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  • एक्सप्लेनर: शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के बीच AI की जंग, मॉडल में अंतर सिर्फ 2.7%, चिप्स में कौन आगे?

    एक्सप्लेनर: शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के बीच AI की जंग, मॉडल में अंतर सिर्फ 2.7%, चिप्स में कौन आगे?

    नई दिल्ली। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 23 से 25 सितंबर तक अमेरिका की राजकीय यात्रा पर हैं। यह एक दशक से ज्यादा समय बाद उनकी वॉशिंगटन यात्रा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी के बीच होने वाली बातचीत में व्यापार, दुर्लभ खनिज, ताइवान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दे अहम रहने वाले हैं। दोनों देशों के बीच AI को लेकर प्रतिस्पर्धा अब केवल सॉफ्टवेयर या चैटबॉट तक सीमित नहीं है। इसमें अत्याधुनिक चिप्स, डेटा सेंटर, बिजली, मॉडल और पूरे तकनीकी इकोसिस्टम की भूमिका है।

    ऐसे में सवाल है कि AI की दौड़ में अमेरिका और चीन में फिलहाल किसकी स्थिति कैसी है? इसका जवाब एक ही आंकड़े से नहीं दिया जा सकता। कुछ क्षेत्रों में अमेरिका आगे है, जबकि चीन ने मॉडल, रिसर्च, पेटेंट और औद्योगिक इस्तेमाल में बड़ी बढ़त बनाई है।

    AI मॉडल में अंतर कितना रह गया?

    स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की 2026 AI Index Report के मुताबिक अमेरिका और चीन के शीर्ष AI मॉडलों के बीच प्रदर्शन का अंतर काफी कम हो चुका है। मार्च 2026 तक शीर्ष अमेरिकी मॉडल चीनी मॉडल से केवल 2.7 प्रतिशत आगे था। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 की शुरुआत से दोनों देशों के मॉडल कई बार प्रदर्शन रैंकिंग में एक-दूसरे से आगे-पीछे होते रहे हैं।

    हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों की AI क्षमता हर क्षेत्र में बराबर हो गई है। अमेरिका अभी भी शीर्ष स्तर के अधिक AI मॉडल विकसित कर रहा है। 2025 में अमेरिका ने 59 उल्लेखनीय AI मॉडल विकसित किए, जबकि चीन की संख्या 35 रही। दूसरी ओर, चीन AI शोध प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट की संख्या में आगे है।

    अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

    अमेरिका की ताकत केवल AI मॉडल में नहीं है। उसके पास अत्याधुनिक AI चिप्स, विशाल कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर तकनीक की मजबूत श्रृंखला है।

    स्टैनफोर्ड AI Index के अनुसार अमेरिका में 5,427 डेटा सेंटर हैं, जो किसी भी दूसरे देश की तुलना में 10 गुना से ज्यादा हैं। दुनिया के सबसे उन्नत AI चिप्स के निर्माण में ताइवान की TSMC की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। यानी अमेरिका की AI बढ़त के पीछे मॉडल के साथ-साथ कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और हार्डवेयर का पूरा नेटवर्क मौजूद है।

    AI में निजी निवेश के मामले में भी अमेरिका की बढ़त बड़ी है। स्टैनफोर्ड के अनुसार 2025 में अमेरिका का निजी AI निवेश चीन से करीब 23 गुना ज्यादा रहा। हालांकि चीन में सरकारी फंड और रणनीतिक निवेश का बड़ा हिस्सा निजी निवेश के आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं देता।

    चीन की रणनीति क्या है?

    चीन की रणनीति AI के पूरे इकोसिस्टम को घरेलू स्तर पर विकसित करने की है। इसका मतलब केवल बड़े AI मॉडल बनाना नहीं, बल्कि उन मॉडलों को चलाने के लिए चिप्स, सर्वर, डेटा सेंटर और सॉफ्टवेयर का विकल्प तैयार करना भी है।

    अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद चीन की कंपनियां घरेलू AI चिप्स पर ज्यादा जोर दे रही हैं। Huawei अपनी Ascend श्रृंखला को आगे बढ़ा रही है, जबकि Alibaba ने Zhenwu M890 जैसे AI चिप विकसित किए हैं। मई 2026 में Alibaba ने M890 पेश करते हुए इसे Nvidia के विकल्प के तौर पर विकसित किए जा रहे घरेलू AI हार्डवेयर का हिस्सा बताया था।

    सितंबर 2026 में Alibaba ने इससे भी आगे बढ़ते हुए Zhenwu V900 चिप पेश की, जिसके बारे में कंपनी ने कहा है कि यह उसके पिछले चिप की तुलना में तीन गुना प्रदर्शन देती है। कंपनी ने 5 से 10 ट्रिलियन पैरामीटर वाला नया AI मॉडल विकसित करने की योजना भी बताई है।

    असली मुकाबला चिप्स का है

    AI मॉडल कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए। यही वजह है कि AI की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में Nvidia जैसे चिप निर्माताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

    चीन की बड़ी समस्या यह है कि उसे सबसे उन्नत AI चिप्स और उन्हें बनाने वाली अत्याधुनिक तकनीक तक अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों के कारण सीमित पहुंच है। Huawei घरेलू विकल्प विकसित कर रही है, लेकिन उसकी चिप तकनीक अभी Nvidia के सबसे उन्नत उत्पादों से पीछे मानी जाती है। Huawei ने 2027 में नए Ascend 960DT और 960PR चिप लॉन्च करने की योजना भी घोषित की है।

    फिर चीन पीछे है या तेजी से बराबरी कर रहा है?

    दोनों बातें अलग-अलग क्षेत्रों में सही हो सकती हैं। फ्रंटियर मॉडल और अत्याधुनिक AI कंप्यूटिंग में अमेरिका की बढ़त अभी मौजूद है, लेकिन चीन ने AI मॉडल की गुणवत्ता और घरेलू तकनीकी इकोसिस्टम में अंतर तेजी से कम किया है।

    स्टैनफोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि चीन शोध प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट की संख्या में आगे है, जबकि अमेरिका ज्यादा उल्लेखनीय मॉडल और ज्यादा प्रभावशाली पेटेंट तैयार कर रहा है। चीन औद्योगिक रोबोटों की तैनाती में भी काफी आगे है। 2024 में दुनिया भर में लगाए गए औद्योगिक रोबोटों में चीन की हिस्सेदारी 54 प्रतिशत थी।

    एडवांस्ड चिप में चीन कितनी दूरी तय कर सकता है?

    Goldman Sachs के एक अनुमान के मुताबिक 7 नैनोमीटर और उससे छोटे प्रोसेस पर बनने वाले चीन के एडवांस्ड चिप्स की घरेलू सप्लाई 2025 से 2035 के बीच सालाना औसतन 46 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। इससे घरेलू आपूर्ति और मांग के बीच का अंतर 2025 के 92 प्रतिशत से घटकर 2035 तक 34 प्रतिशत रह सकता है।

    लेकिन यह एक अनुमान है, उपलब्धि नहीं। इस अनुमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती लिथोग्राफी तकनीक है। Goldman के मॉडल में चीन की घरेलू चिप उत्पादन क्षमता और उत्पादन दक्षता में बहुत तेज सुधार की जरूरत मानी गई है। इसलिए 2035 का अनुमान यह साबित नहीं करता कि चीन तब तक पूरी तरह से सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भर हो जाएगा।

    AI की दौड़ में बिजली भी बड़ा हथियार

    AI की प्रतिस्पर्धा में चिप और मॉडल के साथ बिजली भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। बड़े AI मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन के लिए विशाल डेटा सेंटर चाहिए, जिन्हें लगातार भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है।

    स्टैनफोर्ड AI Index के अनुसार AI डेटा सेंटर की बिजली क्षमता तेजी से बढ़ रही है और AI कंप्यूटिंग का ऊर्जा इस्तेमाल अब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा बन चुका है। अमेरिका के पास बड़े डेटा सेंटर नेटवर्क की बढ़त है, जबकि चीन के पास विशाल औद्योगिक आधार और बड़ी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता है।

    तो फिलहाल कौन कितना आगे?

    मॉडल: अंतर बेहद कम हो चुका है। मार्च 2026 में शीर्ष अमेरिकी मॉडल की बढ़त 2.7 प्रतिशत थी।

    फ्रंटियर AI: अमेरिका अभी ज्यादा शीर्ष-स्तरीय मॉडल विकसित कर रहा है।

    AI रिसर्च और पेटेंट: चीन प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट संख्या में मजबूत है, जबकि अमेरिका उच्च-प्रभाव वाले पेटेंट में आगे है।

    AI चिप्स: सबसे उन्नत चिप और कंप्यूटिंग इकोसिस्टम में अमेरिका की बढ़त बनी हुई है; चीन घरेलू विकल्प तेजी से विकसित कर रहा है।

    डेटा सेंटर: अमेरिका के पास सबसे बड़ा डेटा सेंटर आधार है।

    औद्योगिक इस्तेमाल: चीन औद्योगिक रोबोटों की तैनाती में स्पष्ट रूप से आगे है।

    यानी AI की यह रेस केवल यह तय करने की नहीं है कि सबसे अच्छा चैटबॉट किस देश के पास है। असली मुकाबला मॉडल + चिप + डेटा सेंटर + बिजली + रिसर्च + मैन्युफैक्चरिंग के पूरे इकोसिस्टम का है। इसी वजह से शी जिनपिंग और ट्रंप की मौजूदा मुलाकात में AI केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

  • सरदार सरोवर वन टाइम सेटलमेंट बना सियासी मुद्दा क्या मध्य प्रदेश ने घाटे का सौदा किया या बचाए 1268 करोड़

    सरदार सरोवर वन टाइम सेटलमेंट बना सियासी मुद्दा क्या मध्य प्रदेश ने घाटे का सौदा किया या बचाए 1268 करोड़


    मध्य प्रदेश। करीब तीन दशक से लंबित सरदार सरोवर डैम विवाद पर आखिरकार वन टाइम सेटलमेंट हो गया लेकिन इस समझौते ने मध्य प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जिस राज्य ने अपनी हजारों हेक्टेयर जमीन डूबने और सैकड़ों गांवों के विस्थापन के बदले गुजरात से 7669 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा था उसे अब यह दावा पूरी तरह छोड़ना पड़ा है। इतना ही नहीं राज्य सरकार को गुजरात को 231 करोड़ 80 लाख रुपए का भुगतान भी करना होगा। यही वजह है कि इस समझौते को लेकर सरकार और विपक्ष आमने सामने हैं।

    सरदार सरोवर परियोजना नर्मदा नदी पर गुजरात में बनाई गई थी लेकिन इसके बैकवाटर का सबसे बड़ा असर मध्य प्रदेश पर पड़ा। डैम की ऊंचाई बढ़ने के बाद प्रदेश के 192 गांव और करीब 21 हजार हेक्टेयर भूमि स्थायी रूप से डूब क्षेत्र में आ गई। इसके बाद नए भूमि अधिग्रहण कानून के आधार पर मध्य प्रदेश ने गुजरात से 7669 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग की थी। दूसरी ओर गुजरात पुराने दावों के आधार पर सीमित भुगतान की बात करता रहा और निर्माण लागत में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी का मुद्दा उठाता रहा। इसी विवाद के कारण मामला वर्षों तक अटका रहा।

    दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में चार राज्यों के बीच हुए समझौते में पुरानी फाइल को हमेशा के लिए बंद करने पर सहमति बनी। इसके तहत मध्य प्रदेश ने अपना पूरा मुआवजा दावा वापस ले लिया जबकि गुजरात की ओर से निर्माण लागत में प्रदेश की करीब 1500 करोड़ रुपए की संभावित देनदारी घटाकर केवल 231.80 करोड़ रुपए तय कर दी गई।

    यही फैसला अब राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने प्रदेश के किसानों आदिवासियों और विस्थापित परिवारों के हितों से समझौता किया है। विपक्ष का कहना है कि हजारों करोड़ रुपए के दावे को छोड़ना प्रदेश के अधिकारों का नुकसान है और सरकार को इस पूरे समझौते पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।

    वहीं मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और सरकार इस समझौते को प्रदेश के हित में लिया गया व्यावहारिक फैसला बता रहे हैं। उनका कहना है कि गुजरात किसी भी स्थिति में 7669 करोड़ रुपए देने को तैयार नहीं था। ऐसे में लंबे कानूनी विवाद को समाप्त करते हुए राज्य ने 1500 करोड़ रुपए की संभावित देनदारी को घटाकर केवल 231.80 करोड़ रुपए में निपटा लिया जिससे सरकारी खजाने पर बड़ा वित्तीय बोझ टल गया।

    सरकार यह भी तर्क दे रही है कि सरदार सरोवर परियोजना से मध्य प्रदेश को दीर्घकालिक लाभ लगातार मिल रहे हैं। परियोजना से बनने वाली जल विद्युत का सबसे बड़ा हिस्सा प्रदेश को मिलता है। साथ ही लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई और कई बड़े शहरों की पेयजल आपूर्ति भी इसी परियोजना पर निर्भर है। इसलिए सरकार इस समझौते को भविष्य के हितों और व्यावहारिक समाधान के रूप में देख रही है।

    हालांकि सबसे बड़ा सवाल अब उन विस्थापित परिवारों को लेकर है जिनके पुनर्वास और मुआवजे की जिम्मेदारी अब पूरी तरह मध्य प्रदेश सरकार पर आ गई है। चूंकि गुजरात से कोई मुआवजा राशि नहीं मिलेगी इसलिए राज्य सरकार को ही अपने संसाधनों से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और भुगतान की व्यवस्था करनी होगी। ऐसे में यह समझौता कानूनी विवाद का अंत जरूर है लेकिन इसके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बने रहेंगे।