मौजूदा नॉन-एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर विवेक शर्मा को अंतरिम चेयरमैन नियुक्त किया है। यह नियुक्ति 31 जनवरी, 2027 तक प्रभावी रहेगी।

    कंपनी के अनुसार, ओपी भट्ट वॉकहार्ट लिमिटेड के इंडिपेंडेंट डायरेक्टर भी हैं। वहां वह ऑडिट, स्टेकहोल्डर्स रिलेशनशिप और कैपिटल जुटाने से संबंधित कमेटियों के सदस्य के तौर पर जुड़े हुए हैं। इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद कोफोर्ज के शेयर में आई तेज गिरावट ने बाजार में तत्काल प्रतिक्रिया को स्पष्ट किया।

  • श्रीनिवासन की सिनेमाई दुनिया: मलयालम सिनेमा की 6 अविस्मरणीय फिल्में

    श्रीनिवासन की सिनेमाई दुनिया: मलयालम सिनेमा की 6 अविस्मरणीय फिल्में


    नई दिल्ली । मलयालम सिनेमा के प्रमुख अभिनेता लेखक और निर्देशक स्रीनिवासन का 69 साल की उम्र में निधन हो गया। 40 वर्षों से अधिक समय तक केरल की संस्कृति और सिनेमा को आकार देने वाले स्रीनिवासन ने अपने करियर में 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया और कई महत्वपूर्ण फिल्मों की पटकथा लिखी। उनके किरदार और संवाद आज भी मलयाली समाज और सिनेमा प्रेमियों की यादों में बसे हुए हैं। ‘नाडोडिकट्टु’ ‘संदेशम’ ‘वडक्कुनोक्की यंत्रम’ और ‘उदयाननु तरम’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने समाज की hypocrisies और व्यंग्य को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया। उनके काम ने 1980 से 2010 तक केरल की मध्यम वर्गीय जीवनशैली और राजनीतिक-सामाजिक परिवेश को गहराई से छुआ।

    6 क्लासिक फिल्में और उनका प्रभाव

    संदेशम 1991 में स्रीनिवासन ने केरल की राजनीति पर व्यंग्यपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जो आज भी प्रासंगिक है। नाडोडिकट्टु 1987 में बेरोजगारी और खाड़ी देशों में प्रवास की समस्या को हास्यपूर्ण अंदाज में दिखाया गया। वडक्कुनोक्की यंत्रम 1989 में उन्होंने थलाथिल दिनेशन का किरदार निभाकर आम आदमी की जटिलताओं और असुरक्षाओं को पर्दे पर उतारा। वरवेल्पु 1989 में खाड़ी से लौटे व्यवसायियों की कठिनाइयों और सामाजिक दबावों को दिखाया। चिंथाविष्टयाया श्यामला 1998 में मध्यवर्गीय महिला की चुनौतियों और पति की बेरोजगारी पर प्रकाश डाला। वहीं पोंमोट्टा इडुन्ना थारवु 1988 में मानवीय संबंधों और लालच की जटिलताओं को बेहद सजीव ढंग से पेश किया गया।

    स्रीनिवासन ने न केवल अभिनय किया बल्कि मलयालम समाज की मानसिकता राजनीतिक और आर्थिक जटिलताओं को पर्दे पर उतारकर लोगों को सोचने पर मजबूर किया। उनके संवाद और किरदार आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा हैं। उनकी फिल्में जैसे ‘संदेशम’ ‘नाडोडिकट्टु’ और ‘वडक्कुनोक्की यंत्रम’ पीढ़ियों तक याद रखी जाएंगी और उन्हें मलयालम सिनेमा के सबसे प्रभावशाली हस्तियों में हमेशा याद किया जाएगा।