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  • दो महीने में 250 रुपये प्रति क्विंटल महंगा हुआ गेहूं, त्योहारों से पहले आटा, मैदा और सूजी के दाम बढ़ने की आशंका

    दो महीने में 250 रुपये प्रति क्विंटल महंगा हुआ गेहूं, त्योहारों से पहले आटा, मैदा और सूजी के दाम बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली । त्योहारों के मौसम में आम लोगों के घरेलू बजट पर गेहूं की बढ़ती कीमतों का असर पड़ सकता है। पिछले दो महीनों में गेहूं के भाव में करीब 250 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी दर्ज की गई है। बाजार में कीमतें बढ़कर 3,110 से 3,135 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं। ऐसे में आगामी त्योहारों के दौरान आटा, मैदा और सूजी की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। बाजार में गेहूं की उपलब्धता, मिलों की खरीद और विभिन्न क्षेत्रों से आ रही मांग को इस तेजी की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है।

    गेहूं की सरकारी खरीद निर्धारित लक्ष्य से अधिक होने के बावजूद बाजार में कीमतों में मजबूती बनी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस बार सरकार ने 356 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा था, जिसे पार कर लिया गया। इसके बावजूद पिछले सप्ताह मंडियों में गेहूं की आवक कम होने से कीमतों को सहारा मिला। नमी और रंग के आधार पर गेहूं के भाव 3,110 से 3,135 रुपये प्रति क्विंटल के बीच पहुंच गए। हाल के दिनों में कीमतों में 30 से 35 रुपये प्रति क्विंटल की अतिरिक्त बढ़ोतरी भी दर्ज की गई।

    बाजार से जुड़े कारोबारियों के अनुसार, पिछले दो महीनों से गेहूं की मांग में तेजी बनी हुई है। इसके चलते कीमतों में लगभग 250 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा हुआ है। वहीं, निचले स्तरों की तुलना में भाव में कुल तेजी का अंतर 500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचने की बात कही जा रही है। पिछले एक महीने से किसानों की ओर से मंडियों में गेहूं की आवक का दबाव भी कम रहा है। इससे कारोबारियों को पर्याप्त मात्रा में माल जुटाने के लिए खरीद जारी रखनी पड़ रही है।

    गेहूं की कीमतों को मजबूती देने में रोलर फ्लोर मिलों की मांग की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ये मिलें गेहूं से आटा, मैदा और सूजी तैयार करती हैं। त्योहारों के दौरान इन उत्पादों की खपत बढ़ने की संभावना को देखते हुए मिलों की खरीद प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही मैदा और सूजी के व्यापार में बढ़ती गतिविधियों से भी गेहूं की मांग को समर्थन मिल रहा है। यदि कच्चे माल की लागत ऊंची बनी रहती है, तो इसका असर प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार पर पड़ सकता है।

    दक्षिण भारत की ओर गेहूं की खेप भेजे जाने से भी बाजार में मांग बनी हुई है। माल की ढुलाई के लिए रेल रैक उपलब्ध होने से दूसरे क्षेत्रों तक आपूर्ति करने में मदद मिल रही है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की मंडियों में भी गेहूं के भाव में दोबारा तेजी आने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा निर्यात मांग को भी कीमतों को सहारा देने वाले कारकों में शामिल किया जा रहा है। हालांकि, अलग-अलग मंडियों में गेहूं की गुणवत्ता, उपलब्धता और परिवहन लागत के आधार पर भाव में अंतर हो सकता है।

    अब बाजार की नजर सरकारी गेहूं की बिक्री पर टिकी हुई है। कारोबारियों का मानना है कि यदि सरकार बाजार में पर्याप्त मात्रा में गेहूं उपलब्ध कराती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। दूसरी ओर, सरकारी आपूर्ति सीमित रहने और मंडियों में आवक कम बनी रहने की स्थिति में भाव मजबूत रह सकते हैं। आगे कीमतों की दिशा काफी हद तक इन दोनों कारकों पर निर्भर करेगी।

    आम उपभोक्ताओं के लिए गेहूं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी चिंता का विषय बन सकती है। आटा, मैदा और सूजी रोजमर्रा के भोजन के साथ त्योहारों पर तैयार होने वाले कई पकवानों में इस्तेमाल होते हैं। मांग बढ़ने पर इन उत्पादों की खुदरा कीमतों में बदलाव की आशंका रहती है, हालांकि गेहूं के थोक भाव में हुई तेजी का असर उपभोक्ताओं तक कितना पहुंचेगा, यह भी प्रसंस्करण लागत, व्यापारियों के मार्जिन और स्थानीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

  • सरकार ने गेहूं के आटे, मैदा और सूजी के निर्यात से हटाई पाबंदी, बेहतर उत्पादन और स्टॉक के बीच बड़ा फैसला


    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार ने गेहूं से बने कई प्रमुख उत्पादों के निर्यात को लेकर बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। सरकार ने गेहूं या मेस्लिन आटा, मैदा, सूजी, होलमील आटा और मिश्रित गेहूं के आटे को प्रतिबंधित निर्यात श्रेणी से हटाकर मुक्त श्रेणी में डाल दिया है। अब इन उत्पादों का निर्यात बिना पहले लगाए गए प्रतिबंधों के किया जा सकेगा।

    विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना में निर्यात नीति में किए गए इस बदलाव की जानकारी दी गई। इस फैसले से गेहूं आधारित उत्पादों के कारोबार से जुड़े निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी और वे मांग के अनुसार इन उत्पादों की विदेशी बाजारों में आपूर्ति कर सकेंगे।

    सरकार ने वर्ष 2022 में घरेलू खाद्य सुरक्षा और कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से गेहूं तथा गेहूं से बने उत्पादों के निर्यात पर कई तरह की पाबंदियां लगाई थीं। 13 मई 2022 को गेहूं की निर्यात नीति को मुक्त श्रेणी से प्रतिबंधित श्रेणी में कर दिया गया था।

    इसके बाद अगस्त 2022 में गेहूं के आटे के निर्यात पर भी प्रतिबंध लागू किया गया था। उस समय वैश्विक बाजार में गेहूं की आपूर्ति को लेकर दबाव बना हुआ था। रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई थी, जिससे भारतीय गेहूं की विदेशी मांग में बढ़ोतरी हुई और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी थी।

    सरकार ने उस समय देश की बड़ी आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गेहूं तथा गेहूं के आटे की कीमतों को नियंत्रित रखने को प्राथमिकता दी थी। हालांकि, प्रतिबंधों के दौरान कुछ विशेष परिस्थितियों में गेहूं से बने चुनिंदा उत्पादों के निर्यात की अनुमति भी दी जाती रही।

    अब परिस्थितियों में बदलाव के बाद सरकार ने निर्यात नीति में ढील देने का फैसला किया है। इस वर्ष फरवरी में बेहतर स्टॉक उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 25 लाख मीट्रिक टन गेहूं और अतिरिक्त पांच लाख मीट्रिक टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी थी।

    इस फैसले की पृष्ठभूमि में देश में गेहूं और कुल खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 5.3 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 37.6563 करोड़ टन रहने का अनुमान है। वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 35.7732 करोड़ टन था।

    फसलवार आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में चावल का उत्पादन 15.4024 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष के 15.0184 करोड़ टन के मुकाबले अधिक है। इसी तरह गेहूं का उत्पादन भी बढ़ने का अनुमान है।

    वर्ष 2025-26 में गेहूं का उत्पादन 12.0657 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि 2024-25 में यह 11.7945 करोड़ टन था। उत्पादन में इस बढ़ोतरी और बेहतर स्टॉक उपलब्धता ने सरकार को गेहूं आधारित उत्पादों के निर्यात पर लगी पाबंदियों में बदलाव की गुंजाइश दी है।

    नीति में बदलाव से आटा, मैदा और सूजी जैसे उत्पादों के निर्यात कारोबार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय कृषि उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बढ़ाने का अवसर भी बनेगा। हालांकि, घरेलू बाजार में कीमतों और उपलब्धता पर सरकार की निगरानी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।