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  • न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    नई दिल्ली । खेती के लिए आमतौर पर खुली जमीन, धूप, पानी और सही मौसम की जरूरत होती है. लेकिन क्लाइमेट चेंज के दौर में यही चीजें किसानों के लिए चुनौती बनती जा रही हैं. कहीं सूखा फसल खराब कर देता है तो कहीं ज्यादा बारिश पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है.

    चीन के वैज्ञानिक अब इसी समस्या का एक अलग रास्ता खोज रहे हैं. उनका आइडिया है कि खेती को जमीन के ऊपर करने के बजाय जमीन के नीचे ले जाया जाए. इसके लिए बंद हो चुकी कोयला खदानों का इस्तेमाल किया जा सकता है. खदानों में मौजूद बड़ी खाली जगह को एक तरह के हाईटेक फार्म में बदला जाएगा, जहां फसल के लिए जरूरी रोशनी, पानी, तापमान और हवा को इंसान अपने हिसाब से कंट्रोल कर सकेगा. हालांकि, इसका मकसद सिर्फ अनाज उगाना नहीं, बल्कि भविष्य की स्पेस कॉलोनियों के लिए खेती की टेक्नोलॉजी तैयार करना भी है.

    अंधेरी खदान में आएगी नकली धूप

    जमीन के कई मीटर नीचे सूरज की रोशनी पहुंचना संभव नहीं है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि पौधे बढ़ेंगे कैसे? वैज्ञानिकों के प्लान में इसका जवाब आर्टिफिशियल लाइटिंग है. इसका मतलब खदान के अंदर ऐसी लाइट लगाई जाएगी, जो पौधों को ग्रो करने के लिए जरूरी रोशनी देगी. इस काम में खदानों का पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर भी मदद कर सकता है. कई खदानों में पहले से पावर सप्लाई और वेंटिलेशन सिस्टम मौजूद हैं. इन्हें खेती की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने की संभावना देखी जा रही है. इसका मतलब बाहर चाहे रात हो या दिन, बारिश हो या तेज धूप, जमीन के नीचे मौजूद पौधों के लिए एक अलग ही मौसम तैयार किया जा सकेगा.

    गर्मी के लिए धरती की एनर्जी

    जमीन के अंदर एक और फायदा है. यहां का तापमान खुले मैदान की तरह लगातार तेजी से ऊपर-नीचे नहीं होता. वैज्ञानिक इस स्थिर वातावरण का फायदा उठाने की योजना बना रहे हैं. इसके लिए जियोथर्मल एनर्जी यानी धरती के अंदर मौजूद गर्मी का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे अंडरग्राउंड फार्म में पौधों के लिए जरूरी तापमान बनाए रखने में मदद मिलेगी. साथ ही पारंपरिक फ्यूल पर निर्भरता कम करने और ग्रीनहाउस गैसों के एमिशन को घटाने की कोशिश भी की जा सकती है. इसका मतलब जिस खदान को कभी कोयला निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वही जगह आगे चलकर क्लीन एनर्जी और खेती के एक्सपेरिमेंट का सेंटर बन सकती है.

    जहरीले पानी को भी बनाया जाएगा यूजफुल

    कोयला खदानों में सिर्फ खाली जगह ही नहीं होती. वहां जमा पानी भी एक बड़ी समस्या बन सकता है. कई बार इस पानी में ऐसे केमिकल और हैवी मेटल्स पाए जा सकते हैं, जिन्हें सीधे खेती में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. वैज्ञानिक इस समस्या के लिए पानी को साफ करने वाली तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं. मेम्ब्रेन सेपरेशन जैसी टेक्नोलॉजी के जरिए पानी से नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों को अलग करने की कोशिश होगी. इसके बाद साफ किए गए पानी का इस्तेमाल कुछ फसलों की सिंचाई में किया जा सकता है. चाय और रेपसीड जैसी फसलों का भी जिक्र किया गया है. हालांकि, कौन सी फसल जमीन के नीचे इस सिस्टम में सबसे अच्छी तरह उग सकती है, यह भी रिसर्च का हिस्सा होगा.

    असली मकसद खेती से कहीं बड़ा

    पहली नजर में लग सकता है कि चीन का यह पूरा प्लान सिर्फ जमीन की कमी को दूर करने के लिए बनाया गया है. लेकिन वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इससे कहीं आगे की है. दरअसल, अंडरग्राउंड फार्म को एक तरह की एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग लैब के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है. यहां वैज्ञानिक देखेंगे कि बिना प्राकृतिक वातावरण के पौधों को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है. रोशनी कितनी होनी चाहिए, पानी किस तरह इस्तेमाल किया जाए, हवा और तापमान कैसे कंट्रोल हों और कार्बन का पौधों पर क्या असर पड़े, इन सभी चीजों पर एक्सपेरिमेंट किया जा सकता है.

    धरती के नीचे की खेती जाएगी अंतरिक्ष तक

    इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प हिस्सा स्पेस मिशन से जुड़ा है. भविष्य में अगर इंसान चांद या मंगल जैसे दूसरे ग्रहों पर लंबे समय तक रहना चाहता है तो वहां खुले खेत बनाना बेहद मुश्किल होगा. वहां न धरती जैसा वातावरण है, न आसानी से उपलब्ध पानी और न ही खेती के लिए सामान्य मौसम. ऐसे में जमीन के नीचे या पूरी तरह कंट्रोल किए गए एनवायरनमेंट में खाना उगाने की टेक्नोलॉजी बेहद काम आ सकती है. चीन के वैज्ञानिकों का यह एक्सपेरिमेंट इसी दिशा में एक टेस्टिंग ग्राउंड की तरह काम कर सकता है. आज जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बंद पड़ी कोयला खदान में किया जाएगा, कल उसी के किसी बेहतर वर्जन से दूसरे ग्रहों पर पौधे उगाने की कोशिश की जा सकती है.

    हजारों बंद खदानें बन सकती हैं नया फार्म

    चीन में पिछले कई सालों में बड़ी संख्या में कोयला खदानें बंद हुई हैं. एक दशक में करीब बारह हजार खदानें बंद की जा चुकी हैं और आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है. ऐसे में देश के पास जमीन के नीचे ऐसे कई बड़े इलाके मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल नए तरीके से किया जा सकता है. वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक, आने वाले समय में बंद खदानों में मौजूद विशाल खाली जगह अंडरग्राउंड एग्रीकल्चर के लिए इस्तेमाल हो सकती है. हालांकि, इसे बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले कई सवालों के जवाब तलाशने होंगे.

    आसान नहीं होगी जमीन के नीचे खेती

    अंडरग्राउंड फार्म का आइडिया सुनने में जितना शानदार लगता है, इसे असल में लागू करना उतना ही आसान नहीं होगा. आर्टिफिशियल लाइटिंग के लिए बड़ी मात्रा में बिजली चाहिए. तापमान और हवा को कंट्रोल करने के लिए भी लगातार एनर्जी की जरूरत होगी. इसके अलावा खदानों की सेफ्टी, पानी की क्वालिटी और अंदर काम करने वाले लोगों की सुरक्षा भी अहम मुद्दे होंगे. इसलिए फिलहाल इसे बड़े पैमाने की खेती का तैयार मॉडल मानना जल्दबाजी होगी. वैज्ञानिक पहले यह समझना चाहते हैं कि बंद खदानों को किस तरह सुरक्षित और उपयोगी एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर में बदला जा सकता है.

    आज खदान, कल अंतरिक्ष का खेत

    चीन का यह प्रयोग खेती की पारंपरिक सोच को जरूर बदलने वाला है. जिस जगह कभी धरती के अंदर से कोयला निकाला जाता था, वहीं अब पौधों को उगाने की कोशिश की जा रही है. फिलहाल इसका सबसे बड़ा मकसद करोड़ों टन अनाज जमीन के नीचे पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा सिस्टम समझना है जिसमें इंसान प्राकृतिक मौसम पर निर्भर हुए बिना खाना उगा सके. अगर यह प्रयोग सफल होता है तो इसका फायदा सिर्फ चीन की बंद खदानों तक सीमित नहीं रहेगा. क्लाइमेट चेंज से जूझती दुनिया से लेकर भविष्य में चांद और मंगल पर बनने वाली इंसानी बस्तियों तक, जमीन के नीचे खेती की यह टेक्नोलॉजी एक दिन बेहद काम की साबित हो सकती है.

  • मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार ने देश में खरीफ सीजन की तैयारियों पर असर डालना शुरू कर दिया है। अब तक सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश दर्ज होने के कारण कपास और सोयाबीन जैसी प्रमुख नकदी फसलों की बुआई अपेक्षा से काफी पीछे चल रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो इसका असर कृषि उत्पादन के साथ-साथ उद्योगों पर भी दिखाई दे सकता है।

    कृषि मंत्रालय के 19 जून तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कपास की बुआई 17.13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 22.82 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार करीब 5.69 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में कपास बोई गई है। कपास के रकबे में आई यह गिरावट संकेत दे रही है कि किसान फिलहाल इस फसल की ओर कम रुझान दिखा रहे हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि अगले कुछ सप्ताह में कपास की बुआई में तेजी नहीं आई तो कच्चे कपास और यार्न की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे वस्त्र उद्योग की लागत बढ़ने की आशंका है।

    सोयाबीन की सुस्ती से तिलहन क्षेत्र भी प्रभावित

    कपास के साथ-साथ तिलहन फसलों की बुआई भी दबाव में है। इसकी प्रमुख वजह सोयाबीन की धीमी बुआई है। पिछले वर्ष इसी अवधि में सोयाबीन का रकबा 2.50 लाख हेक्टेयर था, जो इस बार घटकर 1.30 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी करीब 1.20 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।

    सोयाबीन के कमजोर प्रदर्शन का असर कुल तिलहन क्षेत्र पर भी पड़ा है। पिछले साल जहां तिलहन फसलों का रकबा 8.11 लाख हेक्टेयर था, वहीं इस बार यह घटकर 7.24 लाख हेक्टेयर रह गया है। हालांकि मूंगफली और सूरजमुखी की खेती में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन वह सोयाबीन की कमी की भरपाई नहीं कर पा रही है।

    धान और बाजरा किसानों की पहली पसंद बने

    इसके विपरीत धान और मोटे अनाजों की बुआई में वृद्धि दर्ज की गई है। धान का रकबा 4.26 लाख हेक्टेयर बढ़कर 12.36 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। वहीं बाजरा सहित मोटे अनाजों का क्षेत्रफल 2.14 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.05 लाख हेक्टेयर हो गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धान और मोटे अनाजों में सरकारी खरीद की मजबूत व्यवस्था और अपेक्षाकृत कम जोखिम किसानों को आकर्षित कर रहे हैं। दूसरी ओर कपास और सोयाबीन में वैश्विक बाजार की अनिश्चितता तथा कीट प्रकोप का खतरा किसानों को सतर्क बना रहा है।

    जल प्रबंधन व्यवस्था पर मूडीज की चिंता

    इस बीच, मूडीज रेटिंग्स ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है। एजेंसी का कहना है कि पानी के आवंटन, मूल्य निर्धारण और वितरण से जुड़ी मौजूदा व्यवस्थाएं देश के लिए वित्तीय और क्रेडिट जोखिम पैदा कर रही हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार यदि जल प्रबंधन ढांचे में समय रहते सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में राज्यों की वित्तीय स्थिति और उनकी क्रेडिट रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    खेती में खप रहा 80 फीसदी ताजा पानी

    मूडीज के मुताबिक भारत में पानी की कीमतें विशेष रूप से कृषि क्षेत्र के लिए अत्यधिक रियायती हैं। देश के कुल ताजे जल संसाधनों का लगभग 80 फीसदी हिस्सा खेती में उपयोग हो रहा है। सब्सिडी आधारित व्यवस्था के कारण पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

    एआई और डाटा सेंटर भी बढ़ा रहे दबाव

    रिपोर्ट में एक नए उभरते खतरे की ओर भी संकेत किया गया है। देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और क्लाउड कंप्यूटिंग के विस्तार के साथ बड़े पैमाने पर डाटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।

    मूडीज का मानना है कि डाटा सेंटरों की बढ़ती जल मांग पहले से दबाव झेल रही जल आपूर्ति व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकती है। आने वाले वर्षों में सरकारों और यूटिलिटी कंपनियों को इस अतिरिक्त दबाव से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति बनानी होगी।

  • KCC: पैसे की कमी से खेती पर न लगे ब्रेक… बड़े काम की है मोदी सरकार की ये योजना

    KCC: पैसे की कमी से खेती पर न लगे ब्रेक… बड़े काम की है मोदी सरकार की ये योजना


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central government) की कई योजनाएं हैं जिसके तहत लोगों को क्रेडिट कार्ड (Credit Card) मुहैया कराया जाता है। ऐसी ही एक योजना किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card) (केसीसी) है। इस योजना के तहत किसानों को अलग-अलग फसल के लिए बैंक की ओर से क्रेडिट कार्ड दिया जाता है। सरकार का मकसद है कि पैसे की कमी की वजह से किसानों की खेती या अन्य गतिविधियों पर ब्रेक ना लगे।

    कब हुई थी शुरुआत
    वैसे तो इसकी शुरुआत साल 1998 में हुई थी लेकिन समय के साथ इसे मोडिफाई किया गया। साल 2019 में, केसीसी योजना को इससे जुड़ी गतिविधियों, जैसे पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन की वर्किंग कैपिटल आवश्यकताओं को कवर करने के लिए विस्तारित किया गया था। आइए किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट समेत अन्य डिटेल से जान लेते हैं।


    कितनी है लिमिट

    लाभार्थी को संशोधित ब्याज सहायता योजना के अंतर्गत भारत सरकार बैंकों को 7% प्रति वर्ष की दर से 3 लाख रुपये तक के शार्ट टर्म वर्किंग कैपिटल लोन प्रोवाइड करने के लिए 1.5% की ब्याज सहायता प्रदान करती है। इसके अलावा, समय पर लोन चुकाने पर किसानों को 3% का त्वरित री-पेमेंट प्रोत्साहन भी दिया जाता है। इसलिए, किसानों के लिए प्रभावी ब्याज दर 4% है। केंद्रीय बजट 2025-26 में सरकार ने केसीसी के माध्यम से लिए गए लोन को संशोधित ब्याज छूट योजना (एमआईएसएस)के अंतर्गत लोन की सीमा को 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करने की घोषणा की थी। प्रोसेसिंग चार्ज की बात करें तो 3 लाख रुपये तक के लोन पर शून्य है।


    क्या-क्या दस्तावेज हैं जरूरी

    योजना के लिए आवश्यक दस्तावेज आधार कार्ड अनिवार्य है। पहचान पत्र, पता प्रमाण, भूमि दस्तावेज, फोटो और बैंक खाता विवरण होना जरूरी है। एक स्व-घोषणा पत्र भी देना होगा कि अन्य बैंक से डिफॉल्ट नहीं है। ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया fasalrin.gov.in या jansamarth.in पर है। वहीं, ऑफलाइन अप्लाई करने के लिए बैंक ब्रांच जाना होगा।