Tag: Export

  • सरकार ने पेट्रोल निर्यात शुल्क शून्य किया, डीजल और विमान ईंधन पर बढ़ाई एक्सपोर्ट ड्यूटी..

    सरकार ने पेट्रोल निर्यात शुल्क शून्य किया, डीजल और विमान ईंधन पर बढ़ाई एक्सपोर्ट ड्यूटी..

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर लागू शुल्कों में बदलाव किया है। वित्त मंत्रालय की ओर से शनिवार, 31 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क घटाकर शून्य कर दिया गया है। वहीं, डीजल और एटीएफ के निर्यात पर शुल्क में बढ़ोतरी की गई है। सरकार के इस फैसले के बाद पेट्रोल पर पहले लागू 2.50 रुपये प्रति लीटर का शुल्क समाप्त हो गया है।

    संशोधित दरों के तहत डीजल के निर्यात पर शुल्क 8.50 रुपये से बढ़ाकर 11.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसमें तीन रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। इसी तरह, एटीएफ के निर्यात पर शुल्क 10.50 रुपये से बढ़ाकर 11 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इस तरह विमान ईंधन पर निर्यात शुल्क में 50 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। पेट्रोल पर शुल्क शून्य होने के साथ तीनों पेट्रोलियम उत्पादों के लिए अलग-अलग दरें लागू हो गई हैं।

    सरकार ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में बने हालात के बीच इन शुल्कों की समीक्षा की है। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने के बाद मार्च के अंत में पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर शुल्क लागू किए गए थे। इन दरों की समीक्षा केंद्र सरकार हर 15 दिन में करती है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के अनुसार शुल्कों में बदलाव किया जा सके।

    निर्यात शुल्क लागू करने का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तेल रिफाइनरियां घरेलू बाजार में आपूर्ति करने के बजाय अधिक मुनाफे के लिए विदेशी बाजारों को प्राथमिकता न दें। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें घरेलू बाजार की तुलना में अधिक आकर्षक होती हैं, तब निर्यात से बेहतर कमाई की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे हालात में निर्यात शुल्क के माध्यम से घरेलू खरीदारों के लिए पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश की जाती है।

    इस बीच, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड का भाव बढ़कर 113.10 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। बीते एक सप्ताह में इसकी कीमत में 1.55 प्रतिशत और एक महीने के दौरान 15.71 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले तीन महीनों में ब्रेंट क्रूड करीब 26 प्रतिशत महंगा हुआ है।

    भारत के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व भी काफी अधिक है। मध्य पूर्व में संघर्ष शुरू होने से पहले देश के कच्चे तेल के आयात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर आता था। यह मार्ग फारस की खाड़ी को वैश्विक बाजारों से जोड़ता है और तेल व्यापार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़े हैं।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति से जुड़े इन घटनाक्रमों के बीच सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्यात शुल्क की समीक्षा कर रही है। नई दरों के तहत पेट्रोल पर निर्यात शुल्क समाप्त हो गया है, जबकि डीजल और एटीएफ पर शुल्क बढ़ाया गया है। इन बदलावों का उद्देश्य घरेलू आपूर्ति और निर्यात से जुड़े आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना है।

  • लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत के बावजूद भारत का चावल निर्यात मजबूत, वैश्विक खाद्य सुरक्षा में बढ़ रही अहमियत

    लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत के बावजूद भारत का चावल निर्यात मजबूत, वैश्विक खाद्य सुरक्षा में बढ़ रही अहमियत

    नई दिल्ली ।वैश्विक बाजार में भारत की चावल निर्यात संबंधी स्थिति मजबूत बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय चावल व्यापार में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है। हालांकि, समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव, शिपिंग समय में वृद्धि, बीमा खर्च और परिवहन शुल्क में बढ़ोतरी जैसी चुनौतियां निर्यात उद्योग को प्रभावित कर रही हैं। इसके बावजूद सरकार और उद्योग जगत निर्यात को सुचारू बनाए रखने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं।

    नई दिल्ली में आयोजित भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन 2026 में कृषि क्षेत्र, निर्यात कारोबार, व्यापार नीति और खाद्य गुणवत्ता से जुड़े विशेषज्ञों ने उद्योग की स्थिति पर चर्चा की। सम्मेलन में किसानों से लेकर निर्यातकों, खरीदारों, परीक्षण प्रयोगशालाओं और अन्य सेवा प्रदाताओं तक पूरी आपूर्ति शृंखला से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा का मुख्य केंद्र वैश्विक बाजार में भारत की भूमिका, निर्यात लागत और भविष्य में कारोबार की संभावनाएं रहीं।

    वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के महाप्रबंधक तरुण बजाज के अनुसार, भारत का चावल निर्यात वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उन्होंने कहा कि देश की लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी को देखते हुए ऐसा मंच जरूरी है, जहां किसान, व्यापारी, निर्यातक और उपभोक्ता से जुड़ी पूरी मूल्य शृंखला के प्रतिनिधि एक साथ आकर समस्याओं और उनके समाधान पर विचार कर सकें।

    उन्होंने समुद्री परिवहन को मौजूदा समय की प्रमुख चुनौती बताया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी जैसे क्षेत्रों में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे माल पहुंचने में अधिक समय लग रहा है और बीमा तथा शिपिंग की लागत भी बढ़ रही है। इन परिस्थितियों में केंद्र और राज्य सरकारों तथा उद्योग जगत के समन्वय से निर्यात व्यवस्था को बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।

    राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डॉ. राजीव कुमार ने भी भारतीय निर्यातकों की मजबूत स्थिति का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, भारत की वैश्विक बाजार हिस्सेदारी लंबे समय से लगभग 35 से 40 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। उन्होंने कहा कि थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत में सड़क परिवहन पर अधिक निर्भरता होने से लागत बढ़ती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मांग वाले चावल के उत्पादन को प्रोत्साहित करना जरूरी है, ताकि निर्यातकों को बेहतर मूल्य मिल सके।

    सम्मेलन में चावल उद्योग से जुड़ी कंपनियों और संस्थाओं ने भी अपने अनुभव साझा किए। ईवाई के पार्टनर प्रशांत रायजादा ने इसे क्षेत्र के विशेषज्ञों, निर्यातकों और नीति निर्माताओं के बीच विचार-विमर्श का उपयोगी अवसर बताया। कृभको एग्री के मुख्य प्रबंधक राजेश पहारिया जैन के अनुसार, इस बार सम्मेलन में भागीदारी और गतिविधियों का दायरा बढ़ा है। इसमें पैकेजिंग सामग्री बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्वेयर, कस्टम हाउस एजेंट, किसान और निर्यातक शामिल हुए।

    राजेश पहारिया जैन ने बताया कि मौसम संबंधी चुनौतियों और उत्पादन में संभावित कमी की आशंकाओं के बावजूद भारतीय खाद्य निगम के पास लगभग 5.5 से 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक मौजूद है। उन्होंने निर्यात उद्योग को सहायता देने के लिए ब्याज संबंधी समर्थन और अतिरिक्त प्रोत्साहन उपलब्ध कराने की मांग भी रखी।

    तकनीक और बाजार संबंधी जानकारी की भूमिका पर भी चर्चा हुई। एग्रीगुरु ऑनलाइन की संस्थापक हंसा सिंह राक्या ने बताया कि उनकी कंपनी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित बाजार सूचना मंच विकसित किया है। इसके माध्यम से खरीदारों और विक्रेताओं को कीमतों, माल ढुलाई खर्च, व्यापार नियमों और वैश्विक घटनाक्रमों की जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

    यूरोफिन्स एनालिटिकल सर्विसेज इंडिया और एसजीएस फूड टेस्टिंग सर्विसेज के प्रतिनिधियों ने भी गुणवत्ता परीक्षण, शोध संस्थानों के सहयोग और खरीदार-विक्रेता संवाद के महत्व पर जोर दिया। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों और नई व्यापारिक आवश्यकताओं की जानकारी साझा करने से गुणवत्ता संबंधी अस्वीकृतियों और सीमा शुल्क से जुड़ी परेशानियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

    विशेषज्ञों की चर्चाओं से स्पष्ट हुआ कि भारत के सामने वैश्विक चावल बाजार में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखने के साथ निर्यात लागत घटाने, परिवहन व्यवस्था सुधारने और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप कारोबार बढ़ाने की चुनौती है। इन क्षेत्रों में बेहतर समन्वय से भारत की वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भूमिका को और मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

  • हिमाचल के सिंदूरी अनार दुबई पहुंचे, किसानों के लिए खुलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमाई बढ़ाने का नया रास्ता

    हिमाचल के सिंदूरी अनार दुबई पहुंचे, किसानों के लिए खुलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमाई बढ़ाने का नया रास्ता

    नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश के किसानों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपज पहुंचाने का एक नया अवसर सामने आया है। राज्य के कुल्लू में पैदा होने वाले सिंदूरी अनारों की 1.3 मीट्रिक टन खेप सफलतापूर्वक दुबई भेजी गई है। इस निर्यात से भारतीय कृषि उत्पादों को विदेशी बाजारों में पहचान दिलाने और स्थानीय किसानों को व्यापक बाजार से जोड़ने की संभावनाएं बढ़ी हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार, 22 अक्टूबर को इस उपलब्धि की जानकारी दी।

    इस खेप का निर्यात कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के सहयोग से किया गया। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय कृषि उपज को वैश्विक खरीदारों तक पहुंचाना है। विदेशों में भारतीय फलों की मांग और बाजार तक सीधी पहुंच बढ़ने से किसानों को अपनी उपज के लिए नए खरीदार मिल सकते हैं। हालांकि, किसानों की आय पर इसका वास्तविक प्रभाव निर्यात की निरंतरता, बाजार की मांग, कीमतों और आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

    कुल्लू के सिंदूरी अनारों का दुबई पहुंचना हिमाचल प्रदेश की कृषि उपज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। विदेशी बाजार में उत्पाद पहुंचाने के लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग, भंडारण, परिवहन और समय पर आपूर्ति जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी होता है। यदि ऐसे निर्यात नियमित रूप से आगे बढ़ते हैं, तो स्थानीय उत्पादकों और उनसे जुड़े कारोबारियों को अपने व्यापार का विस्तार करने का अवसर मिल सकता है।

    कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अन्य राज्यों में भी प्रयास किए जा रहे हैं। इसी महीने की शुरुआत में एपीडा ने हरियाणा के सोनीपत से कनाडा के लिए 24 मीट्रिक टन जमे हुए खाद्य उत्पादों की खेप भेजने में सहायता की थी। इस खेप में हरी मटर, मिश्रित सब्जियां, मटर और गाजर, स्वीट कॉर्न तथा समोसे जैसे उत्पाद शामिल थे। यह निर्यात किसान उत्पादक संगठनों के नेतृत्व में किया गया था। निर्यात करने वाली इकाई को एपीडा की वित्तीय सहायता योजना से भी मदद मिली।

    इन पहलों के जरिए कृषि और खाद्य उत्पादों के कारोबार से जुड़े छोटे उत्पादकों तथा संगठनों को विदेशी बाजारों तक पहुंचने में सहायता देने का प्रयास किया जा रहा है। किसान उत्पादक संगठन सामूहिक रूप से उपज जुटाने, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने और बड़े खरीदारों की जरूरतों के अनुसार आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वित्तीय सहायता और निर्यात संबंधी मार्गदर्शन से ऐसी इकाइयों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी आसान हो सकती है।

    इस बीच, मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए के लाभों को कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से जागरूकता गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं। गांधीनगर में हुई राज्यस्तरीय कार्यशाला में 200 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें राज्य सरकार के अधिकारी, निर्यात संवर्धन परिषदों के प्रतिनिधि और निर्यातक शामिल थे। कार्यशाला का उद्देश्य प्रतिभागियों को मुक्त व्यापार समझौतों के तहत उपलब्ध अवसरों की जानकारी देना था।

    पीयूष गोयल ने गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय कारोबारियों और निर्यातकों की भागीदारी बढ़ाने से एफटीए का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इससे भारत के कुल निर्यात में गुजरात की हिस्सेदारी बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

    मंत्री ने कहा कि हाल के वर्षों में हुए मुक्त व्यापार समझौतों ने भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोले हैं। सरकार का जोर इन समझौतों का लाभ किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों और छोटे कारोबारियों तक पहुंचाने पर है, ताकि देश में बने उत्पादों को वैश्विक बाजारों में अधिक अवसर मिल सकें।

    गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की ओर से स्थानीय कारोबारियों को नए निर्यात बाजार तलाशने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयासों की भी सराहना की गई। केंद्र सरकार के वाणिज्य विभाग की योजना राज्यों के साथ मिलकर ऐसी और पहल आयोजित करने की है। इससे राज्यों को अपनी विशिष्ट निर्यात क्षमता पहचानने, मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाने और देश के निर्यात को बढ़ावा देने में मदद मिलने की उम्मीद है।

  • भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते से इंजीनियरिंग निर्यात पांच साल में दोगुना होने की उम्मीद

    भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते से इंजीनियरिंग निर्यात पांच साल में दोगुना होने की उम्मीद

    नई दिल्ली । भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता लागू होने से भारतीय इंजीनियरिंग क्षेत्र को नए अवसर मिलने की उम्मीद है। उद्योग जगत का अनुमान है कि इस समझौते के बाद अगले पांच वर्षों में न्यूजीलैंड को भारत का इंजीनियरिंग निर्यात लगभग दोगुना होकर 28 से 30 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे भारतीय निर्माताओं को न्यूजीलैंड के बाजार में अपनी पहुंच बढ़ाने और नए व्यापारिक अवसर तलाशने में मदद मिलने की संभावना है।

    इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद इंडिया के अध्यक्ष पंकज चड्ढा ने समझौते को भारतीय इंजीनियरिंग उद्योग के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए अपेक्षाकृत छोटा बाजार है, लेकिन वहां विकास की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। उनके मुताबिक, मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने से इस बाजार में भारतीय कंपनियों के लिए नए रास्ते खुलेंगे।

    भारत का न्यूजीलैंड को इंजीनियरिंग वस्तुओं का निर्यात वर्ष 2024-25 में 12.98 करोड़ डॉलर था, जो 2025-26 में बढ़कर 14.05 करोड़ डॉलर हो गया। निर्यात में हुई इस बढ़ोतरी के बीच उद्योग को उम्मीद है कि व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच इंजीनियरिंग उत्पादों का कारोबार और मजबूत होगा। शुल्क संबंधी रियायतों और बेहतर व्यापारिक पहुंच से भारतीय निर्माताओं को न्यूजीलैंड में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति सुधारने का अवसर मिल सकता है।

    भारत से न्यूजीलैंड भेजे जाने वाले प्रमुख इंजीनियरिंग उत्पादों में ऑटोमोबाइल, डेयरी उद्योग में इस्तेमाल होने वाली औद्योगिक मशीनरी, चिकित्सा एवं वैज्ञानिक उपकरण, कार्यालय संबंधी उपकरण तथा लोहा और इस्पात उत्पाद शामिल हैं। इन क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों के लिए मांग बढ़ने की संभावनाएं हैं। समझौते के बाद निर्यातकों को अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाने और न्यूजीलैंड के बाजार की जरूरतों के अनुरूप कारोबार का विस्तार करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    पंकज चड्ढा ने विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए इस समझौते को उपयोगी बताया। उनके अनुसार, मुक्त व्यापार समझौता छोटे और मध्यम स्तर के भारतीय इंजीनियरिंग निर्यातकों को अपने उत्पाद पोर्टफोलियो में विविधता लाने का अवसर देगा। इससे वे पारंपरिक बाजारों पर निर्भरता कम करने के साथ न्यूजीलैंड में अपनी व्यावसायिक मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में काम कर सकेंगे।

    उद्योग की अपेक्षा है कि आने वाले वर्षों में भारतीय कंपनियां न्यूजीलैंड में इंजीनियरिंग वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने के लिए नए ग्राहक तलाशेंगी और कारोबार के नए अवसरों का लाभ उठाएंगी। हालांकि, निर्यात में वास्तविक वृद्धि बाजार की मांग, कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और समझौते से मिलने वाले लाभों का उपयोग करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगी।

    इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद इंडिया के अनुमान के मुताबिक, अगले पांच वर्षों में न्यूजीलैंड को भारत का इंजीनियरिंग निर्यात बढ़कर 28 से 30 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। यह वर्ष 2025-26 के 14.05 करोड़ डॉलर के निर्यात की तुलना में लगभग दोगुना होगा। दोनों देशों के बीच इंजीनियरिंग व्यापार संबंध मजबूत होने से वर्ष 2030 तक भारत के 250 अरब डॉलर के इंजीनियरिंग निर्यात लक्ष्य को हासिल करने की व्यापक कोशिशों को भी बल मिलने की उम्मीद है।

  • भारत-न्यूजीलैंड एफटीए लागू, सभी भारतीय निर्यात पर शून्य शुल्क, 20 अरब डॉलर के निवेश से खुलेंगे नए अवसर

    भारत-न्यूजीलैंड एफटीए लागू, सभी भारतीय निर्यात पर शून्य शुल्क, 20 अरब डॉलर के निवेश से खुलेंगे नए अवसर


    नई दिल्ली । भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) लागू होने के साथ भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खुल गए हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को कहा कि इस समझौते के तहत न्यूजीलैंड में भारतीय वस्तुओं को सभी टैरिफ श्रेणियों में शून्य शुल्क पर प्रवेश मिलेगा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूती मिलने और निवेश गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    पीयूष गोयल के अनुसार, समझौते के लागू होने से न्यूजीलैंड जाने वाले सभी भारतीय निर्यात पर 100 प्रतिशत शुल्क छूट का लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पाद अब न्यूजीलैंड के बाजार में बिना आयात शुल्क के प्रवेश कर सकेंगे। इससे वहां भारतीय वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर होने और निर्यातकों को नए खरीदारों तक पहुंच बनाने में मदद मिलने की संभावना है।

    मंत्री ने यह भी बताया कि समझौते के तहत न्यूजीलैंड भारत में 20 अरब डॉलर तक के निवेश को सुगम बनाएगा। इस निवेश से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने, रोजगार के नए अवसर तैयार करने और दोनों देशों के कारोबारी संबंधों को व्यापक बनाने की उम्मीद है। हालांकि, निवेश की वास्तविक मात्रा और उसके क्षेत्रवार वितरण का प्रभाव समझौते के क्रियान्वयन तथा निवेश संबंधी निर्णयों पर निर्भर करेगा।

    भारत ने इस समझौते में संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के हितों की सुरक्षा पर भी जोर दिया है। गोयल ने स्पष्ट किया कि डेयरी, प्रमुख कृषि उत्पादों और पशु-आधारित उत्पादों जैसे क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है। उनके अनुसार, किसानों का कल्याण सरकार की प्राथमिकता है और व्यापार विस्तार के साथ घरेलू कृषि हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है।

    व्यापारी संगठनों ने भी समझौते का स्वागत किया है। अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ के महासचिव और चांदनी चौक से सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने इसे भारत की बढ़ती विनिर्माण क्षमता और वैश्विक बाजारों में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उनके अनुसार, यह समझौता ‘लोकल टू ग्लोबल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

    इस समझौते से वस्त्र एवं परिधान, चमड़ा और फुटवियर, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग सामान, ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स, दवाइयों, रसायनों, कृषि उत्पादों तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों जैसे क्षेत्रों को निर्यात के नए अवसर मिलने की उम्मीद है। न्यूजीलैंड में शून्य शुल्क पर प्रवेश से भारतीय उत्पादों की कीमत संबंधी प्रतिस्पर्धा बेहतर हो सकती है। इसका लाभ विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), कारीगरों, निर्माताओं, किसानों, महिला उद्यमियों और निर्यातकों तक पहुंचने की संभावना है।

    समझौते के तहत निवेश को बढ़ावा देने के साथ भारतीय पेशेवरों और युवाओं के लिए भी नए अवसर पैदा होने की उम्मीद जताई गई है। व्यापारिक गतिविधियों में विस्तार से विनिर्माण, सेवाओं और निर्यात से जुड़े क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, इसका वास्तविक असर आने वाले समय में व्यापार और निवेश के आंकड़ों से स्पष्ट होगा।

    भारत और न्यूजीलैंड ने वर्ष 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। उद्योग जगत को उम्मीद है कि शुल्क-मुक्त पहुंच और निवेश को प्रोत्साहन मिलने से इस लक्ष्य की दिशा में प्रगति तेज होगी। खंडेलवाल ने व्यापारियों, निर्माताओं और एमएसएमई से इस अवसर का लाभ उठाकर ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों की वैश्विक पहुंच बढ़ाने का आह्वान किया है।

  • भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय निर्यात को 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच और किसानों को नए अवसर

    भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय निर्यात को 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच और किसानों को नए अवसर


    नई दिल्ली ।
    भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 से लागू हो गया है। इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी। इसका लाभ विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), किसानों, महिलाओं, युवाओं और श्रम-प्रधान उद्योगों को मिलने की उम्मीद है। समझौते में व्यापार के अवसर बढ़ाने के साथ भारत के संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के हितों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया गया है।

    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच से भारतीय कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिलेगा। उनके अनुसार, इस समझौते से पेशेवरों के लिए भी नए अवसर खुलेंगे और भारत के मूलभूत हित सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने इसे दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया।

    कृषि क्षेत्र को लेकर मंत्री ने कहा कि भारतीय किसानों को फल, सब्जियां, मसाले और अन्य कृषि उत्पादों के लिए न्यूजीलैंड में बाजार के नए अवसर मिलेंगे। इसके साथ ही उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय मजबूत करने और उनकी आजीविका बेहतर बनाने के लिए आपसी सहयोग को प्रोत्साहन मिलेगा। हालांकि, डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते में पूरी तरह संरक्षण दिया गया है। इससे व्यापार विस्तार के साथ किसानों के हितों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है।

    भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए भी इस समझौते को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पीयूष गोयल ने महाराष्ट्र के पुणे में निर्मित जेसीबी मशीन की न्यूजीलैंड को पहली खेप के निर्यात को हरी झंडी दिखाई। उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड में निर्मित भारतीय मशीनों का इस्तेमाल बढ़ना देश के विनिर्माण उद्योग के लिए नए अवसरों का संकेत है। इससे भारतीय उत्पादों को विदेशी बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, मुक्त व्यापार समझौते केवल आयात-निर्यात शुल्क घटाने तक सीमित नहीं होते। ये व्यापार, निवेश और आपूर्ति श्रृंखलाओं के बेहतर एकीकरण के माध्यम से दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी को मजबूत करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समझौतों से नियामकीय मंजूरियों की प्रक्रिया आसान होती है और दोनों देशों के बीच कारोबार करना अधिक सुविधाजनक बनता है।

    सरकार का अनुमान है कि भारत-न्यूजीलैंड एफटीए आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके अतिरिक्त, यह समझौता कृषि, विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और स्टार्टअप सहित विभिन्न क्षेत्रों में न्यूजीलैंड से भारत में 20 अरब डॉलर तक के निवेश का रास्ता खोल सकता है। इससे कारोबारी सहयोग और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना है।

    सेवा क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी, पेशेवर सेवाओं, निर्माण, पर्यटन और दृश्य-श्रव्य सेवाओं से जुड़ी भारतीय कंपनियों को न्यूजीलैंड के बाजार में अवसर मिलेंगे। इन क्षेत्रों में बाजार तक पहुंच बढ़ने से भारतीय सेवा प्रदाताओं को अंतरराष्ट्रीय कारोबार का विस्तार करने में मदद मिल सकती है।

    दवा और चिकित्सा उपकरण उद्योग के लिए भी समझौते में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। न्यूजीलैंड अब वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त नियामकों की ओर से जारी निरीक्षण मंजूरियों को स्वीकार करेगा। इससे भारतीय फार्मास्यूटिकल और मेडिकल डिवाइस निर्यातकों के लिए नियामकीय अनुपालन का बोझ कम हो सकता है और उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। कुल मिलाकर, इस समझौते का उद्देश्य भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार, निवेश और पेशेवर सहयोग को व्यापक बनाना है, जबकि भारत के संवेदनशील क्षेत्रों के हितों को सुरक्षित रखना भी इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।

  • सोने-चांदी के आभूषण निर्यात पर घटा ड्यूटी ड्रॉबैक, गोल्ड पर 3.1 प्रतिशत और सिल्वर पर करीब 9 प्रतिशत की कटौती

    सोने-चांदी के आभूषण निर्यात पर घटा ड्यूटी ड्रॉबैक, गोल्ड पर 3.1 प्रतिशत और सिल्वर पर करीब 9 प्रतिशत की कटौती

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने सोने और चांदी के आभूषणों सहित कीमती धातुओं से बने उत्पादों के निर्यात पर मिलने वाली ड्यूटी ड्रॉबैक दरों में कटौती की है। नए संशोधन के तहत सोने के आभूषणों पर मिलने वाला रिफंड करीब 3.1 प्रतिशत और चांदी के आभूषणों तथा अन्य संबंधित उत्पादों पर मिलने वाला रिफंड लगभग 9 प्रतिशत घटा दिया गया है। इस बदलाव से भारतीय आभूषण निर्यातकों को पहले की तुलना में कम वित्तीय राहत मिलेगी। इसका असर कारोबार की लागत, लाभ के मार्जिन और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है।
    वित्त मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, सोने के आभूषणों के निर्यात पर ड्यूटी ड्रॉबैक की दर 1,851.99 रुपये प्रति ग्राम से घटाकर 1,794.11 रुपये प्रति ग्राम कर दी गई है। इस तरह निर्यातकों को अब प्रत्येक ग्राम सोने के आभूषण पर पहले के मुकाबले 57.88 रुपये कम रिफंड मिलेगा। बड़ी मात्रा में आभूषणों का निर्यात करने वाली कंपनियों के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है।
    चांदी के उत्पादों के मामले में कटौती अधिक है। चांदी के आभूषणों और अन्य संबंधित वस्तुओं के निर्यात पर मिलने वाली ड्यूटी ड्रॉबैक दर 29,501.09 रुपये प्रति किलोग्राम से घटाकर 26,859.02 रुपये प्रति किलोग्राम कर दी गई है। यानी निर्यातकों को अब प्रति किलोग्राम 2,642.07 रुपये कम रिफंड मिलेगा। इस बदलाव से चांदी के आभूषणों का कारोबार करने वाली कंपनियों की वित्तीय गणना प्रभावित हो सकती है।
    ड्यूटी ड्रॉबैक एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत निर्यातकों को निर्यात किए जाने वाले उत्पादों में इस्तेमाल हुए कच्चे माल और अन्य इनपुट पर चुकाए गए पात्र सीमा शुल्क तथा संबंधित शुल्कों का निर्धारित दरों के अनुसार रिफंड मिलता है। इसका उद्देश्य उत्पादन पर पड़ने वाले शुल्क के बोझ को कम करना और घरेलू उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में सहायता देना है। दरों में बदलाव होने से निर्यातकों को मिलने वाली इस वित्तीय राहत की मात्रा भी बदल जाती है।
    गौरतलब है कि इसी वर्ष जुलाई में सरकार ने सोने और चांदी के आभूषणों के लिए ड्यूटी ड्रॉबैक दरों में बड़ी बढ़ोतरी की थी। उस समय सोने के आभूषणों पर रिफंड की दर 773.17 रुपये प्रति ग्राम से बढ़ाकर 1,851.99 रुपये प्रति ग्राम की गई थी। इसी तरह चांदी के उत्पादों पर मिलने वाला रिफंड 14,990.66 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर 29,501.09 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया था। उस समय इस कदम से निर्यातकों को अधिक राहत मिलने की उम्मीद जताई गई थी।
    अब दरों में की गई कटौती से ज्वैलरी निर्यातकों, बुलियन कारोबारियों और विदेशों में सोने-चांदी के आभूषणों की बड़ी खेप भेजने वाली कंपनियों पर असर पड़ सकता है। कम रिफंड मिलने के कारण कारोबार की प्रभावी लागत बढ़ सकती है। यदि कंपनियां इस अतिरिक्त बोझ को अपने स्तर पर वहन करती हैं, तो उनके लाभ का मार्जिन कम हो सकता है। वहीं, यदि वे कीमतों में बदलाव करती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के साथ प्रतिस्पर्धा पर भी असर पड़ने की आशंका रहेगी।
    हालांकि, निर्यात पर वास्तविक प्रभाव वैश्विक बाजार में मांग, कीमती धातुओं की कीमतों और कारोबारियों की लागत संरचना जैसे कारकों पर भी निर्भर करेगा। यदि विदेशी बाजारों में भारतीय आभूषणों की मांग मजबूत रहती है, तो कंपनियां इस बदलाव के प्रभाव को कुछ हद तक संभाल सकती हैं। इसके बावजूद, नई दरों के लागू होने के बाद निर्यातकों को अपने खर्च और कारोबार की रणनीति का दोबारा आकलन करना पड़ सकता है।
  • सरकार ने गेहूं के आटे, मैदा और सूजी के निर्यात से हटाई पाबंदी, बेहतर उत्पादन और स्टॉक के बीच बड़ा फैसला


    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार ने गेहूं से बने कई प्रमुख उत्पादों के निर्यात को लेकर बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। सरकार ने गेहूं या मेस्लिन आटा, मैदा, सूजी, होलमील आटा और मिश्रित गेहूं के आटे को प्रतिबंधित निर्यात श्रेणी से हटाकर मुक्त श्रेणी में डाल दिया है। अब इन उत्पादों का निर्यात बिना पहले लगाए गए प्रतिबंधों के किया जा सकेगा।

    विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना में निर्यात नीति में किए गए इस बदलाव की जानकारी दी गई। इस फैसले से गेहूं आधारित उत्पादों के कारोबार से जुड़े निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी और वे मांग के अनुसार इन उत्पादों की विदेशी बाजारों में आपूर्ति कर सकेंगे।

    सरकार ने वर्ष 2022 में घरेलू खाद्य सुरक्षा और कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से गेहूं तथा गेहूं से बने उत्पादों के निर्यात पर कई तरह की पाबंदियां लगाई थीं। 13 मई 2022 को गेहूं की निर्यात नीति को मुक्त श्रेणी से प्रतिबंधित श्रेणी में कर दिया गया था।

    इसके बाद अगस्त 2022 में गेहूं के आटे के निर्यात पर भी प्रतिबंध लागू किया गया था। उस समय वैश्विक बाजार में गेहूं की आपूर्ति को लेकर दबाव बना हुआ था। रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई थी, जिससे भारतीय गेहूं की विदेशी मांग में बढ़ोतरी हुई और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी थी।

    सरकार ने उस समय देश की बड़ी आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गेहूं तथा गेहूं के आटे की कीमतों को नियंत्रित रखने को प्राथमिकता दी थी। हालांकि, प्रतिबंधों के दौरान कुछ विशेष परिस्थितियों में गेहूं से बने चुनिंदा उत्पादों के निर्यात की अनुमति भी दी जाती रही।

    अब परिस्थितियों में बदलाव के बाद सरकार ने निर्यात नीति में ढील देने का फैसला किया है। इस वर्ष फरवरी में बेहतर स्टॉक उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 25 लाख मीट्रिक टन गेहूं और अतिरिक्त पांच लाख मीट्रिक टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी थी।

    इस फैसले की पृष्ठभूमि में देश में गेहूं और कुल खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 5.3 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 37.6563 करोड़ टन रहने का अनुमान है। वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 35.7732 करोड़ टन था।

    फसलवार आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में चावल का उत्पादन 15.4024 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष के 15.0184 करोड़ टन के मुकाबले अधिक है। इसी तरह गेहूं का उत्पादन भी बढ़ने का अनुमान है।

    वर्ष 2025-26 में गेहूं का उत्पादन 12.0657 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि 2024-25 में यह 11.7945 करोड़ टन था। उत्पादन में इस बढ़ोतरी और बेहतर स्टॉक उपलब्धता ने सरकार को गेहूं आधारित उत्पादों के निर्यात पर लगी पाबंदियों में बदलाव की गुंजाइश दी है।

    नीति में बदलाव से आटा, मैदा और सूजी जैसे उत्पादों के निर्यात कारोबार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय कृषि उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बढ़ाने का अवसर भी बनेगा। हालांकि, घरेलू बाजार में कीमतों और उपलब्धता पर सरकार की निगरानी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

  • मखाने की खेती को मिल रहा तकनीक और निर्यात का सहारा, उत्पादन बढ़ने से बिहार सहित किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

    मखाने की खेती को मिल रहा तकनीक और निर्यात का सहारा, उत्पादन बढ़ने से बिहार सहित किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

    नई दिल्ली ।भारत का मखाना क्षेत्र आने वाले वर्षों में तेजी से विस्तार करने की दिशा में बढ़ रहा है। बढ़ती घरेलू मांग, बेहतर बाजार कीमत, उत्पादन में वृद्धि और निर्यात के विस्तार के कारण वर्ष 2029-30 तक देश का मखाना बाजार 11 हजार से 12 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। केंद्र सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, मखाना अब केवल पारंपरिक खाद्य उत्पाद नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक और प्रीमियम स्नैक के रूप में घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रहा है।

    वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच मखाना उत्पादन में करीब 4 से 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन इसी अवधि में इसकी औसत कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। कीमतों में यह वृद्धि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग, प्रीमियम उत्पादों की लोकप्रियता और सीमित आपूर्ति जैसे कारणों से जुड़ी है।

    मखाने को कम वसा और पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जाता है। पौध-आधारित भोजन और क्लीन-लेबल उत्पादों की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान ने भी इसकी मांग को मजबूत किया है। घरेलू बाजार के साथ विदेशों में भी भारतीय मखाने की खपत बढ़ रही है, जिससे किसानों और प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

    वर्ष 2024-25 में देश में मखाने का कुल उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन रहा था। इस दौरान औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। वर्ष 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान में उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन और उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पहुंचने की संभावना है। उत्पादन और उत्पादकता में यह बढ़ोतरी खेती के आधुनिक तरीकों के बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाती है।

    मखाना उत्पादन में बिहार देश का प्रमुख राज्य है। वर्ष 2025-26 में बिहार का उत्पादन लगभग 60 हजार मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। राज्य में औसत उत्पादकता करीब 2 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। देश के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी सबसे बड़ी होने के कारण मखाना क्षेत्र के विस्तार का सीधा लाभ राज्य के किसानों को मिलने की संभावना है।

    पारंपरिक तौर पर मखाने की खेती तालाबों और जलाशयों में की जाती रही है, लेकिन अब फील्ड सिस्टम खेती और उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों से पैदावार बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इससे खेती के दायरे का विस्तार करने और उत्पादन से जुड़े जोखिम कम करने में भी मदद मिल रही है।

    भारत हर साल 60 हजार मीट्रिक टन से अधिक मखाने का उत्पादन करता है। इसमें करीब 40 प्रतिशत हिस्सा निर्यात होता है, जो लगभग 23 हजार से 25 हजार मीट्रिक टन के बराबर है। शेष उत्पादन की खपत घरेलू बाजार में होती है। घरेलू मखाना बाजार ने 2021-22 से 2024-25 के बीच करीब 17 से 18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है।

    सरकार ने इस क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए केंद्रीय बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की थी। इसके अलावा 2025-26 से 2030-31 के लिए 476.03 करोड़ रुपये की मखाना विकास केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी गई है। इसके तहत अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का कौशल विकास, कटाई के बाद प्रबंधन, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा।

    मखाना क्षेत्र में उत्पादन और बाजार दोनों के विस्तार से किसानों को बेहतर कीमत और नए बाजार मिलने की संभावना है। यदि उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रसंस्करण क्षमता में लगातार सुधार होता है, तो भारतीय मखाना वैश्विक प्रीमियम स्नैक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

  • उत्तर प्रदेश की वैश्विक उड़ान तेज, पीयूष गोयल बोले- व्यापार समझौतों से चमड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि उत्पादों को मिलेगा नया बाजार

    उत्तर प्रदेश की वैश्विक उड़ान तेज, पीयूष गोयल बोले- व्यापार समझौतों से चमड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि उत्पादों को मिलेगा नया बाजार

    नई दिल्ली । केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सोमवार को कहा कि उत्तर प्रदेश अब केवल स्थानीय आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि तेजी से वैश्विक विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य में उद्योग, निर्यात और रोजगार के नए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। भारत द्वारा किए गए मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उत्तर प्रदेश के उद्योगों, किसानों, कारीगरों और विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े उद्यमियों को मिल रहा है।

    पीयूष गोयल ने कहा कि भारत के व्यापार समझौते देश के विभिन्न राज्यों के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख उद्योग अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे राज्य के निर्यातकों को नए बाजार मिल रहे हैं और स्थानीय उत्पादों की मांग विदेशों में बढ़ने की संभावना मजबूत हो रही है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कानपुर का प्रसिद्ध चमड़ा उद्योग उत्तर प्रदेश की औद्योगिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अब व्यापार समझौतों और बेहतर वैश्विक पहुंच के कारण इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि चमड़ा उद्योग से जुड़े हजारों कारीगरों और कारोबारियों को इसका सीधा फायदा पहुंच सकता है।

    उन्होंने नोएडा के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र का भी उल्लेख किया और कहा कि यह क्षेत्र देश के प्रमुख उत्पादन केंद्रों में तेजी से विकसित हो रहा है। वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुंच मिलने से नोएडा के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं और निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और तकनीकी उत्पादों के निर्माण में उत्तर प्रदेश की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

    पीयूष गोयल ने सहारनपुर की पारंपरिक हस्तशिल्प कला को भी वैश्विक बाजार से जोड़ने की संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की विदेशों में मांग बढ़ रही है और व्यापारिक बाधाएं कम होने से छोटे कारीगरों और लघु उद्योगों को नए अवसर मिल सकते हैं। इससे स्थानीय कला और परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने में मदद मिलेगी।

    उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्र का भी जिक्र करते हुए कहा कि किसानों के उत्पादों के लिए वैश्विक बाजारों में संभावनाएं बढ़ रही हैं। बेहतर व्यापार व्यवस्था और निर्यात के नए रास्ते खुलने से कृषि उत्पादकों को अधिक अवसर मिल सकते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    गोयल ने कहा कि मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों को वैश्विक बाजारों से जोड़ने का काम तेज हुआ है। कानपुर का चमड़ा उद्योग, नोएडा का इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, सहारनपुर का हस्तशिल्प और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषि उत्पाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की आर्थिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर काम कर रही हैं। औद्योगिक विकास, निर्यात वृद्धि और निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियों के चलते आने वाले समय में राज्य देश की अर्थव्यवस्था में और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।