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  • मुंबई अंडरवर्ल्ड में दाऊद की डी-कंपनी से लॉरेंस बिश्नोई नेटवर्क तक बदला अपराध का तरीका

    मुंबई अंडरवर्ल्ड में दाऊद की डी-कंपनी से लॉरेंस बिश्नोई नेटवर्क तक बदला अपराध का तरीका

    नई दिल्ली । मुंबई में अंडरवर्ल्ड का इतिहास कई दशकों पुराना है। 1980 और 1990 के दशक में दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी का प्रभाव इतना व्यापक माना जाता था कि उसका नाम फिल्म उद्योग, कारोबार और आपराधिक गतिविधियों से जुड़ने लगा था। उस दौर में हाजी मस्तान, करीम लाला और वरदराजन मुदलियार जैसे नामों के बाद दाऊद का नेटवर्क तेजी से उभरा। अब फिल्मी हस्तियों से जुड़ी गोलीबारी की घटनाओं के बाद लॉरेंस बिश्नोई गैंग की गतिविधियों और मुंबई में उसकी मौजूदगी को लेकर चर्चा बढ़ गई है।

    डी-कंपनी का प्रभाव 1980 के दशक के आखिरी वर्षों और 1990 के शुरुआती दौर में बढ़ा। उस समय दाऊद इब्राहिम, छोटा शकील, अबू सलेम और छोटा राजन जैसे नाम मुंबई के आपराधिक जगत में चर्चित थे। आरोप लगते रहे कि अंडरवर्ल्ड ने फिल्मों में अवैध धन लगाया और कलाकारों, निर्माताओं तथा फिल्म वितरण से जुड़े लोगों पर दबाव बनाया। कुछ फिल्मी हस्तियों और निर्माताओं को सुरक्षा भी मांगनी पड़ी थी। इस दौर में अपराध जगत और बॉलीवुड के संबंधों को लेकर कई मामले सामने आए।

    1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने अंडरवर्ल्ड नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी। दाऊद इब्राहिम भारत से बाहर चला गया। मुंबई पुलिस की अपराध शाखा की कार्रवाई, गिरफ्तारियों और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून यानी मकोका के इस्तेमाल से पुराने गिरोहों पर दबाव बढ़ा। छोटा राजन के जेल जाने और डी-कंपनी के नेटवर्क के कमजोर पड़ने के साथ मुंबई में संगठित अपराध का पुराना स्वरूप भी बदलने लगा। फिल्म उद्योग में कॉर्पोरेट निवेश और स्टूडियो व्यवस्था के विस्तार ने अवैध धन पर निर्भरता कम करने में भूमिका निभाई।

    इसी बीच उत्तर भारत में लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड़ का नेटवर्क विकसित हुआ। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, करीब 2012 में पंजाब विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति और छात्र संगठन एसओपीयू से जुड़े विवादों के दौरान लॉरेंस का गिरोह सक्रिय हुआ। कॉलेज के झगड़ों, आपसी रंजिश और स्थानीय विवादों के बीच उसने युवाओं को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। 2013 में एक विरोधी उम्मीदवार की हत्या के बाद संपत नेहरा का नाम भी गिरोह से जुड़ा। 2018 में सलमान खान को निशाना बनाने के इरादे से मुंबई में रेकी किए जाने की बात भी सामने आई थी।

    वर्ष 2015 से अलग-अलग जेलों में बंद रहने के बावजूद लॉरेंस बिश्नोई का नेटवर्क विभिन्न राज्यों में फैला। गोल्डी बराड़, काला जठेड़ी, रोहित गोदारा और अनमोल बिश्नोई जैसे नाम इस नेटवर्क से जुड़े बताए जाते हैं। इस गिरोह की गतिविधियों में सोशल मीडिया, विदेश से संपर्क और जेल के भीतर से कथित तौर पर संचालित संचार व्यवस्था की भूमिका की चर्चा होती रही है। हालांकि, किसी विशेष घटना में गिरोह की भूमिका का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।

    मुंबई में हाल की घटनाओं ने इस नेटवर्क को फिर चर्चा में ला दिया है। फरवरी 2026 में फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी के जुहू स्थित घर के बाहर गोलीबारी हुई थी। इस मामले में बिश्नोई गैंग के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद 18 अक्टूबर 2026 को अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर जुहू इलाके में गोलीबारी की खबर आई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस घटना में अभिनेता सुरक्षित रहे। इन मामलों के बाद फिल्मी हस्तियों की सुरक्षा और जबरन वसूली की आशंकाओं को लेकर सवाल उठे हैं।

    हालांकि, इन घटनाओं के आधार पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग को 1990 के दशक की डी-कंपनी के समान व्यापक नियंत्रण वाला संगठन मानना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई में रंगदारी के मामले 2024 में 199 थे, जो 2025 में बढ़कर 314 हो गए। लेकिन सभी मामलों को बिश्नोई गैंग से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। पुलिस के अनुसार, इनमें स्थानीय स्तर पर सक्रिय छोटे अपराधियों से जुड़े मामले भी शामिल हैं।

    डी-कंपनी का प्रभाव बंदरगाहों, हवाला, रियल एस्टेट, स्थानीय कारोबार और फिल्म उद्योग तक फैला हुआ बताया जाता था। इसके विपरीत, लॉरेंस बिश्नोई गैंग के मुंबई में स्थायी आर्थिक और जमीनी ढांचे को लेकर ऐसी व्यापक तस्वीर सामने नहीं आई है। उसके नेटवर्क पर उत्तर भारत और विदेश में मौजूद लोगों के जरिए गतिविधियां चलाने तथा सोशल मीडिया पर वारदातों की जिम्मेदारी लेकर प्रचार हासिल करने के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए मुंबई में अंडरवर्ल्ड का बदलता दौर केवल नामों का बदलाव नहीं, बल्कि अपराध के तरीकों, संपर्क व्यवस्था और पुलिस के सामने खड़ी चुनौतियों में आए परिवर्तन से भी जुड़ा है।

  • डोसे में चूहा मिलने के बाद होटल मालिक से 25 लाख की वसूली मांग, दो आरोपी गिरफ्तार

    डोसे में चूहा मिलने के बाद होटल मालिक से 25 लाख की वसूली मांग, दो आरोपी गिरफ्तार

    मुंबई। के बोरीवली वेस्ट स्थित एक होटल में डोसे के अंदर चूहा मिलने के बाद बनाया गया वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के मामले ने नया मोड़ ले लिया। होटल मालिक ने आरोप लगाया कि वीडियो को दोबारा फैलाने और अन्य कार्रवाई की धमकी देकर उससे पैसे मांगे गए। बोरीवली पुलिस ने 5 अक्टूबर को इस मामले में FIR दर्ज की है। मामले में मानसी अमित आचार्य और किंजल सुभाष भाटिया को आरोपी बनाया गया है। यह पूरा मामला 24 सितंबर को राधाकृष्ण होटल-बुफे-फास्ट फूड में हुई घटना से जुड़ा है।

    जानकारी के अनुसार, 24 सितंबर को होटल में आए लोगों में से एक ने डोसा मंगाया था। आरोप है कि डोसे के अंदर चूहा मिलने के बाद उसका वीडियो बनाया गया। यह वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। घटना के बाद खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने 28 सितंबर को होटल का लाइसेंस निलंबित कर दिया था। लाइसेंस निलंबित होने के बाद होटल बंद रहा।

    होटल मालिक ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया कि वीडियो वायरल होने के बाद कुछ लोगों ने उसका इस्तेमाल पैसे मांगने के लिए करना शुरू किया। शिकायत के मुताबिक, वीडियो को सोशल मीडिया पर और फैलाने तथा दूसरे कदम उठाने की धमकी दी गई। शुरुआत में होटल मालिक से 25 लाख रुपये मांगे गए थे। बाद में कथित तौर पर यह रकम घटाकर 20 लाख रुपये और फिर 15 लाख रुपये कर दी गई।

    आरोप है कि बातचीत के बाद आखिरकार 7 लाख रुपये में मामला तय करने की बात हुई। होटल मालिक ने इसमें से 1 लाख रुपये नकद बतौर टोकन देने का दावा किया। इसके बाद भी बाकी रकम को लेकर मांग जारी रही। शिकायतकर्ता के मुताबिक, 30 सितंबर से 5 अक्टूबर के बीच उसे लगातार फोन कॉल और वाट्सऐप संदेशों के जरिए पैसे देने के लिए दबाव बनाया गया।

    होटल मालिक का आरोप है कि उसे लगातार चेतावनी दी जाती रही कि अगर बाकी रकम नहीं दी गई तो वायरल वीडियो को फिर से फैलाया जा सकता है और उसे अन्य नतीजे भी भुगतने पड़ सकते हैं। होटल मालिक ने 29 सितंबर को पुलिस से संपर्क किया था। इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और पैसों की मांग जारी रहने के दौरान आरोपियों को पकड़ने की योजना बनाई गई।

    5 अक्टूबर को पुलिस की योजना के तहत शिकायतकर्ता से बाकी 6 लाख रुपये की व्यवस्था करने को कहा गया। शाम करीब 5:45 बजे जब आरोपी कथित तौर पर यह रकम लेने पहुंचे, तब उन्हें गवाहों की मौजूदगी में पकड़ लिया गया। इसके बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों को हिरासत में लिया। मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(2) और धारा 3(5) के तहत केस दर्ज किया गया है।

    पुलिस की जांच अब केवल होटल में डोसे के अंदर चूहा मिलने की मूल घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके बाद हुई पैसों की मांग पर भी केंद्रित है। जांच में वायरल वीडियो, फोन कॉल, वाट्सऐप पर हुई बातचीत और नकद लेन-देन से जुड़े पहलुओं को देखा जा रहा है। होटल का लाइसेंस निलंबित किए जाने और उसके बाद पैदा हुए हालात की भी जांच की जा रही है। FIR में होटल मालिक की ओर से लगाए गए आरोप दर्ज हैं और पूरे मामले की जांच जारी है।

  • 200 करोड़ रंगदारी मामले में जैकलीन को आरोपी बनाने की मांग, अदालत ने याचिका खारिज की

    200 करोड़ रंगदारी मामले में जैकलीन को आरोपी बनाने की मांग, अदालत ने याचिका खारिज की

    नई दिल्ली । दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 200 करोड़ रुपये की कथित रंगदारी से जुड़े मामले में अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडीस और लीपाक्षी एलावाड़ी को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर तलब करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। यह याचिका सुकेश चंद्रशेखर के कथित करीबी सहयोगी नवास कक्कट की ओर से दायर की गई थी।

    विशेष न्यायाधीश गगनदीप सिंह की अदालत ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इसमें जिन लोगों को अतिरिक्त आरोपी बनाए जाने की मांग की गई है, उनके खिलाफ इस स्तर पर पर्याप्त आधार सामने नहीं आता। अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों और उपलब्ध बयानों पर विचार करने के बाद यह फैसला सुनाया।

    याचिकाकर्ता का मामला मुख्य रूप से सह-आरोपी पिंकी ईरानी के उस बयान पर आधारित था, जो महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून यानी मकोका की धारा 18 के तहत दर्ज किया गया था। अदालत ने इस बयान को आधार मानते हुए याचिका में लगाए गए दावों की जांच की।

    अदालत ने कहा कि यदि पिंकी ईरानी के बयान को पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तब भी उसमें उन लोगों की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती, जिन्हें सुकेश के निर्देश पर महंगे उपहार दिए जाने की बात कही गई है। ऐसे में केवल इस बयान के आधार पर जैकलीन फर्नांडीस और लीपाक्षी एलावाड़ी को नए आरोपी के तौर पर तलब करने का आधार नहीं बनता।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने लीपाक्षी एलावाड़ी के बयान का भी उल्लेख किया। कोर्ट के मुताबिक, मामले में उपलब्ध सामग्री को देखते हुए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत किसी अतिरिक्त आरोपी को तलब करने के लिए आवश्यक आधार इस स्तर पर स्थापित नहीं होता।

    नवास कक्कट की ओर से दायर याचिका में अपने ऊपर लगे आरोपों से संबंधित घटनाक्रम का भी उल्लेख किया गया था। दावा किया गया कि वह सुकेश चंद्रशेखर के निर्देश पर कथित अपराध से जुड़ी रकम को अलग-अलग स्थानों पर रखने, उसे स्थानांतरित करने और उसके लेनदेन को संभालने में मदद करता था।

    याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि बॉलीवुड से जुड़े लोगों के लिए महंगे उपहार और अन्य कीमती सामान खरीदने के भुगतान की व्यवस्था में भी उसकी भूमिका थी। इसके लिए बैंक खातों में लेनदेन से संबंधित प्रविष्टियां कराने की बात कही गई थी।

    मामले में जैकलीन फर्नांडीस का नाम पहले भी सुकेश चंद्रशेखर से जुड़े विवाद में सामने आता रहा है। हालांकि, मौजूदा सुनवाई में अदालत के सामने सवाल यह था कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर उन्हें इस मामले में अतिरिक्त आरोपी के तौर पर तलब किया जा सकता है या नहीं।

    अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए आधारों और संबंधित बयानों पर विचार करने के बाद माना कि अतिरिक्त आरोपी को तलब करने के लिए जरूरी कानूनी आधार मौजूद नहीं है। इसी के साथ जैकलीन फर्नांडीस और लीपाक्षी एलावाड़ी को आरोपी बनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई।

  • नैनीताल पुलिस पर पर्यटकों से 18 हजार रुपये वसूली के आरोप, यूपीआई लेनदेन से जियोलिकोट चौकी की भूमिका पर सवाल

    नैनीताल पुलिस पर पर्यटकों से 18 हजार रुपये वसूली के आरोप, यूपीआई लेनदेन से जियोलिकोट चौकी की भूमिका पर सवाल

    नई दिल्ली । उत्तराखंड के नैनीताल में जियोलिकोट पुलिस चौकी से जुड़ा एक मामला सामने आया है, जिसमें चार पर्यटकों ने तीन कांस्टेबलों पर मारपीट, चालान और इसके बाद करीब 18 हजार रुपये मांगने के गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ितों के मुताबिक कथित रकम यूपीआई के माध्यम से अलग-अलग खातों में भेजी गई। भुगतान विवरण सामने आने के बाद मामले में पुलिस की भूमिका के साथ संबंधित बैंक खातों की जांच की मांग भी उठ रही है।

    जानकारी के अनुसार सुनील कुमार, मनीष सिंह, श्रियांश साहू और सुशील राजपूत स्कॉर्पियो से नीम करौली की ओर से लौट रहे थे। जियोलिकोट के पास बच्चों की तिरंगा यात्रा निकल रही थी। पीड़ितों के मुताबिक, वाहन में सवार दो युवकों ने यात्रा में शामिल बच्चों को तिरंगे दिए थे। इसी दौरान 112 पर वाहन सवार युवकों द्वारा स्कूल की बच्चियों के साथ छेड़छाड़ किए जाने की शिकायत की गई।

    इसके बाद पुलिस ने आगे जाकर स्कॉर्पियो को रोका और चारों युवकों को जियोलिकोट चौकी लाया गया। पीड़ितों का आरोप है कि चौकी में उनके साथ मारपीट की गई और बाद में ढाई-ढाई सौ रुपये के चालान काटे गए। हालांकि, उनका दावा है कि कार्रवाई यहीं खत्म नहीं हुई और उनसे उनकी आर्थिक स्थिति तथा पेशे के बारे में जानकारी ली गई।

    पीड़ित पक्ष के अनुसार, एक युवक के पार्लर संचालक होने की जानकारी मिलने पर उससे पांच हजार रुपये मांगे गए। वहीं स्कॉर्पियो मालिक के ठेकेदार होने की बात सामने आने पर कथित तौर पर उससे दस हजार रुपये देने को कहा गया। अन्य युवकों से भी अलग-अलग रकम मांगने का आरोप लगाया गया है।

    मामले का सबसे गंभीर पहलू कथित यूपीआई भुगतान से जुड़ा है। पीड़ितों के मुताबिक, कुल करीब 18 हजार रुपये डिजिटल माध्यम से लिए गए। उपलब्ध भुगतान विवरण के अनुसार, रकम का एक हिस्सा नैनी फिलिंग स्टेशन के खाते में और कुछ राशि वहां कार्यरत एक कर्मचारी के बैंक खाते में भेजी गई।

    इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि यदि भुगतान पुलिस कार्रवाई से संबंधित था तो रकम सीधे आरोपित पुलिसकर्मियों के खातों में जाने के बजाय अन्य खातों में क्यों भेजी गई। इसी वजह से संबंधित बैंक खातों के लेनदेन की विस्तृत जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    पीड़ितों ने जियोलिकोट चौकी में तैनात चंदन आर्या, नीरज कुमार और धर्मेंद्र कुमार पर मारपीट तथा रकम मांगने और लेने के आरोप लगाए हैं। आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन भुगतान के स्क्रीनशॉट और यूपीआई विवरण होने का दावा मामले को गंभीर बनाता है।

    यह भी जांच का विषय है कि नैनी फिलिंग स्टेशन और संबंधित कर्मचारी के खाते में इससे पहले पुलिसकर्मियों या पुलिस से जुड़े लोगों की ओर से कोई संदिग्ध भुगतान हुआ था या नहीं। बैंक रिकॉर्ड के जरिए तारीख, रकम, भेजने वाले और भुगतान के उद्देश्य की पड़ताल की जा सकती है।

    बताया गया है कि बाद में पीड़ितों को रकम वापस किए जाने की बात सामने आई। हालांकि, रकम लौटाए जाने के बावजूद कथित भुगतान की परिस्थितियों और उसमें शामिल लोगों की भूमिका से जुड़े सवाल बने हुए हैं।

    नैनीताल देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है और यहां पुलिस की कार्यशैली सीधे पर्यटकों के अनुभव तथा क्षेत्र की छवि से जुड़ती है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और यूपीआई लेनदेन किन परिस्थितियों में हुआ। जांच से ही यह भी सामने आएगा कि मामला एक घटना तक सीमित था या इसके पीछे कोई व्यापक पैटर्न मौजूद था।

  • मकोका आरोपों पर सुकेश की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, दिल्ली पुलिस को अपना पक्ष रखने का निर्देश

    मकोका आरोपों पर सुकेश की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, दिल्ली पुलिस को अपना पक्ष रखने का निर्देश

    नई दिल्ली । 200 करोड़ रुपए की वसूली और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में आरोपी सुकेश चंद्रशेखर ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) के तहत लगाए गए आरोपों को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। सुकेश ने निचली अदालत के उस फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल की है, जिसमें उसके खिलाफ मकोका के तहत आरोप तय किए गए थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई के लिए 23 सितंबर की तारीख तय की है।

    सुकेश चंद्रशेखर की याचिका में कहा गया है कि उसके खिलाफ लगाए गए मकोका के आरोपों पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का पक्ष है कि इस कानून के तहत कार्रवाई को लेकर नए सिरे से समीक्षा की आवश्यकता है। अब इस मामले में दिल्ली पुलिस के जवाब के बाद हाईकोर्ट आगे की सुनवाई करेगा और तय करेगा कि मकोका आरोपों को लेकर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

    यह पूरा मामला करीब 200 करोड़ रुपए की कथित वसूली और धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है। जांच एजेंसियों के अनुसार, सुकेश चंद्रशेखर पर आरोप है कि उसने खुद को सरकारी अधिकारी बताकर एक कारोबारी परिवार से बड़ी रकम हासिल की। आरोप है कि उसने प्रभावशाली लोगों से संपर्क होने और कानूनी मामलों को सुलझाने का भरोसा दिलाकर पैसे की मांग की थी।

    मामला उस समय सामने आया जब फोर्टिस के पूर्व प्रमोटर शिविंदर सिंह की पत्नी अदिति सिंह ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, एक व्यक्ति ने उनसे संपर्क किया और खुद को केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में पेश किया। उसने उनके पति से जुड़े कानूनी मामलों में मदद दिलाने का दावा किया और इसके बदले बड़ी रकम की मांग की गई। इसके बाद पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू की।

    जांच में एजेंसियों ने आरोप लगाया कि इस कथित साजिश में कई लोग शामिल थे और सरकारी अधिकारियों की पहचान का गलत इस्तेमाल किया गया। जांच के दौरान करीब 217 करोड़ रुपए तक की रकम अलग-अलग माध्यमों से हासिल किए जाने का दावा किया गया। इसी आधार पर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू की।

    जांच आगे बढ़ने के बाद सुकेश चंद्रशेखर की भूमिका सामने आने पर उसे गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का आरोप था कि वह जेल के अंदर रहते हुए भी अपनी गतिविधियों को संचालित कर रहा था। जांच एजेंसियों ने उसके पास से मोबाइल फोन मिलने का भी दावा किया था। इसके बाद पुलिस ने उसके खिलाफ मकोका के तहत कार्रवाई की।

    महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून यानी मकोका का इस्तेमाल संगठित अपराध से जुड़े मामलों में किया जाता है। इस कानून के तहत कार्रवाई के लिए पुलिस को यह दिखाना होता है कि अपराध किसी संगठित गिरोह या लगातार आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। दिल्ली पुलिस का आरोप रहा है कि सुकेश ने अकेले नहीं बल्कि एक समूह के साथ मिलकर कथित अपराध को अंजाम दिया।

    अब हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई इस बात पर केंद्रित होगी कि सुकेश के खिलाफ मकोका के तहत लगाए गए आरोप कानूनी रूप से सही हैं या नहीं। दिल्ली पुलिस के जवाब के बाद मामले में आगे की दिशा तय होगी। इस मामले में लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया के बीच हाईकोर्ट की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • इंदौर में कारोबारी और आरटीआई कार्यकर्ता के विवाद ने पकड़ा तूल, शिकायतकर्ता पर ही एफआईआर से उठे सवाल

    इंदौर में कारोबारी और आरटीआई कार्यकर्ता के विवाद ने पकड़ा तूल, शिकायतकर्ता पर ही एफआईआर से उठे सवाल


    मध्य प्रदेश
    के इंदौर में एक शराब कारोबारी और आरटीआई कार्यकर्ता के बीच विवाद अब कानूनी और प्रशासनिक चर्चा का विषय बन गया है। दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ लगाए गए आरोपों के बीच पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। मामले की विशेष चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि ब्लैकमेलिंग और कथित रंगदारी की शिकायत करने वाले व्यक्ति के खिलाफ ही पहले मामला दर्ज हो गया, जबकि उसकी शिकायत पर तत्काल कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, शराब कारोबारी सूरज रजक ने स्थानीय पुलिस थाने में लिखित शिकायत देकर आरोप लगाया था कि एक आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा उनके खिलाफ सोशल मीडिया और व्हाट्सएप समूहों में कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री प्रसारित की जा रही है। शिकायत में यह भी दावा किया गया कि उनसे कथित रूप से बड़ी धनराशि की मांग की गई और भुगतान नहीं करने पर और अधिक सामग्री सार्वजनिक करने की चेतावनी दी गई।

    कारोबारी का आरोप है कि उन्होंने पुलिस से ब्लैकमेलिंग, मानहानि और सूचना प्रौद्योगिकी कानून से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की मांग की थी। उनका कहना है कि शिकायत देने के बावजूद कई दिनों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इसी दौरान दूसरे पक्ष की ओर से भी पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर कारोबारी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया।

    इस घटनाक्रम के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया। कारोबारी का कहना है कि उन्होंने सबसे पहले पुलिस को शिकायत दी थी और अपनी बात रखने के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया था। उनका आरोप है कि उनकी शिकायत पर कार्रवाई लंबित रहने के दौरान उनके खिलाफ दर्ज हुए मामले ने पूरे घटनाक्रम को विवादास्पद बना दिया है। वहीं दूसरे पक्ष की शिकायत के आधार पर दर्ज प्रकरण अब जांच का विषय बना हुआ है।

    मामले में दोनों पक्षों के आरोप और प्रत्यारोपों के बीच पुलिस की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने पहले गंभीर आरोपों के साथ शिकायत दर्ज कराई थी, तो उसकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई और किस आधार पर दूसरे पक्ष की शिकायत पर पहले प्रकरण दर्ज किया गया। हालांकि पुलिस की ओर से अभी तक विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

    विवाद के दौरान आरटीआई कार्यकर्ता को लेकर भी विभिन्न प्रकार के दावे सामने आए हैं। कुछ सूत्रों के अनुसार उन पर पूर्व में भी सूचना के अधिकार से जुड़े मामलों को लेकर दबाव बनाने जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही संबंधित पक्ष की ओर से इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। इसलिए इन आरोपों को जांच पूरी होने तक प्रमाणित नहीं माना जा सकता।

    फिलहाल पुलिस दोनों पक्षों द्वारा दिए गए दस्तावेजों, शिकायतों, डिजिटल साक्ष्यों और अन्य उपलब्ध तथ्यों की जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। इस बीच यह मामला शहर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और लोग जांच के निष्कर्ष का इंतजार कर रहे हैं।

  • अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर 2.77 करोड़ की उगाही का आरोप, यूथ कांग्रेस नेता समेत दो गिरफ्तार

    अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर 2.77 करोड़ की उगाही का आरोप, यूथ कांग्रेस नेता समेत दो गिरफ्तार

    नई दिल्ली । कर्नाटक के मंगलुरु में एक कारोबारी से करोड़ों रुपये की कथित जबरन वसूली के मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। पुलिस ने एक व्यापारी को ब्लैकमेल कर लगभग 2.77 करोड़ रुपये वसूलने के आरोप में यूथ कांग्रेस के एक पदाधिकारी और उसके सहयोगी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार मामला केवल आर्थिक उगाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सुनियोजित धोखाधड़ी, मानसिक दबाव और फर्जी घटनाक्रम रचने जैसे गंभीर आरोप भी शामिल हैं।

    पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों की पहचान यूथ कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारी निजाम और उसके सहयोगी जितेश के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर व्यापारी को पहले निजी और संवेदनशील सामग्री के आधार पर निशाना बनाया गया। आरोप है कि व्यापारी की अश्लील तस्वीरों और वीडियो का उपयोग कर उसे ब्लैकमेल किया गया तथा बदनामी का डर दिखाकर बड़ी रकम की मांग की गई।

    जांच अधिकारियों के अनुसार शुरुआत में व्यापारी से 35 लाख रुपये मांगे गए थे। आरोपियों ने कथित रूप से वीडियो सार्वजनिक करने और परिवार तक पहुंचाने की धमकी दी थी। सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक छवि को नुकसान पहुंचने की आशंका के चलते व्यापारी ने रकम का भुगतान कर दिया। हालांकि इसके बाद भी पैसों की मांग बंद नहीं हुई और कथित तौर पर लगातार दबाव बनाया जाता रहा।

    मामले में नया मोड़ तब आया जब पीड़ित ने सहायता के लिए निजाम से संपर्क किया। व्यापारी को उम्मीद थी कि वह विवाद सुलझाने में मदद करेगा, लेकिन पुलिस का दावा है कि निजाम भी कथित उगाही की पूरी योजना में शामिल था। जांच एजेंसियों का कहना है कि दोनों आरोपियों ने मिलकर व्यापारी पर दबाव बनाए रखने के लिए एक और साजिश रची।

    पुलिस के अनुसार मई 2024 में व्यापारी को यह विश्वास दिलाया गया कि जितेश ने आत्महत्या कर ली है। आरोपियों ने कथित तौर पर एक फर्जी सुसाइड नोट का हवाला दिया, जिसमें व्यापारी का नाम होने की बात कही गई। इसके साथ ही मौत और अंतिम संस्कार से जुड़ी तस्वीरें दिखाकर यह साबित करने का प्रयास किया गया कि घटना वास्तविक है। व्यापारी को यह भी बताया गया कि उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है।

    गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई के भय से व्यापारी लगातार पैसे देता रहा। पुलिस का दावा है कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच विभिन्न माध्यमों से कुल 2.77 करोड़ रुपये की उगाही की गई। इस दौरान पीड़ित मानसिक दबाव और सामाजिक बदनामी की आशंका में आरोपियों की मांगें पूरी करता रहा।

    मामले का खुलासा तब हुआ जब जून 2026 में व्यापारी ने जितेश को मंगलुरु में जीवित देखा। जिस व्यक्ति को वह मृत समझ रहा था, उसे सामने देखकर उसे पूरे घटनाक्रम पर संदेह हुआ। इसके बाद उसने उरवा पुलिस स्टेशन पहुंचकर विस्तृत शिकायत दर्ज कराई और पूरे मामले की जानकारी अधिकारियों को दी।

    शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। जांच एजेंसियां अब वित्तीय लेन-देन, कथित ब्लैकमेलिंग नेटवर्क और मामले से जुड़े अन्य संभावित पहलुओं की भी पड़ताल कर रही हैं। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या इस कथित रैकेट में अन्य लोग भी शामिल थे।

    गिरफ्तारी के बाद यह मामला राजनीतिक चर्चा का विषय भी बन गया है। सोशल मीडिया पर विभिन्न राजनीतिक कार्यक्रमों और नेताओं के साथ आरोपी की तस्वीरें साझा की जा रही हैं। हालांकि जांच एजेंसियों का कहना है कि फिलहाल पूरा ध्यान आरोपों की सत्यता, वित्तीय रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच पर केंद्रित है।

  • तेज प्रताप यादव ने पुलिस में दर्ज कराई शिकायत, रंगदारी और धमकी का आरोप

    तेज प्रताप यादव ने पुलिस में दर्ज कराई शिकायत, रंगदारी और धमकी का आरोप


    नई दिल्ली ।तेज प्रताप यादव की ओर से पुलिस को दिए गए आवेदन में कहा गया है कि संतोष रेणु यादव लगातार फोन कॉल के जरिए उन पर दबाव बना रहे थे। आरोप है कि उनसे मोटी रकम की रंगदारी मांगी गई और मांग पूरी न होने पर राजनीतिक और व्यक्तिगत रूप से नुकसान पहुंचाने की धमकी दी गई। तेज प्रताप ने इसे अपनी सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बताया है।

    पुलिस ने शुरू की जांच

    सचिवालय थाना पुलिस ने तेज प्रताप यादव के आवेदन के आधार पर सनहा दर्ज कर लिया है और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कॉल डिटेलमैसेज और अन्य सबूतों के आधार पर निष्पक्ष जांच की जाएगी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस अलर्ट मोड में है।

    संतोष रेणु यादव का पलटवार

    दूसरी ओरआरोपी बनाए गए संतोष रेणु यादव ने भी तेज प्रताप के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने पटना के बेऊर थाना में आवेदन देकर अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की मांग की है। संतोष रेणु यादव का आरोप है कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया जा रहा है और झूठे मामलों में उलझाकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।

    संतोष रेणु यादव ने क्या कहा

    मीडिया से बातचीत में संतोष रेणु यादव ने कहा कि वे लंबे समय से सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं और माधव सेवा नामक संगठन के अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि उनका रंगदारी या धमकी से कोई लेना-देना नहीं है। उनका कहना है कि वे कानून में विश्वास रखते हैं और जांच में सच्चाई सामने आएगी।

    पुलिस का आधिकारिक बयान

    इस पूरे मामले पर पटना सिटी एसपी पश्चिमी भानु प्रताप सिंह ने कहा कि दोनों पक्षों की ओर से लिखित आवेदन प्राप्त हुए हैं। पुलिस ने दोनों शिकायतों पर सनहा दर्ज कर ली है और निष्पक्ष जांच की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने के बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।

    पार्टी के भीतर विवाद ने बढ़ाई सियासी गर्मी

    इस घटनाक्रम ने राजद के अंदरूनी समीकरणों को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी के भीतर आपसी मतभेद अब खुलकर सामने आ रहे हैं। तेज प्रताप यादव जैसे बड़े नेता द्वारा अपनी ही पार्टी के पूर्व प्रवक्ता पर लगाए गए आरोपों ने विपक्ष को भी हमला बोलने का मौका दे दिया है।

    अब सबकी नजर पुलिस जांच पर


    फिलहाल पूरे मामले में सस्पेंस बना हुआ है। एक तरफ तेज प्रताप यादव के गंभीर आरोप हैंतो दूसरी ओर संतोष रेणु यादव खुद को निर्दोष बता रहे हैं। अब यह देखना अहम होगा कि पुलिस जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और यह मामला आगे किस दिशा में जाता है।तेज प्रताप यादव से कथित रंगदारी मांगने का मामला सिर्फ एक कानूनी विवाद नहींबल्कि बिहार की राजनीति में नया सियासी तूफान बनकर उभरा है। आने वाले दिनों में पुलिस जांच और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं इस मुद्दे को और गर्मा सकती हैं।