Tag: face challenge

  • ट्रंप की रेटिंग ऑल टाइम लो, मिडटर्म में रिपब्लिकन के लिए बढ़ी चुनौती

    ट्रंप की रेटिंग ऑल टाइम लो, मिडटर्म में रिपब्लिकन के लिए बढ़ी चुनौती


    नई दिल्ली। अमेरिका में मिडटर्म चुनाव का काउंटडाउन शुरू होते ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट रिपब्लिकन पार्टी के लिए चिंता का कारण बन गई है। चुनाव से करीब दो महीने पहले सामने आए ताजा सर्वे में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। वहीं, मतदाताओं के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन पर बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। ऐसे संकेत हैं कि नवंबर में होने वाले चुनाव में डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में वापसी कर सकते हैं।

    रॉयटर्स और इप्सॉस के ताजा सर्वे के मुताबिक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग ऑल टाइम लो पर है। बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक ईरान युद्ध और देश की आर्थिक स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं। ट्रंप की घटती लोकप्रियता का सीधा असर रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    सर्वे में रजिस्टर्ड वोटरों से पूछा गया कि अगर अभी कांग्रेस के चुनाव कराए जाएं तो वे किस पार्टी के उम्मीदवार को वोट देंगे। जवाबों में डेमोक्रेट्स को रिपब्लिकन पर 5 प्रतिशत अंक की बढ़त मिली। खास बात यह है कि डेमोक्रेट समर्थक चुनाव को लेकर रिपब्लिकन समर्थकों की तुलना में ज्यादा उत्साहित नजर आए।

    हाउस में बहुमत का बेहद करीबी मुकाबला

    मिडटर्म चुनाव में सबसे बड़ा मुकाबला प्रतिनिधि सभा को लेकर माना जा रहा है। फिलहाल हाउस में रिपब्लिकन के पास 218 सीटें हैं, जबकि डेमोक्रेट्स के पास 214 सीटें हैं। बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए डेमोक्रेट्स को केवल 3 सीटें और हासिल करनी होंगी। करीब 50 सीटों पर मुकाबला कड़ा माना जा रहा है, ऐसे में कुछ सीटों के नतीजे ही सदन का पूरा समीकरण बदल सकते हैं।

    अगर डेमोक्रेट्स हाउस में बहुमत हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। उनके पास प्रशासन के खिलाफ कई जांच शुरू करने की ताकत होगी। साथ ही, सरकार को अहम विधेयकों को पारित कराने के लिए डेमोक्रेट्स के साथ समझौते करने पड़ सकते हैं।

    सीनेट में भी रिपब्लिकन के सामने चुनौती

    सीनेट की तस्वीर फिलहाल हाउस की तुलना में कम स्पष्ट है, लेकिन यहां भी कई सीटों पर मुकाबला कड़ा बताया जा रहा है। डेमोक्रेट्स को बहुमत हासिल करने के लिए रिपब्लिकन की 4 सीटें जीतनी होंगी।

    अगर डेमोक्रेट्स सीनेट पर भी नियंत्रण हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप प्रशासन के लिए कई अहम नियुक्तियों को मंजूरी दिलाना मुश्किल हो सकता है। खासतौर पर राष्ट्रपति के नामित उम्मीदवारों की नियुक्ति रोकने की उनकी क्षमता बढ़ जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में किसी जज का पद खाली होने की स्थिति में सीनेट का यह समीकरण और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

    ट्रंप की लोकप्रियता क्यों बन रही चुनावी मुद्दा?

    अमेरिका में मिडटर्म चुनाव को अक्सर मौजूदा राष्ट्रपति के कार्यकाल पर जनता के अप्रत्यक्ष जनमत संग्रह के तौर पर देखा जाता है। राष्ट्रपति की पार्टी को इन चुनावों में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है। इस बार ट्रंप की कम अप्रूवल रेटिंग रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।

    इतिहास भी रिपब्लिकन के लिए ज्यादा राहत देने वाला नहीं है। 1938 के बाद से केवल दो मिडटर्म चुनाव ऐसे रहे हैं, जब राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाई। ऐसे में नवंबर का चुनाव सिर्फ ट्रंप की लोकप्रियता की परीक्षा नहीं, बल्कि संसद में रिपब्लिकन की मौजूदा पकड़ बचाने की भी बड़ी लड़ाई माना जा रहा है।

  • ईरान-इजरायल युद्ध लंबा चला तो भारत में खाद और उर्वरक की हो सकती है किल्लत

    ईरान-इजरायल युद्ध लंबा चला तो भारत में खाद और उर्वरक की हो सकती है किल्लत


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब सिर्फ तेल और गैस पर ही नहीं, बल्कि भारत के कृषि और व्यापार क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच जंग लंबी खिंचती है और खाड़ी देशों में तनाव बढ़ता है, तो भारत को पेट्रोलियम उत्पादों के साथ-साथ उर्वरक, खाद्य सामग्री और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं की सप्लाई में भी समस्या हो सकती है।
    उर्वरक की आपूर्ति हो सकती है प्रभावित
    भारत यूरिया और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों के बड़े हिस्से के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। विशेष रूप से डीएपी और यूरिया का करीब 46 प्रतिशत आयात अकेले ओमान से होता है। अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है, तो उर्वरक की कमी के कारण कृषि क्षेत्र पर सीधे असर पड़ेगा और कीमतों में तेजी आएगी।

    सोना और अन्य आयातित उत्पाद महंगे हो सकते हैं
    संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों से भारत में सोने का आयात होता है। शिपिंग लागत बढ़ने से सोने की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसके अलावा खजूर और कुछ प्रोसेस्ड फूड जैसे उत्पादों की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी कुल खजूर का लगभग 80-90 प्रतिशत खाड़ी देशों से आयात करता है, खासकर यूएई और ओमान से। तनाव बढ़ने और समुद्री मार्ग बंद होने की स्थिति में इन उत्पादों की कीमतों में उछाल आ सकता है।

    निर्यात क्षेत्र भी होगा प्रभावित
    भारत के निर्यात पर भी खाड़ी देशों में तनाव का असर पड़ेगा। प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हैं:-

    खाद्यान्न और चावल: सऊदी अरब, ईराक, यूएई और ओमान भारत के बड़े खरीदार हैं। समुद्री मार्ग बंद होने पर शिपमेंट में देरी होगी, नई आपूर्ति रूट लंबा होगा और ढुलाई लागत बढ़ेगी। भारत का लगभग 50 प्रतिशत बासमती निर्यात खाड़ी देशों और ईरान को जाता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 60 लाख टन बासमती निर्यात किया, जिसकी कीमत लगभग 50,312 करोड़ रुपये थी।

    मांस और समुद्री उत्पाद: जमी हुई मछली और झींगा जैसी वस्तुएं खाड़ी देशों में बड़ी मांग में हैं। लॉजिस्टिक बाधाओं से निर्यात घट सकता है।

    फार्मास्यूटिकल्स: भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा सप्लायर है। आपूर्ति बाधित होने पर निर्यात राजस्व प्रभावित होगा और कंपनियों को सामान पहुंचाने में मुश्किलें आएंगी।

    इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स: मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और निर्माण सामग्री की खेप में देरी से विशेषकर एमएसएमई प्रभावित होंगे। जनवरी में खाड़ी देशों को मशीनरी निर्यात में 16 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई थी।

    कपड़ा और परिधान: खाड़ी देशों का बाजार रेडीमेड गारमेंट और टेक्सटाइल निर्यात के लिए अहम है। भारत का खाड़ी देशों को कुल परिधान निर्यात लगभग 1.79 बिलियन डॉलर का है। शिपिंग लागत बढ़ने से प्रतिस्पर्धा घट सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा चलता है और हॉर्मुज स्ट्रेट पर तनाव जारी रहता है, तो किसानों और निर्यातक दोनों के लिए चुनौतियां गंभीर रूप से बढ़ सकती हैं।