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  • 8 फरवरी महाकाल भस्म आरती: चंदन के त्रिपुंड और त्रिनेत्र से सजे बाबा महाकाल, अलौकिक श्रृंगार के हुए दर्शन

    8 फरवरी महाकाल भस्म आरती: चंदन के त्रिपुंड और त्रिनेत्र से सजे बाबा महाकाल, अलौकिक श्रृंगार के हुए दर्शन

    उज्जैन । उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में रविवार तड़के 8 फरवरी को फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। सुबह करीब 4 बजे मंदिर के कपाट खोले गए, जिसके साथ ही श्रद्धा और आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। कपाट खुलते ही गर्भगृह में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुजारियों ने भगवान महाकाल सहित सभी देवी-देवताओं का विधिवत पूजन किया और जलाभिषेक से आरती की शुरुआत हुई ।

    इसके पश्चात भगवान महाकाल का दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक किया गया। अभिषेक के बाद बाबा महाकाल का अत्यंत मनोहारी और दिव्य श्रृंगार किया गया। भगवान को चंदन का त्रिपुंड लगाया गया, त्रिनेत्र से अलंकृत किया गया और भांग से राजा स्वरूप में सजाया गया। यह दृश्य भक्तों के लिए अत्यंत भावविभोर कर देने वाला रहा।

    भस्म अर्पण से पूर्व प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम का जल अर्पित किया गया। मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का ध्यान किया गया और कपूर आरती संपन्न हुई। इसके बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से आच्छादित कर भस्म रमाई गई, जो महाकाल की विशिष्ट पहचान और शिव तत्व का प्रतीक मानी जाती है। भस्म अर्पण के पश्चात भगवान को शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुंडमाल, रुद्राक्ष की माला और सुगंधित पुष्पों की मालाएं अर्पित की गईं। आभूषणों और फूलों से बाबा महाकाल का भव्य अलंकरण किया गया, जिससे गर्भगृह दिव्यता से आलोकित हो उठा।

    अल सुबह संपन्न हुई इस भस्म आरती में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य लाभ अर्जित किया। दर्शन के बाद श्रद्धालुओं ने नंदी महाराज के दर्शन किए और उनके कान के समीप अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना की। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर “जय श्री महाकाल” के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। भक्तों की आस्था और भक्ति ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि बाबा महाकाल के दरबार में आकर हर मनोकामना पूर्ण होने की आशा जाग उठती है। जो श्रद्धालु मंदिर नहीं पहुंच सके, वे घर बैठे ऑनलाइन माध्यम से भी भस्म आरती के दर्शन कर बाबा का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

  • फाल्गुन 2026: फाल्गुन मास कब से कब तक, जानें शुभ-अशुभ नियम और पूजा का महत्व

    फाल्गुन 2026: फाल्गुन मास कब से कब तक, जानें शुभ-अशुभ नियम और पूजा का महत्व


    नई दिल्ली । सनातन परंपरा में फाल्गुन मास को अत्यंत पावन माना गया है। यह महीना भगवान श्रीकृष्ण को विशेष प्रिय है और ब्रज क्षेत्र में इस दौरान होली का उत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। फाल्गुन मास के साथ ही महाशिवरात्रि का पर्व भी आता है, जब श्रद्धालु विधि-विधान से भगवान शिव की उपासना करते हैं। यही नहीं, इस माह को चंद्र देव से भी जोड़कर देखा गया है, इसलिए उनकी आराधना से मानसिक शांति और सुख की प्राप्ति होती है। वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास 02 फरवरी 2026 से प्रारंभ होकर 03 मार्च 2026 तक रहेगा। इसके अगले दिन 04 मार्च से चैत्र मास का आरंभ होगा। इस महीने में किए जाने वाले धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान विशेष फलदायी माने जाते हैं।

    फाल्गुन मास में भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव की पूजा-अर्चना अत्यंत शुभ मानी जाती है। प्रतिदिन शिवलिंग का जल, दूध और बेलपत्र से अभिषेक करने से कष्टों में कमी आती है और जीवन में सुख-शांति बढ़ती है। साथ ही अन्न, धन और वस्त्रों का दान करने से आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। पितरों की कृपा पाने के लिए तर्पण और दान करना भी लाभकारी माना गया है, जिससे परिवार में सुख-शांति और सौहार्द्र का वातावरण बनता है। हालांकि, फाल्गुन मास में कुछ वर्जित कर्म भी बताए गए हैं। होलाष्टक के दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य टालने चाहिए। इसके अलावा मांस-मदिरा और नशीले पदार्थों का सेवन न करना, बुजुर्गों और महिलाओं का अपमान न करना और कटु भाषा से दूर रहना अनिवार्य है। धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवार और एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें और पौधों में जल अर्पित करने से बचें।

    इस माह की विशेषता यह है कि यह न केवल भगवान श्रीकृष्ण और शिव की आराधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, बल्कि पितृ तर्पण, दान और सामाजिक सदाचार के लिए भी महत्वपूर्ण है। फाल्गुन मास का पालन नियमपूर्वक करने से जीवन में शांति, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है। कुल मिलाकर फाल्गुन 2026 का यह पावन माह धार्मिक क्रियाओं, पूजा-अर्चना और सामाजिक दायित्वों का समन्वय है। इस मास में किए गए शुभ कार्यों से व्यक्ति और परिवार दोनों का कल्याण होता है, जबकि वर्जित कर्मों से बचकर जीवन में नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति मिलती है।