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  • छठ पूजा के बाद फिर जहरीली हुई यमुना, प्रदूषण बढ़ा लेकिन 2024 के मुकाबले 2025 में दिखी हल्की राहत

    छठ पूजा के बाद फिर जहरीली हुई यमुना, प्रदूषण बढ़ा लेकिन 2024 के मुकाबले 2025 में दिखी हल्की राहत


    नई दिल्ली। दिल्ली में यमुना नदी की हालत एक बार फिर चिंता का विषय बन गई है। ताज़ा जारी जल गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार छठ पूजा के बाद यमुना का पानी लगातार और अधिक प्रदूषित होता चला गया है। अक्टूबर के बाद से नदी में गिरने वाले बिना शोधित सीवेज के संकेतक माने जाने वाले फीकल कोलीफॉर्म के स्तर में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है जिससे जनस्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बढ़ गया है। हालांकि रिपोर्ट में एक राहत वाली बात भी सामने आई है कि मौजूदा आंकड़े पिछले वर्ष 2024 की तुलना में बेहतर हैं।
    रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2025 में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर करीब 8000 यूनिट प्रति 100 मिलीलीटर दर्ज किया गया था। नवंबर में यह आंकड़ा तीन गुना बढ़कर 24000 यूनिट तक पहुंच गया जबकि दिसंबर में स्थिति और बिगड़ते हुए यह 92000 यूनिट प्रति 100 मिलीलीटर हो गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक फीकल कोलीफॉर्म की सुरक्षित सीमा 2500 यूनिट मानी जाती है और आदर्श स्तर सिर्फ 500 यूनिट होना चाहिए। ऐसे में मौजूदा आंकड़े यमुना के पानी की बेहद खराब गुणवत्ता को दर्शाते हैं।

    अक्टूबर में प्रदूषण अपेक्षाकृत कम रहने की बड़ी वजह छठ पूजा से पहले ऊपरी इलाकों के बैराजों से छोड़ा गया भारी मात्रा में ताज़ा पानी बताया गया है। 21 से 25 अक्टूबर के बीच यमुना में 6.68 लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा गया जिससे नदी का प्रवाह बढ़ा और प्रदूषण कुछ हद तक बह गया। इसी कारण उस दौरान सफेद झाग लगभग गायब हो गया था और नदी अपेक्षाकृत साफ नजर आई।हालांकि नवंबर की शुरुआत में जैसे ही पानी का बहाव कम हुआ यमुना में बदबू और झाग दोबारा लौट आए। इसके साथ ही प्रदूषण के अन्य संकेतक भी चिंताजनक बने रहे। बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड BOD अक्टूबर में 25 mg/l था जो नवंबर में बढ़कर 33 mg/l पहुंच गया। दिसंबर में यह फिर 25 mg/l पर आ गया लेकिन यह अब भी सुरक्षित सीमा 3 mg/l से करीब आठ गुना अधिक है।जलीय जीवों के लिए जरूरी डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन DO का स्तर भी कई स्थानों पर बेहद कम पाया गया। नवंबर में DO का स्तर 0.5 से 8.5 mg/l के बीच रहा जिसमें दो स्थानों पर यह शून्य तक गिर गया। दिसंबर में भी कई जगहों पर ऑक्सीजन का स्तर जलीय जीवन के लिए आवश्यक 5 mg/l से काफी नीचे दर्ज किया गया।

    हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दिसंबर 2024 में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 84 लाख यूनिट और नवंबर 2024 में 79 लाख यूनिट तक पहुंच गया था। इस तुलना में मौजूदा आंकड़े काफी कम हैं लेकिन विशेषज्ञ इस सुधार को लेकर संदेह जता रहे हैं। उनका कहना है कि साल के इस समय यमुना में पानी का प्रवाह बेहद कम होता है ऐसे में प्रदूषण में इतनी बड़ी और अचानक गिरावट व्यावहारिक नहीं लगती।यमुना कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जमीनी हकीकत और रिपोर्ट में दर्शाए गए आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर है। नदी से अब भी तेज़ बदबू आती है और कई जगह झाग साफ दिखाई देता है। ऐसे में विशेषज्ञों ने प्रदूषण नियंत्रण समिति से डेटा संग्रह की पद्धति पर सवाल उठाए हैं और पारदर्शिता की मांग की है।

  • भोपाल का पानी 'जहर', 7 जगह इंदौर से भी ज्यादा दूषित, पीने पर रोक

    भोपाल का पानी 'जहर', 7 जगह इंदौर से भी ज्यादा दूषित, पीने पर रोक


    भोपाल। भोपाल नगर निगम की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पानी में कैंसर, हैजा, टाइफाइड और हेपेटाइटिस-ए जैसी बीमारियों का कारण बनने वाले बैक्टीरिया मौजूद हैं। नल से आने वाला पानी कुछ ही मिनटों में लाल हो जाता है और बदबू इतनी तीव्र होती है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है। टीडीएस (टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स), कैल्शियम, टोटल हार्डनेस, सल्फेट और कोलीफॉर्म भी उच्च मात्रा में पाए गए हैं।

    स्थानीय लोग अब पूरी तरह से पानी के टैंकरों पर निर्भर हैं।

    आदमपुर खंती और पड़रिया के इलाकों में लोग भूजल का पानी पीने के बजाय, केवल फसलों की सिंचाई और साफ-सफाई में इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ इलाकों में तो हैंडपंप से लाल और बदबूदार पानी निकल रहा है, जिसे देखकर लोग पीने से डर रहे हैं।

    पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष पांडे के मुताबिक, जनवरी 2018 से भोपाल का कचरा आदमपुर खंती में डंप किया जा रहा है, जिससे आसपास के 7 गांवों का भूजल गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुका है। डंपिंग साइट पर फिलहाल 14 लाख टन कचरा जमा है, जिससे लिक्विड रसायन (लीचेट) निकलकर पानी को और दूषित कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि भोपाल का भूजल इंदौर से भी ज्यादा गंभीर स्थिति में है। आदमपुर खंती और आसपास के इलाकों में भूजल में आयरन और क्रोमियम भी मिले हैं, जो लंबे समय तक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं और कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं। CPCB और MPPCB की रिपोर्ट्स में भी यह तथ्य सामने आया है।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भोपाल से प्रतिदिन लगभग 850 टन कचरा निकलता है, जिसमें से 800 टन कचरा प्रोसेसिंग के लिए खंती भेजा जाता है। लेकिन यूनिट की क्षमता केवल 420 टन है, जिससे कचरे का ढेर लगातार बढ़ता जा रहा है और आसपास के गांवों का पानी दूषित होता जा रहा है।

    भोपाल के खानूगांव, आदमपुर छावनी और वाजपेयी नगर का पानी फेल सैंपल्स दे चुका है। पानी में पाया गया ई-कोलाई बैक्टीरिया वही है, जो इंदौर के भागीरथपुरा में पाया गया था और जिसके कारण अब तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है।
    भोपाल का ग्राउंड वाटर वर्तमान में पीने योग्य नहीं है और स्थानीय लोगों को सुरक्षित पानी की तत्काल आवश्यकता है। प्रशासन और पर्यावरण एजेंसियों को मिलकर पानी की सफाई और कचरा प्रबंधन के लिए सख्त कदम उठाने होंगे, ताकि जनता की जान और स्वास्थ्य सुरक्षित रह सके।

  • नर्मदा जल में सीवर की मिलावट का खुलासा, खतरनाक बैक्टीरिया मिलने से बढ़ा हैजा-डायरिया का खतरा

    नर्मदा जल में सीवर की मिलावट का खुलासा, खतरनाक बैक्टीरिया मिलने से बढ़ा हैजा-डायरिया का खतरा


    नई दिल्ली। इंदौर शहर से एक बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया है। भागीरथपुरा क्षेत्र में पिछले कई दिनों से सप्लाई हो रहे नर्मदा जल को लेकर की गई जांच में चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। सरकारी और निजी प्रयोगशालाओं में लिए गए पानी के सैंपल्स में कई खतरनाक और जानलेवा बैक्टीरिया पाए गए हैं जिससे इलाके में हैजा डायरिया और अन्य पेट संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ गया है।लैब रिपोर्ट के अनुसार पानी में फीकल कॉलिफॉर्म ई-कोलाई विब्रियो कोलेरी स्यूडोमोनास क्लेबसेला सिट्रोबैक्टर और प्रोटोजोआ जैसे सूक्ष्म जीव मौजूद हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन बैक्टीरिया की मौजूदगी इस बात का सीधा संकेत है कि पीने के पानी की पाइपलाइन में सीवर का गंदा पानी मिल रहा है। इसी कारण पानी को जांच रिपोर्ट में अनसैटिस्फैक्ट्री यानी पूरी तरह असंतोषजनक श्रेणी में रखा गया है।

    स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले कुछ दिनों से इलाके में लगातार लोग बीमार पड़ रहे हैं। कई घरों में उल्टी-दस्त पेट दर्द और बुखार की शिकायतें सामने आई हैं। इसी के बाद स्वास्थ्य विभाग ने पानी की सैंपलिंग शुरू की। रविवार से लगातार पानी के नमूने लेकर जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। यह सैंपल्स शहर के 100 से अधिक कॉलेजों और निजी अस्पतालों की लैब में भी भेजे गए जहां रिपोर्ट ने स्थिति को गंभीर बताया है।हालांकि स्वास्थ्य विभाग की ओर से अब तक इन रिपोर्ट्स को सार्वजनिक नहीं किया गया है। सूत्रों के मुताबिक विभाग के पास मौजूद रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा है कि यह पानी न तो पीने योग्य है और न ही घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित। इसके बावजूद आधिकारिक तौर पर कोई विस्तृत बयान सामने नहीं आया है जिससे लोगों में नाराजगी और डर दोनों बढ़ रहे हैं।

    इसी बीच कलेक्टर शिवम वर्मा ने क्षेत्र का दौरा किया और लोगों को भरोसा दिलाने के लिए मौके पर पानी पीकर दिखाया। लेकिन संक्रमण के समय लिए गए पानी की लैब कल्चर रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीपेज के जरिए सीवर का पानी सप्लाई लाइन में मिल रहा है जिससे यह स्थिति पैदा हुई है।रिपोर्ट में विब्रियो कोलेरी बैक्टीरिया की मौजूदगी विशेष रूप से चिंता का विषय है क्योंकि यही बैक्टीरिया हैजा फैलाने के लिए जिम्मेदार होता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है। इसके अलावा ई-कोलाई और फीकल कॉलिफॉर्म की मौजूदगी यह दर्शाती है कि पानी में मलजनित प्रदूषण है जो किसी भी हालत में सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर इम्युनिटी वाले लोग बुजुर्ग और बच्चे इस दूषित पानी से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। स्यूडोमोनास और क्लेबसेला जैसे बैक्टीरिया फेफड़ों मूत्र मार्ग और खून में संक्रमण का खतरा बढ़ा सकते हैं।फिलहाल जरूरत इस बात की है कि जल सप्लाई सिस्टम की तत्काल जांच कर ली जाए पाइपलाइनों की मरम्मत की जाए और लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए। साथ ही प्रभावित इलाकों में मेडिकल कैंप और जागरूकता अभियान चलाने की भी सख्त जरूरत है ताकि किसी बड़े स्वास्थ्य संकट को समय रहते रोका जा सके।