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  • 33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई

    33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई


    नई दिल्ली। तीन दशक पहले नौकरी से बर्खास्त किए गए भारतीय वायुसेना (IAF) के एक पूर्व अधिकारी को आखिरकार न्याय मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 की बर्खास्तगी को अवैध और अनुचित ठहराते हुए न सिर्फ उसे रद्द किया, बल्कि अधिकारी को सम्मानजनक विदाई देने का ऐतिहासिक आदेश भी दिया है।

    अदालत ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसका सम्मान सबसे बड़ी पूंजी होता है, और उसे बहाल करना न्याय का अहम हिस्सा है।

    कोर्ट का बड़ा फैसला
    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि वायुसेना की कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर और त्रुटिपूर्ण थी।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

    वायुसेना प्रमुख द्वारा तय तारीख पर उन्हें औपचारिक विदाई दी जाए
    विदाई उसी सम्मान के साथ हो, जिसके वे नियमित सेवानिवृत्ति पर हकदार होते

    क्या था मामला?
    यह पूरा विवाद 1987 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक नागरिक ड्राइवर को रेगिस्तान में छोड़ दिया गया था, जहां बाद में उसके अवशेष मिले। इसी मामले में कार्रवाई करते हुए 22 सितंबर 1993 को वायुसेना अधिनियम की धारा 19 के तहत आर. सूद को सेवा से हटा दिया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

    पहले ही मिल चुकी थी क्लीन चिट
    एक आपराधिक अदालत ने सबूतों के अभाव में आर. सूद को पहले ही बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुकदमा चलाने लायक सबूत ही नहीं थे, तो विभागीय कार्रवाई का आधार भी कमजोर हो जाता है।
    सजा में भेदभाव पर सख्त टिप्पणी
    कोर्ट ने पाया कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी को मामूली सजा दी गई, जबकि आदेश का पालन करने वाले आर. सूद को बर्खास्त कर दिया गया—जो स्पष्ट रूप से असमानता है।

    वरिष्ठ के आदेश का पालन बना सजा का कारण
    अदालत ने कहा कि किसी अधीनस्थ अधिकारी को सिर्फ इसलिए कठोर सजा नहीं दी जा सकती कि उसने अपने वरिष्ठ के आदेशों का पालन किया।

    सम्मान की वापसी को प्राथमिकता
    चूंकि आर. सूद अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, उन्हें सेवा में बहाल करना संभव नहीं है। लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें सभी लाभ ऐसे दिए जाएं मानो वे कभी बर्खास्त ही नहीं हुए थे।

    सबसे अहम बात—अदालत ने आर्थिक मुआवजे से ज्यादा “सम्मान की बहाली” को प्राथमिकता दी। यह फैसला बताता है कि एक सैनिक के लिए उसकी प्रतिष्ठा ही सबसे बड़ी पहचान होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 33 साल बाद फिर से स्थापित कर दिया।

  • राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे 59 सांसदों को दी गई विदाई

    राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे 59 सांसदों को दी गई विदाई


    नई दिल्ली।
    राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे 59 सांसदों को बुधवार को विदाई दी गई। विदाई समारोह में 20 राज्यों के 59 सदस्य, जिनमें 9 महिलाएं भी शामिल हैं, ने सदन को अलविदा कहा।

    इस मौके पर उपसभापति हरिवंश ने कहा कि पहले लोग खुद नियम फॉलो करते थे, अब हमें कंट्रोल करके कराना पड़ते हैं।उन्होंने नीतीश कुमार, अमित शाह, वेंकैया नायडू और सभी दलों के सदस्यों को उनके समर्थन के लिए धन्यवाद दिया और उपसभापति के रूप में अपने कार्यकाल को “जीवन का सुनहरा अवसर” बताया।

    सांसद संजय सिंह ने कहा कि किसी को विदा करना पीड़ादायक व भावनात्मक पल होता है। हम जब कमेटी में काम करते तो दलों की दूरी कम रहती है, ज्यादा मिलना होता है। कई लोगों से रिश्ते बनते हैं। उन्होंने मांग की कि पहले सांसदों को सेवानिवृत्ति के बाद भी परिसर में दरवाजे तक आने की व्यवस्था थी, तो ऐसा ही फिर किया जाए।

    केरल से सांसद जॉन ब्रिटास ने विदाई सम्बोधन के बीच सांसद जयराम रमेश को कहा कि हमने सहयोग करके आपको मंत्री बनाया, आपको सत्ता के समय सहयोग किया, लेकिन आप भूल गए। जयराम ने इस पर जवाब दिया, तो ब्रिटास ने कहा कि आप मुझे उकसाईयें मत।

    राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यदि मोह व आसक्ति हमें अपने गंतव्य तक जाने से रोके हैं। यदि भगवान राम वन नहीं जाते तो रावण का नाश कैसे होता। बहता पानी निर्मल होता है और रूका हुआ गंदा होता है। इसलिए हम हमारे साध्य और साधनों में पवित्रता रखते हुए आगे बढ़े।

    गुजरात के सांसद शक्ति सिंह ने कहा कि सदन में टोका-टोकी भी हुई, तारीफ भी मिली, लेकिन जनता और विचारधारा के लिए लड़ता रहा हूं और लड़ता रहूंगा। सामने विपक्ष वाले भी जनता से चुनकर आते हैं, उनको सुनने की परंपरा रही है, लेकिन गुजरात में यह परंपरा टूटी, इस पाप का हिस्सा कही मैं भी हूं, लेकिन मुझे खुशी है कि राज्यसभा में कुछ किस्सों को छोड़ दे तो आज भी सामने वालों को सुनने की वो परंपरा जीवित है।

    कांग्रेस सांसद दिग्विजय ने कहा कि छात्र जीवन में कभी राजनीति से कोई सम्पर्क नहीं था, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि 22 साल की उम्र में नगर पालिका अध्यक्ष बन गया। फिर 30 साल में विधायक, 33 साल में मंत्री-सांसद और 40 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बन गया, लेकिन मैंने कभी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। मेरे मतभेद रहे हैं और आगे भी रहेंगे, लेकिन राजनीतिक जीवन में किसी से कटुता नहीं पाली। विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में मेरे संंबंध उनसे भी अच्छे जिनकी विचारधारा से मैं सहमत नहीं। मैं सदन में व्यवधान के पक्ष में नहीं। सत्ता पक्ष पर समस्या का हल निकालने की जिम्मेदारी ज्यादा रहती, और रास्ता निकलता है। जिस प्रकार से साम्प्रदायिक कटुता बढ़ रही, वो देश के लिए उचित नहीं है। अटलजी की लाइनें याद आती है कि मैं टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं, आगे चलकर हम और काम करेंगे। दिग्विजय ने कबीर की लाइनों को भी दोहराया कि ना काहूं से दोस्ती और ना काहू से बैर।

    सभापति ने सभा को संबोधित करते हुए सदस्यों के द्विवार्षिक परिवर्तन की अनूठी संसदीय परंपरा पर प्रकाश डाला, यह बताते हुए कि यह निरंतरता और बदलाव दोनों को दर्शाती है—जहाँ अनुभव नए दृष्टिकोण के लिए मार्ग बनाता है और सदन की स्थायी भावना बनी रहती है। उन्होंने सेवानिवृत्त होने वाले सदस्यों के अमूल्य योगदान की सराहना की और कहा कि उनके ज्ञान, बहस और जन सेवा के प्रति प्रतिबद्धता ने सदन के कामकाज को समृद्ध किया और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत किया। उन्होंने यह भी विश्वास व्यक्त किया कि उनका अनुभव आगे भी जन जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करेगा।

    राज्य सभा सचिवालय के अनुसार 2025 में कुल 26 सदस्य सेवानिवृत्त हुए, जबकि 2026 में 73 सदस्य सेवानिवृत्त हो चुके हैं या होने वाले हैं, जिनमें उपसभापति, हरिवंश भी शामिल हैं। समारोह में, संसद कार्य मंत्री, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और विदाई आयोजन समिति के संयोजक किरेन रिजिजू ने राज्य सभा के सभापति, सी. पी. राधाकृष्णन, और अन्य गणमान्य व्यक्तियों का स्वागत किया।