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  • पाकिस्तान में फ्रांसीसी महिला से दरिंदगी के दोषियों को होगी फांसी: उच्च न्यायालय ने खारिज की अपील, वैश्विक स्तर पर न्यायिक कड़ेपन का समर्थन

    पाकिस्तान में फ्रांसीसी महिला से दरिंदगी के दोषियों को होगी फांसी: उच्च न्यायालय ने खारिज की अपील, वैश्विक स्तर पर न्यायिक कड़ेपन का समर्थन

    नई दिल्ली। पाकिस्तान की न्यायपालिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित और संवेदनशील ‘लाहौर मोटरवे सामूहिक दुष्कर्म मामले’ में एक अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। लाहौर उच्च न्यायालय (LHC) ने इस बर्बर कांड के दो मुख्य दोषियों, आबिद अली और शफकत अली की फांसी की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। दोनों दोषियों ने साल 2021 में आतंकवाद निरोधी अदालत (ATC) द्वारा दी गई मौत की सजा के खिलाफ उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने अभियोजन पक्ष के पुख्ता सबूतों के आलोक में सिरे से खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अब दोनों अपराधियों की मौत की सजा का क्रियान्वयन तय माना जा रहा है, जिसने वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकारों और महिला सुरक्षा से जुड़े संगठनों का ध्यान आकर्षित किया है।

    यह अत्यंत क्रूर और खौफनाक घटना 9 सितंबर 2020 की है, जब पाकिस्तानी मूल की एक फ्रांसीसी महिला अपने तीन मासूम बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे पर कार से यात्रा कर रही थी। देर रात अचानक कार का ईंधन समाप्त हो जाने के कारण उनका परिवार सुनसान सड़क के किनारे असहाय स्थिति में फंस गया था। महिला अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार के दरवाजे बंद कर भीतर ही मदद की प्रतीक्षा कर रही थी। इसी दौरान हथियारों से लैस हमलावरों ने वाहन की खिड़की का शीशा तोड़कर महिला को जबरन बाहर घसीट लिया और उसके ही रोते-बिलखते बच्चों के सामने बंदूक की नोक पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य वारदात को अंजाम दिया। अपराधी वहां से भागने से पहले पीड़ित परिवार से नकदी, आभूषण और बैंक कार्ड भी लूट ले गए थे।

    इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद पूरे पाकिस्तान में जनाक्रोश भड़क उठा था और कार्यस्थलों तथा सार्वजनिक मार्गों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कानूनों की मांग को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे। जनभावनाएं उस समय और अधिक उग्र हो गई थीं, जब तत्कालीन लाहौर पुलिस प्रमुख उमर शेख ने प्रशासनिक विफलता को छुपाने के लिए उल्टा पीड़िता के समय और मार्ग चयन पर ही अनुचित सवाल खड़े कर दिए थे। हालांकि, बढ़ते दबाव के बीच पुलिस प्रशासन ने अपराधियों को पकड़ने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक अभियान चलाया। जांचकर्ताओं ने अत्याधुनिक मोबाइल फोन डेटा विश्लेषण और घटनास्थल से एकत्र किए गए डीएनए नमूनों की सहायता से आरोपियों को दबोचा था। बाद में न्यायिक कार्यवाही के दौरान पीड़िता ने भी दोनों की पहचान की थी और एक आरोपी ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।

    उच्च न्यायालय में अपील की सुनवाई के दौरान दोषियों के विधिक सलाहकारों ने दलील दी थी कि जांच एजेंसी की प्रक्रिया में कई तकनीकी कमियां हैं और साक्ष्य पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं। इसके विपरीत, सरकारी वकीलों ने अदालत के समक्ष अकाट्य वैज्ञानिक (डीएनए) और तकनीकी (सेलुलर लोकेशन) प्रमाण प्रस्तुत किए, जो सीधे तौर पर अपराधियों की अपराध स्थल पर उपस्थिति और संलिप्तता को प्रमाणित करते थे। उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के तर्कों को वैध मानते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत का फैसला पूर्णतः न्यायसंगत था। इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रसिद्ध वैश्विक उद्यमी और टेस्ला प्रमुख एलन मस्क ने भी सोशल मीडिया पर ‘शाबाश पाकिस्तान’ लिखते हुए न्यायिक कड़ेपन की सराहना की और कहा कि पश्चिमी देशों को भी हिंसक अपराधों के खिलाफ ऐसे ही कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है।

  • ईरान में खामेनेई के खिलाफ आवाज उठाने वाले इरफान सोलतानी को फांसी की सजा की तैयारी, कानूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल

    ईरान में खामेनेई के खिलाफ आवाज उठाने वाले इरफान सोलतानी को फांसी की सजा की तैयारी, कानूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल


    नई दिल्ली । ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के बीच एक और खौफनाक खबर सामने आई है। 26 वर्षीय इरफान सोलतानी जिन्होंने खामेनेई के खिलाफ 8 जनवरी को हुए प्रदर्शन में भाग लिया था अब उन्हें फांसी की सजा दिए जाने की तैयारी है। सोलतानी को 14 जनवरी को फांसी दी जा सकती है और उनके मामले को लेकर मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में गहरी चिंता जताई जा रही है।

    इरफान सोलतानी जो तेहरान के पास कराज शहर के फर्दीस इलाके के निवासी हैं, को खामेनेई के खिलाफ प्रदर्शन करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद से उन्हें किसी भी प्रकार की कानूनी सहायता का अवसर नहीं दिया गया। वे बिना वकील से मिले ही अपनी सजा का सामना करने के लिए मजबूर हो गए हैं। उनका परिवार भी इस मामले से पूरी तरह अज्ञात रखा गया है और उन्हें इस बारे में कोई महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी गई। 11 जनवरी को जब सोलतानी के परिवार को उनकी मौत की सजा के बारे में सूचित किया गया, तब भी उन्हें केवल 10 मिनट की मुलाकात करने की अनुमति दी गई।

    सोलतानी की बहन जो खुद एक लाइसेंस प्राप्त वकील हैं ने कानूनी तरीके से अपने भाई की सजा को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन उन्हें केस की फाइल तक देखने और अपने भाई का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं दी गई। यह मामले की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है। इसके अलावा लेबनानी-ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी मारियो नॉफाल ने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि ईरान में अब तक 2,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और सरकार इन विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए डर का माहौल बना रही है।

    तेज ट्रायल और सख्त दंड की प्रक्रिया ईरान में बढ़ते विरोधों को दबाने के लिए अपनाई जा रही है। इजरायल और अमेरिका आधारित न्यूज आउटलेट जफीड के मुताबिक सोलतानी का मामला आने वाली सख्त सजाओं का संकेत हो सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान सरकार इस तरह के मामलों के माध्यम से आगे के प्रदर्शनों को रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई कर रही है। नॉर्वे में पंजीकृत कुर्द मानवाधिकार संगठन हेंगॉ ने भी इस मामले की कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और पारदर्शिता की कमी पर चिंता व्यक्त की है।

    ईरान में खामेनेई के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला पिछले 16 दिनों से जारी है। इन प्रदर्शनों में अब तक 544 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 8 बच्चे भी शामिल हैं। इस दौरान 10,681 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। तेहरान में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि हॉस्पिटल के बाहर शवों का ढेर लगा हुआ है, और लोग अपने परिजनों के शवों की तलाश कर रहे हैं। ईरान की सरकार की यह कठोर कार्रवाई और नफरत से भरी नीति विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए उठाए गए कदमों का हिस्सा है, लेकिन इनका परिणाम केवल और अधिक हिंसा और रक्तपात हो सकता है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ईरान में इस तरह की कार्रवाई केवल सत्ता की तानाशाही को मजबूत करने के लिए की जा रही है।