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  • लोन लेने से पहले EMI के ये नियम जरूर जान लें: छोटी गलती बढ़ा सकती है बड़ा आर्थिक बोझ

    लोन लेने से पहले EMI के ये नियम जरूर जान लें: छोटी गलती बढ़ा सकती है बड़ा आर्थिक बोझ


    नई दिल्ली। आज के समय में घर, कार, शिक्षा और व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग तेजी से बैंक लोन का सहारा ले रहे हैं। आसान प्रोसेस और डिजिटल बैंकिंग के चलते लोन लेना पहले की तुलना में सरल जरूर हो गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि EMI से जुड़े नियमों की अनदेखी भविष्य में गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर सकती है। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, लोन लेने से पहले अपनी मासिक आय, खर्च और EMI क्षमता का सही आकलन करना बेहद जरूरी है। गलत योजना से न केवल बजट बिगड़ सकता है, बल्कि लंबे समय तक आर्थिक दबाव भी बना रह सकता है।

    EMI आय का 35-40% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए
    विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी व्यक्ति की कुल EMI उसकी मासिक आय के 35 से 40 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि EMI इससे ज्यादा हो जाती है, तो रोजमर्रा के खर्च, बचत और आपातकालीन जरूरतों पर सीधा असर पड़ता है। बैंकों द्वारा भी लोन मंजूरी से पहले आवेदक की आय, मौजूदा कर्ज और खर्च का विस्तृत आकलन किया जाता है ताकि डिफॉल्ट का जोखिम कम किया जा सके।

    ब्याज दर का सही चुनाव बेहद जरूरी
    लोन लेते समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू ब्याज दर होता है। ग्राहकों को यह समझना चाहिए कि फ्लोटिंग और फिक्स्ड ब्याज दर में बड़ा अंतर होता है। फ्लोटिंग रेट में बाजार की स्थिति के अनुसार EMI बढ़ या घट सकती है, जिससे भविष्य में भुगतान अनिश्चित हो सकता है। वहीं फिक्स्ड रेट में EMI पूरी अवधि के लिए स्थिर रहती है, जिससे बजट प्लानिंग आसान हो जाती है।

    लोन अवधि का सीधा असर EMI पर
    लोन की अवधि भी EMI को सीधे प्रभावित करती है। लंबी अवधि चुनने पर EMI कम हो जाती है, जिससे मासिक दबाव कम महसूस होता है, लेकिन कुल मिलाकर ब्याज अधिक देना पड़ता है। वहीं कम अवधि के लोन में EMI ज्यादा होती है, लेकिन कुल ब्याज कम चुकाना पड़ता है। ऐसे में वित्तीय विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि लोन अवधि का चुनाव अपनी आय और खर्च के संतुलन को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

    क्रेडिट स्कोर और अतिरिक्त चार्ज पर ध्यान जरूरी
    लोन लेने से पहले क्रेडिट स्कोर की जांच करना भी जरूरी है, क्योंकि अच्छा क्रेडिट स्कोर होने पर कम ब्याज दर पर लोन मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट चार्ज और अन्य छिपे हुए शुल्कों की जानकारी भी पहले से लेना जरूरी है, ताकि बाद में कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।

    सही योजना से ही बनती है वित्तीय स्थिरता
    विशेषज्ञों का कहना है कि लोन लेना गलत नहीं है, लेकिन बिना योजना के लिया गया कर्ज भविष्य में आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है। सही EMI प्लानिंग और समझदारी से लिया गया निर्णय व्यक्ति को वित्तीय स्थिरता की ओर ले जाता है।

  • पर्सनल लोन एक नज़र में: तुरंत पैसे पाने का आसान तरीका, लेकिन समझदारी जरूरी

    पर्सनल लोन एक नज़र में: तुरंत पैसे पाने का आसान तरीका, लेकिन समझदारी जरूरी


    नई दिल्ली । आज के समय में पर्सनल लोन लोगों की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने का एक आसान और तेजी से उपलब्ध होने वाला विकल्प बन चुका है। चाहे मेडिकल इमरजेंसी हो, शादी का खर्च, ट्रैवल प्लान या किसी अन्य व्यक्तिगत आवश्यकता—पर्सनल लोन बिना किसी गारंटी के बैंक और वित्तीय संस्थानों द्वारा दिया जाता है।

    पर्सनल लोन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें किसी भी प्रकार की सिक्योरिटी या संपत्ति गिरवी रखने की जरूरत नहीं होती। यह पूरी तरह आपकी आय, क्रेडिट स्कोर और रीपेमेंट क्षमता पर आधारित होता है। आवेदन प्रक्रिया भी काफी सरल होती है और कई बार कुछ ही घंटों में लोन अप्रूव हो जाता है।

    योग्यता यानी एलिजिबिलिटी की बात करें तो इसके लिए आवेदक का वेतनभोगी या स्व-नियोजित होना जरूरी है। आमतौर पर 21 से 60 वर्ष की आयु सीमा में आने वाले व्यक्ति इस लोन के लिए पात्र होते हैं। साथ ही अच्छा क्रेडिट स्कोर (आमतौर पर 700 या उससे अधिक) होने पर लोन मिलने की संभावना बढ़ जाती है। बैंक आपकी मासिक आय और नौकरी की स्थिरता को भी ध्यान में रखते हैं।

    ब्याज दर (Interest Rate) की बात करें तो यह अलग-अलग बैंकों और NBFCs में भिन्न हो सकती है। आमतौर पर पर्सनल लोन पर ब्याज दर 10% से लेकर 24% सालाना तक हो सकती है। यह दर आपके क्रेडिट स्कोर, आय और बैंक पॉलिसी पर निर्भर करती है। बेहतर क्रेडिट स्कोर होने पर आपको कम ब्याज दर पर लोन मिल सकता है।

    पर्सनल लोन की एक खासियत यह भी है कि इसकी रीपेमेंट अवधि 1 साल से लेकर 5-7 साल तक हो सकती है, जिससे ईएमआई को अपने बजट के अनुसार मैनेज करना आसान हो जाता है।

    हालांकि, विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पर्सनल लोन केवल जरूरी परिस्थितियों में ही लिया जाए, क्योंकि इसकी ब्याज दर अन्य लोन की तुलना में थोड़ी अधिक होती है। समय पर ईएमआई न चुकाने पर क्रेडिट स्कोर पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर पर्सनल लोन एक उपयोगी वित्तीय साधन है, जो सही योजना और समझदारी के साथ लिया जाए तो आर्थिक जरूरतों को आसानी से पूरा कर सकता है।

  • मई 2026 में बैंक छुट्टियां: 12 दिन बंद रहेंगे बैंक, RBI कैलेंडर जारी

    मई 2026 में बैंक छुट्टियां: 12 दिन बंद रहेंगे बैंक, RBI कैलेंडर जारी


    नई दिल्ली| मई 2026 में बैंक से जुड़े काम करने वालों के लिए जरूरी खबर है। Reserve Bank of India की ओर से जारी छुट्टियों की लिस्ट (Banking Holidays List) के मुताबिक इस महीने कुल 12 दिन बैंक बंद रहेंगे। इसमें वीकेंड के अलावा कई बड़े त्योहार भी शामिल हैं, ऐसे में ग्राहकों को पहले से प्लानिंग करना जरूरी होगा।

    12 दिन बंद रहेंगे बैंक, वीकेंड और त्योहारों का असर
    मई महीने में कुल 12 दिन बैंक बंद रहने वाले हैं। इसमें सभी रविवार और दूसरे व चौथे शनिवार की छुट्टियां शामिल हैं। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में स्थानीय त्योहारों और आयोजनों के चलते भी बैंक बंद रहेंगे। इसलिए यह जरूरी है कि ग्राहक अपने शहर के हिसाब से छुट्टियों की लिस्ट जरूर चेक कर लें, ताकि किसी जरूरी काम में परेशानी न हो।

    बुद्ध पूर्णिमा और ईद जैसे त्योहारों पर भी रहेगी छुट्टी
    इस महीने कई अहम त्योहार पड़ रहे हैं, जिनमें Buddha Purnima और Eid al-Adha जैसे मौके शामिल हैं। इन त्योहारों के कारण अलग-अलग राज्यों में बैंक बंद रहेंगे। हालांकि सभी छुट्टियां पूरे देश में लागू नहीं होतीं, कुछ छुट्टियां क्षेत्रीय होती हैं।

    जरूरी काम पहले निपटाएं, ऑनलाइन सेवाएं रहेंगी चालू
    लगातार छुट्टियों को देखते हुए ग्राहकों को सलाह दी जाती है कि वे अपने जरूरी बैंकिंग काम पहले ही निपटा लें। कैश निकालने, चेक क्लियरेंस या ब्रांच विजिट से जुड़े काम छुट्टियों से पहले कर लेना बेहतर रहेगा।

    हालांकि डिजिटल बैंकिंग सेवाएं जैसे नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और एटीएम सेवाएं इन दिनों में भी चालू रहेंगी, जिससे ग्राहकों को ज्यादा परेशानी नहीं होगी।

  • ईरान संकट में निवेश: वॉरेन बफे की सलाह से बनाएं स्मार्ट रणनीति

    ईरान संकट में निवेश: वॉरेन बफे की सलाह से बनाएं स्मार्ट रणनीति


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को हिला कर रख दिया है। इस उथल-पुथल का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा, जो तेज़ी से बढ़ती हुई भारतीयों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए चिंता का कारण बन गई है। बढ़ती तेल की कीमतें महंगाई को बढ़ाती हैं और वैश्विक आर्थिक विकास को धीमा कर सकती हैं।
    भारत में शेयर बाजारों पर दबाव
    भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए इस संकट का असर और गहरा है। बीएसई सेंसेक्स और निफ्टी 50 में भारी गिरावट देखी गई, क्योंकि निवेशक अनिश्चितता के बीच जोखिम कम करने के लिए जल्दबाजी में फैसला लेने लगे। उद्यमियों का कहना है कि तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई बढ़ाने के साथ-साथ व्यापार घाटा भी बढ़ा सकती हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।

    वॉरेन बफे की सलाह बनी चर्चा का केंद्र
    बाजार में इस उथल-पुथल के बीच दिग्गज निवेशक वॉरेन बफे का एक पुराना इंटरव्यू सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर चर्चा में आ गया है। 2022 में पत्रकार चार्ली रोज को दिए गए इंटरव्यू में बफे ने युद्ध, आर्थिक मंदी और महामारी जैसी परिस्थितियों में भारतीयों के लिए अहम सुझाव दिए थे।

    बफे, जो बर्कशायर हाथवे के डिपार्टमेंट और पूर्व सीईओ रह चुके हैं, को दुनिया के सबसे सफल निवेशकों में मिलता जाता है। उनकी निवेश रणनीति का मुख्य आधार लंबी अवधि का निवेश और बाजार की स्थिरता के दौरान धैर्य बनाए रखना है। ‘ओरेकल ऑफ ओमाहा’ के नाम से मशहूर बफे का रुझान है कि भू-राजनीतिक संकट, आर्थिक मंदी और बाजार में गिरावट समय-समय पर आती रहती हैं, लेकिन ये लंबे समय में आर्थिक प्रगति को रोक नहीं पाता।

    इतिहास से सीख
    इतिहास गवाह है कि शेयर बाजार ने कई बड़े संकटों का सामना किया है – महानदी, वैश्विक वित्तीय संकट और कोविड-19 जैसी घटनाएं शामिल हैं। इन मुश्किल दौरों के बावजूद समय के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार आगे बढ़ रहे हैं। बफे का कहना है कि संभावित संकट के बावजूद लंबी अवधि में बाजार की बढ़ोतरी बनी रहती है, और इसलिए स्थानीय उतार-चढ़ाव से घबराने की जरूरत नहीं है।

    लंबी अवधि के नजरिए पर ध्यान दें
    मौजूदा समय में अमेरिका-ईरान संघर्ष दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है, जिससे वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। लंबी अवधि तक युद्ध और तेल बाजार में बाधाओं की आशंका से शेयर बाजारों में गिरावट देखी जा रही है। ऐसे समय में कई निवेशक तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय जोखिम कम करने के लिए जल्दबाजी में फैसला लेते हैं।

    बफे की फिलॉसफी यही कहती है कि कंपनियों की लंबी अवधि की वृद्धि पर ध्यान दें, न कि बाजार की स्थानीय हलचल पर। उनकी परिस्थितियां हैं कि संकट भले ही कुछ समय के लिए बाजार को प्रभावित करें, लेकिन अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक प्रगति को पटरी से नहीं उतारते।

    अवसरों के लिए संदेश
    वॉरेन बफे की सलाह हर निवेशक के लिए स्पष्ट है: संकट के समय धैर्य बनाए रखें, लंबी अवधि के अवसरों को पहचानें और जल्दबाजी से बचें। चाहे युद्ध हो, आर्थिक मंदी या महामारी, बाजार हमेशा ऊपर-नीचे होता रहेगा। समझ यही है कि संभावित लाभार्थियों को समझ हुए दीर्घकालिक रणनीति अपनी जाए, जिससे निवेश स्थिर और सुरक्षित रहे।

  • मार्च 2026 में बैंक 18 दिन बंद, जरूरी लेनदेन पहले निपटाएं

    मार्च 2026 में बैंक 18 दिन बंद, जरूरी लेनदेन पहले निपटाएं


    नई दिल्ली। मार्च 2026 में देशभर के बैंक कुल 18 दिन बंद रहेंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार इसमें पांच रविवार, दूसरे और चौथे शनिवार के नियमित अवकाश के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों में 11 अतिरिक्त छुट्टियाँ शामिल हैं। यह अवधि शाखा-स्तरीय बैंकिंग सेवाओं को प्रभावित करेगी इसलिए ग्राहकों को जरूरी वित्तीय काम पहले से निपटाने की सलाह दी जा रही है।

    अवकाश की व्यवस्था क्षेत्रीय त्योहारों, धार्मिक आयोजनों और प्रशासनिक छुट्टियों के आधार पर तय की जाती है। इसलिए सभी राज्यों में एक साथ बैंक बंद नहीं रहेंगे। जहां संबंधित पर्व या स्थानीय छुट्टी घोषित होगी, वहीं शाखाएँ बंद रहेंगी। इस तरह बैंकिंग संचालन संतुलित रहता है और आवश्यक सेवाएँ पूरी तरह बाधित नहीं होतीं।

    हालांकि, बैंक बंद रहने के बावजूद डिजिटल माध्यमों की सेवाएँ सामान्य रूप से चालू रहेंगी। ऑनलाइन बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और एटीएम सेवाओं के जरिए ग्राहक धन हस्तांतरण, बिल भुगतान और अन्य लेनदेन आसानी से कर सकेंगे। विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल बैंकिंग ने छुट्टियों के दौरान सेवा व्यवधान के प्रभाव को काफी हद तक कम कर दिया है। फिर भी शाखा आधारित सेवाएँ जैसे चेक क्लियरेंस और कैश डिपॉजिट अवकाश के दौरान प्रभावित हो सकती हैं।

    वित्तीय गतिविधियों की दृष्टि से मार्च में शेयर बाजार में भी सीमित कारोबारी दिन रहेंगे। सप्ताहांत अवकाश और कुछ प्रमुख त्योहारों के कारण बाजार बंद रहेगा। निवेशकों और ट्रेडरों को अपने सौदों की योजना समय से बनानी होगी ताकि किसी तरह की वित्तीय हानि न हो। लगातार अवकाश वाले महीनों में नकदी प्रबंधन और भुगतान चक्र पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है।

    बैंकिंग क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि छुट्टियों की पूर्व जानकारी ग्राहकों को वित्तीय अनुशासन बनाए रखने में मदद करती है। व्यापारियों, वेतनभोगी कर्मचारियों और लोनधारकों के लिए भुगतान तिथियों का समुचित प्रबंधन जरूरी है। समय पर ईएमआई, चेक जमा और अन्य भुगतान सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल विकल्पों का उपयोग करना लाभकारी रहेगा।

    यह अवकाश सूची सार्वजनिक हित के लिए जारी की गई है ताकि आम नागरिक, व्यापारी और संस्थान अपनी वित्तीय गतिविधियों की पूर्व योजना बना सकें। बैंकिंग प्रणाली के सुचारु संचालन और उपभोक्ता सुविधा के लिए समय-समय पर ऐसे अपडेट जारी किए जाते हैं। मार्च 2026 के अवकाश कार्यक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि बदलते वित्तीय परिवेश में डिजिटल बैंकिंग अब वैकल्पिक नहीं बल्कि आवश्यक सेवा बन चुकी है। इसलिए ग्राहकों को सलाह दी गई है कि वे अपने राज्य के अनुसार अवकाश सूची की पुष्टि कर अपने जरूरी कार्य समय रहते पूरा कर लें।

  • लॉन्ग टर्म SIP कैलकुलेशन; 1000 से 3000 रुपये तक निवेश पर संभावित रिटर्न का पूरा हिसाब, जानें डिटेल

    लॉन्ग टर्म SIP कैलकुलेशन; 1000 से 3000 रुपये तक निवेश पर संभावित रिटर्न का पूरा हिसाब, जानें डिटेल


    नई दिल्ली । महीने का SIP इन्वेस्टमेंट रिटर्न 1000 2000 3000 कॉर्पस कैलकुलेशन 20 साल भारत में डिटेल्स जानें लॉन्ग टर्म SIP कैलकुलेशन; 1000 से 3000 रुपये तक निवेश पर संभावित रिटर्न का पूरा हिसाब, जानें डिटेल
    छोटे निवेश से बनेगा बड़ा फंड
    SIP इन्वेस्टमेंट रिटर्न कैलकुलेशन बदलते परिवेश में पैसे कमाने के साथ-साथ पैसा बचाना और सही जगह निवेश करना सबसे जरूरी हो गया है. निवेश के कई विकल्प बाजार में उपलब्ध है. जहां निवेशक अपनी सहूलियत के अनुसार निवेश करते हैं. भारतीय निवेशकों के बीच म्यूचुअल फंड में एसआईपी बहुत फेमस है. इसकी वजह यह है कि, निवेशक लंबी अवधि तक छोटी-छोटी राशि में निवेश करने एक बड़ा फंड बना पाते हैं.

    अगर बाजार की चाल पॉजिटिव रहती है तो, एसआईपी में बेहतर रिटर्न मिलता है. यहीं कारण है कि, बहुत से लोग एसआईपी में निवेश का रास्ता चुन रहे हैं. ऐसे में छोटे निवेशक जो हर महीने हजार- दो हजार रुपये निवेश करते हैं, उनके मन में यह सवाल आता है कि, लंबी अवधि में उन्हें कितना रिटर्न मिलेगा. आइए इस सवाल का जवाब खोजते है….

    1000 के निवेश पर इतना बनेगा फंड

    नियमित निवेश की आदत लंबे समय में मजबूत फंड बनाने में मदद करती है. उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति हर महीने 1000 रुपये की SIP म्यूचुअल फंड में लगाता है और यह निवेश लगातार 20 वर्षों तक जारी रखता है.

    इस अवधि में 12 प्रतिशत के अनुमानित रिटर्न के आधार पर उसके पास लगभग 9.19 लाख रुपये का कॉर्पस तैयार हो सकता है. इस अवधि में निवेशक की कुल जमा राशि 2.40 लाख रुपये होगी. जबकि कमाई के रूप में करीब 6.79 लाख रुपये का लाभ मिल सकता है. जो चक्रवृद्धि की ताकत को साफ दिखाता है.

    2000 रुपये की मासिक SIP से 20 साल में बन सकता है इतना कॉर्पस

    अगर कोई निवेशक हर महीने 2000 रुपये की SIP म्यूचुअल फंड में करता है और इस निवेश को लगातार 20 वर्षों तक बनाए रखता है, तो 12 प्रतिशत के अनुमानित रिटर्न के हिसाब से उसके पास करीब 18.39 लाख रुपये की रकम तैयार हो सकती है.

    इस दौरान कुल निवेश 4.80 लाख रुपये का होगा. जबकि संभावित लाभ लगभग 13.59 लाख रुपये तक पहुंच सकता है. जो लंबे समय तक अनुशासित निवेश के फायदे को दिखाता है.

    3000 रुपये की SIP से 20 वर्षों में इतना बनेगा फंड

    हर महीने 3000 रुपये की SIP के जरिए म्यूचुअल फंड में निवेश करने और इसे लगातार 20 साल तक जारी रखने पर अच्छा फंड तैयार किया जा सकता है. 12 प्रतिशत के अनुमानित रिटर्न के आधार पर इस अवधि के अंत में कुल कॉर्पस लगभग 27.59 लाख रुपये तक पहुंच सकता है.

    इस दौरान निवेशक की जेब से कुल 7.20 लाख रुपये का निवेश होगा. जबकि संभावित कमाई करीब 20.39 लाख रुपये की हो सकती है. डिस्क्लेमर यहां मुहैया जानकारी सिर्फ़ सूचना हेतु दी जा रही है. यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है. निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें  किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है.

  • CIBIL स्कोर खराब है तो क्या नहीं मिलेगा नया क्रेडिट कार्ड? जानिए क्या कहता है नियम

    CIBIL स्कोर खराब है तो क्या नहीं मिलेगा नया क्रेडिट कार्ड? जानिए क्या कहता है नियम


    नई दिल्ली। ऑनलाइन शॉपिंग करनी हो फ्लाइट टिकट बुक करनी हो या अचानक आई जरूरत आज के दौर में क्रेडिट कार्ड केवल सुविधा नहीं बल्कि फाइनेंशियल लाइफ का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति नया क्रेडिट कार्ड अप्लाई करता है सबसे पहले जिस चीज की जांच होती है वह है उसका CIBIL स्कोर। ऐसे में जिन लोगों का सिबिल स्कोर खराब है उनके मन में यही सवाल उठता है कि क्या अब उन्हें कभी नया क्रेडिट कार्ड नहीं मिलेगा? चलिए जानते हैं।
    क्या है CIBIL स्कोर?
    CIBIL स्कोर एक तीन अंकों की संख्या होती है जो आपकी क्रेडिट हिस्ट्री को दर्शाती है। यह स्कोर 300 से 900 के बीच होता है। आमतौर पर 750 या उससे ज्यादा स्कोर को बैंक अच्छा मानते हैं। वहीं 600 से नीचे का स्कोर यह संकेत देता है कि आपने पहले लोन या क्रेडिट कार्ड के भुगतान में लापरवाही की है। ऐसे में बैंक आपको ‘हाई रिस्क कस्टमर’ मान लेते हैं।

    क्या RBI ने खराब स्कोर वालों पर रोक लगाई है?
    यह जानना जरूरी है कि भारतीय रिजर्व बैंक RBIने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है जो खराब CIBIL स्कोर वाले व्यक्ति को क्रेडिट कार्ड देने से रोकता हो। दरअसल क्रेडिट कार्ड जारी करना पूरी तरह बैंकों और कार्ड जारी करने वाली कंपनियों की नीति पर निर्भर करता है। बैंक अपने रिस्क को देखते हुए शर्तें तय करते हैं।

    खराब CIBIL स्कोर वालों के लिए कोई ऑप्शन?
    अगर आपका स्कोर कम है तब भी कुछ रास्ते खुले हैं। सबसे सेफ ऑप्शन है सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड। इसमें आपको बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट FDकरानी होती है और उसी के बदले कार्ड मिलता है। इसके अलावा परिवार के किसी सदस्य के कार्ड पर ऐड-ऑन कार्ड भी लिया जा सकता है। कुछ फिनटेक कंपनियां और NBFC सीमित क्रेडिट लिमिट के साथ कार्ड ऑफर करती हैं ताकि यूजर धीरे-धीरे अपनी साख सुधार सके।

    क्रेडिट कार्ड से कैसे सुधरेगा सिबिल स्कोर?
    सही तरीके से इस्तेमाल किया गया क्रेडिट कार्ड आपके खराब CIBIL स्कोर को सुधारने में मदद कर सकता है। समय पर बिल भुगतान लिमिट से कम खर्च और नियमित उपयोग से 6 से 12 महीनों में स्कोर में अच्छा सुधार देखा जा सकता है। एक बार स्कोर बेहतर होते ही अनसिक्योर्ड यानी बिना FD वाले क्रेडिट कार्ड के रास्ते भी खुल जाते हैं।

  • सालाना इनकम 12 लाख रुपये से ज्यादा है तो आज ही करें ये 4 निवेश, रिटायरमेंट भी रहेगा सुरक्षित और टैक्स भी जीरो!

    सालाना इनकम 12 लाख रुपये से ज्यादा है तो आज ही करें ये 4 निवेश, रिटायरमेंट भी रहेगा सुरक्षित और टैक्स भी जीरो!


    नई दिल्ली । अगर आपकी सालाना आमदनी 12 लाख रुपये से ज्यादा है और हर साल इनकम टैक्स आपकी जेब पर भारी पड़ता है, तो अब चिंता छोड़ दीजिए। सही टैक्स प्लानिंग और स्मार्ट निवेश से न सिर्फ टैक्स का बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है, बल्कि रिटायरमेंट के लिए एक मजबूत फाइनेंशियल फंड भी तैयार किया जा सकता है। खास बात यह है कि कुछ निवेश ऐसे हैं, जो टैक्स बचत और भविष्य की सुरक्षा दोनों का डबल फायदा देते हैं।
    नेशनल पेंशन सिस्टम
    नेशनल पेंशन सिस्टम हाई इनकम वालों के लिए सबसे असरदार टैक्स सेविंग टूल माना जाता है। सेक्शन 80CCD के तहत इसमें 50,000 रुपये की अतिरिक्त टैक्स छूट मिलती है, जो 80C की 1.5 लाख रुपये की सीमा से अलग है। यानी सीधे-सीधे टैक्सेबल इनकम कम। NPS में इक्विटी, डेट और सरकारी बॉन्ड में निवेश होता है, जिससे लंबे समय में 10-12% तक रिटर्न की उम्मीद की जाती है। रिटायरमेंट के समय 60% राशि टैक्स-फ्री निकाली जा सकती है, जबकि बाकी रकम से नियमित पेंशन मिलती है।

    पब्लिक प्रोविडेंट फंड

    जो लोग रिस्क से दूर रहना चाहते हैं, उनके लिए पब्लिक प्रोविडेंट फंड बेहतरीन ऑप्शन है। इसमें 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट मिलती है। मौजूदा समय में PPF पर 7.1% का फिक्स्ड और टैक्स-फ्री रिटर्न मिलता है। 15 साल की लंबी अवधि में कंपाउंडिंग का फायदा इसे रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए बेहद मजबूत बनाता है।

    इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम

    इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम उन निवेशकों के लिए है, जो टैक्स बचाते हुए ज्यादा रिटर्न चाहते हैं। इसमें भी 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की छूट मिलती है। 3 साल के लॉक-इन के साथ ELSS फंड्स इक्विटी में निवेश करते हैं और लंबे समय में 12–15% तक रिटर्न दे सकते हैं। हालांकि इसमें बाजार का रिस्क रहता है, इसलिए निवेश से पहले प्रोफाइल समझना जरूरी है।

    ULIP और पेंशन प्लान
    ULIP और लाइफ इंश्योरेंस पेंशन प्लान्स भी हाई इनकम वालों के लिए फायदेमंद हैं। 80C/80CCC के तहत टैक्स छूट और 10 के तहत टैक्स-फ्री मैच्योरिटी इन्हें अट्रैक्टिव बनाती है। ULIP में निवेश और इंश्योरेंस दोनों का लाभ मिलता है, जबकि पेंशन प्लान रिटायरमेंट के बाद नियमित आय सुनिश्चित करते हैं।

  • FD की सुरक्षा, EMI का खर्च, SIP की ताकत: 20 साल बाद किसका पलड़ा भारी?

    FD की सुरक्षा, EMI का खर्च, SIP की ताकत: 20 साल बाद किसका पलड़ा भारी?


    नई दिल्ली। आज के समय में निवेश के लिए लोगों के पास तीन बड़े रास्ते हैंFD, EMI और SIP। FD को सुरक्षित माना जाता है, EMI से लोग अपनी जरूरतें पूरी करते हैं, जबकि SIP धीरे-धीरे पैसा बढ़ाने का काम करता है। लेकिन सवाल यह है कि 20 साल बाद कौन आपको अमीर बना सकता है? अगर आप आज अपनी कमाई का एक हिस्सा इन तीनों में से किसी भी रास्ते पर लगाते हैं, तो 20 साल बाद आपकी स्थिति कैसी होगी?
    चलिए एक आसान कैलकुलेशन के जरिए समझते हैं कि FD की सीमा क्या है, EMI का नुकसान कितना भारी है और SIP की कंपाउंडिंग पावर कितनी मजबूत है।

    सबसे पहले FD की बात करें। FD को भारत में भरोसे और सुरक्षा का दूसरा नाम माना जाता है।  20 साल बाद आपका फंड लगभग ₹52 लाख तक पहुंच सकता है। लेकिन अगर आप महंगाई को भी ध्यान में रखें, तो 20 साल बाद उस पैसे की असली वैल्यू लगभग ₹15-20 लाख के आसपास ही रह सकती है।

    इसका मतलब FD आपके पैसे को बचाती है, लेकिन महंगाई के हिसाब से बढ़ा नहीं पाती। FD में रिटर्न कम होने के कारण आपका पैसा “सुरक्षित” जरूर रहता है, लेकिन वह अमीर नहीं बनाता।

    अब EMI की बात करें। EMI आमतौर पर लोगों को तुरंत सुख देती है, लेकिन लंबे समय में यह आपके लिए भारी पड़ सकती है। जब आप किसी पर्सनल लोन या लग्जरी कार के लिए 20 साल तक ₹10,000 EMI भरते हैं, तो आप कुल मिलाकर लगभग ₹24 लाख तो दे ही देते हैं, साथ ही बैंक को ब्याज में लगभग ₹15-20 लाख अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। 20 साल बाद आपके पास केवल एक पुरानी चीज बचती है जिसकी वैल्यू काफी कम हो चुकी होती है।

    EMI असल में आपकी फ्यूचर की कमाई को आज ही खर्च कर देती है और आपके लिए एक लंबा ब्याज का बोझ छोड़ जाती है। इसलिए EMI आपको अमीर नहीं बनाती, बल्कि बैंक को अमीर बनाती है।

    तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण विकल्प SIP है। SIP में आप छोटे-छोटे निवेश करते हैं और कंपाउंडिंग की ताकत से लंबे समय में बड़ा फंड बनाते हैं। अगर आप हर महीने ₹10,000 की SIP करते हैं और औसतन 12% रिटर्न मानें, तो 20 साल बाद आपका निवेश लगभग ₹24 लाख होकर करीब ₹1 करोड़ से ज्यादा बन सकता है। और अगर रिटर्न 15% रहे तो यह राशि ₹1.5 करोड़ तक भी पहुंच सकती है।

    SIP का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बाजार के उतार-चढ़ाव को अपने पक्ष में इस्तेमाल करता है। शुरुआती सालों में मार्केट गिरती है तो units ज्यादा मिलते हैं, और बाद में जब मार्केट बढ़ता है तो वही units ज्यादा लाभ देती हैं।

    अब 20 साल की जंग में किसका पलड़ा भारी है? FD सुरक्षित है, लेकिन महंगाई के हिसाब से अमीर नहीं बनाती। EMI आपको तुरंत सुविधा देती है, लेकिन लंबी अवधि में यह आपकी कमाई को खा जाती है और ब्याज के बोझ से आपकी संपत्ति घटती है।

    वहीं SIP में जोखिम जरूर है, लेकिन लंबे समय में यह कंपाउंडिंग के जरिए सबसे ज्यादा फायदा देता है। अगर आपका लक्ष्य 20 साल में “वेल्थ” बनाना है और आप निवेश को समय के साथ बढ़ते देखना चाहते हैं, तो SIP सबसे बेहतर विकल्प माना जा सकता है।
    (नोट: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें।)
  • नए NPS नियम लागू: रिटायरमेंट पर पैसा निकालते समय यह गलती पड़ सकती है भारी

    नए NPS नियम लागू: रिटायरमेंट पर पैसा निकालते समय यह गलती पड़ सकती है भारी

    नई दिल्ली।रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा हर नौकरीपेशा व्यक्ति की सबसे बड़ी चिंता होती है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए नेशनल पेंशन सिस्टम NPS को देश की सबसे भरोसेमंद रिटायरमेंट स्कीम्स में गिना जाता है। साल 2025 से NPS के नए नियम लागू हो चुके हैं, जो निवेशकों को पहले से ज्यादा लचीलापन तो देते हैं, लेकिन साथ ही एक गलत फैसले का जोखिम भी बढ़ा देते हैं।पेंशन फंडरेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटीPFRDA द्वारा किए गए बदलावों का सही इस्तेमाल किया जाए तो रिटायरमेंट आरामदायक हो सकता है, लेकिन अगर निवेशक केवल एकमुश्त रकम निकालने के लालच में आ गए, तो भविष्य में उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
    NPS के नए नियम क्या कहते हैं?
    PFRDA के नए नियम मुख्य रूप से नॉन-गवर्नमेंट सब्सक्राइबर्स, यानी ऑल सिटिजन मॉडल और कॉरपोरेट NPS निवेशकों पर लागू होते हैं। सबसे बड़ा बदलाव अनिवार्य एन्युटी निवेश को लेकर किया गया है।पहले नियमों के तहत रिटायरमेंट पर कुल NPS कॉर्पस का कम से कम 40 प्रतिशत हिस्सा एन्युटी में लगाना जरूरी था। अब इसे घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है। इस बदलाव के बाद निवेशकों को रिटायरमेंट के समय 80 प्रतिशत तक रकम एकमुश्तLump Sum निकालने की सुविधा मिल गई है। कुछ खास परिस्थितियों में 100 प्रतिशत तक निकासी की अनुमति भी दी गई है।

    एन्युटी को नजरअंदाज करना क्यों हो सकता है खतरनाक?
    एन्युटी वह व्यवस्था है, जिसके जरिए रिटायरमेंट के बाद निवेशक को हर महीने नियमित पेंशन मिलती है। नए नियमों में भले ही इसकी अनिवार्यता कम कर दी गई हो, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है।अगर किसी निवेशक का कुल NPS कॉर्पस 12 लाख रुपये से अधिक है, तो कम से कम 20 प्रतिशत राशि से एन्युटी खरीदना अनिवार्य होगा। यह नियम न सिर्फ 60 साल की उम्र में रिटायरमेंट लेने वालों पर लागू होता है, बल्कि 60 से 85 वर्ष के बीच NPS से एग्जिट करने वाले निवेशकों पर भी लागू रहेगा। यानी सरकार यह साफ संकेत दे रही है कि रिटायरमेंट के बाद नियमित आय की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

    कॉर्पस के हिसाब से निकासी के विकल्प
    नए नियमों में NPS कॉर्पस के आधार पर अलग-अलग विकल्प तय किए गए हैं-अगर कुल NPS कॉर्पस 8 लाख रुपये तक है, तो पूरी राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है।अगर कॉर्पस 8 से 12 लाख रुपये के बीच है, तो अधिकतम 6 लाख रुपये लंपसम निकाले जा सकते हैं। बाकी राशि एन्युटी या किश्तों में मिलेगी।अगर कॉर्पस 12 लाख रुपये से ज्यादा है, तो कम से कम 20 प्रतिशत एन्युटी में निवेश जरूरी होगा और शेष 80 प्रतिशत एक साथ निकाला जा सकता है।

    सबसे बड़ी चूक कहां हो सकती है?
    ज्यादा लंपसम निकासी की सुविधा देखकर कई निवेशक पूरा पैसा एक साथ निकालने का फैसला कर लेते हैं। यही सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है।रिटायरमेंट के बाद मेडिकल खर्च, बढ़ती महंगाई और लंबी उम्र के कारण नियमित आय की जरूरत लगातार बनी रहती है। अगर पेंशन का स्थायी स्रोत नहीं होगा, तो कुछ ही सालों में एकमुश्त रकम खत्म हो सकती है।

    संतुलन बनाना है सबसे जरूरी 
    NPS के नए नियम निवेशकों को आज़ादी जरूर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह है कि लंपसम और एन्युटी के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। एक हिस्सा एकमुश्त निकालकर जरूरी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं, लेकिन नियमित पेंशन के लिए पर्याप्त एन्युटी रखना रिटायरमेंट को सुरक्षित बनाता है। NPS के नए नियम राहत देने वाले जरूर हैं, लेकिन जल्दबाजी में लिया गया फैसला भारी नुकसान पहुंचा सकता है। समझदारी इसी में है कि रिटायरमेंट प्लानिंग करते समय केवल आज नहीं, बल्कि आने वाले 20–25 सालों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए। सही संतुलन ही सुरक्षित और तनावमुक्त रिटायरमेंट की कुंजी है।