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  • खेत में फसल तैयार, लेकिन बाजार तक पहुंचने से पहले बर्बाद: MP में स्टोरेज की कमी बनी किसानों की सबसे बड़ी मुसीबत

    खेत में फसल तैयार, लेकिन बाजार तक पहुंचने से पहले बर्बाद: MP में स्टोरेज की कमी बनी किसानों की सबसे बड़ी मुसीबत


    भोपाल । मध्य प्रदेश को देश के प्रमुख कृषि राज्यों में गिना जाता है और यहां बड़ी संख्या में किसान फल सब्जियों तथा अलग अलग बागवानी फसलों की खेती पर निर्भर हैं। सरकार की ओर से किसानों की आय बढ़ाने और खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के लगातार दावे किए जाते हैं लेकिन फसल तैयार होने के बाद उसकी सही तरीके से देखभाल और भंडारण की व्यवस्था आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। स्थिति यह है कि खेतों में मेहनत से तैयार की गई उपज का एक हिस्सा मंडी तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाता है। मध्य प्रदेश में फलों में अमरूद और सब्जियों में लौकी की बर्बादी सबसे ज्यादा सामने आई है। उपलब्ध सर्वे आंकड़ों के मुताबिक राज्य में करीब 14.93 प्रतिशत अमरूद और 7.46 प्रतिशत लौकी उचित भंडारण और रखरखाव के अभाव में खराब हो जाती है। इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है क्योंकि जिस फसल के लिए किसान महीनों मेहनत और खर्च करता है उसका एक हिस्सा बाजार तक पहुंचने से पहले ही बेकार हो जाता है।

    फसल कटने के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए वैज्ञानिक भंडारण व्यवस्था को बेहद जरूरी माना जाता है लेकिन कई इलाकों में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक सप्लाई चेन उपलब्ध नहीं है। जल्दी खराब होने वाले फल और सब्जियों के मामले में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। अमरूद की बर्बादी का आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता को सामने रखता है। सब्जियों में लौकी के अलावा फूलगोभी भी बड़े स्तर पर खराब हो रही है। आंकड़ों के अनुसार फूलगोभी का करीब 6.46 प्रतिशत हिस्सा उचित रखरखाव नहीं मिलने के कारण नष्ट हो जाता है। वहीं नींबू वर्गीय फलों में भी करीब 7.40 प्रतिशत तक फसलोत्तर नुकसान दर्ज किया गया है।

    नकदी फसलों और मसालों पर नजर डालें तो मिर्च में करीब 6.29 प्रतिशत और हरी मटर में 6.27 प्रतिशत तक नुकसान सामने आया है। धनिया भी इससे अछूता नहीं है और करीब 6.01 प्रतिशत फसल उचित भंडारण व्यवस्था के अभाव में खराब हो जाती है। दलहन में मध्य प्रदेश की प्रमुख फसल चना भी करीब 5.85 प्रतिशत तक नुकसान का सामना करती है। इसी तरह बाजरा में भी करीब 4.53 प्रतिशत तक फसलोत्तर नुकसान दर्ज किया गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल किसी एक फल या सब्जी तक सीमित नहीं है बल्कि खेती से बाजार तक पहुंचने वाली पूरी सप्लाई चेन को मजबूत करने की जरूरत है।

    दरअसल फल और सब्जियां लंबे समय तक सामान्य तापमान पर सुरक्षित नहीं रह पातीं। कटाई के बाद यदि उन्हें जल्द बाजार तक नहीं पहुंचाया जाए या उचित तापमान पर संग्रहित नहीं किया जाए तो उनकी गुणवत्ता तेजी से गिरने लगती है। कई बार किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ती है और जहां खरीदार नहीं मिलते वहां फसल खेत या मंडी में ही खराब होने लगती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान छोटे और सीमांत किसानों को उठाना पड़ता है।

    दूसरे राज्यों के आंकड़े भी फसलोत्तर नुकसान की तस्वीर को सामने रखते हैं। बिहार में अमरूद का करीब 15.36 प्रतिशत और टमाटर का 12.36 प्रतिशत तक नुकसान बताया गया है। उत्तर प्रदेश में खरबूजे का करीब 7.25 प्रतिशत और पोल्ट्री मीट का 7.24 प्रतिशत नुकसान दर्ज किया गया है। इससे साफ है कि देश के कई कृषि राज्यों में उत्पादन बढ़ाने के साथ साथ भंडारण और परिवहन की व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।

    मध्य प्रदेश में यदि गांवों और प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों के आसपास छोटे कोल्ड स्टोरेज फूड प्रोसेसिंग यूनिट और बेहतर परिवहन सुविधाएं विकसित की जाएं तो किसानों की उपज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे किसान मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचने के बजाय बेहतर बाजार का इंतजार कर सकेंगे। साथ ही खराब होने वाली उपज को प्रोसेसिंग के जरिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है बल्कि खेत से बाजार तक फसल को सुरक्षित पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

  • PM Fasal Bima Yojana: अब जंगली जानवरों से बर्बाद फसल पर भी मिलेगा मुआवजा, किसानों को बड़ी राहत

    PM Fasal Bima Yojana: अब जंगली जानवरों से बर्बाद फसल पर भी मिलेगा मुआवजा, किसानों को बड़ी राहत


    नई दिल्ली। खेती-किसानी में मौसम के साथ-साथ जंगली जानवरों का खतरा भी किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन चुका है। कई बार खेतों में घुसकर नीलगाय, जंगली सूअर और दूसरे वन्य जीव पूरी फसल बर्बाद कर देते हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। अब किसानों के लिए राहत की खबर है। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बड़ा बदलाव करते हुए जंगली जानवरों और जलभराव से खराब होने वाली फसलों को भी बीमा कवर में शामिल करने का फैसला किया है।

    केंद्रीय कृषि मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने जानकारी दी कि खरीफ 2026 सीजन से यह नई व्यवस्था लागू की जाएगी। इसके तहत अगर किसी किसान की फसल जंगली जानवरों द्वारा नुकसान पहुंचाने या भारी बारिश के कारण खेतों में पानी भरने से खराब होती है, तो उसे भी बीमा योजना के तहत मुआवजा दिया जाएगा। लंबे समय से किसान इस तरह के नुकसान को योजना में शामिल करने की मांग कर रहे थे।

    सरकार के मुताबिक, नई व्यवस्था का फायदा देशभर के हजारों किसानों को मिलेगा। अब तक फसल बीमा योजना में प्राकृतिक आपदाओं और मौसम से होने वाले नुकसान को ही प्राथमिकता दी जाती थी, लेकिन अब खेती को प्रभावित करने वाले दूसरे बड़े जोखिमों को भी शामिल किया जा रहा है। इससे किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलने की उम्मीद बढ़ी है।

    कैसे मिलेगा बीमा क्लेम?
    नई गाइडलाइन के अनुसार, फसल खराब होने की स्थिति में किसान को 72 घंटे के भीतर इसकी सूचना देनी होगी। किसान मोबाइल ऐप या संबंधित पोर्टल के जरिए शिकायत दर्ज कर सकेंगे। इसके साथ खेत की जियो-टैग फोटो भी अपलोड करनी होगी, ताकि नुकसान की पुष्टि की जा सके। इसके बाद अधिकारी मौके पर जांच करेंगे और रिपोर्ट के आधार पर मुआवजा जारी किया जाएगा।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि किन जंगली जानवरों से हुए नुकसान को योजना में शामिल किया जाएगा और किन जिलों में यह सुविधा लागू होगी, इसका फैसला संबंधित राज्य सरकारें करेंगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन किसानों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है, जो हर साल जंगली जानवरों या जलभराव के कारण भारी नुकसान झेलते हैं। सरकार का कहना है कि खेती को सुरक्षित और किसानों की आय को मजबूत बनाने के लिए योजनाओं में लगातार सुधार किए जा रहे हैं और यह कदम उसी दिशा में अहम माना जा रहा है।

  • MP में गेहूं खरीदी पर अफसर अलर्ट मोड में: 80 लाख टन के लिए स्लॉट बुक, कई केंद्रों पर किसान परेशान

    MP में गेहूं खरीदी पर अफसर अलर्ट मोड में: 80 लाख टन के लिए स्लॉट बुक, कई केंद्रों पर किसान परेशान


    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में इस साल गेहूं खरीदी प्रक्रिया तेज रफ्तार से चल रही है, लेकिन तकनीकी और व्यवस्थागत दिक्कतों ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राजधानी भोपाल सहित कई जिलों में स्लॉट बुकिंग सिस्टम पर दबाव के कारण किसानों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक करीब 5 लाख किसानों से 22 लाख टन से अधिक गेहूं समर्थन मूल्य पर खरीदा जा चुका है। वहीं, सरकार का दावा है कि कुल 80 लाख टन गेहूं के लिए स्लॉट बुक हो चुके हैं। हालांकि, किसानों को स्लॉट बुकिंग कराने में सर्वर स्लो होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।

    राज्य सरकार ने इस बार गेहूं उपार्जन का लक्ष्य बढ़ाकर 100 लाख टन रखा है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा करीब 77 लाख टन था। किसानों की सुविधा के लिए उपार्जन केंद्रों की क्षमता भी बढ़ाई गई है, जहां प्रतिदिन स्लॉट सीमा को 1000 क्विंटल से बढ़ाकर 2250 क्विंटल कर दिया गया है।

    इसके बावजूद कई केंद्रों पर अव्यवस्था बनी हुई है। भोपाल, इंदौर, उज्जैन, सीहोर, जबलपुर, ग्वालियर, विदिशा और रायसेन जैसे जिलों में किसान स्लॉट बुकिंग और गेहूं बेचने के लिए घंटों इंतजार कर रहे हैं।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में कई उपार्जन केंद्रों का औचक निरीक्षण किया था, जिसके बाद प्रशासन अलर्ट मोड में आ गया है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि खरीदी प्रक्रिया में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

    सरकार ने किसानों की सुविधा के लिए कई व्यवस्थाओं का दावा किया है, जैसे कि पेयजल, छायादार स्थान, बैठने की सुविधा और शौचालय आदि। साथ ही किसानों को यह सुविधा भी दी गई है कि वे अपने जिले के किसी भी उपार्जन केंद्र पर गेहूं बेच सकते हैं।

    इस बार गेहूं की खरीद 2585 रुपए प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य और 40 रुपए प्रति क्विंटल बोनस सहित कुल 2625 रुपए प्रति क्विंटल की दर से की जा रही है।

    हालांकि, जमीनी स्तर पर तकनीकी दिक्कतों और अव्यवस्थाओं के कारण किसान अब भी सिस्टम से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं।