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  • भारत की बड़ी कामयाबी… तेजी से घटी गरीबी…12 साल में 49.6 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से आए बाहर

    भारत की बड़ी कामयाबी… तेजी से घटी गरीबी…12 साल में 49.6 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से आए बाहर


    नई दिल्ली।
    भारत (India) ने गरीबी के खिलाफ लड़ाई में बड़ी कामयाबी (Success) हासिल की है. विश्व बैंक (World Bank) की अक्टूबर 2026 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 से 2023 के बीच 12 साल में देश में अत्यधिक गरीबी (Extreme Poverty) तेजी से घटी है. साल 2011 में जहां भारत की 27.1 फीसदी आबादी बेहद गरीब थी, वहीं 2023 में यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 2.6 फीसदी रह गया. हालांकि, प्रति व्यक्ति आय के मोर्चे पर भारत को अभी और बेहतर करने की जरूरत है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, गरीबी कम होने के बावजूद 2023 में करीब 7.5 करोड़ लोग ऐसे थे, जिनकी रोजाना की आमदनी 3 डॉलर से कम थी।


    12 साल में 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर

    विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में गरीबी मापने के लिए दो पैमाने इस्तेमाल किए हैं. पहला है रोजाना 3 डॉलर की आय, जिसके आधार पर अत्यधिक गरीबी का आकलन किया जाता है. रोजाना तीन डॉलर आय का यह पैमाना 2021 की परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) यानी अलग-अलग देशों में चीजों की कीमतों और खरीदने की क्षमता के हिसाब से तय की गई है।

    दूसरा पैमाना रोजाना 4.20 डॉलर की आय है. विश्व बैंक इस सीमा का इस्तेमाल भारत जैसे निम्न-मध्यम आय (Lower Middle Income) वाले देशों में गरीबी मापने के लिए करता है. इस पैमाने पर भारत में गरीबी की दर 2011 में 57.7 फीसदी थी, जो 2023 में घटकर 16.1 फीसदी रह गई. इसका मतलब है कि इस दौरान करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए.


    गरीबी घटने के पीछे ये रहे बड़े कारण

    विश्व बैंक ने गरीबी घटने के पीछे तीन बड़ी वजहें बताई हैं. पहली, लोगों के घरेलू खर्च और खपत में बढ़ोतरी. दूसरी, देश में रोजगार के मौके बढ़ना और तीसरी, सरकारी योजनाओं का ज्यादा लोगों तक पहुंचना. इनमें मुफ्त राशन और अन्य तरह की सब्सिडी जैसी योजनाओं की भी अहम भूमिका रही. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2017 से 2023 के बीच करीब 13.4 करोड़ नई नौकरियां जुड़ीं. यह इस दौरान कामकाजी उम्र वाली आबादी में हुई बढ़ोतरी से लगभग दोगुना है. ज्यादा लोगों को काम मिलने से परिवारों की कमाई बढ़ी और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया।


    ग्रामीण महिलाओं ने भी बदली तस्वीर

    गरीबी घटाने में ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में बढ़ती भागीदारी ने भी अहम भूमिका निभाई. बड़ी संख्या में महिलाएं पैसे कमाने वाले कामों से जुड़ीं. इससे कई परिवारों में कमाने वाले सदस्यों की संख्या बढ़ी और घर की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई. विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में गरीबी घटने की रफ्तार शहरों के मुकाबले तेज रही है. इससे गांव और शहर के बीच गरीबी का अंतर भी कम हुआ है. हालांकि, आज भी ग्रामीण भारत में गरीबी की समस्या ज्यादा है. रिपोर्ट में दिए गए साल 2023 तक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में रोजाना 4.20 डॉलर की आय के पैमाने पर गांवों में 19.3 फीसदी लोग गरीब हैं, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 8.6 फीसदी है।


    यूपी से बंगाल तक के क्षेत्र में ज्यादा गरीबी

    देश में गरीबी कम करने के मामले में बड़ी सफलता मिली है, लेकिन अब यह समस्या कुछ राज्यों और इलाकों में ज्यादा सिमट गई है. विश्व बैंक के मुताबिक, भारत के करीब 57 फीसदी गरीब उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले एक बड़े क्षेत्र में रहते हैं. इनमें बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्य भी शामिल हैं. इसका मतलब है कि आने वाले समय में गरीबी कम करने की लड़ाई में इन राज्यों की भूमिका सबसे अहम होगी. इन इलाकों में ऐसे रोजगार पैदा करने की जरूरत है, जिनसे लोगों को सिर्फ काम ही न मिले, बल्कि उनकी कमाई भी अच्छी हो।


    गरीबी का शिक्षा से सीधा कनेक्शन: रिपोर्ट

    विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा का स्तर भी गरीबी से जुड़ा हुआ है. जिन वयस्कों ने कभी औपचारिक शिक्षा नहीं ली, उनमें 21.3 फीसदी लोग गरीब थे. वहीं, उच्च शिक्षा यानी कॉलेज या उससे आगे की पढ़ाई करने वालों में गरीबी की दर सिर्फ 7.4 फीसदी थी. बच्चों पर भी गरीबी का असर ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक, 0 से 14 साल के बच्चों में गरीबी की दर 21.8 फीसदी रही, जो सभी उम्र के समूहों में सबसे ज्यादा है. इसके अलावा, देश की 29.6 फीसदी आबादी को बुनियादी स्तर की स्वच्छता सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी. वहीं, 13.8 फीसदी लोगों के घर में किसी भी वयस्क ने प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं की थी।


    रोजगार तो बढ़ा, लेकिन अच्छी कमाई चुनौती

    विश्व बैंक ने रोजगार बढ़ने को गरीबी घटने की बड़ी वजह माना है, लेकिन साथ ही नौकरियों की गुणवत्ता पर चिंता भी जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा ऐसे कामों से आया, जिनमें कम कमाई होती है और उत्पादकता भी कम रहती है. इस दौरान महंगाई के असर को हटाकर देखी जाने वाली वास्तविक कमाई (Real Earnings) में भी खास बढ़ोतरी नहीं हुई. युवाओं के लिए रोजगार की चुनौती अब भी बनी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के बीच युवा बेरोजगारी दर 14.6 फीसदी से बढ़कर 15.9 फीसदी हो गई. ग्रामीण इलाकों की युवा महिलाएं इस बढ़ोतरी से ज्यादा प्रभावित हुईं।


    देश में आर्थिक असमानता एक बड़ी चुनौती

    भारत में गरीबी भले ही तेजी से घटी है, लेकिन कमाई के मामले में अमीर और गरीब के बीच बड़ा अंतर अब भी बना हुआ है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में सबसे ज्यादा कमाने वाले 10 फीसदी कामगारों की औसत कमाई, सबसे कम कमाने वाले 10 फीसदी कामगारों की तुलना में करीब 13 गुना थी. आसान भाषा में समझें तो अगर सबसे कम कमाने वाले वर्ग के एक कामगार की कमाई 1,000 रुपये मानी जाए, तो सबसे ज्यादा कमाने वाले वर्ग के कामगार की कमाई करीब 13,000 रुपये रही. यह दोनों समूहों की बीच कमाई (Median Earnings) में बड़ा अंतर दिखाता है. विश्व बैंक ने यह भी बताया है कि अमीर परिवारों की खपत को घरेलू सर्वे में पूरी तरह दर्ज करना मुश्किल हो सकता है. इस वजह से देश में अमीर और गरीब के बीच असमानता का वास्तविक स्तर रिपोर्ट में दिखाए गए आंकड़ों से ज्यादा हो सकता है. यानी गरीबी घटने की उपलब्धि के साथ यह चुनौती भी बनी हुई है कि देश में आर्थिक असमानता की खाई कैसे पाटी जाए और लोगों की आय कैसे बढ़ाई जाए।


    देश में 2028 तक और घट सकती है गरीबी

    विश्व बैंक का अनुमान है कि भारत में आने वाले वर्षों में भी गरीबी घटेगी, लेकिन अब इसकी रफ्तार पहले के मुकाबले धीमी हो सकती है. रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, रोजाना 4.20 डॉलर की आय वाली गरीबी दर 2026 में 14.2 फीसदी से घटकर 2028 तक 12.1 फीसदी रह सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक गरीबी घटाने के मामले में भारत ने पिछले 12 साल में बड़ी उपलब्धि हासिल की है. अब अगली चुनौती यह है कि लोगों को ऐसे गुणवत्ता परक रोजगार मिलें, जिनसे उनकी कमाई लगातार बढ़े. इससे उनकी क्रय शक्ति में भी इजाफा होगा और जीवनस्तर भी सुधरेगा. खासकर उन राज्यों और ग्रामीण इलाकों में इस पर ध्यान देना होगा, जहां आज भी बड़ी आबादी गरीबी से जूझ रही है।

  • मोदी राज में गरीबी लगभग खत्म, अब मुस्लिमों से ज्यादा गरीब हिंदू: नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष का रिसर्च

    मोदी राज में गरीबी लगभग खत्म, अब मुस्लिमों से ज्यादा गरीब हिंदू: नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष का रिसर्च


    नई दिल्‍ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi)के शासनकाल में बड़े पैमाने पर अत्यधिक गरीबी (Extreme Poverty) खत्म हुई है। बड़ी बात यह है कि अत्यधिक गरीबी खत्म होने की दर हिन्दुओं से ज्यादा मुस्लिमों में रही है। यानी अब मुस्लिमों से ज्यादा गरीब हिन्दू हैं। नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष और सोलहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया(Arvind Panagariya) ने अपने एक रिसर्च पेपर में यह दावा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2011-12 और 2023-24 के बीच भारत ने लगभग अत्यधिक गरीबी खत्म कर दी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मुसलमानों में गरीबी दर (उनकी आबादी का) 1.5% रह गया है, जबकि हिंदुओं में यह 2.3% है जो कि तुलना में थोड़ा ज्यादा है।

    कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और सोलहवें वित्त आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया और नई दिल्ली स्थित रिसर्च और कंसल्टिंग फर्म इंटेलिंक एडवाइजर्स के संस्थापक विशाल मोरे द्वारा लिखे गए एक नए पेपर में यह दावा किया गया है। पेपर इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुआ है। पेपर के अनुसार, वर्ष 2022-23 में भी दोनों समुदायों के बीच गरीबी का अंतर लगभग एक समान था। उस दौरान मुसलमानों में गरीबी दर उनकी आबादी का 4% था, जबकि हिंदुओं में यह 4.8% था, जो 0.8 प्रतिशत ज्यादा है।

    आंकड़े आम धारणा के विपरीत
    पेपर में यह भी दावा किया गया है कि ये आंकड़े उस आम धारणा के विपरीत हैं जिसके तहत कहा जाता रहा है कि मुसलमानों में हिंदुओं की तुलना में ज्यादा गरीबी है और इसमें सुधार की जरूरत है, कम से कम अत्यधिक गरीबी के संबंध में। बता दें कि विश्व बैंक क्रय शक्ति समानता (PPP) के संदर्भ में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 3 डॉलर से कम खरीद क्षमता को अत्यधिक गरीबी के रूप में परिभाषित किया जाता है। लेखकों के अनुसार, यह तेंदुलकर कमेटी की गरीबी रेखा के करीब है, जो आखिरी आधिकारिक तौर पर अपनाई गई गरीबी रेखा थी।

    देश से लगभग अत्यधिक गरीबी खत्म
    एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह पेपर सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक समूहों, और ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी के स्तर का अनुमान लगाता है। इसमें लेखकों ने लिखा है, “अनुमान बताते हैं कि 2011-12 से 2023-24 तक 12 वर्षों में गरीबी में गिरावट काफी और व्यापक रही है, इस हद तक कि देश ने लगभग अत्यधिक गरीबी खत्म कर दी है।”

    लेखकों के अनुसार, तेंदुलकर पद्धति के आधार पर राष्ट्रीय (ग्रामीण+शहरी) गरीबी रेखा 2011-12 में प्रति व्यक्ति प्रति माह 932 रुपये, 2022-23 में 1,714 रुपये और 2023-24 में 1,804 रुपये निर्धारित की गई थी। इस पेपर में, हर घर को राज्य और इलाके (ग्रामीण या शहरी) के लिए गरीबी रेखा के आधार पर गरीब या गैर-गरीब माना गया है। जिन्हें गरीब के तौर पर क्लासिफाई किया गया है, उन्हें फिर ग्रुप के हिसाब से जोड़ा गया है।

    2011-2024 के बीच कुल गरीबी में तेज़ और लगातार गिरावट
    पेपर के अनुसार, 2011-2024 की अवधि में कुल गरीबी में तेज़ और लगातार गिरावट देखी गई है। पेपर में दावा किया गया है कि राष्ट्रीय गरीबी दर 2011-12 में 21.9% (आबादी का) से घटकर 2023-24 में 2.3% हो गई। यानी 12 सालों में गरीबी दर में 19.7 प्रतिशत अंकों की गिरावट आई है, जो प्रति वर्ष के हिसाब से 1.64 प्रतिशत की गिरावट है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में गिरावट ज़्यादा तेज़ रही है। ररिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में जहां 2011-12 में शुरुआती गरीबी का स्तर राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा था, उस अवधि में 22.5 प्रतिशत अंकों की कमी आई, या सालाना 1.87 प्रतिशत अंकों की कमी आई। इसके विपरीत, शहरी गरीबी में 12.6 प्रतिशत अंकों की गिरावट आई, जो मोटे तौर पर प्रति वर्ष 1 प्रतिशत अंक के बराबर है। पेपर में ये भी कहा गया है कि वर्ग के हिसाब से भी, सभी प्रमुख सामाजिक समूहों – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), और अगड़ी जाति के समूहों में भी गरीबी में काफी कमी आई है।

    ST समुदाय में भी गरीबी दर 8.7% रह गई
    लेखकों ने इस बात पर फोकस किया है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदाय के अंदर 2023-24 में गरीबी घटकर 8.7% रह गई है। पेपर में कहा गया है कि जहां हिंदुओं में गरीबी की दर 2.3% अनुमानित है, वहीं मुसलमानों में अब 1.5%, ईसाइयों में 5%, बौद्धों में 3.5%, और सिखों और जैनियों में 0% है। रिपोर्ट में यह दावा कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अत्यधिक गरीबी में अंतर लगभग खत्म हो गया है, हैरान करने वाला है।

    पेपर में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में भी हिंदुओं की तुलना में मुसलमान कम ही गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह आंकड़ा मुस्लिमों में 1.6% है जबकि हिन्दुओं में 2.8% है। हालांकि, शहरी इलाकों में 2011-12 में मुसलमानों में गरीबी दर 20.8% थी, जबकि हिंदुओं में यह 12.5% ​​थी, जो 2023-24 तक घटकर अब क्रमशः 1.2% और 1% रह गई है।