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  • तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में लंबे अंतराल के बाद निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता तस्लीमा नसरीन की सार्वजनिक मौजूदगी एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। करीब 19 वर्ष बाद कोलकाता में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उनका स्वागत करते हुए भरोसा दिलाया कि जब भी वह पश्चिम बंगाल आना चाहेंगी, उन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इस अवसर को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित धार्मिक कट्टरवाद के विरोध पर केंद्रित साहित्यिक कार्यक्रम में तस्लीमा नसरीन ने हिस्सा लिया। लंबे समय बाद शहर में उनकी सार्वजनिक उपस्थिति ने साहित्य, समाज और राजनीति से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार प्रत्येक लेखक और विचारक के अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करती है। उन्होंने तस्लीमा नसरीन को आश्वस्त किया कि वह अपनी इच्छा के अनुसार जितनी बार चाहें पश्चिम बंगाल आ सकती हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि तस्लीमा नसरीन की रचनाओं को बड़ी संख्या में पाठक पढ़ते हैं और साहित्य के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक समाज में लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने विचार रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इसी भावना के तहत राज्य सरकार उनकी यात्रा और सुरक्षा से जुड़े सभी आवश्यक इंतजाम करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए तस्लीमा नसरीन ने अपनी वापसी को प्रतीकात्मक बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय बाद कोलकाता लौटना इस बात का संकेत है कि अन्याय हमेशा कायम नहीं रहता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर आधारित रहा है। उनके अनुसार समाज में स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति के लिए सुरक्षित वातावरण आवश्यक है।

    तस्लीमा नसरीन वर्ष 1994 से निर्वासन का जीवन जी रही हैं। अपनी लेखनी और विचारों के कारण उन्हें कट्टरपंथी संगठनों की ओर से लगातार धमकियां मिलने के बाद बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। बाद के वर्षों में वह भारत सहित विभिन्न देशों में रहीं। वर्ष 2007 में कोलकाता में उनके लेखन को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उनकी सार्वजनिक रूप से कोलकाता वापसी नहीं हो सकी थी।

    करीब दो दशक बाद उनकी यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने भविष्य के लिए ऐसी दुनिया की उम्मीद जताई, जहां किसी लेखक को अपने विचार व्यक्त करने के कारण अपना घर या देश छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े। उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य समाज में संवाद और विचारों का विस्तार करना है, न कि भय का वातावरण बनाना।

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी और राज्य सरकार की ओर से दिए गए सुरक्षा आश्वासन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नई चर्चा को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा साहित्यिक और सामाजिक विमर्श के साथ-साथ सार्वजनिक बहस का भी महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

  • दिलजीत दोसांझ की प्रतिबंधित फिल्म 'सतलुज' के लेखक ने तोड़ी चुप्पी; सीबीएफसी और सिस्टम की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल

    दिलजीत दोसांझ की प्रतिबंधित फिल्म 'सतलुज' के लेखक ने तोड़ी चुप्पी; सीबीएफसी और सिस्टम की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘सतलुज’ इन दिनों देश के सिनेमा जगत और दर्शकों के बीच गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘ज़ी5’ पर रिलीज होने के महज दो दिनों के भीतर ही इस फिल्म को अचानक प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया, जिसके बाद से इसके कंटेंट और प्रतिबंध को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। हनी त्रेहन के निर्देशन में बनी इस फिल्म का नाम पहले ‘पंजाब 95’ रखा गया था, जिसे सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के बाद बदलकर ‘सतलुज’ किया गया था। अब इस फिल्म के सह-लेखक निरेन भट्ट ने फिल्म को बिना किसी स्पष्ट कारण के हटाए जाने पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

    फिल्म के सह-लेखक निरेन भट्ट ने हाल ही में एक मीडिया साक्षात्कार में फिल्म को हटाए जाने की प्रक्रिया और सिस्टम की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सिस्टम में बैठे कुछ लोगों को इस फिल्म की कहानी से बहुत बड़ी दिक्कत है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस पूरे मामले पर संबंधित विभागों की ओर से बातचीत का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। उन्होंने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी की तरफ से साधी गई लंबी चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि बोर्ड कभी यह स्पष्ट नहीं करता कि उन्हें फिल्म के किस हिस्से से आपत्ति है या ये फैसले आखिर किस स्तर पर लिए जा रहे हैं।

    प्रशासनिक हलकों और रिपोर्ट्स में यह अंदेशा जताया गया था कि इस संवेदनशील फिल्म को भारत विरोधी तत्वों द्वारा एक एजेंडे या प्रोपेगैंडा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए निरेन भट्ट ने देश में हाल ही में रिलीज हुई अन्य राजनीतिक और संवेदनशील फिल्मों का उदाहरण दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि देश में ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरला स्टोरी’ जैसी फिल्में बिना किसी रुकावट के रिलीज हो सकती हैं, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय ताकतों का हथियार क्यों नहीं माना गया। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि सिर्फ एक बायोग्राफी को दबाने के लिए काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर फैसला लेना बिल्कुल अतार्किक है।

    उल्लेखनीय है कि फिल्म ‘सतलुज’ की कहानी पंजाब के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के वास्तविक जीवन और उनके संघर्षों पर आधारित है। जसवंत सिंह खालड़ा पेशे से एक बैंक कर्मचारी थे, जिन्होंने साल 1984 से 1994 के बीच पंजाब के अशांत दौर में मारे गए और लापता घोषित किए गए लगभग 25 हजार लोगों के लावारिस अंतिम संस्कार के मामलों की स्वतंत्र जांच शुरू की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि इन लोगों को फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मारा गया था। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों को लेकर काम करने वाले संगठनों के बीच यह मामला हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है क्योंकि इस मामले की जांच के दौरान ही खालड़ा रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए थे और बाद में उनका शव सतलुज नदी से बरामद हुआ था।