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  • भोपाल के मास्टर प्लान पर किसानों और व्यापारियों ने उठाए सवाल, कृषि जमीन का लैंडयूज बदलने और 45 मीटर सड़क के प्रस्ताव का विरोध

    भोपाल के मास्टर प्लान पर किसानों और व्यापारियों ने उठाए सवाल, कृषि जमीन का लैंडयूज बदलने और 45 मीटर सड़क के प्रस्ताव का विरोध


    भोपाल । भोपाल मास्टर प्लान 2047 के ड्राफ्ट को लेकर विरोध और आपत्तियों का सिलसिला तेज हो गया है। अब तक योजना के प्रस्तावों पर 5000 से ज्यादा आपत्तियां दर्ज की जा चुकी हैं। इन आपत्तियों की छंटनी करने में करीब 15 दिन लगने का अनुमान है। इसके बाद संबंधित विभाग की ओर से सुनवाई का शेड्यूल जारी किया जाएगा। बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया में बदलाव कृषि भूमि के उपयोग में परिवर्तन अवैध निर्माण और चौड़ी सड़कों के प्रस्ताव को लेकर लोगों ने सबसे ज्यादा सवाल उठाए हैं। शनिवार रात 12 बजे तक ऑनलाइन माध्यम से दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समयसीमा बताई गई है। अंतिम समय में आवेदन करने वाले लोगों को तकनीकी परेशानी या समयसीमा को लेकर असमंजस का सामना न करना पड़े इसे लेकर भी मांग उठाई गई है।

    शाहपुरा स्थित टाउन एंड कंट्री प्लानिंग यानी टीएंडसीपी कार्यालय में पिछले दो दिनों से आपत्तियां दर्ज कराने के लिए लोगों की आवाजाही बढ़ी हुई है। शुक्रवार को भारतीय किसान संघ के साथ व्यापारी और स्थानीय रहवासी भी कार्यालय पहुंचे। लोगों ने मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में प्रस्तावित बदलावों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। कई लोगों की चिंता निर्माण और जमीन के उपयोग से जुड़े प्रावधानों को लेकर है। किसानों का कहना है कि उनकी कृषि भूमि का उपयोग खेती के लिए सुरक्षित रहना चाहिए जबकि कुछ स्थानीय रहवासी प्रस्तावित चौड़ी सड़कों और अन्य नियोजन प्रावधानों पर सवाल उठा रहे हैं।

    मास्टर प्लान पर आपत्ति और सुझाव देने की समयसीमा को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। क्रेडाई भोपाल के अध्यक्ष मनोज मीक ने संयुक्त संचालक टीएंडसीपी को आवेदन भेजकर अंतिम तारीख और समय को लेकर स्पष्ट जानकारी देने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि विभिन्न संस्थाएं और नागरिक समूह योजना पर आपत्तियां और सुझाव जुटा रहे हैं। ऐसे में अंतिम दिनों में कार्यालय बंद रहने या ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी परेशानी आने से किसी नागरिक की आपत्ति दर्ज होने से छूट सकती है। आवेदन में काउंटर चालू रखने स्टाफ की उपलब्धता और संपर्क अधिकारी की जानकारी वेबसाइट तथा नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित करने की मांग भी की गई है। साथ ही आवेदन की रसीद पर तारीख समय आवक नंबर और जमा किए गए दस्तावेजों का विवरण दर्ज करने का सुझाव दिया गया है।

    क्रेडाई की ओर से भेजे गए आवेदन में मध्य प्रदेश राजपत्र में 25 सितंबर को प्रकाशित ड्राफ्ट के संदर्भ में आपत्ति और सुझाव देने की समयसीमा का उल्लेख किया गया है। आवेदन के मुताबिक प्रकाशन का दिन छोड़कर 30 दिनों की गणना करने पर अंतिम दिन 25 अक्टूबर पड़ता है। इसी कारण विभाग से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि काउंटर ईमेल और ऑनलाइन पोर्टल के जरिए आवेदन किस तारीख और समय तक स्वीकार किए जाएंगे। अंतिम समयसीमा को लेकर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना इसलिए जरूरी है ताकि लोगों को आवेदन जमा करने में परेशानी न हो।

    मास्टर प्लान को लेकर किसानों की सबसे बड़ी चिंता बड़े तालाब के आसपास की कृषि भूमि और उसके भू-उपयोग में प्रस्तावित बदलाव हैं। किसानों का आरोप है कि नए ड्राफ्ट में कुछ कृषि भूमि को दूसरी श्रेणियों में शामिल करने का प्रस्ताव है जिससे भविष्य में खेती और आजीविका प्रभावित हो सकती है। किसान प्रतिनिधि अनोखी सिंह पटेल के मुताबिक खेती ही कई परिवारों की आय का प्रमुख साधन है। इसी वजह से किसान भोजताल संरक्षण जोन एक यानी BIZ-1 और जोन दो यानी BIZ-2 को हटाने तथा कृषि भूमि का लैंडयूज कृषि ही बनाए रखने की मांग कर रहे हैं।

    इसके अलावा बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र में बदलाव को लेकर भी आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। स्थानीय लोगों और किसानों का कहना है कि तालाब के जलग्रहण क्षेत्र और आसपास की जमीन के उपयोग से जुड़े फैसलों पर पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वहीं मिसरोद के रहवासियों की ओर से 45 मीटर चौड़ी सड़क के प्रस्ताव को हटाने की मांग भी उठाई गई है। किसानों और स्थानीय नागरिकों की आपत्तियों में कृषि भूमि को रिवरफ्रंट फॉरेस्ट ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल किए जाने जैसे मुद्दे भी सामने आए हैं।

    अब विभाग के सामने हजारों आपत्तियों की जांच और उनकी श्रेणीवार छंटनी करने की चुनौती है। छंटनी पूरी होने के बाद सुनवाई का कार्यक्रम जारी किया जाएगा। इसके बाद संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलने की उम्मीद है। भोपाल मास्टर प्लान 2047 शहर के भविष्य के विकास और भूमि उपयोग से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसलिए किसानों व्यापारियों और रहवासियों की आपत्तियों पर सुनवाई और प्रस्तावों के प्रभावों का आकलन आने वाले समय में इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा रहेगा।

  • भोपाल मास्टर प्लान-2047 पर व्यापारियों का मोर्चा, कन्वर्जन फीस 5% करने और सीलिंग रोकने की मांग, अब किसान भी उठाएंगे आवाज

    भोपाल मास्टर प्लान-2047 पर व्यापारियों का मोर्चा, कन्वर्जन फीस 5% करने और सीलिंग रोकने की मांग, अब किसान भी उठाएंगे आवाज


    भोपाल । भोपाल मास्टर प्लान-2047 के नए ड्राफ्ट को लेकर विरोध तेज होने लगा है। योजना पर आपत्तियां दर्ज कराने के लिए शुक्रवार को सबसे पहले व्यापारी शाहपुरा स्थित नगर तथा ग्राम निवेश यानी टीएंडसीपी कार्यालय पहुंचे। व्यापारियों ने व्यावसायिक भू-उपयोग कन्वर्जन फीस फ्लोर एरिया रेशियो यानी एफएआर और सीलिंग की कार्रवाई से जुड़े प्रावधानों पर सवाल उठाए। दूसरी ओर भारतीय किसान संघ के बैनर तले किसान भी अपनी जमीन और खेती से जुड़े मुद्दों को लेकर आपत्तियां दर्ज कराने की तैयारी में हैं। इससे मास्टर प्लान के प्रस्तावों पर व्यापारियों और किसानों की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है।

    व्यापारियों की प्रमुख मांग है कि कन्वर्जन फीस एकमुश्त और कुल पांच प्रतिशत तय की जाए। उनका कहना है कि निर्धारित फीस जमा करने के बाद उन्हें पूरा कमर्शियल एफएआर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही पुराने बाजारों को राहत देने और सीलिंग की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग भी उठाई गई है। व्यापारियों का मानना है कि व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े नियम स्पष्ट और व्यावहारिक होने चाहिए ताकि कारोबारियों को अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।

    व्यापारियों के बाद अब किसानों की आपत्तियां भी मास्टर प्लान के लिए अहम होने वाली हैं। भारतीय किसान संघ के बैनर तले किसान शाहपुरा स्थित टीएंडसीपी कार्यालय पहुंचकर अपनी चिंताएं अधिकारियों के सामने रखेंगे। इससे पहले गुरुवार को नीलबड़ में किसानों ने सड़क पर बैठकर प्रदर्शन किया था। किसानों का आरोप है कि नए ड्राफ्ट में 66 गांवों की कृषि भूमि को रिवरफ्रंट फॉरेस्ट ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल करने के प्रस्ताव से उनकी निजी जमीन खेती और आजीविका प्रभावित हो सकती है।

    किसानों के मुताबिक वर्ष 1995 के मास्टर प्लान में संबंधित जमीनों का भू-उपयोग कृषि रखा गया था। वर्ष 2031 के लिए तैयार किए गए पहले के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में भी कृषि उपयोग का प्रावधान होने की बात कही जा रही है। अब नए ड्राफ्ट में बड़े तालाब के आसपास की कृषि भूमि के भू-उपयोग में बदलाव की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसान चाहते हैं कि जमीन का उपयोग बदलने से पहले उनकी आपत्तियों और अधिकारों पर गंभीरता से विचार किया जाए। भारतीय किसान संघ के तहसील अध्यक्ष अखिलेश मीणा ने भी किसानों की ओर से कार्यालय पहुंचकर विरोध दर्ज कराने की बात कही है।

    मास्टर प्लान में बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र में निर्माण की सीमा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। किसानों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ इलाकों में आम लोगों के मकानों पर निर्माण संबंधी पाबंदियों की आशंका है जबकि एलडीआर में शामिल कुछ क्षेत्रों में निर्माण की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव है। आलोचकों का दावा है कि इससे प्रभावशाली लोगों के बंगलों और फार्म हाउस वाले इलाकों को फायदा मिल सकता है। हालांकि इन आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित नियमों निर्माण अनुमतियों और जमीन के रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।

    किसानों ने मेंडोरा मेंडोरी सेवनिया गौंड और केरवा वुड्स जैसे क्षेत्रों में भू-उपयोग और जमीन की सरकारी गाइडलाइन में बदलाव पर भी चिंता जताई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मेंडोरी के केरवा वुड्स क्षेत्र में कृषि भूमि की कलेक्टर गाइडलाइन वर्ष 2025-26 में एक करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर थी जो वर्ष 2026-27 में बढ़कर तीन करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर हो गई। हालांकि सरकारी गाइडलाइन में बढ़ोतरी का अर्थ यह नहीं है कि वास्तविक बाजार मूल्य भी उसी अनुपात में बढ़ गया है।

    किसानों की मांग है कि भोजताल संरक्षण जोन-1 और जोन-2 से जुड़े प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए और कृषि भूमि का उपयोग खेती के लिए सुरक्षित रखा जाए। उनका कहना है कि खेती ही उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है इसलिए जमीन के भविष्य से जुड़े फैसले लेते समय किसानों की सहमति और समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

    टीएंडसीपी की संयुक्त संचालक इंदू त्रिपाठी के मुताबिक नियमानुसार 30 दिन के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए हैं। प्राप्त आपत्तियों को ऑनलाइन पोर्टल पर डिजिटाइज किया जाएगा और इसके बाद संबंधित पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया जाएगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि व्यापारियों और किसानों की मांगों पर सुनवाई के दौरान क्या निर्णय सामने आते हैं और भोपाल के विकास की प्रस्तावित योजना में किन बदलावों पर विचार किया जाता है।

  • बड़ा तालाब संरक्षण के नाम पर जमीन छिनने का डर, भोपाल में किसानों की पदयात्रा, BIZ-1 और BIZ-2 जोन हटाने की मांग

    बड़ा तालाब संरक्षण के नाम पर जमीन छिनने का डर, भोपाल में किसानों की पदयात्रा, BIZ-1 और BIZ-2 जोन हटाने की मांग


    नई दिल्ली। भोपाल मास्टर प्लान के नए ड्राफ्ट को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में विरोध तेज होने लगा है। प्रस्तावित योजना में 66 गांवों की कृषि भूमि के भू-उपयोग में बदलाव किए जाने की आशंका से किसान चिंतित हैं। किसानों का आरोप है कि खेती की जमीन को रिवरफ्रंट फॉरेस्ट ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल करने का प्रस्ताव उनकी आजीविका पर असर डाल सकता है। इसी मुद्दे को लेकर किसानों ने अपनी जमीन बचाने और प्रस्तावित बदलावों पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए पदयात्रा शुरू की। किसान मुगालिया छाप से नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के संयुक्त संचालक कार्यालय तक पहुंचकर ज्ञापन देना चाहते थे लेकिन पुलिस ने नीलबड़ में बैरिकेडिंग कर उन्हें रोक लिया। पुलिस की ओर से पहले से व्यवस्था किए जाने की वजह यह बताई गई कि पिछली बार किसान भोपाल शहर तक पहुंच गए थे।

    किसानों की मुख्य मांग है कि उनकी कृषि भूमि का उपयोग पहले की तरह खेती के लिए ही सुरक्षित रखा जाए। उनका कहना है कि जिस जमीन पर किसान वर्षों से खेती कर रहे हैं उसी से उनके परिवारों का भरण पोषण होता है। यदि इन जमीनों को दूसरी आरक्षित श्रेणियों में शामिल कर दिया गया तो खेती करने और भविष्य में जमीन का उपयोग करने को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है। किसानों का कहना है कि जमीन केवल संपत्ति नहीं बल्कि उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है। इसलिए मास्टर प्लान में कोई भी बदलाव करने से पहले प्रभावित ग्रामीणों की बात सुनी जानी चाहिए।

    किसान अनोखी सिंह पटेल ने आरोप लगाया कि बड़ा तालाब के संरक्षण के नाम पर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की कृषि भूमि का लैंडयूज बदलने का प्रस्ताव किया जा रहा है। किसानों का कहना है कि वे बड़ा तालाब के संरक्षण के महत्व को समझते हैं लेकिन इसके नाम पर कृषि भूमि के उपयोग में बदलाव करने से पहले स्थानीय लोगों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि वर्षों से खेती कर रहे परिवारों के भविष्य को लेकर स्पष्टता होना जरूरी है। इसी वजह से किसान प्रस्तावित ड्राफ्ट में किए गए बदलावों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराना चाहते हैं।

    किसानों के मुताबिक वर्ष 1995 के मास्टर प्लान में संबंधित जमीनों का भू-उपयोग कृषि निर्धारित था। इसके बाद वर्ष 2031 के मास्टर प्लान के लिए तैयार किए गए ड्राफ्ट में भी कृषि उपयोग का प्रावधान रखा गया था। हालांकि बाद में वह मास्टर प्लान निरस्त हो गया। अब मौजूदा ड्राफ्ट में बड़ा तालाब के आसपास की कृषि भूमि के उपयोग में बदलाव की आशंका को लेकर किसान विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि नई योजना तैयार करते समय पुराने प्रावधानों और किसानों की आजीविका पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

    किसानों ने भोजताल संरक्षण जोन-1 यानी BIZ-1 और जोन-2 यानी BIZ-2 को हटाने की मांग भी उठाई है। किसान अनोखी सिंह पटेल के मुताबिक खेती उनकी आय का प्रमुख स्रोत है और कृषि भूमि का उपयोग कृषि के लिए ही बनाए रखना जरूरी है। किसानों का कहना है कि यदि उनकी जमीनों को दूसरी श्रेणियों में शामिल किया जाता है तो उनके सामने भविष्य में कई तरह की व्यावहारिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि प्रस्तावित बदलावों पर पुनर्विचार किया जाए और उनकी आपत्तियों का उचित समाधान निकाला जाए।

    किसानों का एक बड़ा सवाल ग्रामसभाओं में सहमति लेने को लेकर भी है। उनका आरोप है कि वर्ष 2031 के मास्टर प्लान की प्रक्रिया के दौरान नए ड्राफ्ट को तैयार करने में पंचायतों से सहमति लेने का आश्वासन दिया गया था लेकिन मौजूदा प्रस्ताव में संबंधित गांवों की सहमति नहीं ली गई। किसान चाहते हैं कि पहले सभी 66 गांवों में ग्रामसभाएं आयोजित की जाएं और प्रस्तावित भू-उपयोग पर विस्तार से चर्चा हो। उनका कहना है कि किसानों की समस्याएं और आपत्तियां सुनने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए। फिलहाल मास्टर प्लान को लेकर किसानों की चिंता बनी हुई है और वे अपनी मांगों को संबंधित विभाग तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

  • MP में रबी सीजन से पहले बिजली कटौती ने बढ़ाई मुश्किलें, ग्रिडों का घेराव और चक्काजाम, ऊर्जा मंत्री ने दिए 10 घंटे बिजली के निर्देश

    MP में रबी सीजन से पहले बिजली कटौती ने बढ़ाई मुश्किलें, ग्रिडों का घेराव और चक्काजाम, ऊर्जा मंत्री ने दिए 10 घंटे बिजली के निर्देश


    भोपाल । मध्य प्रदेश में अघोषित बिजली कटौती का मुद्दा अब गांवों से निकलकर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में पहुंच गया है। किसानों और ग्रामीणों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है। पिछले एक सप्ताह के दौरान मंदसौर राजगढ़ सीहोर बड़वानी धार झाबुआ खंडवा आगर मालवा नर्मदापुरम और बुरहानपुर समेत 10 से ज्यादा जिलों में बिजली कटौती के खिलाफ प्रदर्शन हो चुके हैं। कहीं किसानों ने बिजली ग्रिडों का घेराव किया तो कहीं चक्काजाम लगाकर अधिकारियों के सामने अपनी समस्याएं रखीं। कई स्थानों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी विरोध प्रदर्शन करते हुए बिजली आपूर्ति नियमित करने की मांग उठाई है। खास बात यह है कि बिजली संकट को लेकर अब भाजपा के मंत्री और विधायक भी परेशान नजर आ रहे हैं और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से समस्या का समाधान कराने की गुहार लगा रहे हैं।
    ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली कटौती का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ रहा है। रबी सीजन की तैयारियों के बीच सिंचाई के लिए बिजली की जरूरत बढ़ने लगी है। किसानों का कहना है कि समय पर बिजली नहीं मिलने से खेतों में सिंचाई प्रभावित हो रही है और फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ रही है। ग्रामीण इलाकों में रात के समय बिजली गुल होने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। कुछ स्थानों पर दो से आठ घंटे तक बिजली कटौती होने की बात कही जा रही है। इससे खेती के साथ घरेलू कामकाज और आम जनजीवन भी प्रभावित हो रहा है।
    मंदसौर जिले में बिजली कटौती के विरोध में कई जगह प्रदर्शन हुए। गरोठ सुवासरा बालागुड़ा और शामगढ़ में किसानों ने बिजली ग्रिडों का घेराव किया। गरोठ-भोपाल रोड पर करीब तीन घंटे तक चक्काजाम रहा। मंदसौर विधायक विपिन जैन के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बिजली विभाग के कार्यालय का घेराव किया। इस दौरान विधायक और अधीक्षण यंत्री के बीच तीखी बहस भी हुई। प्रदर्शनकारियों ने बिजली आपूर्ति में सुधार की मांग करते हुए कहा कि किसानों और ग्रामीणों की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
    राजगढ़ जिले में भी बिजली कटौती को लेकर नाराजगी देखने को मिली। करेड़ी गांव और ढाबला जोड़ पर पूर्व विधायक बापू सिंह तंवर ने ग्रामीणों के साथ चक्काजाम किया। उन्होंने अधिकारियों से बिजली कटौती की शिकायत की और समस्या दूर नहीं होने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी। नवरात्रि के दौरान आरती के समय बिजली कटने को लेकर भी सवाल उठाए गए। सीहोर जिले के बिलकिसगंज में ग्रामीणों ने विद्युत केंद्र का घेराव किया जबकि बड़वानी में किसानों ने कार्यकारी यंत्री कार्यालय पहुंचकर विरोध जताया। धार जिले के मनावर में विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने कलेक्टर को पत्र लिखकर बिजली समस्या की ओर ध्यान दिलाया।
    आगर मालवा में ग्रामीणों ने चक्काजाम किया तो झाबुआ और खंडवा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रैलियां निकालकर विरोध दर्ज कराया। नर्मदापुरम जिले के पिपरिया में ज्ञापन सौंपा गया जबकि बुरहानपुर में किसानों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर बिजली कटौती का मुद्दा उठाया। लगातार सामने आ रही शिकायतों के कारण मामला कैबिनेट बैठक तक पहुंच गया। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार और उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा समेत कई मंत्रियों ने अपने क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की समस्याएं बताईं। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अगली कैबिनेट बैठक में चर्चा कर समाधान निकालने का आश्वासन दिया।
    ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने अधिकारियों को रबी सीजन में किसानों को प्रतिदिन 10 घंटे बिजली उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने प्रमुख सचिव और बिजली उत्पादन ट्रांसमिशन तथा पावर मैनेजमेंट से जुड़ी कंपनियों के अधिकारियों को आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कहा है। ऊर्जा मंत्री के मुताबिक प्रदेश में बिजली की मांग में अचानक तेजी आई है। 11 अक्टूबर को मांग करीब 16 हजार मेगावाट तक पहुंच गई थी जबकि पिछले साल इसी तारीख को यह लगभग 11 हजार मेगावाट थी। यानी एक साल में मांग में करीब 38 से 40 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।
    सरकार के सामने अब बढ़ती मांग के बीच बिजली उत्पादन और आपूर्ति का संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। अधिकारियों को उत्पादन बढ़ाने कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करने और स्थानीय स्तर पर आ रही बाधाओं को दूर करने के निर्देश दिए गए हैं। भारतीय किसान संघ ने भी दशहरे तक बिजली समस्या का समाधान करने का अल्टीमेटम दिया है। रबी की बुवाई का समय नजदीक होने के कारण आने वाले दिनों में बिजली की जरूरत और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में किसानों और ग्रामीणों की नजर सरकार के आश्वासन तथा ऊर्जा विभाग के निर्देशों के असर पर टिकी है। अब देखना होगा कि प्रदेश में बिजली कटौती पर रोक लगाने और गांवों में नियमित आपूर्ति बहाल करने के लिए सरकार कितनी जल्दी प्रभावी कदम उठाती है।

  • सीएम से मुलाकात क्यों नहीं हो पा रही? किसानों का गुस्सा क्यों भड़का? 5 सवाल-जवाब में समझिए पूरा मामला

    सीएम से मुलाकात क्यों नहीं हो पा रही? किसानों का गुस्सा क्यों भड़का? 5 सवाल-जवाब में समझिए पूरा मामला

    मध्यप्रदेश। मध्य प्रदेश में किसानों का आंदोलन एक बार फिर सुर्खियों में है। नर्मदापुरम में संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले हजारों किसानों ने प्रदर्शन किया और भोपाल कूच की तैयारी की, लेकिन पुलिस ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया। 40 से अधिक किसान नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। किसानों का आरोप है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिलने का समय तीन बार तय हुआ, लेकिन हर बार अंतिम समय में मुलाकात टाल दी गई। इससे किसानों में नाराजगी और बढ़ गई। आखिर यह आंदोलन क्यों भड़का और इसकी वजह क्या है? आइए 5 सवाल-जवाब में समझते हैं।

    1. किसान अचानक आंदोलन पर क्यों उतर आए?

    इस आंदोलन के पीछे दो बड़े मुद्दे हैं। पहला मुद्दा मूंग की समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदी का है। केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार मूंग की खरीद अनुमानित उत्पादन के केवल 25 प्रतिशत तक ही की जा सकती है। जबकि इस वर्ष मूंग का समर्थन मूल्य 8,768 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। किसानों का कहना है कि उनकी अधिकांश उपज खुले बाजार में 6,000 से 7,000 रुपये प्रति क्विंटल के बीच बिक रही है, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

    दूसरा बड़ा मुद्दा खाद वितरण के लिए लागू किया गया ई-टोकन सिस्टम है। किसानों का आरोप है कि पोर्टल में तकनीकी खामियां हैं। कई बार सर्वर काम नहीं करता और कई किसानों का टोकन दूसरे जिलों के डिपो के नाम पर जारी हो जाता है, जिससे उन्हें खाद लेने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

    2. मुख्यमंत्री से मुलाकात तीन बार क्यों टली?

    संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि उन्होंने 20 जुलाई को मुख्यमंत्री और कृषि मंत्री से मुलाकात कराने की मांग की थी। पहले 23 जुलाई तक मुलाकात कराने का भरोसा दिया गया, लेकिन बैठक नहीं हो सकी। इसके बाद 26 जुलाई की तारीख तय हुई, फिर समय बदलता रहा और आखिर में किसानों को बताया गया कि मुख्यमंत्री दिल्ली रवाना हो गए हैं। इससे किसानों में यह संदेश गया कि सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है। हालांकि सरकार की ओर से अब तक मुलाकात टलने की आधिकारिक वजह सार्वजनिक नहीं की गई है।

    3. केंद्र और राज्य सरकार का पक्ष क्या है?

    केंद्र सरकार का कहना है कि मध्य प्रदेश को जितना मूंग खरीदने का कोटा मिला है, उसका भी पूरा उपयोग नहीं हो पाया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में बताया कि स्वीकृत कोटे का बहुत कम हिस्सा ही खरीदा गया है। इसलिए फिलहाल कोटा बढ़ाने का औचित्य नहीं बनता। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से किसानों की शिकायतों पर विस्तृत प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।

    4. पुलिस कार्रवाई पर किसानों की आपत्ति क्यों है?

    किसानों का आरोप है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से भोपाल जाकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन देना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें नर्मदापुरम में ही रोक दिया। 40 से ज्यादा नेताओं को हिरासत में ले लिया गया। किसान नेताओं का कहना है कि सरकार बातचीत के बजाय आंदोलन दबाने की कोशिश कर रही है।

    5. अब आगे क्या हो सकता है?

    संयुक्त किसान मोर्चा ने साफ कर दिया है कि जब तक हिरासत में लिए गए नेताओं की रिहाई नहीं होती और सरकार किसानों से औपचारिक बातचीत नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। यदि सरकार और किसान संगठनों के बीच जल्द संवाद नहीं हुआ तो आंदोलन प्रदेश के अन्य जिलों तक भी फैल सकता है।

    किसानों की नाराजगी केवल समर्थन मूल्य या खाद वितरण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अब यह संवादहीनता का मुद्दा भी बन चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली बातचीत ही तय करेगी कि यह आंदोलन शांत होगा या और व्यापक रूप लेगा।

  • सीहोर में किसानों-कांग्रेस नेताओं ने रोका शिवराज का काफिला, बोले- “आप हमारे भी प्रतिनिधि”; नीमच में विधायक को जनता का विरोध झेलना पड़ा

    सीहोर में किसानों-कांग्रेस नेताओं ने रोका शिवराज का काफिला, बोले- “आप हमारे भी प्रतिनिधि”; नीमच में विधायक को जनता का विरोध झेलना पड़ा


    सीहोर। मध्य प्रदेश के सीहोर और नीमच जिलों में रविवार को जनप्रतिनिधियों को जनता के तीखे विरोध और सवालों का सामना करना पड़ा। एक ओर सीहोर में किसानों और कांग्रेस नेताओं ने केंद्रीय कृषि मंत्री Shivraj Singh Chouhan का काफिला रोककर अपनी समस्याएं सामने रखीं, तो दूसरी ओर नीमच में भाजपा विधायक ओमप्रकाश सकलेचा को ग्रामीणों के भारी विरोध के चलते अपना कार्यक्रम बीच में ही छोड़ना पड़ा।

    सीहोर में इछावर के आजाद मैदान की ओर जा रहे शिवराज सिंह चौहान का काफिला अचानक उस समय रुक गया जब कांग्रेस नेताओं और किसानों के एक समूह ने रास्ते में उन्हें घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कहा कि वे राजनीतिक रूप से भले ही कांग्रेस से जुड़े हों, लेकिन जनप्रतिनिधि के रूप में शिवराज सभी के प्रतिनिधि हैं, इसलिए वे अपनी समस्याएं उनके सामने रखना चाहते हैं।

    इस दौरान किसानों ने बताया कि पिछले कई दिनों से वे खाद और कृषि संबंधी कार्यों के लिए परेशान हैं। डिजिटल पोर्टल के सर्वर डाउन होने के कारण किसानों को घंटों कतारों में खड़ा रहना पड़ रहा है, जिससे उनकी समस्याएं बढ़ रही हैं। किसानों ने इस संबंध में केंद्रीय मंत्री को ज्ञापन भी सौंपा।

    किसानों की बात सुनने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने आश्वासन दिया कि उनकी समस्याओं का जल्द समाधान किया जाएगा और सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे जनता के प्रतिनिधि हैं और हर नागरिक की समस्या का समाधान करना उनकी जिम्मेदारी है।

    बाद में जनकल्याण शिविर में पहुंचे शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों पर भी सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि कुछ अधिकारी जनता के कामों में बाधा डाल रहे हैं और पात्र लोगों को योजनाओं से बाहर किया जा रहा है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि सभी आवेदनों की निष्पक्ष जांच हो और किसी गरीब का हक न छीना जाए।

    इसी बीच नीमच जिले के जावद क्षेत्र में स्थिति अलग रही, जहां विधायक ओमप्रकाश सकलेचा को जनता के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। वे बांगरेड गांव में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के भूमिपूजन कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों ने निर्माण कार्य और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठाए।

    ग्रामीणों का कहना था कि अस्पताल तो बन रहा है, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। जब विधायक ने जवाब देने की कोशिश की, तो भीड़ और अधिक आक्रोशित हो गई और ‘विधायक वापस जाओ’ के नारे लगाने लगी। स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षाकर्मियों के बीच हस्तक्षेप के बाद विधायक को कार्यक्रम बीच में छोड़कर जाना पड़ा। यह घटनाएं दर्शाती हैं कि जनता अब अपने मुद्दों को लेकर अधिक मुखर हो रही है और जनप्रतिनिधियों से सीधे जवाब की अपेक्षा रखती है।

  • यूरिया संकट से भड़के किसान, मोदीनगर में सहकारी समिति पर बड़ा बवाल

    यूरिया संकट से भड़के किसान, मोदीनगर में सहकारी समिति पर बड़ा बवाल

    गाजियाबाद । उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में यूरिया खाद की किल्लत को लेकर किसानों का गुस्सा फूट पड़ा। मोदीनगर क्षेत्र के कादराबाद गांव स्थित साधन सहकारी समिति पर शनिवार सुबह उस समय स्थिति बेकाबू हो गई जब किसानों ने गोदाम से लगभग 350 यूरिया के कट्टे जबरन उठा लिए। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में हड़कंप मचा दिया और प्रशासन को मौके पर पहुंचकर हालात संभालने पड़े।

    किसानों का आरोप है कि उन्हें पिछले कई दिनों से यूरिया खाद नहीं मिल रही थी, जबकि समिति के अधिकारी कथित तौर पर ऊंचे दामों पर खाद की बिक्री कर रहे थे। धान की बुवाई के इस महत्वपूर्ण समय में खाद न मिलने से किसानों में लगातार आक्रोश बढ़ता जा रहा था।

    जानकारी के अनुसार, शुक्रवार रात को समिति के गोदाम में यूरिया का एक ट्रक पहुंचा था, जिसे उतारकर गोदाम में रख दिया गया। जैसे ही शनिवार सुबह समिति का कार्यालय खुला, बड़ी संख्या में किसान वहां पहुंच गए और खाद की मांग को लेकर विरोध शुरू कर दिया। स्थिति उस समय और बिगड़ गई जब किसानों को तुरंत यूरिया उपलब्ध नहीं कराया गया।

    इसके बाद किसानों का सब्र टूट गया और वे नारेबाजी करते हुए गोदाम में घुस गए। देखते ही देखते हालात ऐसे हो गए कि किसानों ने गोदाम से यूरिया के लगभग 350 कट्टे उठा लिए। इस दौरान समिति के कर्मचारियों और सचिव के साथ धक्का-मुक्की की भी खबरें सामने आईं।

    सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। अधिकारियों ने किसानों को समझाकर शांत कराया और मामले की जांच शुरू कर दी गई है। उपजिलाधिकारी के अनुसार पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए एक कमेटी गठित की गई है।

    वहीं दूसरी ओर यह भी जानकारी सामने आई है कि समिति के सचिव और कर्मचारियों ने बाद में किसानों के घर-घर जाकर यूरिया के कट्टों की कीमत वसूली और लगभग 93 हजार रुपये की राशि जिला सहकारी बैंक में जमा कराई गई। इस पूरे मामले ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में खाद वितरण व्यवस्था और उसकी पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन अब जांच के बाद आगे की कार्रवाई की बात कह रहा है।

  • मंडी शुल्क वृद्धि पर बवाल: कांग्रेस का विरोध तेज, सरकार से फैसला वापस लेने की मांग

    मंडी शुल्क वृद्धि पर बवाल: कांग्रेस का विरोध तेज, सरकार से फैसला वापस लेने की मांग


    मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश में कृषि उपज मंडियों में मंडी शुल्क को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.50 प्रतिशत किए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ विरोध तेज हो गया है। इस फैसले को लेकर मंदसौर जिले के पिपलियामंडी में कांग्रेस नेताओं, किसानों और व्यापारियों ने मिलकर राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा और इसे तत्काल वापस लेने की मांग की।

    यह ज्ञापन ब्लॉक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अनिल शर्मा और जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष रामचंद्र करुण के नेतृत्व में मंडी सचिव जगदीशचंद्र भाभड़ को सौंपा गया। इस दौरान बड़ी संख्या में किसान और व्यापारी भी मौजूद रहे।

     किसानों पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
    पूर्व ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा मंडी शुल्क में 0.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी किसानों और व्यापारियों दोनों के लिए नुकसानदायक है। उन्होंने कहा कि किसान पहले ही अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में यह अतिरिक्त शुल्क उन पर और आर्थिक दबाव बढ़ाएगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि देश के कई कृषि उत्पादक राज्यों में मंडी शुल्क 1 प्रतिशत या उससे भी कम है। ऐसे में मध्य प्रदेश में बढ़ा हुआ शुल्क व्यापारियों को अन्य राज्यों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में पीछे कर सकता है।

     किसानों और व्यापारियों में नाराजगी
    किसान बंशीलाल पाटीदार ने इस फैसले को किसान विरोधी बताया। उन्होंने कहा कि खेती पहले से ही घाटे का सौदा बनती जा रही है और इन परिस्थितियों में शुल्क वृद्धि किसानों की समस्याओं को और बढ़ाएगी। जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष रामचंद्र करुण ने भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह निर्णय किसान और व्यापारी वर्ग के हितों के खिलाफ है। उन्होंने इसे “शोषणकारी” कदम बताया और तत्काल वापस लेने की मांग की।

    आंदोलन की चेतावनी
    कांग्रेस नेता बाबूखा मेवाती ने मंडी शुल्क वृद्धि को अन्यायपूर्ण बताते हुए चेतावनी दी कि यदि सरकार ने यह निर्णय वापस नहीं लिया तो कांग्रेस आंदोलन करने के लिए मजबूर होगी।

     व्यापक समर्थन
    इस मौके पर कई स्थानीय नेता, किसान और व्यापारी उपस्थित रहे, जिन्होंने एक स्वर में मंडी शुल्क वृद्धि का विरोध किया और सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की।

    किसानों और व्यापारियों का कहना है कि यदि यह बढ़ोतरी लागू रहती है तो इसका सीधा असर उनकी आमदनी और व्यापार पर पड़ेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

  • पिपरसमा मंडी के बाहर सैकड़ों ट्रैक्टर-ट्रॉली से जाम, प्याज की भारी आवक से 3 घंटे ठप रहा रास्ता

    पिपरसमा मंडी के बाहर सैकड़ों ट्रैक्टर-ट्रॉली से जाम, प्याज की भारी आवक से 3 घंटे ठप रहा रास्ता


    मध्यप्रदेश । शिवपुरी जिले की पिपरसमा अनाज मंडी के बाहर बुधवार को प्याज की भारी आवक के चलते सैकड़ों ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतारें लग गईं। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि मुख्य मार्ग पर करीब तीन से चार किलोमीटर लंबा जाम लग गया और यातायात पूरी तरह बाधित हो गया। इस कारण किसान, राहगीर और अन्य वाहन चालक घंटों तक फंसे रहे।

    जानकारी के अनुसार, मंडी में प्याज की आवक सामान्य दिनों की तुलना में काफी अधिक रही। बड़ी संख्या में किसान अपनी फसल लेकर पहुंचे, लेकिन पर्याप्त व्यवस्थाओं की कमी के कारण ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को सड़क पर ही खड़ा करना पड़ा। इससे मंडी के बाहर मुख्य मार्ग पर यातायात पूरी तरह रुक गया और स्थिति धीरे-धीरे गंभीर जाम में बदल गई।

    जाम के कारण मंडी में होने वाली प्याज की नीलामी (डाक) भी प्रभावित हुई। कई किसानों ने मंडी प्रशासन की अव्यवस्था पर नाराजगी जताई और कहा कि हर साल आवक बढ़ने पर इसी तरह की स्थिति बनती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं किया जाता।

    करीब तीन घंटे तक चले इस जाम में सैकड़ों वाहन फंसे रहे और लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। गर्मी और भीड़भाड़ के बीच लोग लंबे समय तक सड़क पर ही फंसे रहे।

    मंडी सचिव बालेश शुक्ला ने बताया कि प्याज की आवक असामान्य रूप से अधिक होने के कारण यह स्थिति बनी। कुछ ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के सड़क पर खड़े होने से जाम बढ़ गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मंडी का दूसरा गेट खोलकर वाहनों को अंदर प्रवेश दिलाया गया, जिसके बाद धीरे-धीरे यातायात सामान्य हो सका। प्रशासन का कहना है कि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने इसके लिए अतिरिक्त व्यवस्था पर विचार किया जाएगा।

  • बमोरी में हंगामा: खाद न मिलने पर किसानों का प्रदर्शन, तहसीलदार के आश्वासन के बाद खुला रास्ता

    बमोरी में हंगामा: खाद न मिलने पर किसानों का प्रदर्शन, तहसीलदार के आश्वासन के बाद खुला रास्ता

    नई दिल्ली। गुना जिले के बमोरी क्षेत्र स्थित बागेरी डबल लॉक केंद्र पर सोमवार को उस समय हंगामा मच गया जब बड़ी संख्या में किसान खाद लेने पहुंचे। किसानों के पास निर्धारित तारीख के ऑनलाइन टोकन थे, लेकिन केंद्र पर सर्वर डाउन होने के कारण खाद का वितरण शुरू नहीं हो सका। ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत किसानों को पहले स्वयं टोकन जनरेट करना होता है और उसी दिन केंद्र पर पहुंचकर खाद प्राप्त करनी होती है। लेकिन तकनीकी खराबी ने पूरी व्यवस्था को ठप कर दिया।

    नाराज किसानों ने किया चक्काजाम
    खाद न मिलने और बार-बार हो रही परेशानियों से आक्रोशित किसानों ने सड़क पर ट्रैक्टर खड़े कर चक्काजाम कर दिया। किसानों का कहना था कि यदि आज का टोकन एक्सपायर हो जाता है तो उन्हें फिर से पूरी प्रक्रिया दोहरानी पड़ेगी, जिससे समय और संसाधनों की बर्बादी होगी। जाम के कारण सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और यातायात पूरी तरह बाधित हो गया।

    प्रशासन मौके पर पहुंचा, समझाइश से शांत हुआ मामला
    स्थिति बिगड़ती देख बमोरी पुलिस और तहसीलदार मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने किसानों से बातचीत कर उनकी समस्या सुनी और समाधान का आश्वासन दिया। प्रशासन ने भरोसा दिलाया कि किसानों के आज के टोकन मान्य रहेंगे और इन्हीं के आधार पर उन्हें अगले दिन खाद उपलब्ध कराई जाएगी। इस आश्वासन के बाद किसानों ने अपना प्रदर्शन समाप्त कर दिया और सड़क यातायात बहाल हो गया।

    ऑनलाइन सिस्टम पर उठे सवाल
    इस घटना ने खाद वितरण की ऑनलाइन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसानों का कहना है कि सर्वर डाउन और तकनीकी खराबी के कारण उन्हें बार-बार परेशानी झेलनी पड़ रही है, जबकि समय पर खाद न मिलने से खेती प्रभावित हो रही है।

    बमोरी की यह घटना साफ दर्शाती है कि डिजिटल व्यवस्था के बावजूद जमीनी स्तर पर तकनीकी खामियां किसानों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई हैं। प्रशासनिक आश्वासन के बाद भले ही मामला शांत हो गया हो, लेकिन सिस्टम की खामियों को सुधारने की जरूरत अब और ज्यादा महसूस की जा रही है।