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  • सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम

    सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम


    नई दिल्ली । 
    हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में की गई शिव उपासना, सोमवार व्रत और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का अलग महत्व होता है। सुहागिन महिलाएं भी पति की सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ इस महीने में विभिन्न व्रत और पूजा करती हैं।

    सावन के दौरान महिलाओं के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा बताई गई है। इसके बाद भगवान शिव की पूजा और अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत या धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है। मान्यता है कि दिन की शुरुआत धार्मिक कार्यों और सकारात्मक विचारों के साथ करने से पूजा के प्रति एकाग्रता बनी रहती है।

    धार्मिक मान्यताओं में सावन के दौरान काले वस्त्रों से परहेज करने की बात कही जाती है। इसके स्थान पर हरे रंग को शुभ माना जाता है। सावन में हरा रंग प्रकृति, हरियाली और सौभाग्य से जोड़ा जाता है। हालांकि इन परंपराओं को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए और अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में इनके पालन का तरीका अलग हो सकता है।

    शिव पूजा से जुड़ी सामग्री को लेकर भी कुछ मान्यताएं प्रचलित हैं। सावन में भगवान शिव को बेलपत्र, भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा है। वहीं तुलसी, हल्दी और केतकी के फूल को शिव पूजा में अर्पित न करने की धार्मिक मान्यता बताई जाती है। पूजा सामग्री का उपयोग करते समय श्रद्धालु अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक विधि का भी ध्यान रखते हैं।

    सावन के व्रत के दौरान सात्विक भोजन करने पर विशेष जोर दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में मांसाहार और मदिरा से दूर रहने की परंपरा है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन करती हैं। भोजन को लेकर किसी भी प्रकार का व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    सावन के व्रत और पूजा के दिनों में बैंगन, मूली तथा कुछ पत्तेदार सब्जियों से परहेज करने की परंपरा भी बताई जाती है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ मौसम संबंधी पारंपरिक कारण भी बताए जाते हैं। बारिश के मौसम में कुछ सब्जियों में कीड़े लगने की संभावना अधिक मानी जाती थी, इसलिए पुराने समय से इनके सेवन को सीमित करने की परंपरा विकसित हुई।

    मासिक धर्म को लेकर भी कुछ पारंपरिक धार्मिक नियम बताए जाते हैं, जिनमें शिवलिंग को स्पर्श न करने की मान्यता शामिल है। हालांकि यह धार्मिक परंपरा का विषय है और अलग-अलग परिवारों तथा समुदायों में इसके पालन के तरीके भिन्न हो सकते हैं। इस दौरान महिलाओं के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

    सुहागिन महिलाओं के लिए सावन में मंगली गौरी, शिवरात्रि और हरियाली तीज जैसे व्रतों का भी विशेष महत्व बताया जाता है। वहीं अविवाहित लड़कियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से सावन के सोमवार का व्रत रखने की धार्मिक परंपरा का पालन करती हैं। सावन का मूल उद्देश्य श्रद्धा, संयम और भगवान शिव की भक्ति से जुड़ा माना जाता है। इसलिए पूजा और व्रत करते समय धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य, स्वच्छता और अपनी क्षमता का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

  • सावन व्रत में आलू चोखा की जगह बनाएं स्वादिष्ट टमाटर चोखा, 10 मिनट में तैयार होगी चटपटी और सात्विक डिश

    सावन व्रत में आलू चोखा की जगह बनाएं स्वादिष्ट टमाटर चोखा, 10 मिनट में तैयार होगी चटपटी और सात्विक डिश

    नई दिल्ली । सावन का महीना आते ही घरों में व्रत, पूजा और सात्विक भोजन का महत्व बढ़ जाता है। इस दौरान अधिकांश लोग प्याज और लहसुन से परहेज करते हैं और खाने में आलू आधारित व्यंजनों का उपयोग अधिक करने लगते हैं। हालांकि लगातार आलू से बनी चीजें खाने के कारण कई बार स्वाद में एकरसता आ जाती है। ऐसे में टमाटर का चोखा एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है, जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ हल्का और झटपट बनने वाला व्यंजन भी है।

    टमाटर का चोखा उत्तर भारत के कई हिस्सों में पसंद किया जाता है। इसका खट्टा-तीखा स्वाद साधारण व्रत के भोजन को भी खास बना देता है। इस रेसिपी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे तैयार करने में ज्यादा समय नहीं लगता और बहुत कम सामग्री की आवश्यकता होती है। घर में उपलब्ध कुछ सामान्य चीजों की मदद से इसे आसानी से बनाया जा सकता है।

    इस व्यंजन को बनाने के लिए सबसे पहले तीन से चार पके हुए टमाटर और दो हरी मिर्च लें। इन्हें हल्का सा तेल लगाकर सीधे गैस की आंच पर अच्छी तरह भून लें। जब टमाटर नरम हो जाएं और उनका छिलका काला पड़ने लगे, तब उन्हें निकालकर ठंडा होने दें। इसके बाद टमाटर और मिर्च का छिलका उतार लें। भूनने की प्रक्रिया से इसमें एक विशेष स्मोकी फ्लेवर आता है, जो चोखे के स्वाद को और बेहतर बनाता है।

    अब भुने हुए टमाटर और मिर्च को सिलबट्टे या किसी बर्तन में डालकर हल्का दरदरा कूट लें। इसके साथ दो बड़े चम्मच भूनी हुई मूंगफली, एक छोटा चम्मच भूना जीरा, आधा छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर और स्वादानुसार सेंधा नमक मिलाएं। इन सभी सामग्रियों को अच्छी तरह मिलाएं, लेकिन ध्यान रखें कि मिश्रण पूरी तरह पेस्ट न बने। हल्का दरदरा टेक्सचर ही इस रेसिपी की पहचान माना जाता है।

    इसके बाद इसमें बारीक कटा हुआ हरा धनिया और एक छोटा चम्मच ताजा नींबू का रस मिलाएं। सभी सामग्री को अच्छी तरह मिलाने के बाद टमाटर का चोखा तैयार हो जाता है। नींबू का रस इसमें अतिरिक्त ताजगी और स्वाद जोड़ता है, जबकि मूंगफली हल्का कुरकुरापन प्रदान करती है।

    टमाटर का यह चोखा व्रत में खाए जाने वाले कई व्यंजनों के साथ परोसा जा सकता है। इसे कुट्टू या सिंहाड़े की पूरी, साबूदाना टिक्की, राजगीरा पराठा और सामक के चावल के साथ खाया जा सकता है। इसका तीखा और खट्टा स्वाद साधारण भोजन को भी स्वादिष्ट बना देता है। यही कारण है कि यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

    पोषण के दृष्टिकोण से भी यह व्यंजन अच्छा माना जाता है। टमाटर में विटामिन सी, एंटीऑक्सीडेंट और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। वहीं मूंगफली प्रोटीन और हेल्दी फैट का अच्छा स्रोत है। इस वजह से यह केवल स्वाद ही नहीं बल्कि पोषण भी प्रदान करता है।

    अगर आप सावन के व्रत या सात्विक भोजन के दौरान कुछ नया, हल्का और स्वादिष्ट बनाना चाहते हैं, तो टमाटर का चोखा एक शानदार विकल्प हो सकता है। कम समय, कम सामग्री और बेहतरीन स्वाद की वजह से यह रेसिपी हर उम्र के लोगों को पसंद आ सकती है और व्रत के भोजन में एक नया स्वाद जोड़ सकती है।

  • सावन के दूसरे सोमवार पर फलाहार में बनाएं कुरकुरी कुट्टू की पकौड़ी, आसान है इसकी रेसिपी

    सावन के दूसरे सोमवार पर फलाहार में बनाएं कुरकुरी कुट्टू की पकौड़ी, आसान है इसकी रेसिपी


    नई दिल्ली । 
    सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान आने वाले सोमवार को श्रद्धालु व्रत रखते हैं और पूरे दिन फलाहार करते हुए भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। इस साल सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को पड़ रहा है। ऐसे में व्रत रखने वाले लोगों के सामने अक्सर यह सवाल रहता है कि फलाहार में ऐसा क्या बनाया जाए जो स्वादिष्ट होने के साथ आसानी से तैयार भी हो जाए।

    व्रत के दौरान कुट्टू का आटा कई घरों में इस्तेमाल किया जाता है। इससे पूरी, चीला, पराठा और पकौड़ी जैसे कई व्यंजन बनाए जा सकते हैं। अगर सोमवार के व्रत में कुछ अलग और स्वादिष्ट खाने का मन है, तो कुट्टू के आटे से बनने वाली आलू की पकौड़ी एक अच्छा विकल्प हो सकती है।

    कुट्टू की पकौड़ी बनाने के लिए मुख्य रूप से कुट्टू का आटा और आलू की जरूरत होती है। इसके साथ स्वाद के लिए सेंधा नमक, हरी मिर्च, अदरक, धनिया और काली मिर्च का इस्तेमाल किया जा सकता है। व्रत के दौरान सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का ही प्रयोग किया जाता है।

    इस रेसिपी के लिए करीब एक कटोरी कुट्टू का आटा लिया जा सकता है। इसके साथ छह आलू, एक हरी मिर्च, एक चम्मच अदरक, धनिया, काली मिर्च और सेंधा नमक की जरूरत होगी। सामग्री की मात्रा स्वाद और जरूरत के अनुसार कम या ज्यादा की जा सकती है।

    सबसे पहले आलू को उबालकर ठंडा कर लें और फिर उन्हें अच्छी तरह मैश कर लें। इसके बाद इसमें बारीक कटी हरी मिर्च, अदरक, धनिया, काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाएं। सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाने के बाद इसमें कुट्टू का आटा डालकर मिश्रण तैयार किया जा सकता है।

    कुट्टू का आटा मिलाते समय मिश्रण की स्थिरता का ध्यान रखना जरूरी है। इसे इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि पकौड़ी आसानी से आकार ले सके। जरूरत के अनुसार थोड़ा पानी डालकर मिश्रण को तैयार किया जा सकता है। इसके बाद तैयार मिश्रण से छोटे-छोटे हिस्से लेकर पकौड़ी का आकार दिया जा सकता है।

    अब एक कड़ाही में तेल गर्म करें। तेल पर्याप्त गर्म होने के बाद तैयार पकौड़ियों को सावधानी से डालें और उन्हें मध्यम आंच पर सुनहरा और कुरकुरा होने तक पकाएं। पकौड़ियों को बीच-बीच में पलटते रहें, ताकि वे सभी तरफ से अच्छी तरह पक जाएं।

    तैयार होने के बाद पकौड़ियों को कड़ाही से निकालकर कुछ देर के लिए अतिरिक्त तेल निकलने दें। इसके बाद इन्हें व्रत में खाई जाने वाली चटनी या दही के साथ परोसा जा सकता है। अगर आप व्रत के दौरान तेल कम इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो पकौड़ी तैयार करने की अपनी पसंदीदा कम तेल वाली विधि भी अपना सकते हैं।

    कुट्टू की पकौड़ी सावन सोमवार के फलाहार में स्वाद में बदलाव लाने का आसान तरीका है। आलू और कुट्टू के आटे से तैयार यह व्यंजन कम सामग्री में बनाया जा सकता है और परिवार के अन्य सदस्य भी इसे पसंद कर सकते हैं। हालांकि व्रत में भोजन को लेकर अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में नियम अलग हो सकते हैं, इसलिए अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार ही सामग्री का इस्तेमाल करना उचित है।

  • शिव भक्ति का विशेष दिन, जानें सोमवार व्रत की पूजा विधि और महत्व

    शिव भक्ति का विशेष दिन, जानें सोमवार व्रत की पूजा विधि और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन किए जाने वाले व्रत और पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। विशेष रूप से अविवाहित कन्याएं अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए और गृहस्थ लोग सुख-समृद्धि एवं शांति की कामना से सोमवार का व्रत रखते हैं।

    सोमवार व्रत की शुरुआत प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने से होती है। इसके बाद घर के मंदिर या शिवालय में भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से पंचामृत बनाकर भगवान शिव का पूजन किया जाता है। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, भस्म और सफेद पुष्प अर्पित किए जाते हैं।

    पूजन के दौरान “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है। भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और फलाहार या केवल एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। शाम के समय पुनः शिवलिंग का पूजन कर आरती की जाती है और भगवान से अपने कष्टों के निवारण और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना की जाती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार का व्रत करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों के जीवन से सभी बाधाएं दूर करते हैं। यह व्रत मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और आर्थिक समृद्धि प्रदान करने वाला माना गया है। कहा जाता है कि जो भक्त श्रद्धा और नियम से सोमवार का व्रत करता है, उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    सोमवार व्रत का विशेष महत्व श्रावण मास में और भी अधिक बढ़ जाता है, लेकिन इसे वर्षभर किया जा सकता है। कई लोग 16 सोमवार व्रत का संकल्प लेते हैं, जिसे अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

    इस प्रकार सोमवार का व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आत्मिक शांति और जीवन में संतुलन स्थापित करने का माध्यम भी है। शिव भक्ति से जुड़ा यह दिन भक्तों के जीवन में नई ऊर्जा और विश्वास का संचार करता है।

  • मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

    मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में हर माह आने वाली मासिक शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि आज 17 मार्च को मनाई जा रही है। यह दिन भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अभिषेक करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक शिवरात्रि के दिन श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत विशेष फलदायी होता है। कहा जाता है कि इस दिन भोलेनाथ अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। विशेष रूप से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है और अविवाहित लोगों को योग्य जीवनसाथी मिलने की भी मान्यता है।

    शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    वैदिक पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि का आरंभ 17 मार्च सुबह 9:23 बजे से हुआ है, जो 18 मार्च सुबह 8:25 बजे तक रहेगी। शिव पूजा के लिए निशिता काल का विशेष महत्व होता है। इस दिन निशिता काल रात 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस समय की गई पूजा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

    जलाभिषेक का महत्व

    ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित कर अभिषेक करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही रुद्राष्टकम या अन्य शिव स्तोत्रों का पाठ करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।मासिक शिवरात्रि का यह पावन अवसर भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का उत्तम समय माना जाता है।

  • Papmochani Ekadashi 2026: 16 मार्च को व्रत, शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, पापों और कष्टों से मिले मुक्ति

    Papmochani Ekadashi 2026: 16 मार्च को व्रत, शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, पापों और कष्टों से मिले मुक्ति


    नई दिल्ली। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पावन तिथि पापमोचनी एकादशी इस वर्ष 16 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु और महादेव की शक्ति के संगम का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन विशेष साधना और शिवलिंग पर कुछ सामग्रियों का अर्पण जीवन के जटिल कष्टों, शनि दोष और पुराने पापों से मुक्ति दिलाने में अत्यंत प्रभावशाली है।

    पापमोचनी एकादशी पर शिवलिंग साधना का विशेष महत्व है। इस दिन भक्त शिवलिंग पर पांच महत्वपूर्ण चीजें अर्पित करके महादेव को प्रसन्न कर सकते हैं।

    1. शमी के पुष्प – रोग और दोषों से मुक्ति:
    नीलकंठेश्वर महादेव का स्मरण करते हुए शिवलिंग पर शमी के फूल चढ़ाएं। यह उपाय शरीर के रोगों और कुंडली में उपस्थित दोषों को दूर करने में मदद करता है।

    2. बिल्वपत्र और शहद – उत्तम स्वास्थ्य का वरदान:
    शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय बिल्वपत्र पर थोड़ा शहद लगाकर अर्पित करें। शास्त्रों के अनुसार इससे समस्त पाप नष्ट होते हैं और भक्त को उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    3. चावल और काले तिल – शनि दोष से राहत:
    शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से परेशान लोग इस दिन कच्चे चावल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। पूजन के बाद इसे जरूरतमंद को दान करने से शनि देव की पीड़ा शांत होती है।

    4. गाय का शुद्ध घी – संकटों का नाश:
    शुद्ध गाय के घी से शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। यह उपाय घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है और जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों से सुरक्षा देता है।

    5. महामृत्युंजय मंत्र – संकट टालने की शक्ति:
    पूजा के अंत में महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप अवश्य करें। एकादशी की पवित्र ऊर्जा और मंत्र का प्रभाव मिलकर जीवन के बड़े संकटों और कष्टों को टालने की क्षमता रखता है।

    पापमोचनी एकादशी का व्रत 16 मार्च 2026 को रखा जाएगा और इसका पारण अगले दिन शुभ मुहूर्त में करना श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन की साधना से न केवल जीवन के कष्ट दूर होते हैं, बल्कि जन्मों के पापों से भी मुक्ति पाने का अद्वितीय अवसर मिलता है।

  • Amavasya 2026: जानें साल 2026 में अमावस्या की सभी 13 तिथियां, मौनी और सोमवती अमावस्या सहित

    Amavasya 2026: जानें साल 2026 में अमावस्या की सभी 13 तिथियां, मौनी और सोमवती अमावस्या सहित


    नई दिल्ली/हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष 12 या कभी-कभी 13 अमावस्याएं होती हैं। अमावस्या वह तिथि है जब चंद्रमा पूरी तरह लुप्त हो जाता है और कृष्ण पक्ष समाप्त हो जाता है। साल 2026 में कुल 13 अमावस्या पड़ने वाली हैं। इनमें मौनी अमावस्या और सोमवती अमावस्या विशेष महत्व रखती हैं। आइए जानते हैं 2026 में आने वाली सभी अमावस्याओं की तिथियां और उनके महत्व के बारे में।

    साल 2026 की पहली अमावस्या – मौनी अमावस्या

    साल की पहली अमावस्या माघ मास में पड़ रही है, जिसे मौनी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन ऋषि मनु का जन्म हुआ था और इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। मौनी अमावस्या पर व्रत रखने, दान देने और पितरों का तर्पण करना विशेष रूप से लाभकारी होता है। साथ ही भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करने का भी खास महत्व है। मौनी अमावस्या पर मौन व्रत रखने की परंपरा प्रचलित है। इस साल मौनी अमावस्या 18 जनवरी 2026 को पड़ रही है।

    सोमवती अमावस्या 2026
    जब अमावस्या का दिन सोमवार को पड़ता है, उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। साल 2026 में दो बार सोमवती अमावस्या है। पहली सोमवती अमावस्या 15 जून 2026 को और दूसरी 9 नवंबर 2026 को है। इस दिन व्रत और विशेष पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और पितृ दोष से मुक्ति का लाभ माना जाता है।

    शनिश्चरी अमावस्या 2026
    शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन शनिदेव की विशेष पूजा का विधान होता है। साल 2026 में शनिश्चरी अमावस्या दो बार पड़ रही है – 16 मई और 10 अक्टूबर 2026। इस दिन शनिदेव की पूजा और रुद्राभिषेक करने से कष्टों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

    अमावस्या का धार्मिक महत्व

    अमावस्या की रात चंद्रमा पूरी तरह गायब हो जाता है और इसे काली रात कहा जाता है। इस दिन किया गया दान, व्रत और पितरों के लिए तर्पण अत्यंत लाभकारी माना जाता है। कई बार अमावस्या तिथि दो दिन तक चलती है – पहला दिन स्नान-दान के लिए शुभ होता है और दूसरा दिन तर्पण, व्रत और पूजा-अर्चना के लिए।

    साल 2026 की सभी अमावस्या तिथियां:

    मौनी अमावस्या: 18 जनवरी 2026 अग्रहायण अमावस्या: 16 फरवरी 2026 फाल्गुन अमावस्या: 18 मार्च 2026 चैत्र अमावस्या: 16 अप्रैल 2026 वैशाख अमावस्या: 16 मई 2026 शनिश्चरी ज्येष्ठ अमावस्या: 15 जून 2026 सोमवती  आषाढ़ अमावस्या: 15 जुलाई 2026 श्रावण अमावस्या: 13 अगस्त 2026 भाद्रपद अमावस्या: 12 सितंबर 2026 आश्विन अमावस्या: 10 अक्टूबर 2026 शनिश्चरी
    कार्तिक अमावस्या: 9 नवंबर 2026 सोमवती मार्गशीर्ष अमावस्या: 8 दिसंबर 2026 पौष अमावस्या: 6 जनवरी 2027

    विशेष सलाह:

    अमावस्या पर व्रत रखने, पितरों का तर्पण करने और दान देने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मौनी और सोमवती अमावस्या का धार्मिक महत्व अधिक माना जाता है।साल 2026 में अमावस्या के दिन धार्मिक अनुष्ठान और पूजा के माध्यम से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।