Tag: foreign funding

  • विदेशी फंडिंग पर दुनिया भर में सख्ती, जानिए भारत के FCRA और अमेरिका-यूरोप के कानूनों में क्या है अंतर

    विदेशी फंडिंग पर दुनिया भर में सख्ती, जानिए भारत के FCRA और अमेरिका-यूरोप के कानूनों में क्या है अंतर


    नई दिल्ली। देश में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम 2026 यानी एफसीआरए को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। संसद में पेश किए गए इस विधेयक पर चर्चा जारी है और माना जा रहा है कि जल्द ही इस पर विस्तार से विचार किया जाएगा। हालांकि विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला ऐसा कानून केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई विकसित देशों में भी विदेशी धन के प्रवाह पर कड़ी निगरानी रखने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्थाएं पहले से लागू हैं। इनका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना और विदेशी प्रभाव को सीमित करना है।

    भारत के प्रस्तावित एफसीआरए कानून का मकसद विदेशी स्रोतों से मिलने वाले आर्थिक सहयोग की पूरी जानकारी सरकार के पास उपलब्ध कराना है ताकि किसी भी संस्था या संगठन की वित्तीय गतिविधियों की पारदर्शी निगरानी की जा सके। सरकार का मानना है कि इससे विदेशी धन के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और राष्ट्रीय हितों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।

    अमेरिका में विदेशी फंडिंग को फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट यानी एफएआरए के तहत नियंत्रित किया जाता है। इस कानून के अनुसार जो भी व्यक्ति या संस्था विदेशी सरकार या संगठन की ओर से अमेरिका में गतिविधियां संचालित करती है उसे न्याय विभाग के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। इसके साथ वित्तीय लेनदेन गतिविधियों और विदेशी सहयोग से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। अमेरिकी व्यवस्था में भी पारदर्शिता और नियमित निगरानी को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।

    यूरोप के कई देशों ने भी विदेशी फंडिंग को लेकर सख्त नियम बनाए हैं। उदाहरण के तौर पर स्लोवाकिया में उन गैर सरकारी संगठनों के लिए वार्षिक डोनर रिपोर्ट जमा करना अनिवार्य है जिन्हें तय सीमा से अधिक विदेशी आर्थिक सहायता प्राप्त होती है। सरकारी एजेंसियां ऐसे संगठनों के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर सकती हैं और नियमों का पालन नहीं करने पर जुर्माना लगाने का अधिकार भी रखती हैं। इसका उद्देश्य विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग को पूरी तरह पारदर्शी बनाए रखना है।

    जॉर्जिया ने भी विदेशी प्रभाव पारदर्शिता कानून लागू किया है। इसके तहत जिन गैर सरकारी संगठनों या मीडिया संस्थानों की 20 प्रतिशत से अधिक फंडिंग विदेश से आती है उन्हें विदेशी वित्त पोषित संस्था के रूप में पंजीकरण कराना पड़ता है। साथ ही उनकी वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करना नियमित ऑडिट कराना और सरकारी जांच में सहयोग देना भी अनिवार्य है। नियमों के उल्लंघन पर आर्थिक दंड का प्रावधान भी रखा गया है।

    रूस में भी विदेशी फंडिंग पर बेहद सख्त नियंत्रण है। वहां विदेशी आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाले संगठनों को अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होता है और उनकी वित्तीय गतिविधियों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक रखनी पड़ती है। सरकारी एजेंसियों को बिना पूर्व सूचना के ऑडिट करने लाइसेंस निलंबित करने या रद्द करने तथा विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों पर नियामकीय नियंत्रण स्थापित करने का अधिकार प्राप्त है। समय समय पर लाइसेंस का नवीनीकरण भी आवश्यक होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का प्रस्तावित एफसीआरए कानून वैश्विक व्यवस्था से अलग नहीं बल्कि उसी दिशा में उठाया गया कदम है जहां विदेशी धन के स्रोत उपयोग और प्रभाव की पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि अलग अलग देशों में कानूनों की प्रकृति और दायरा अलग हो सकता है लेकिन अधिकांश लोकतांत्रिक देशों का साझा उद्देश्य यही है कि विदेशी वित्तीय सहायता का उपयोग राष्ट्रीय हितों और कानूनी मानकों के अनुरूप हो तथा किसी भी प्रकार के छिपे हुए विदेशी प्रभाव को रोका जा सके।

    English Tags:
    FCRA Bill, Foreign Funding, FARA, NGOs, Global Laws

  • विदेशी फंडिंग और डिजिटल कैंपेन की जांच तेज, जंतर मंतर प्रदर्शन मामले में पांच कंपनियां एजेंसियों के निशाने पर

    विदेशी फंडिंग और डिजिटल कैंपेन की जांच तेज, जंतर मंतर प्रदर्शन मामले में पांच कंपनियां एजेंसियों के निशाने पर


    नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए विवादित प्रदर्शन को लेकर जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। जांच एजेंसियां अब इस पूरे मामले में कथित विदेशी फंडिंग डिजिटल कैंपेन और सोशल मीडिया नेटवर्क की गहन पड़ताल कर रही हैं। शुरुआती जांच के आधार पर पांच से अधिक कंपनियां एजेंसियों के रडार पर बताई जा रही हैं। इनमें कुछ ऐसी कंपनियां भी शामिल हैं जो डिजिटल मार्केटिंग सोशल मीडिया कैंपेन और इंफ्लूएंसर मैनेजमेंट से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराती हैं। अधिकारियों का उद्देश्य यह पता लगाना है कि प्रदर्शन से जुड़ी गतिविधियों के लिए धन किस माध्यम से जुटाया गया और उसका इस्तेमाल किस प्रकार किया गया।

    सूत्रों के अनुसार बीते तीन दिनों के दौरान दिल्ली गुरुग्राम मुंबई और बेंगलुरु स्थित कई कार्यालयों और परिसरों में तलाशी अभियान चलाया गया। इस दौरान वित्तीय लेनदेन से जुड़े दस्तावेज डिजिटल कैंपेन का रिकॉर्ड सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर के साथ हुए समझौते और अन्य महत्वपूर्ण कागजात की जांच की गई। एजेंसियों ने कई डिजिटल उपकरण भी अपने कब्जे में लिए हैं जिनकी फोरेंसिक जांच की जा रही है ताकि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर पूरे नेटवर्क की जानकारी जुटाई जा सके।

    जांच में कुछ संदिग्ध वित्तीय लेनदेन भी सामने आने की बात कही जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि इन लेनदेन के माध्यम से सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रकार के प्रचार अभियान चलाए गए हो सकते हैं। इसी कारण कई सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर भी जांच के दायरे में आए हैं। एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या किसी प्रकार के भुगतान के बदले सोशल मीडिया पर विशेष अभियान संचालित किए गए थे। जांच पूरी होने और पर्याप्त दस्तावेजी तथा डिजिटल साक्ष्य मिलने के बाद संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज किए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।

    जांच एजेंसियों ने सोशल मीडिया गतिविधियों की भी विस्तृत समीक्षा शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में करीब दो हजार संदिग्ध सोशल मीडिया अकाउंट की पहचान किए जाने का दावा किया गया है। इनमें से कई अकाउंट विदेशों से संचालित बताए जा रहे हैं जबकि लगभग सात सौ अकाउंट भारत से सक्रिय होने की जानकारी सामने आई है। जांच का फोकस इन खातों के संचालन भुगतान और डिजिटल डेटा को सुरक्षित रखने पर भी है ताकि पूरे डिजिटल नेटवर्क की भूमिका स्पष्ट की जा सके।

    इसी बीच पश्चिम बंगाल एसटीएफ की जांच में गिरफ्तार जैश ए मोहम्मद के संदिग्ध आतंकी हामिम मंडल से जुड़े मामले ने भी जांच को नया आयाम दिया है। सूत्रों के अनुसार पूछताछ में यह जानकारी सामने आई है कि उसने कथित रूप से जंतर मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के दौरान पुलिस की वर्दी पहनकर तोड़फोड़ करने की साजिश रची थी। साथ ही कुछ पुलिस अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को भी निशाना बनाने की योजना होने की बात सामने आई है। हालांकि इन दावों की जांच संबंधित एजेंसियां कर रही हैं।

    इसके अलावा कई यूट्यूबर और ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर भी जांच एजेंसियों की निगरानी में हैं। जांच का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि प्रदर्शन और उससे जुड़े डिजिटल प्रचार अभियान में उनकी भूमिका क्या थी और क्या किसी प्रकार का आर्थिक लेनदेन या संगठित अभियान चलाया गया था। फिलहाल एजेंसियां सभी पहलुओं की जांच कर रही हैं और आधिकारिक निष्कर्ष सामने आने तक मामले की विस्तृत पड़ताल जारी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित वित्तीय नेटवर्क और डिजिटल गतिविधियों में किसकी क्या भूमिका रही।

  • UP: ईडी की जांच में सामने आया घुसपैठ नेटवर्क, विदेशी फंडिंग और बिना KYC खातों को लेकर बड़े खुलासे

    UP: ईडी की जांच में सामने आया घुसपैठ नेटवर्क, विदेशी फंडिंग और बिना KYC खातों को लेकर बड़े खुलासे


    लखनऊ। बांग्लादेशी और रोहिंग्या नागरिकों की अवैध घुसपैठ तथा फर्जी दस्तावेज तैयार कराने से जुड़े नेटवर्क की जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को कई अहम सुराग मिलने का दावा किया गया है। जांच एजेंसी के अनुसार, एटीएस की कार्रवाई के बाद भी पश्चिम बंगाल में यह नेटवर्क सक्रिय बना रहा और विदेश से मिलने वाली फंडिंग के जरिए अपनी गतिविधियां संचालित करता रहा।

    ईडी की प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आने का दावा किया गया है कि कुछ गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को विदेश से प्राप्त धनराशि को जांच एजेंसियों की नजर से बचाने के लिए दूसरे बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया।

    कई राज्यों में ईडी की छापेमारी
    प्रवर्तन निदेशालय ने पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में 17 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की। कार्रवाई के दायरे में कई एनजीओ भी शामिल रहे। ईडी के अनुसार, तलाशी के दौरान कई आपत्तिजनक दस्तावेज मिले हैं। एजेंसी का दावा है कि जांच में संकेत मिले हैं कि कुछ संस्थाएं अब भी विदेश से फंडिंग प्राप्त कर रही हैं।

    FCRA खातों और बैंकों की होगी जांच
    ईडी के मुताबिक, अब इस मामले में आगे की कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। एजेंसी उन बैंकों से भी जवाब मांगेगी, जहां संबंधित एनजीओ के एफसीआरए (Foreign Contribution Regulation Act) खाते खोले गए थे और जिनके माध्यम से विदेश से धनराशि प्राप्त की जाती थी।

    इसके अलावा, जांच एजेंसी उन छोटे बैंकों की भूमिका की भी पड़ताल करेगी, जिन पर बिना आवश्यक केवाईसी (KYC) प्रक्रिया पूरी किए खाते खोलने का संदेह है। यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं तो संबंधित संस्थानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

    यूपी में नेटवर्क की गहरी पैठ का दावा
    जांच एजेंसियों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बांग्लादेशी और रोहिंग्या नागरिकों के नेटवर्क की जड़ें गहरी रही हैं। खास तौर पर सहारनपुर का देवबंद इस मामले में जांच एजेंसियों के रडार पर रहा है। बीते पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश एटीएस ने ऐसे तीन मॉड्यूल के खिलाफ कार्रवाई की है। इनमें से एक मामले में हाल ही में राजधानी की एक अदालत ने 15 आरोपियों को सजा सुनाई है। राज्य सरकार ने भी अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया के तहत डिटेंशन सेंटर स्थापित करने की योजना बनाई थी।