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  • 77 की उम्र में महेश भट्ट ने निर्देशन को कहा अंतिम अलविदा, रचनात्मक स्वतंत्रता में कमी को बताया फैसले की सबसे बड़ी वजह

    77 की उम्र में महेश भट्ट ने निर्देशन को कहा अंतिम अलविदा, रचनात्मक स्वतंत्रता में कमी को बताया फैसले की सबसे बड़ी वजह

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार महेश भट्ट ने आधिकारिक रूप से निर्देशन की दुनिया से खुद को अलग करने का फैसला किया है। 77 वर्ष की आयु में उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि अब वह भविष्य में किसी भी फिल्म का निर्देशन नहीं करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म निर्माण और थिएटर से जुड़े रचनात्मक कार्यों में उनकी सक्रियता आगे भी बनी रहेगी, लेकिन निर्देशक के रूप में वापसी की संभावना अब नहीं है। उनके इस फैसले ने फिल्म उद्योग में लंबे समय से चली आ रही उनकी रचनात्मक यात्रा पर एक महत्वपूर्ण विराम लगा दिया है।

    महेश भट्ट ने अपने निर्णय के पीछे बदलते फिल्मी माहौल और रचनात्मक प्रक्रिया में आए बदलावों को प्रमुख कारण बताया। उनका कहना है कि आज अधिकांश फिल्मों का स्वरूप पहले से तय रहता है, जिससे निर्देशक और कलाकार के लिए अपनी कल्पनाशीलता तथा स्वतंत्र सोच को पूरी तरह अभिव्यक्त करना पहले जैसा संभव नहीं रह गया है। उनके अनुसार कला का वास्तविक स्वरूप तभी सामने आता है, जब रचनाकार को प्रयोग करने और अपने दृष्टिकोण को खुलकर प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता मिले।

    उन्होंने कहा कि जब किसी फिल्म का लगभग हर पहलू पहले से निर्धारित हो और रचनात्मक निर्णयों की गुंजाइश सीमित हो जाए, तब निर्देशक की भूमिका भी पहले जैसी प्रभावी नहीं रह जाती। उनका मानना है कि किसी भी कलाकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति होती है और यदि वही सीमित हो जाए तो रचनात्मक संतुष्टि भी कम होने लगती है। इसी सोच ने उन्हें निर्देशन से स्थायी रूप से दूरी बनाने का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया।

    महेश भट्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्देशन छोड़ने का अर्थ सिनेमा से पूरी तरह अलग होना नहीं है। उन्होंने कहा कि वह बतौर निर्माता और थिएटर से जुड़े प्रोजेक्ट्स में अपनी भागीदारी जारी रखेंगे। उनका उद्देश्य नए विचारों और प्रतिभाओं को आगे बढ़ाना है, लेकिन कैमरे के पीछे निर्देशक की भूमिका निभाने की अब उनकी कोई इच्छा नहीं है।

    महेश भट्ट का फिल्मी सफर चार दशकों से भी अधिक समय तक फैला रहा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1974 में की थी। शुरुआती दौर में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन बाद के वर्षों में उन्होंने ऐसी कई फिल्में बनाई, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। संवेदनशील विषयों, मानवीय रिश्तों और सामाजिक मुद्दों पर आधारित उनकी फिल्मों ने उन्हें एक विशिष्ट निर्देशक के रूप में स्थापित किया।

    उनके निर्देशन में बनी कई फिल्मों को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने सराहा। उन्होंने ऐसी कहानियों को बड़े पर्दे पर उतारा, जिन्होंने मनोरंजन के साथ-साथ समाज और मानवीय भावनाओं पर भी गहरी छाप छोड़ी। लेखक के रूप में भी उन्होंने कई सफल फिल्मों में महत्वपूर्ण योगदान दिया और अपनी अलग रचनात्मक शैली विकसित की।

    निर्देशन से उनका पहला लंबा विराम वर्ष 1999 के बाद शुरू हुआ था। इसके करीब दो दशक बाद उन्होंने एक फिल्म के जरिए फिर से निर्देशन में वापसी की, लेकिन अब उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह वापसी अंतिम थी। उनके ताजा बयान के बाद यह लगभग तय हो गया है कि हिंदी सिनेमा को अब उनकी नई निर्देशित फिल्म देखने का अवसर नहीं मिलेगा। हालांकि फिल्म निर्माण और रचनात्मक परियोजनाओं में उनकी उपस्थिति आगे भी बनी रहेगी और उनके अनुभव का लाभ नई पीढ़ी के कलाकारों तथा फिल्मकारों को मिलता रहेगा।

  • सिनेमाई इतिहास का वो विवादित वाकया: जब फिल्म 'प्रेम धर्म' के इंटीमेट सीन के दौरान बेकाबू हुए विनोद खन्ना, गुस्से में डिंपल कपाड़िया ने उठाया था बड़ा कदम

    सिनेमाई इतिहास का वो विवादित वाकया: जब फिल्म 'प्रेम धर्म' के इंटीमेट सीन के दौरान बेकाबू हुए विनोद खन्ना, गुस्से में डिंपल कपाड़िया ने उठाया था बड़ा कदम


    नई दिल्ली ।
    हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे किस्से दर्ज हैं जो फिल्मों की सफलता से इतर सेट पर घटित विवादित वाकयों के लिए हमेशा चर्चा में रहे। अस्सी के दशक में भी एक ऐसा ही वाकया सामने आया था, जिसने तत्कालीन फिल्म जगत में भारी सनसनी मचा दी थी। यह पूरा मामला हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर के सुपरस्टार विनोद खन्ना और दिग्गज अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया से जुड़ा हुआ है। वर्ष उन्नीस सौ अस्सी में आई फिल्म ‘प्रेम धर्म’ की शूटिंग के दौरान एक बेहद संवेदनशील और अंतरंग दृश्य को फिल्माते समय ऐसा घटनाक्रम हुआ कि सेट पर मौजूद हर व्यक्ति हैरान रह गया।

    इस बहुचर्चित फिल्म का निर्देशन मशहूर फिल्मकार महेश भट्ट कर रहे थे, जो अपनी फिल्मों में दृश्यों को बेहद यथार्थवादी और भावुक बनाने के लिए जाने जाते हैं। फिल्म के एक खास सीक्वेंस के लिए विनोद खन्ना और डिंपल कपाड़िया के बीच एक बेहद इंटीमेट और इमोशनल सीन शूट किया जाना तय हुआ था। इस दृश्य को अधिक वास्तविक रूप देने और कलाकारों की झिझक दूर करने के उद्देश्य से निर्देशक महेश भट्ट ने सेट की सभी लाइटों को काफी धीमा करवा दिया था और मुख्य कैमरा टीम को छोड़कर बाकी पूरी यूनिट को भी उस स्थान से थोड़ा दूर रहने के निर्देश दिए गए थे।

    जैसे ही कैमरे ने रोल करना शुरू किया, विनोद खन्ना ने स्क्रिप्ट की मांग के अनुसार अपनी सह-कलाकार डिंपल कपाड़िया को चूमना शुरू कर दिया। दृश्य के पूरा होते ही निर्देशक महेश भट्ट ने लाउडस्पीकर पर ‘कट’ की घोषणा की, लेकिन विनोद खन्ना दृश्य की भावुकता और तीव्रता में इस कदर खो चुके थे कि उन्होंने निर्देशक की आवाज नहीं सुनी। ‘कट’ बोले जाने के बाद भी वे लगातार डिंपल कपाड़िया को किस करते रहे, जिससे सेट पर असहज स्थिति पैदा हो गई। डिंपल कपाड़िया को शुरुआत में समझ ही नहीं आया कि उनके सह-कलाकार आखिर क्या कर रहे हैं।

    माहौल को अचानक गंभीर और अजीब होते देख निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी जगह से उठकर बेहद जोर-जोर से ‘कट’ बोलना शुरू किया, जिसके बाद कहीं जाकर विनोद खन्ना होश में आए और पीछे हटे। इस अप्रत्याशित और अचानक हुई घटना से युवा अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया पूरी तरह स्तब्ध और गहरे सदमे में आ गईं। उन्हें विनोद खन्ना के इस अनपेक्षित व्यवहार पर भारी गुस्सा भी आया और वे तुरंत सेट से भागकर सीधे अपने मेकअप रूम की तरफ चली गईं।

    अपने स्वाभिमान और गरिमा को ठेस पहुंचने से आहत अभिनेत्री ने मेकअप रूम के भीतर पहुंचकर खुद को अंदर से पूरी तरह बंद कर लिया और बाहर आने से साफ मना कर दिया। सेट पर पैदा हुए इस गंभीर तनाव को देखते हुए निर्देशक महेश भट्ट ने तुरंत स्थिति को संभाला और वे स्वयं डिंपल कपाड़िया के कमरे के बाहर पहुंचे। उन्होंने अभिनेत्री से इस पूरी घटना के लिए औपचारिक रूप से माफी मांगी और उन्हें आश्वस्त किया कि यह केवल एक भूल थी। दूसरी तरफ, सुपरस्टार विनोद खन्ना भी अपनी इस अनियंत्रित हरकत के बाद बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहे थे।

    बॉलीवुड के गलियारों में आज भी इस किस्से को संवेदनशीलता के साथ याद किया जाता है, जो यह दर्शाता है कि चकाचौंध भरी फिल्मों के निर्माण के दौरान कई बार कलाकारों के लिए स्थितियां कितनी असहज और चुनौतीपूर्ण हो जाती हैं। हालांकि, बाद में मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे सुलझा लिया गया था, लेकिन सेंसर बोर्ड की कैंची और सेट पर मचे इस बवाल के कारण यह फिल्म और इससे जुड़ा यह विवाद हमेशा-कहमेशा के लिए फिल्मी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

  • परदे पर परफेक्ट शॉट के लिए जब पिता ने भुला दिया रिश्ता: 'गदर' के क्लाइमेक्स में अनिल शर्मा ने दांव पर लगा दी थी बेटे उत्कर्ष की जान

    परदे पर परफेक्ट शॉट के लिए जब पिता ने भुला दिया रिश्ता: 'गदर' के क्लाइमेक्स में अनिल शर्मा ने दांव पर लगा दी थी बेटे उत्कर्ष की जान

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनके दृश्य दर्शकों के जहन में हमेशा के लिए दर्ज हो जाते हैं, लेकिन उन दृश्यों को परदे पर जीवंत करने के लिए पर्दे के पीछे जो खतरे उठाए जाते हैं, वे अक्सर हैरान करने वाले होते हैं। ऐसा ही एक बेहद भावुक और खौफनाक किस्सा साल २००१ में रिलीज हुई ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘गदर: एक प्रेम कथा’ के सेट से सामने आया है। फिल्म के निर्देशक अनिल शर्मा ने खुद इस बात का खुलासा किया है कि फिल्म के एक मुख्य और बेहद खतरनाक स्टंट सीन को फिल्माते समय उन्होंने निर्देशक के दायित्व को पूरा करने के लिए अपने ही सगे बेटे उत्कर्ष शर्मा की जान को दांव पर लगा दिया था। उत्कर्ष ने इस फिल्म में सनी देओल और अमीषा पटेल के बेटे ‘चरणजीत’ की भूमिका निभाई थी।

    यह पूरा घटनाक्रम फिल्म के उस मशहूर क्लाइमेक्स सीन की शूटिंग के दौरान का है, जिसमें मुख्य किरदार तारा सिंह अपने परिवार की रक्षा करते हुए पाकिस्तान से भारत की सीमा की तरफ भाग रहा होता है। इस पूरे दृश्य को किसी स्टूडियो में नहीं, बल्कि वास्तव में एक चलती हुई ट्रेन के ऊपर फिल्माया जा रहा था। सीन की मांग यह थी कि जब ट्रेन लगभग ४० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही हो, तब अभिनेता सनी देओल अपने पांच वर्षीय बाल कलाकार बेटे उत्कर्ष शर्मा को अपने मजबूत कंधों पर बैठाकर ट्रेन की एक बोगी से दूसरी बोगी पर छलांग लगाएंगे। एक पिता होने के नाते अनिल शर्मा के लिए यह निर्णय बेहद आत्मघाती और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला था, परंतु फिल्म को वास्तविक और प्रभावशाली बनाने के चक्कर में उन्होंने यह बड़ा जोखिम मोल ले लिया।

    शूटिंग के उन खौफनाक पलों को याद करते हुए अनिल शर्मा ने बताया कि जब यह शॉट चल रहा था, तब उनके भीतर का पिता इतना डर गया था कि उन्होंने डर के मारे अपनी आंखें पूरी तरह बंद कर ली थीं। उनके दिमाग में लगातार अनहोनी की आशंकाएं तैर रही थीं और वह सिर्फ भगवान से अपने बच्चे की सलामती की प्रार्थना कर रहे थे। जब तक ट्रेन के रुकने की आवाज उनके कानों में नहीं पड़ती थी, वह अपनी आंखें खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। निर्देशक ने इसे अपने पूरे फिल्मी सफर का सबसे मुश्किल और तनावपूर्ण शॉट करार दिया। उन्होंने आत्मग्लानि भरे स्वर में कहा कि आज भी जब वह पीछे मुड़कर देखते हैं, तो खुद से यही सवाल पूछते हैं कि यदि उस वक्त कोई छोटी सी चूक हो जाती या संतुलन बिगड़ जाता, तो क्या होता। उन्होंने माना कि सब कुछ सनी देओल के भरोसे छोड़कर उन्होंने बहुत बड़ा जुआ खेला था।

    इस जानलेवा रिस्क और कलाकारों की कड़ी मेहनत का नतीजा यह हुआ कि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। मात्र १८ करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी ‘गदर’ ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर ७७ करोड़ रुपये और वैश्विक स्तर पर १३३ करोड़ रुपये की ऐतिहासिक कमाई की थी। इस फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके ५.६ करोड़ से अधिक टिकट बिके थे, जो भारतीय सिनेमा में एक रिकॉर्ड है। मध्य प्रदेश सहित पूरे देश के सिनेमाघरों में इस फिल्म को देखने के लिए ट्रकों में भरकर लोग आए थे। इसी ऐतिहासिक सफलता को दोहराने के लिए २२ साल बाद साल २०२३ में अनिल शर्मा इसका सीक्वल ‘गदर २’ लेकर आए, जिसमें अब बड़े हो चुके उत्कर्ष शर्मा मुख्य भूमिका में नजर आए और इस सीक्वल ने भी दुनिया भर में ६९१ करोड़ रुपये कमाकर इतिहास रच दिया, लेकिन इस सफलता की नींव में पिता का वो खौफनाक समझौता हमेशा छिपा रहेगा।