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  • सरकार ने गेहूं के आटे, मैदा और सूजी के निर्यात से हटाई पाबंदी, बेहतर उत्पादन और स्टॉक के बीच बड़ा फैसला


    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार ने गेहूं से बने कई प्रमुख उत्पादों के निर्यात को लेकर बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। सरकार ने गेहूं या मेस्लिन आटा, मैदा, सूजी, होलमील आटा और मिश्रित गेहूं के आटे को प्रतिबंधित निर्यात श्रेणी से हटाकर मुक्त श्रेणी में डाल दिया है। अब इन उत्पादों का निर्यात बिना पहले लगाए गए प्रतिबंधों के किया जा सकेगा।

    विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना में निर्यात नीति में किए गए इस बदलाव की जानकारी दी गई। इस फैसले से गेहूं आधारित उत्पादों के कारोबार से जुड़े निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी और वे मांग के अनुसार इन उत्पादों की विदेशी बाजारों में आपूर्ति कर सकेंगे।

    सरकार ने वर्ष 2022 में घरेलू खाद्य सुरक्षा और कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से गेहूं तथा गेहूं से बने उत्पादों के निर्यात पर कई तरह की पाबंदियां लगाई थीं। 13 मई 2022 को गेहूं की निर्यात नीति को मुक्त श्रेणी से प्रतिबंधित श्रेणी में कर दिया गया था।

    इसके बाद अगस्त 2022 में गेहूं के आटे के निर्यात पर भी प्रतिबंध लागू किया गया था। उस समय वैश्विक बाजार में गेहूं की आपूर्ति को लेकर दबाव बना हुआ था। रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई थी, जिससे भारतीय गेहूं की विदेशी मांग में बढ़ोतरी हुई और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी थी।

    सरकार ने उस समय देश की बड़ी आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गेहूं तथा गेहूं के आटे की कीमतों को नियंत्रित रखने को प्राथमिकता दी थी। हालांकि, प्रतिबंधों के दौरान कुछ विशेष परिस्थितियों में गेहूं से बने चुनिंदा उत्पादों के निर्यात की अनुमति भी दी जाती रही।

    अब परिस्थितियों में बदलाव के बाद सरकार ने निर्यात नीति में ढील देने का फैसला किया है। इस वर्ष फरवरी में बेहतर स्टॉक उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 25 लाख मीट्रिक टन गेहूं और अतिरिक्त पांच लाख मीट्रिक टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी थी।

    इस फैसले की पृष्ठभूमि में देश में गेहूं और कुल खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 5.3 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 37.6563 करोड़ टन रहने का अनुमान है। वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 35.7732 करोड़ टन था।

    फसलवार आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में चावल का उत्पादन 15.4024 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष के 15.0184 करोड़ टन के मुकाबले अधिक है। इसी तरह गेहूं का उत्पादन भी बढ़ने का अनुमान है।

    वर्ष 2025-26 में गेहूं का उत्पादन 12.0657 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि 2024-25 में यह 11.7945 करोड़ टन था। उत्पादन में इस बढ़ोतरी और बेहतर स्टॉक उपलब्धता ने सरकार को गेहूं आधारित उत्पादों के निर्यात पर लगी पाबंदियों में बदलाव की गुंजाइश दी है।

    नीति में बदलाव से आटा, मैदा और सूजी जैसे उत्पादों के निर्यात कारोबार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय कृषि उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बढ़ाने का अवसर भी बनेगा। हालांकि, घरेलू बाजार में कीमतों और उपलब्धता पर सरकार की निगरानी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

  • मखाने की खेती को मिल रहा तकनीक और निर्यात का सहारा, उत्पादन बढ़ने से बिहार सहित किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

    मखाने की खेती को मिल रहा तकनीक और निर्यात का सहारा, उत्पादन बढ़ने से बिहार सहित किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

    नई दिल्ली ।भारत का मखाना क्षेत्र आने वाले वर्षों में तेजी से विस्तार करने की दिशा में बढ़ रहा है। बढ़ती घरेलू मांग, बेहतर बाजार कीमत, उत्पादन में वृद्धि और निर्यात के विस्तार के कारण वर्ष 2029-30 तक देश का मखाना बाजार 11 हजार से 12 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। केंद्र सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, मखाना अब केवल पारंपरिक खाद्य उत्पाद नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक और प्रीमियम स्नैक के रूप में घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रहा है।

    वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच मखाना उत्पादन में करीब 4 से 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन इसी अवधि में इसकी औसत कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। कीमतों में यह वृद्धि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग, प्रीमियम उत्पादों की लोकप्रियता और सीमित आपूर्ति जैसे कारणों से जुड़ी है।

    मखाने को कम वसा और पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जाता है। पौध-आधारित भोजन और क्लीन-लेबल उत्पादों की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान ने भी इसकी मांग को मजबूत किया है। घरेलू बाजार के साथ विदेशों में भी भारतीय मखाने की खपत बढ़ रही है, जिससे किसानों और प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

    वर्ष 2024-25 में देश में मखाने का कुल उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन रहा था। इस दौरान औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। वर्ष 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान में उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन और उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पहुंचने की संभावना है। उत्पादन और उत्पादकता में यह बढ़ोतरी खेती के आधुनिक तरीकों के बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाती है।

    मखाना उत्पादन में बिहार देश का प्रमुख राज्य है। वर्ष 2025-26 में बिहार का उत्पादन लगभग 60 हजार मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। राज्य में औसत उत्पादकता करीब 2 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। देश के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी सबसे बड़ी होने के कारण मखाना क्षेत्र के विस्तार का सीधा लाभ राज्य के किसानों को मिलने की संभावना है।

    पारंपरिक तौर पर मखाने की खेती तालाबों और जलाशयों में की जाती रही है, लेकिन अब फील्ड सिस्टम खेती और उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों से पैदावार बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इससे खेती के दायरे का विस्तार करने और उत्पादन से जुड़े जोखिम कम करने में भी मदद मिल रही है।

    भारत हर साल 60 हजार मीट्रिक टन से अधिक मखाने का उत्पादन करता है। इसमें करीब 40 प्रतिशत हिस्सा निर्यात होता है, जो लगभग 23 हजार से 25 हजार मीट्रिक टन के बराबर है। शेष उत्पादन की खपत घरेलू बाजार में होती है। घरेलू मखाना बाजार ने 2021-22 से 2024-25 के बीच करीब 17 से 18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है।

    सरकार ने इस क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए केंद्रीय बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की थी। इसके अलावा 2025-26 से 2030-31 के लिए 476.03 करोड़ रुपये की मखाना विकास केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी गई है। इसके तहत अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का कौशल विकास, कटाई के बाद प्रबंधन, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा।

    मखाना क्षेत्र में उत्पादन और बाजार दोनों के विस्तार से किसानों को बेहतर कीमत और नए बाजार मिलने की संभावना है। यदि उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रसंस्करण क्षमता में लगातार सुधार होता है, तो भारतीय मखाना वैश्विक प्रीमियम स्नैक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

  • उत्तर प्रदेश की वैश्विक उड़ान तेज, पीयूष गोयल बोले- व्यापार समझौतों से चमड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि उत्पादों को मिलेगा नया बाजार

    उत्तर प्रदेश की वैश्विक उड़ान तेज, पीयूष गोयल बोले- व्यापार समझौतों से चमड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि उत्पादों को मिलेगा नया बाजार

    नई दिल्ली । केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सोमवार को कहा कि उत्तर प्रदेश अब केवल स्थानीय आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि तेजी से वैश्विक विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य में उद्योग, निर्यात और रोजगार के नए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। भारत द्वारा किए गए मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उत्तर प्रदेश के उद्योगों, किसानों, कारीगरों और विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े उद्यमियों को मिल रहा है।

    पीयूष गोयल ने कहा कि भारत के व्यापार समझौते देश के विभिन्न राज्यों के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख उद्योग अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे राज्य के निर्यातकों को नए बाजार मिल रहे हैं और स्थानीय उत्पादों की मांग विदेशों में बढ़ने की संभावना मजबूत हो रही है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कानपुर का प्रसिद्ध चमड़ा उद्योग उत्तर प्रदेश की औद्योगिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अब व्यापार समझौतों और बेहतर वैश्विक पहुंच के कारण इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी स्थिति और मजबूत करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि चमड़ा उद्योग से जुड़े हजारों कारीगरों और कारोबारियों को इसका सीधा फायदा पहुंच सकता है।

    उन्होंने नोएडा के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र का भी उल्लेख किया और कहा कि यह क्षेत्र देश के प्रमुख उत्पादन केंद्रों में तेजी से विकसित हो रहा है। वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुंच मिलने से नोएडा के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं और निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और तकनीकी उत्पादों के निर्माण में उत्तर प्रदेश की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

    पीयूष गोयल ने सहारनपुर की पारंपरिक हस्तशिल्प कला को भी वैश्विक बाजार से जोड़ने की संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की विदेशों में मांग बढ़ रही है और व्यापारिक बाधाएं कम होने से छोटे कारीगरों और लघु उद्योगों को नए अवसर मिल सकते हैं। इससे स्थानीय कला और परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने में मदद मिलेगी।

    उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्र का भी जिक्र करते हुए कहा कि किसानों के उत्पादों के लिए वैश्विक बाजारों में संभावनाएं बढ़ रही हैं। बेहतर व्यापार व्यवस्था और निर्यात के नए रास्ते खुलने से कृषि उत्पादकों को अधिक अवसर मिल सकते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    गोयल ने कहा कि मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों को वैश्विक बाजारों से जोड़ने का काम तेज हुआ है। कानपुर का चमड़ा उद्योग, नोएडा का इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, सहारनपुर का हस्तशिल्प और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषि उत्पाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की आर्थिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर काम कर रही हैं। औद्योगिक विकास, निर्यात वृद्धि और निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियों के चलते आने वाले समय में राज्य देश की अर्थव्यवस्था में और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • रिकॉर्ड 863.1 अरब डॉलर के निर्यात में एफटीए बने गेमचेंजर, नए वैश्विक बाजारों तक भारत की पहुंच मजबूत

    रिकॉर्ड 863.1 अरब डॉलर के निर्यात में एफटीए बने गेमचेंजर, नए वैश्विक बाजारों तक भारत की पहुंच मजबूत

    नई दिल्ली । भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 863.1 अरब डॉलर का अब तक का सर्वाधिक निर्यात दर्ज कर नया रिकॉर्ड बनाया है। सरकार ने संसद में जानकारी देते हुए बताया कि इस उपलब्धि में विभिन्न मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन समझौतों के माध्यम से भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुंच मिली, शुल्क रियायतों का लाभ बढ़ा और श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा हुए। सरकार का कहना है कि एफटीए की बदौलत भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत हुई है और निर्यात के नए क्षेत्रों में विस्तार संभव हुआ है।

    लोकसभा में लिखित उत्तर देते हुए वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में वस्तु निर्यात (मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट) 441.8 अरब डॉलर रहा, जबकि सेवा क्षेत्र का निर्यात बढ़कर 421.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। दोनों क्षेत्रों के संयुक्त प्रदर्शन से देश का कुल निर्यात 863.1 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। उन्होंने कहा कि सरकार व्यापार समझौतों के तहत मिलने वाली शुल्क रियायतों के उपयोग की लगातार निगरानी कर रही है, ताकि भारतीय निर्यातकों को इनका अधिकतम लाभ मिल सके।

    सरकार के अनुसार भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) लागू होने के बाद अब तक 4.45 लाख सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए जा चुके हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय निर्यातकों ने शुल्क रियायतों का व्यापक रूप से उपयोग किया है। यूएई को निर्यात होने वाली एचएस 8-डिजिट टैरिफ लाइनों की संख्या भी वित्त वर्ष 2021-22 के 7,546 से बढ़कर 2025-26 में 8,053 हो गई। इन टैरिफ लाइनों के तहत 37.3 अरब डॉलर का निर्यात दर्ज किया गया, जो भारतीय उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग का संकेत माना जा रहा है।

    भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (ईसीटीए) के तहत भी भारतीय निर्यातकों को उल्लेखनीय लाभ मिला है। समझौते के बाद अब तक 2.73 लाख सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए गए हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया को निर्यात होने वाली टैरिफ लाइनों की संख्या बढ़कर 5,668 हो गई है, जिनके माध्यम से 7.2 अरब डॉलर का निर्यात हुआ। इसी प्रकार भारत-मॉरीशस व्यापक आर्थिक सहयोग एवं साझेदारी समझौते (सीईसीपीए) के तहत भी टैरिफ लाइनों और निर्यात मूल्य दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे भारतीय उत्पादों की पहुंच नए क्षेत्रों तक विस्तारित हुई है।

    सरकार ने बताया कि भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के तहत भारत के 99.38 प्रतिशत निर्यात को शुल्क मुक्त पहुंच प्राप्त हुई है। समझौता लागू होने के बाद ओमान को निर्यात में तेज वृद्धि देखने को मिली है। जून 2026 में ओमान को 622.8 मिलियन डॉलर का निर्यात दर्ज किया गया, जो मई 2026 की तुलना में 54.7 प्रतिशत और जून 2025 की तुलना में 189.6 प्रतिशत अधिक रहा। इसके अलावा यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के साथ लागू समझौते के बाद भी हजारों सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए जा चुके हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों को शुल्क रियायतों का व्यापक लाभ मिला है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हाल के वर्षों में किए गए एफटीए में टेक्सटाइल, चमड़ा और अन्य श्रम-प्रधान उद्योगों को विशेष प्राथमिकता दी गई है। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और ईएफटीए जैसे साझेदार देशों के साथ हुए समझौतों ने भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजारों के द्वार खोले हैं। सरकार का कहना है कि इन समझौतों में घरेलू उद्योगों के हितों की सुरक्षा के साथ संतुलित रणनीति अपनाई गई है, जिससे निर्यात बढ़ाने के साथ-साथ देश के औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को भी नई गति मिली है।

  • आम महोत्सव में दिखेगी स्वाद, तकनीक और निर्यात की नई तस्वीर, किसानों से लेकर बच्चों तक के लिए होंगे विशेष आकर्षण, यूपी की आम अर्थव्यवस्था बनेगी चर्चा का केंद्र

    आम महोत्सव में दिखेगी स्वाद, तकनीक और निर्यात की नई तस्वीर, किसानों से लेकर बच्चों तक के लिए होंगे विशेष आकर्षण, यूपी की आम अर्थव्यवस्था बनेगी चर्चा का केंद्र

    नई दिल्ली। आम केवल स्वाद का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की कृषि, बागवानी और निर्यात अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी बन चुका है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आयोजित होने वाले आम महोत्सव में किसानों, बागवानों, कृषि विशेषज्ञों, व्यापारियों और आम प्रेमियों को एक ही मंच पर जोड़ने की तैयारी की गई है। इस आयोजन में आम की आधुनिक खेती, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, अंतरराष्ट्रीय निर्यात, बाजार प्रबंधन और नई तकनीकों पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही बच्चों के लिए आम खाने की प्रतियोगिता जैसे मनोरंजक कार्यक्रम भी आकर्षण का केंद्र रहेंगे।

    महोत्सव के दौरान कृषि विशेषज्ञ आम की बागवानी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर मार्गदर्शन देंगे। इसमें पौधों के वैज्ञानिक प्रबंधन, उन्नत किस्मों का चयन, समय पर कटाई, कीट एवं रोग नियंत्रण, फलों की गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त करने की रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा होगी। विशेषज्ञ किसानों को आधुनिक तकनीकों के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने और लागत कम करने के व्यावहारिक उपाय भी बताएंगे।

    उत्तर प्रदेश देश में आम उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां की जलवायु और मिट्टी कई प्रसिद्ध किस्मों के लिए उपयुक्त है। राज्य के दशहरी, लंगड़ा, चौसा, रटौल, बॉम्बे ग्रीन और गौरजीत जैसे आम देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। विशेष रूप से मलिहाबाद का दशहरी अपनी मिठास, सुगंध और रेशारहित गूदे के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय है, जबकि वाराणसी का लंगड़ा और सहारनपुर का चौसा भी निर्यात बाजार में लगातार मांग बनाए हुए हैं।

    राज्य में आम के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक पैक हाउस, प्रसंस्करण इकाइयों और गुणवत्ता परीक्षण सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप फलों की पैकिंग और ट्रीटमेंट के कारण उत्तर प्रदेश से कई देशों में बड़ी मात्रा में आम और आम उत्पादों का निर्यात हो रहा है। भविष्य में जेवर क्षेत्र में प्रस्तावित फ्रूट टेस्टिंग एवं ट्रीटमेंट सेंटर से निर्यात प्रक्रिया को और अधिक गति मिलने की उम्मीद है। किसानों को फ्रूट बैग वितरण और पुराने बागों के पुनर्जीवन के लिए दी जा रही सब्सिडी जैसी योजनाएं भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

    आम महोत्सव में विभिन्न किस्मों की विशेषताओं को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया जाएगा। दशहरी अपनी सुगंध और मिठास के लिए प्रसिद्ध है, जबकि लंगड़ा का खट्टा-मीठा स्वाद इसे अलग पहचान देता है। चौसा अपनी रसीली बनावट के कारण पसंद किया जाता है और रटौल अपनी विशिष्ट खुशबू के लिए जाना जाता है। बॉम्बे ग्रीन और गौरजीत जैसी किस्में भी अपने स्वाद और समय से पहले पकने की विशेषता के कारण किसानों और उपभोक्ताओं के बीच लोकप्रिय हैं।

    महोत्सव का एक प्रमुख आकर्षण जापान की प्रसिद्ध मियाजाकी किस्म भी होगी, जिसे दुनिया के सबसे महंगे आमों में गिना जाता है। पकने पर इसका रंग गहरा लाल और बैंगनी हो जाता है तथा इसका गूदा पूरी तरह रेशारहित होता है। इसमें प्राकृतिक शर्करा की मात्रा सामान्य किस्मों की तुलना में अधिक होती है, जिससे इसका स्वाद अत्यंत मीठा माना जाता है। उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों ने भी इसकी सफल खेती शुरू कर नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और निर्यात उन्मुख खेती के माध्यम से भारत का आम उद्योग आने वाले वर्षों में वैश्विक बाजार में और अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।

  • इजरायली तकनीक से नरसिंहपुर में चमत्कार: बंजर जमीन पर खड़ा किया 70 एकड़ का 'मैंगो किंगडम', अब लंदन-दुबई में धूम

    इजरायली तकनीक से नरसिंहपुर में चमत्कार: बंजर जमीन पर खड़ा किया 70 एकड़ का 'मैंगो किंगडम', अब लंदन-दुबई में धूम

    मध्य प्रदेश। राज्य के नरसिंहपुर जिले के छेना गाँव से आधुनिक कृषि और दृढ़ संकल्प की एक ऐसी अभूतपूर्व कहानी सामने आई है, जिसने देश के कृषि विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है। जहां की पथरीली और कम उपजाऊ जमीन पर पारंपरिक खेती करना भी घाटे का सौदा माना जाता था, वहीं आज इजरायली तकनीक के चमत्कार से 70 एकड़ का एक विशाल और आधुनिक आमों का साम्राज्य खड़ा हो चुका है। स्थानीय प्रगतिशील किसान के इस साहसिक और तकनीकी प्रयास की बदौलत अब नरसिंहपुर के रसीले आमों का स्वाद सात समंदर पार दुबई और लंदन जैसे वैश्विक बाजारों तक पहुँच गया है।

    कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस सफलता के पीछे इजरायल की प्रसिद्ध ‘अल्ट्रा हाई डेंसिटी प्लांटेशन’ (UHDP) यानी सघन बागवानी कूटनीति और आधुनिक ड्रिप सिंचाई प्रणाली का कुशल उपयोग है। पारंपरिक तरीके से जहां एक एकड़ में आम के बेहद सीमित पौधे लगाए जाते हैं, वहीं इस आधुनिक इजरायली तकनीक के माध्यम से प्रति एकड़ पौधों की संख्या कई गुना बढ़ा दी गई। इसके साथ ही, बूंद-बूंद सिंचाई और नियंत्रित खाद प्रबंधन के जरिए पौधों को सीधे जड़ों तक पोषक तत्व दिए गए, जिससे पथरीली और कम पानी वाली जमीन पर भी पौधों का तेजी से और स्वस्थ विकास संभव हो सका।

    नरसिंहपुर के इस विशाल मैंगो ऑर्चर्ड (आम के बाग) में आम की कई उन्नत और व्यावसायिक प्रजातियों का उत्पादन किया जा रहा है, जिनकी मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बहुत अधिक है। फसल की गुणवत्ता, रंग और स्वाद को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाए रखने के लिए पूरी तरह से जैविक और वैज्ञानिक पद्धतियों का पालन किया जाता है। यही कारण है कि इस बाग के आमों को सीधे विदेशों में निर्यात करने के लिए अंतरराष्ट्रीय डीलर्स और बड़ी कंपनियों से अनुबंध मिले हैं, जिससे स्थानीय क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी आय के नए मार्ग खुल गए हैं।

    इस चमत्कारिक कृषि मॉडल ने न केवल नरसिंहपुर बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के कृषि परिदृश्य को एक नई दिशा दिखाई है। जिला प्रशासन और बागवानी विभाग के अधिकारी भी इस सफलता को एक बड़े उदाहरण के रूप में देख रहे हैं। इस बागवानी मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम पानी और विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों में भी बंपर पैदावार सुनिश्चित करता है। लंदन और दुबई जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में यहां के आमों की खेप पहुंचने से भारतीय कृषि उत्पादों की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत हुई है।

    इस कृषि क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही तकनीक, कड़ा परिश्रम और आधुनिक दृष्टिकोण को मिला दिया जाए, तो किसी भी बंजर या कम उम्मीद वाली जमीन को सोने की खान में बदला जा सकता है। आज इस 70 एकड़ के आम साम्राज्य को देखने और समझने के लिए दूर-दूर से किसान और कृषि वैज्ञानिक नरसिंहपुर के छेना गाँव पहुँच रहे हैं। यह प्रोजेक्ट अब क्षेत्र के ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा जरिया बन चुका है और आत्मनिर्भर खेती की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।

  • भारत के इंजीनियरिंग निर्यात ने पकड़ी रफ्तार, अप्रैल में 10.4 अरब डॉलर का कारोबार

    भारत के इंजीनियरिंग निर्यात ने पकड़ी रफ्तार, अप्रैल में 10.4 अरब डॉलर का कारोबार


    नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में लॉजिस्टिक चुनौतियों के बावजूद भारत के इंजीनियरिंग गुड्स निर्यात ने वित्त वर्ष 2026-27 की मजबूत शुरुआत की है। अप्रैल 2026 में देश का इंजीनियरिंग निर्यात सालाना आधार पर करीब 9 प्रतिशत बढ़कर 10.35 अरब डॉलर पहुंच गया।

    इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (EEPC) इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष अप्रैल में यह निर्यात 9.52 अरब डॉलर था। इस बार कई प्रमुख सेक्टर्स में मजबूत मांग और बेहतर प्रदर्शन के कारण निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    डेटा के मुताबिक एल्युमीनियम और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात में 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि तांबा और उससे संबंधित उत्पादों में 80 प्रतिशत का बड़ा उछाल दर्ज किया गया। इसके अलावा इलेक्ट्रिकल मशीनरी और उपकरणों के निर्यात में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

    ऑटोमोबाइल सेक्टर ने भी निर्यात वृद्धि में अहम योगदान दिया। दोपहिया और तिपहिया वाहनों के निर्यात में 36 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई, जबकि ऑटो कंपोनेंट्स और पार्ट्स के निर्यात में 7.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

    EEPC इंडिया के अनुसार, इंजीनियरिंग गुड्स के कुल 34 पैनलों में से 28 ने अप्रैल महीने में सकारात्मक निर्यात वृद्धि दर्ज की, जो सेक्टर की व्यापक मजबूती को दर्शाता है।

    ईईपीसी इंडिया के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने कहा कि मध्य पूर्व में जारी तनाव और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों के बावजूद अधिकांश क्षेत्रों और बाजारों में भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों की मांग बनी हुई है। उन्होंने कहा कि भारत-ओमान व्यापार समझौते के कारण ओमान को निर्यात में बढ़ोतरी देखने को मिली है।

    हालांकि पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका (WANA) क्षेत्र में संघर्ष के कारण निर्यात पर दबाव बना हुआ है। वहीं आसियान देशों में भी मांग कमजोर रहने और ऑटोमोबाइल शिपमेंट में गिरावट के चलते निर्यात अपेक्षाकृत धीमा रहा।

    अप्रैल में अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के प्रमुख बाजार रहे। वहीं चीन को होने वाला निर्यात 81.7 प्रतिशत बढ़कर 301 मिलियन डॉलर से अधिक पहुंच गया।

    क्षेत्रीय स्तर पर उत्तरी अमेरिका में 7.1 प्रतिशत और यूरोपीय संघ में 13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि यूएई, सिंगापुर और सऊदी अरब को होने वाले निर्यात में गिरावट देखने को मिली।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में देश के कुल व्यापारिक निर्यात में इंजीनियरिंग गुड्स की हिस्सेदारी 23.8 प्रतिशत रही, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 24.9 प्रतिशत थी।

  • भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर सुधार, अप्रैल में PMI ने दिखाया मजबूत प्रदर्शन

    भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर सुधार, अप्रैल में PMI ने दिखाया मजबूत प्रदर्शन

    नई दिल्ली।भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर लगातार मजबूती की ओर बढ़ रहा है और ताजा आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि औद्योगिक गतिविधियों में स्थिर सुधार देखा जा रहा है। अप्रैल महीने में मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई बढ़कर 54.7 पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के 53.9 की तुलना में बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है। यह वृद्धि मुख्य रूप से नए ऑर्डर में बढ़ोतरी, उत्पादन में तेजी और रोजगार के अवसरों में सुधार के कारण सामने आई है।
    अप्रैल के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। खासकर निर्यात के क्षेत्र में सुधार देखने को मिला है, जहां पिछले कई महीनों की तुलना में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है। इसका संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जिससे उद्योग जगत को नई ऊर्जा मिल रही है।
    हालांकि, इस सकारात्मक रुझान के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। वैश्विक स्तर पर जारी तनाव और अनिश्चितताओं, विशेषकर मध्य पूर्व में चल रहे हालात, का असर लागत पर दिखाई दे रहा है। इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी हुई है, जिससे उत्पादन खर्च में भी इजाफा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही आउटपुट कीमतों में भी तेजी देखी गई है, जो पिछले कई महीनों में सबसे अधिक मानी जा रही है।
    इसके बावजूद उत्पादन गतिविधियां स्थिर बनी हुई हैं। कंपनियों ने बताया है कि घरेलू मांग और विज्ञापन गतिविधियों ने बिक्री और उत्पादन को समर्थन दिया है। हालांकि, प्रतिस्पर्धा का दबाव और कुछ ग्राहकों द्वारा ऑर्डर को अंतिम रूप देने में देरी के कारण विकास की गति थोड़ी प्रभावित हुई है।
    उद्योग जगत के प्रतिभागियों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों के बावजूद भविष्य को लेकर भरोसा बना हुआ है। कंपनियां आने वाले महीनों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही हैं और नए निवेश तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं। हालांकि, इस विश्वास में पिछले महीने की तुलना में हल्की कमी जरूर देखी गई है, लेकिन यह अभी भी एक सकारात्मक स्तर पर बना हुआ है।
    कुल मिलाकर भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एक स्थिर और मजबूत विकास पथ पर आगे बढ़ रहा है। घरेलू मांग, निर्यात में सुधार और उत्पादन गतिविधियों की निरंतरता इस वृद्धि के प्रमुख आधार हैं। यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो आने वाले समय में इस क्षेत्र में और भी मजबूती देखने को मिल सकती है।
  • होर्मुज में अमेरिकी नाकाबंदी से ग्लोबल मार्केट में उथल-पुथल …. कच्चा तेल 120 डॉलर के पार

    होर्मुज में अमेरिकी नाकाबंदी से ग्लोबल मार्केट में उथल-पुथल …. कच्चा तेल 120 डॉलर के पार


    तेहरान।
    ग्लोबल ऑयल मार्केट (Global Oil Market) में उथल-पुथल जारी है। अमेरिका के ईरान के खिलाफ सख्त रुख और होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में जारी नौसैनिक नाकाबंदी (Naval blockade) के चलते कच्चे तेल के दाम (Crude Oil Price) लगातार बढ़ रहे हैं। गुरुवार को कीमतों में और इजाफा देखने को मिला, जबकि एक दिन पहले ही इनमें करीब 7 प्रतिशत की उछाल आई थी।


    ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के पार

    ब्लूमबर्ग के मुताबिक इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर ब्रेंट क्रूड का जून कॉन्ट्रैक्ट 120.08 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जो पिछले बंद स्तर से 1.74 प्रतिशत अधिक है। वहीं, न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज (Nymex) पर वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) का जून कॉन्ट्रैक्ट 0.55 प्रतिशत चढ़कर 107.47 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।


    ट्रंप का बयान: ‘सूअर की तरह घुट रहे हैं ईरान’

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में साफ किया कि जब तक ईरान के साथ परमाणु समझौता नहीं हो जाता, तब तक होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी नहीं हटाई जाएगी। उन्होंने कहा, “यह नाकाबंदी बमबारी से कहीं ज्यादा कारगर है। वे (ईरान) सूअर की तरह घुट रहे हैं। उनके पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते।”


    ईरान का प्रस्ताव भी खारिज

    इससे पहले ईरान ने परमाणु वार्ता को टालते हुए होर्मुज को फिर से खोलने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन ट्रंप इससे खुश नहीं थे क्योंकि इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा नहीं उठाया गया था। शांति वार्ता ठप होने और नाकाबंदी जारी रहने से ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चरमरा गई है। ध्यान रहे कि होर्मुज स्ट्रेट से होकर दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस व्यापार की आवाजाही होती है।

    भारत पर क्या असर पड़ रहा है?
    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में इस नाकाबंदी ने देश के लिए एलपीजी, एलएनजी और क्रूड ऑयल की सप्लाई बुरी तरह बाधित की है। महंगे कच्चे तेल का सीधा असर आम नागरिक की जेब पर भी पड़ने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं, हालांकि पेट्रोल-डीजल के रिटेल दाम अभी स्थिर हैं।


    इक्रा की चेतावनी: इन सेक्टरों पर दबाव

    रेटिंग एजेंसी इक्रा ने बुधवार को अनुमान जताया कि वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में कच्चे माल की कीमतों में दबाव और सप्लाई कमी के चलते ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs, फर्टीलाइजर सेक्टर, केमिकल इंडस्ट्री, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन क्षेत्र के मुनाफे पर असर पड़ेगा।


    OMCs का मुनाफा क्यों घट रहा है?

    इक्रा के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ ने बताया कि क्रूड की ऊंची कीमतों के बावजूद पंप पर पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए गए हैं, जिससे तेल कंपनियों की लाभप्रदता प्रभावित हुई है। हाल ही में एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद भी यह स्थिति बनी हुई है।


    कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर कितना हो रहा नुकसान

    उनके अनुसार, अगर क्रूड 120-125 डॉलर प्रति बैरल पर रहता है और लॉन्ग-टर्म औसत क्रैक स्प्रेड बना रहता है, तो पेट्रोल पर मार्केटिंग मार्जिन लगभग माइनस 14 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर माइनस 18 रुपये प्रति लीटर रहने का अनुमान है।


    क्या आगे और बढ़ेंगे दाम?

    विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक होर्मुज स्ट्रेट में नाकाबंदी जारी रहेगी और अमेरिका-ईरान वार्ता में सफलता नहीं मिलती, तब तक तेल की कीमतों में गिरावट की संभावना कम है। भारत जैसे आयात पर निर्भर देश के लिए यह चिंता का विषय बना हुआ है।

  • सीएम डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में एमपी-यूपी सहयोग सम्मेलन: ओडीओपी, शिल्प और पर्यटन को मिलेगी नई गति

    सीएम डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में एमपी-यूपी सहयोग सम्मेलन: ओडीओपी, शिल्प और पर्यटन को मिलेगी नई गति


    भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में वाराणसी में 31 मार्च को एमपी-यूपी सहयोग सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है यह सम्मेलन निवेश, निर्यात, ओडीओपी, शिल्प और पर्यटन के क्षेत्र में नई दिशा और गति प्रदान करेगा

    इस सम्मेलन के माध्यम से अंतरराज्यीय सहयोग का नया मॉडल गढ़ने की दिशा में निर्णायक पहल की जा रही है सम्मेलन में ओडीओपी, जीआई टैग उत्पाद, पारंपरिक शिल्प, कृषि एवं फूड उत्पादों को ब्रांडिंग, मार्केटिंग और निर्यात से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा साथ ही निवेश और पर्यटन को एकीकृत करते हुए एक व्यापक आर्थिक इकोसिस्टम तैयार करने की योजना है

    कार्यक्रम की शुरुआत मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के अध्ययन भ्रमण से करेंगे इस दौरान क्राउड फ्लो डिजाइन, अधोसंरचना लेआउट और तीर्थयात्री प्रबंधन प्रणालियों का गहन अवलोकन किया जाएगा इसके बाद सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर विस्तृत संवाद और कार्यशालाओं के माध्यम से राज्यों के सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा होगी

    एमपी-यूपी सहयोग सम्मेलन से दोनों राज्यों के व्यवसायिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है इसके तहत पारंपरिक शिल्प और कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने के लिए रणनीतियां बनाई जाएंगी निवेशकों को आकर्षित करने और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी विशेष पहल की जाएगी इस तरह यह सम्मेलन दोनों राज्यों के लिए आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती लाने का एक महत्वपूर्ण अवसर साबित होगा