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  • राज्यों पर पड़ेगा वित्तीय बोझ: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने 'विकसित भारत गारंटी' के नियमों को बदलने की मांग उठाई

    राज्यों पर पड़ेगा वित्तीय बोझ: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने 'विकसित भारत गारंटी' के नियमों को बदलने की मांग उठाई


    नई दिल्ली ।
    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी और प्रस्तावित ‘विकसित भारत गारंटी’ योजना के वर्तमान स्वरूप पर गहरी असहमति जताते हुए इसका कड़ा विरोध किया है। मुख्यमंत्री ने इस संबंध में सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र प्रेषित किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था के मौजूदा नियमों को यदि इसी तरह लागू किया गया तो राज्य सरकार के खजाने पर 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का भारी और अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। उन्होंने केंद्र से इस योजना के वित्तीय और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों में तत्काल सुधार करने का आग्रह किया है।

    मध्य प्रदेश

    मुख्यमंत्री विजय ने अपने पत्र के माध्यम से नई योजना के तहत तय किए गए फंडिंग पैटर्न पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने उल्लेख किया कि ‘विकसित भारत गारंटी’ अधिनियम, 2025 के प्रावधानों के मुताबिक मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक खर्चों को वहन करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 का अनुपात निर्धारित किया गया है। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि देश में पिछले दो दशकों से ग्रामीण रोजगार योजना एक बिल्कुल अलग वित्तीय ढांचे के अंतर्गत सफलतापूर्वक संचालित हो रही थी, जहां राज्यों पर इस तरह का भार नहीं था। अचानक किए गए इस नीतिगत बदलाव से राज्यों की वित्तीय स्थिति पूरी तरह असंतुलित हो जाएगी।

    तमिलनाडु सरकार का मानना है कि इस नए वित्तीय फॉर्मूले के कारण राज्य को अपनी अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और जनहित से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को दिए जाने वाले रोजगार के दिनों की संख्या को कम करना पड़ेगा। इस संभावित संकट से बचने के लिए मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया है कि मजदूरी और प्रशासनिक व्यय की पूरी शत-प्रतिशत जिम्मेदारी केंद्र सरकार को खुद उठानी चाहिए, जबकि निर्माण सामग्री से जुड़े खर्चों को केंद्र और राज्यों के बीच 75:25 के तार्किक अनुपात में साझा किया जाना चाहिए।

    वित्तीय बोझ के अलावा तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने इस योजना के प्रशासनिक केंद्रीकरण और पंचायतों के वर्गीकरण की पद्धति पर भी कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा फंड वितरण के लिए अपनाई जा रही इस केंद्रीय व्यवस्था को एक प्रकार का ‘माइक्रोमैनेजमेंट’ करार दिया है। पत्र में कहा गया है कि पूरे विविधतापूर्ण देश के लिए एक समान फॉर्मूला लागू करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि हर राज्य और क्षेत्र की सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियां भिन्न होती हैं। इसलिए राज्यों को अपनी स्थानीय आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप फंड आवंटित करने की पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने कृषि क्षेत्र से जुड़े एक विशेष नियम को लेकर भी व्यावहारिक आपत्ति दर्ज कराई है, जिसके तहत खेती के पीक सीजन के दौरान ग्रामीण रोजगार के कार्यों को 60 दिनों के लिए बंद रखने का प्रावधान किया गया है। उन्होंने वैश्विक जलवायु परिवर्तन और ‘अल नीनो’ के प्रभावों का हवाला देते हुए कहा कि अब खेती का समय और चक्र पहले की तरह निश्चित नहीं रह गया है। ऐसे में किसी एक निश्चित समयावधि के लिए काम को पूरी तरह रोक देना उचित नहीं है, क्योंकि ग्रामीण मजदूरों को विपरीत मौसम और संकट के समय किसी भी वक्त रोजगार की सख्त आवश्यकता पड़ सकती है।

  • राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    नई दिल्ली:भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। हाल ही में सदन की कार्यवाही के दौरान देश के भविष्य की राजनीतिक दिशा और संघीय ढांचे की स्थिरता को लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त की गईं। इस चर्चा का मुख्य केंद्र आगामी परिसीमन और उसके संभावित परिणाम रहे जो आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति के स्वरूप को पूरी तरह बदल सकते हैं।
    यह तर्क दिया गया कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या वृद्धि के मानकों पर किया जाता है तो इससे उन राज्यों के राजनीतिक प्रभाव में भारी कमी आने की आशंका है जिन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्यों जैसे परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के संदर्भ में यह एक गंभीर विषय बन गया है क्योंकि उनके बेहतर सामाजिक और शैक्षिक प्रदर्शन का परिणाम उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व के रूप में भुगतना पड़ सकता है।

    संसदीय पटल पर प्रस्तुत किए गए तर्कों और विश्लेषण के अनुसार यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया तो देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक बड़ा असंतुलन पैदा हो सकता है। आंकड़ों के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि यदि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दर और प्रस्तावित परिसीमन का मेल होता है तो भविष्य में उत्तर भारत के केवल छह या सात प्रमुख राज्यों के सहयोग से ही केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गठन संभव हो जाएगा।

    ऐसी स्थिति में देश के अन्य हिस्सों विशेषकर दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की राजनीतिक भागीदारी और उनकी आवाज का महत्व केंद्र सरकार के निर्णयों में काफी कम हो सकता है। यह संभावना न केवल क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ावा दे सकती है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना के लिए भी चुनौती बन सकती है जो विविधता में एकता और सभी क्षेत्रों की समान भागीदारी पर आधारित है।

    चर्चा के दौरान यह बात भी प्रमुखता से रखी गई कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून निर्माण की प्रक्रिया में हर भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का समान महत्व होना चाहिए। संघीय शासन प्रणाली की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि देश का प्रत्येक नागरिक और हर राज्य स्वयं को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व पाता हुआ महसूस करे।

    यदि सीटों के पुनर्गठन के बाद राजनीतिक सत्ता का केंद्र पूरी तरह से कुछ विशिष्ट राज्यों तक सीमित हो जाता है तो इससे उन राज्यों के भीतर असुरक्षा और उपेक्षा की भावना पैदा हो सकती है जिन्होंने विकास के मानकों पर शानदार कार्य किया है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए यह अनिवार्य माना गया कि परिसीमन को केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया के रूप में न देखकर इसे एक न्यायसंगत वितरण प्रणाली के रूप में विकसित किया जाए।

    इस विषय पर विचार करते हुए यह सुझाव दिया गया कि नीति निर्माताओं को परिसीमन के नियमों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बेहतर शासन और जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाए न कि उनकी संसदीय शक्ति को कम करके उन्हें दंडित किया जाए।

    सदन में इस विचार पर बल दिया गया कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केवल संख्या बल ही सत्ता का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए बल्कि क्षेत्रीय योगदान और विकास के पैमानों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में एक गहरा विभाजन देखने को मिल सकता है जो संघीय सहयोग और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

    अंततः यह संपूर्ण चर्चा इस निष्कर्ष की ओर इशारा करती है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आने वाले वर्षों में प्रतिनिधित्व का संकट एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। इस जटिल मुद्दे के समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं को सामूहिक रूप से प्रयास करने होंगे।

    संघीय ढांचे को अटूट रखने के लिए ऐसे समाधान खोजने की आवश्यकता है जो जनसंख्या के संतुलन के साथ-साथ क्षेत्रीय अस्मिता और राज्यों के विशिष्ट योगदान को भी सुरक्षित रख सकें। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत का नेतृत्व इस संवेदनशील मुद्दे पर किस प्रकार की आम सहमति बनाता है ताकि देश का हर हिस्सा स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा का एक सशक्त और अपरिहार्य अंग समझता रहे।