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  • MP: बांधवगढ़ रिजर्व में मानसून में शुरू हुआ प्रयोग हुआ हिट… 100 दिनों में पहुंचे 3780 पर्यटक

    MP: बांधवगढ़ रिजर्व में मानसून में शुरू हुआ प्रयोग हुआ हिट… 100 दिनों में पहुंचे 3780 पर्यटक


    उमरिया।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के विश्व प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व (Bandhavgarh Tiger Reserve) में वन्यजीव पर्यटन (Wildlife tourism) को लेकर सैलानियों का उत्साह लगातार चरम पर है. कोर जोन के साथ-साथ अब बफर जोन पर्यटन (Bandhavgarh Buffer Zone Safari) भी भारी लोकप्रियता हासिल कर रहा है. मानसून के दौरान जब कोर जोन में सफारी पूरी तरह बंद रहती है, तब बफर क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियां शुरू की गई थीं. यह प्रयोग इतना सफल रहा कि चालू पर्यटन सत्र (2026-27) के शुरुआती 100 दिनों के भीतर परासी और पचपेड़ी बफर जोन में 3,780 पर्यटकों ने जंगल सफारी का आनंद लिया।

    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1 जुलाई से 8 अक्टूबर तक कुल 802 वाहनों के माध्यम से पर्यटकों ने बफर जोन का भ्रमण किया. इसमें 3,758 भारतीय और 22 विदेशी पर्यटक शामिल रहे।

    परासी बफर जोन: यहां 550 वाहनों से 2,588 पर्यटकों ने भ्रमण किया. पचपेड़ी बफर जोन: यहां 252 वाहनों के जरिए 1,192 पर्यटक जंगल सफारी के लिए पहुंचे। महीनेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो जुलाई में 243 वाहनों से 1,109, अगस्त में 265 वाहनों से 1,247 और सितंबर में 168 वाहनों से 780 पर्यटक आए. वहीं 1 से 8 अक्टूबर के दौरान 126 वाहनों से 644 सैलानी बफर जोन पहुंचे. पूरी अवधि में अगस्त माह में सबसे अधिक सैलानियों का आगमन दर्ज किया गया.


    प्राकृतिक परिवेश में बाघों के दीदार और स्थानीय रोजगार

    बफर जोन में पर्यटकों को बाघ (टाइगर) सहित अन्य दुर्लभ वन्यप्राणियों के उनके प्राकृतिक परिवेश में नियमित दीदार हो रहे हैं. कोर जोन खुलने के बाद भी बफर जोन के प्रति पर्यटकों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। बफर क्षेत्र में पर्यटन संचालन का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय आदिवासी और आसपास के समुदायों को मिला है. जिप्सी संचालन, गाइड सेवा, होमस्टे और स्थानीय हस्तशिल्प के माध्यम से ग्रामीणों के लिए रोजगार और आजीविका के नए अवसर पैदा हुए हैं, जिससे वन्यजीव संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है।

  • बिहार में MP-राजस्थान जैसा प्रयोग नहीं चाहती है JDU…. CM नीतीश के उत्तराधिकारी को लेकर चर्चा शुरू

    बिहार में MP-राजस्थान जैसा प्रयोग नहीं चाहती है JDU…. CM नीतीश के उत्तराधिकारी को लेकर चर्चा शुरू


    पटना।
    बिहार की राजनीति (Politics of Bihar) में इन दिनों हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Chief Minister Nitish Kumar) के संभावित इस्तीफे को लेकर अटकलें जारी हैं। भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party- BJP) को उम्मीद थी कि 26 मार्च को उनकी “समृद्धि यात्रा” समाप्त होने के बाद वह पद छोड़ देंगे, लेकिन जनता दल (यूनाइटेड) (Janata Dal (United) ने इस प्रक्रिया को लेकर जल्दबाजी नहीं दिखाई है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, जेडीयू इस समय को रणनीतिक रूप से इस्तेमाल कर रही है और यह सुनिश्चित करना चाहती है कि मुख्यमंत्री के उत्तराधिकारी के चयन में उसे पूरी तरह विश्वास में लिया जाए। पार्टी ने साफ संकेत दिए हैं कि वह भाजपा द्वारा मध्य प्रदेश और राजस्थान की तरह अचानक किसी कम चर्चित नेता को मुख्यमंत्री बनाए जाने जैसे प्रयोग नहीं चाहती है।

    बीजेपी के वरिष्ठ नेता और बिहार प्रभारी विनोद तावड़े पटना में मौजूद हैं और राज्य के नेताओं के साथ बैठक कर रहे हैं। इसे सत्ता परिवर्तन की तैयारियों के रूप में देखा जा रहा है। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति संसद के उच्च सदन यानी कि राज्यसभा के लिए निर्वाचित होता है तो उसे 14 दिनों के भीतर राज्य विधानसभा की सदस्यता छोड़नी होती है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो उसकी राज्यसभा सदस्यता स्वतः समाप्त हो सकती है।


    नीतीश कब तक देंगे इस्तीफा?

    बिहार सरकार में मंत्री श्रवण कुमार ने संकेत दिया है कि नीतीश कुमार 8 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं। वहीं जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और नीतीश कुमार के करीबी संजय झा ने कहा है कि 14 दिन के नियम का पूरी तरह पालन किया जाएगा। नीतीश कुमार के 13 अप्रैल को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेने की संभावना है।


    कौन होगा नीतीश का उत्तराधिकारी?

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री पद के उत्तराधिकारी को लेकर बीजेपी में कई नामों पर चर्चा हो रही है, लेकिन जेडीयू ने स्पष्ट कर दिया है कि अगला मुख्यमंत्री वही होना चाहिए, जो नीतीश कुमार की पसंद का हो। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि नया मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाला होना चाहिए और उनकी राजनीति की शैली को बनाए रखना जरूरी है।


    जेडीयू ने भाजपा के सामने रखी शर्तें

    जेडीयू ने यह भी जोर दिया है कि सरकार की सामाजिक संरचना में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। साथ ही पार्टी चाहती है कि नया नेता नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को भी विश्वास में लेकर चले, जो अब राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि बिहार की राजनीतिक परिस्थिति मध्य प्रदेश या राजस्थान से अलग है, जहां बीजेपी ने अचानक मुख्यमंत्री के नाम घोषित कर सभी को चौंका दिया था। बिहार में समाजवादी विचारधारा की गहरी जड़ें हैं और एनडीए के सहयोगी दलों को भी पूरी तरह विश्वास में लेना जरूरी है।


    मंत्रिमंडल के फॉर्मूले में भी बदलाव संभव

    जेडीयू ने यह भी संकेत दिया है कि यदि उसे गठबंधन में जूनियर पार्टनर की भूमिका निभानी पड़ी तो वह मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी के मौजूदा फार्मूले की समीक्षा और विधानसभा अध्यक्ष पद की मांग कर सकती है। पार्टी का मानना है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से जेडीयू कमजोर नहीं होगी, बल्कि वह बिहार की राजनीति में और अधिक समय दे पाएंगे।

    वहीं बीजेपी की ओर से इस मुद्दे पर सतर्क प्रतिक्रिया दी गई है। पार्टी के एक नेता ने कहा कि अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा। उन्होंने भरोसा जताया कि एनडीए के सभी सहयोगियों की सहमति से सत्ता का सुचारु हस्तांतरण होगा। कुल मिलाकर बिहार में सत्ता परिवर्तन को लेकर सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और जेडीयू व बीजेपी के बीच तालमेल इस पूरी प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाएगा।