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  • सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें

    सऊदी अरब के ड्रीम प्रोजेक्ट NEOM पर संकट, घटते निवेश और आर्थिक दबाव ने बढ़ाई मुश्किलें



    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का महत्वाकांक्षी ‘NEOM’ प्रोजेक्ट अब गंभीर आर्थिक चुनौतियों के बीच घिरता नजर आ रहा है। कभी भविष्य के सबसे बड़े और आधुनिक शहर के रूप में पेश किए गए इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर अब खर्चों में कटौती, निर्माण की रफ्तार धीमी करने और योजनाओं को सीमित करने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    ‘विजन-2030’ के तहत शुरू किए गए NEOM प्रोजेक्ट का मकसद तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर सऊदी अरब को तकनीक, पर्यटन और वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनाना था। इस योजना में रेगिस्तान के बीच करीब 170 किलोमीटर लंबी भविष्यवादी “लाइन सिटी” बनाने की परिकल्पना की गई थी, जिसमें शीशे की दीवारों वाले आधुनिक ढांचे, हाईटेक ट्रांसपोर्ट और लग्जरी सुविधाएं शामिल थीं।

    हालांकि अब वैश्विक आर्थिक दबाव, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश में कमी के कारण प्रोजेक्ट की रफ्तार प्रभावित हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई हिस्सों को फिलहाल सीमित किया जा रहा है और शुरुआती चरण में सिर्फ छोटे हिस्से के निर्माण पर फोकस किया जाएगा।

    बताया जा रहा है कि सऊदी सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंसी कंपनियों के नए कॉन्ट्रैक्ट रोक दिए हैं और कुछ भुगतान भी होल्ड पर डाल दिए गए हैं। वहीं, कुछ बड़े खेल और मनोरंजन निवेशों की गति भी धीमी पड़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा। इसके साथ ही सऊदी अरब को अपने बढ़ते बजट घाटे और भारी खर्चों को संतुलित करने के लिए अब ज्यादा व्यावहारिक रणनीति अपनानी पड़ रही है।

    फिलहाल NEOM पूरी तरह बंद होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना साफ है कि सऊदी अरब अब अपने बड़े सपनों को आर्थिक वास्तविकताओं के हिसाब से दोबारा आकार देने की कोशिश कर रहा है।

  • वैश्विक निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ा, पीएम मोदी की यात्रा से 40 अरब डॉलर की संभावनाएं

    वैश्विक निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ा, पीएम मोदी की यात्रा से 40 अरब डॉलर की संभावनाएं


    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर एक बड़ी मजबूती उस समय मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया पांच दिवसीय विदेश यात्रा के दौरान देश में लगभग 40 अरब डॉलर के निवेश की संभावनाएं सामने आईं। यह निवेश विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार योजनाओं, नई साझेदारियों और वैश्विक कंपनियों की बढ़ती रुचि का परिणाम बताया जा रहा है। इस यात्रा ने भारत की आर्थिक स्थिति और निवेश माहौल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक आकर्षक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    इस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने सेमीकंडक्टर, लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में काम कर रही 50 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात की। इन कंपनियों का संयुक्त बाजार मूल्य लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर से 3 ट्रिलियन डॉलर के बीच बताया गया, जो इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर भारत को एक प्रमुख निवेश गंतव्य के रूप में देखा जा रहा है।

    अधिकारियों के अनुसार, इनमें से कई कंपनियां पहले से ही भारत में सक्रिय हैं और यहां उनका कुल निवेश और कारोबार लगभग 180 अरब डॉलर के आसपास है। अब ये कंपनियां भारत की तेज आर्थिक वृद्धि, स्थिर नीतिगत वातावरण और बढ़ती घरेलू मांग को देखते हुए अपने संचालन को और विस्तार देने की योजना बना रही हैं। इससे रोजगार, तकनीकी विकास और औद्योगिक उत्पादन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    इस यात्रा के दौरान कई महत्वपूर्ण निवेश घोषणाएं भी सामने आईं, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात की ओर से भारत में लगभग 5 अरब डॉलर के नए निवेश का ऐलान प्रमुख रहा। इसके अलावा अन्य देशों और कंपनियों के साथ हुई चर्चाओं में भी निवेश विस्तार और सहयोग की संभावनाएं मजबूत हुई हैं, जिन्हें मिलाकर कुल अनुमानित निवेश लगभग 40 अरब डॉलर तक पहुंचता है।

    प्रधानमंत्री की यह यात्रा केवल निवेश तक सीमित नहीं रही, बल्कि इससे भारत के कई देशों के साथ रणनीतिक संबंध भी और मजबूत हुए हैं। नीदरलैंड के साथ व्यापार, रक्षा, सेमीकंडक्टर, एआई और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी रोडमैप पर सहमति बनी। वहीं स्वीडन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने पर भी सहमति बनी, जो भविष्य में तकनीकी और औद्योगिक सहयोग को नई दिशा देगी।

    नॉर्वे में आयोजित एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री की भागीदारी के दौरान नॉर्डिक देशों के साथ भारत के संबंधों को और गहरा करने पर चर्चा हुई। इसी क्रम में इटली के साथ भी विशेष रणनीतिक साझेदारी स्थापित की गई, जिससे रक्षा, ऊर्जा और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुलने की संभावना है।

    इन सभी घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि भारत वैश्विक निवेश और रणनीतिक साझेदारियों के केंद्र के रूप में तेजी से उभर रहा है। यह यात्रा न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही, बल्कि इससे भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति भी और मजबूत हुई है, जिसका असर आने वाले वर्षों में देश की विकास गति पर साफ दिखाई दे सकता है।

  • डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक दबाव में, 96.32 के निचले स्तर ने बढ़ाई आर्थिक चिंता

    डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक दबाव में, 96.32 के निचले स्तर ने बढ़ाई आर्थिक चिंता

    नई दिल्ली । भारतीय मुद्रा पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है और हाल ही में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे कमजोर स्तर 96.32 पर पहुंच गया है। यह गिरावट केवल एक दिन की नहीं है, बल्कि पिछले कई कारोबारी सत्रों से जारी कमजोरी का परिणाम है, जिसने देश की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक बाजार में मुद्रा की स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और घरेलू आर्थिक प्रवाह के बीच बढ़ते असंतुलन ने रुपये को लगातार दबाव में रखा है, जिससे यह ऐतिहासिक रूप से कमजोर स्तर पर पहुंच गया है।

    इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ता तनाव माना जा रहा है, खासकर पश्चिम एशिया में उत्पन्न भू-राजनीतिक अस्थिरता। इस तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल का आयात करता है, और जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, वैसे-वैसे देश का आयात बिल भी बढ़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनता है और रुपये की कीमत कमजोर होती जाती है।

    इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने भी स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अमेरिका में आर्थिक आंकड़ों और ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण निवेशकों का रुझान सुरक्षित संपत्तियों की ओर बढ़ा है, जिससे डॉलर की मांग में इजाफा हुआ है। जब डॉलर मजबूत होता है, तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं दबाव में आ जाती हैं और भारतीय रुपया भी इसी प्रवृत्ति का शिकार हुआ है।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली भी रुपये की कमजोरी का एक महत्वपूर्ण कारण बनकर उभरी है। निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकालकर डॉलर में बदलने की प्रक्रिया ने विदेशी मुद्रा बाजार में अतिरिक्त दबाव पैदा किया है। इस पूंजी बहिर्वाह के कारण रुपये की मांग घटती है और उसकी कीमत और नीचे चली जाती है।

    इसके अलावा व्यापार घाटे में बढ़ोतरी ने भी स्थिति को और गंभीर बनाया है। आयात बढ़ने और निर्यात अपेक्षाकृत स्थिर रहने से विदेशी मुद्रा का संतुलन बिगड़ता है, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। हालांकि केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा में अत्यधिक गिरावट को रोकने के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप किया जाता है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों की तीव्रता के कारण इसका प्रभाव सीमित रहा है।

    रुपये की इस कमजोरी का सीधा असर आम जनता पर महंगाई के रूप में दिखाई देता है। आयातित वस्तुएं जैसे पेट्रोल-डीजल, गैस और उर्वरक महंगे हो जाते हैं, जिससे परिवहन लागत बढ़ती है और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इससे आम आदमी की क्रय शक्ति प्रभावित होती है और घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

    हालांकि इस गिरावट के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। निर्यात आधारित उद्योगों जैसे सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मा और इंजीनियरिंग सेक्टर को इससे लाभ मिल सकता है क्योंकि उनकी विदेशी आय रुपये में बदलने पर बढ़ जाती है। इसके अलावा विदेशी पर्यटकों के लिए भारत अपेक्षाकृत सस्ता गंतव्य बन जाता है, जिससे पर्यटन क्षेत्र को भी समर्थन मिलता है।

    कुल मिलाकर रुपये की मौजूदा स्थिति वैश्विक अनिश्चितताओं और आर्थिक दबावों का संयुक्त परिणाम है, जो आने वाले समय में बाजार की दिशा और आर्थिक नीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

  • डॉलर के मुकाबले रुपये में रिकॉर्ड कमजोरी, 96 के पार पहुंचा स्तर, आम लोगों की जेब पर असर तय

    डॉलर के मुकाबले रुपये में रिकॉर्ड कमजोरी, 96 के पार पहुंचा स्तर, आम लोगों की जेब पर असर तय

    नई दिल्ली ।भारतीय मुद्रा बाजार में गुरुवार को बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जब रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कारोबार के दौरान रुपया 96.14 के स्तर तक फिसल गया, जिससे आर्थिक मोर्चे पर चिंता बढ़ गई है। यह गिरावट वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार पूंजी निकासी के कारण देखी जा रही है।

    मुद्रा विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ने से डॉलर की ओर निवेशकों का रुझान तेज हुआ है। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ती है, निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में डॉलर को प्राथमिकता देते हैं। इसी वजह से डॉलर की मांग बढ़ती है और अन्य मुद्राओं पर दबाव बनता है, जिससे वे कमजोर हो जाती हैं।

    भारतीय बाजार में भी यही स्थिति देखने को मिली है। विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से लगातार पूंजी निकासी की जा रही है, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। जब निवेशक अपने निवेश को डॉलर में बदलते हैं, तो बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये की कीमत गिरने लगती है।

    इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी रुपये की कमजोरी का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, ऐसे में तेल महंगा होने पर अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है और घरेलू मुद्रा कमजोर हो जाती है।

    रुपये में आई इस गिरावट का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ सकता है। आयातित वस्तुएं जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान, मोबाइल फोन, लैपटॉप और कच्चा तेल महंगे हो सकते हैं। इसके साथ ही परिवहन लागत बढ़ने की संभावना भी रहती है, जिससे रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। इससे महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी शिक्षा और यात्रा पर जाने वाले लोगों के खर्च में भी बढ़ोतरी होगी, क्योंकि डॉलर में भुगतान अधिक महंगा हो जाएगा। इसके अलावा, आयात आधारित उद्योगों की लागत बढ़ने से उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है, जिसका अंतिम प्रभाव उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

    शेयर बाजार पर रुपये की कमजोरी का मिला-जुला असर देखने को मिलता है। जो कंपनियां निर्यात पर आधारित हैं, जैसे सूचना प्रौद्योगिकी और दवा क्षेत्र, उन्हें इसका फायदा मिल सकता है क्योंकि उन्हें डॉलर में अधिक आय प्राप्त होती है। वहीं, आयात पर निर्भर कंपनियों, खासकर तेल और परिवहन से जुड़ी कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में केंद्रीय बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए रुपये पर दबाव पूरी तरह समाप्त होने की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है।

    कुल मिलाकर, रुपये में आई यह गिरावट न केवल वित्तीय बाजारों के लिए बल्कि आम लोगों के दैनिक जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत लेकर आई है, जिससे आने वाले समय में महंगाई और खर्च दोनों पर असर देखने को मिल सकता है।

  • चीन-अमेरिका आर्थिक रिश्तों में नई गर्माहट: शी जिनपिंग बोले, अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन में बढ़ेंगे बड़े मौके

    चीन-अमेरिका आर्थिक रिश्तों में नई गर्माहट: शी जिनपिंग बोले, अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन में बढ़ेंगे बड़े मौके


    नई दिल्ली ।  चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिकी कंपनियों को लेकर एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक संदेश दिया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि चीन में विदेशी कंपनियों, विशेषकर अमेरिकी कंपनियों के लिए भविष्य में और भी बड़े व्यापारिक अवसर उपलब्ध होंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों ही नए रूप ले रहे हैं और दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच रिश्तों पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

    बीजिंग में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान शी जिनपिंग ने अमेरिकी प्रतिनिधियों और शीर्ष कॉर्पोरेट अधिकारियों से मुलाकात की। इस बैठक में टेक्नोलॉजी, एयरोस्पेस, बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। राष्ट्रपति ने स्पष्ट रूप से कहा कि चीन अपने बाजार को और अधिक खोलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और यह प्रक्रिया आने वाले समय में और तेज होगी। उन्होंने यह भी कहा कि चीन और अमेरिका के बीच सहयोग दोनों देशों के लिए लाभकारी हो सकता है और इससे वैश्विक आर्थिक स्थिरता को भी मजबूती मिल सकती है।

    इस बैठक में कई प्रमुख अमेरिकी सीईओ और वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे, जिनमें वैश्विक टेक और वित्तीय क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। चर्चा के दौरान व्यापारिक सहयोग, निवेश के अवसर और तकनीकी साझेदारी जैसे मुद्दों पर भी विचार किया गया। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक बाजार में अनिश्चितता और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, और ऐसे में दोनों देशों के बीच संवाद को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि चीन लगातार अपने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा रहा है और विदेशी निवेश के लिए वातावरण को और अधिक अनुकूल बनाने की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने यह संकेत दिया कि आने वाले वर्षों में चीन का बाजार न केवल बड़ा होगा, बल्कि अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भी बनेगा, जिससे विदेशी कंपनियों को अधिक अवसर मिलेंगे।

    इस बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधियों की उपस्थिति को भी काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसमें दुनिया की कई प्रमुख कंपनियों के शीर्ष अधिकारी शामिल थे। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को लेकर संवाद और सहयोग की संभावनाएं अभी भी मजबूत हैं, भले ही राजनीतिक स्तर पर कई बार तनाव देखने को मिला हो।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयानों और बैठकों से वैश्विक निवेश माहौल पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि चीन अपने बाजार को वास्तव में अधिक खुला और पारदर्शी बनाता है, तो इससे अमेरिकी कंपनियों के साथ-साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भी बड़ा लाभ मिल सकता है। यह कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और व्यापारिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।

    कुल मिलाकर, शी जिनपिंग का यह बयान चीन की आर्थिक नीति में खुलेपन और सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह घोषणाएं कितनी हद तक वास्तविक नीतिगत बदलावों में बदलती हैं और वैश्विक व्यापारिक संबंधों को किस तरह प्रभावित करती हैं।

  • UAE का सख्त रुख: कर्ज वसूली के बाद अब पाकिस्तान से निवेश समेटने के संकेत

    UAE का सख्त रुख: कर्ज वसूली के बाद अब पाकिस्तान से निवेश समेटने के संकेत



    नई दिल्ली। आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहे Pakistan के लिए एक और चिंताजनक खबर सामने आई है। United Arab Emirates की प्रमुख दूरसंचार कंपनी e& (पूर्व में एतिसलात) पाकिस्तान में अपने निवेश की समीक्षा कर रही है और टेलीकॉम सेक्टर से बाहर निकलने पर विचार कर रही है।

    जानकारी के अनुसार, e& के पास PTCL में 26 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ प्रबंधन नियंत्रण भी है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी अब अपने शेयर बेचकर इस बाजार से बाहर निकलने की संभावनाएं तलाश रही है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में यूएई ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज वापस लिया है। यह कर्ज लंबे समय से रोलओवर के जरिए टाला जाता रहा था, जिससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को राहत मिलती थी। हालांकि, अचानक भुगतान की मांग ने देश की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा दिया है।

    वहीं, एतिसलात और पाकिस्तान सरकार के बीच 2005 से चला आ रहा 800 मिलियन डॉलर का विवाद भी अब तक अनसुलझा है। उस समय कंपनी ने PTCL की हिस्सेदारी 2.6 अरब डॉलर में खरीदी थी, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े विवाद के कारण रोका गया था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति से प्रेरित नहीं है, बल्कि यूएई की व्यापक वैश्विक निवेश रणनीति का हिस्सा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और पूंजी के बेहतर उपयोग की नीति के तहत खाड़ी देश अपने निवेश पोर्टफोलियो का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं।

    पाकिस्तान सरकार का कहना है कि यदि e& अपना निवेश वापस लेती है, तो वह Saudi Arabia और Qatar जैसे देशों से नए निवेश आकर्षित करने का प्रयास करेगी।

    यूएई के लगातार सख्त होते आर्थिक फैसले पाकिस्तान के लिए चेतावनी माने जा रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पाकिस्तान नई निवेश संभावनाएं तलाश कर पाता है या आर्थिक दबाव और बढ़ता है।

  • भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो

    भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो


    नई दिल्ली ।अमेरिका में अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो अगस्टिन कॉसिनो ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर बड़ा बयान दिया है। न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसकी विशाल आबादी है। उनके अनुसार भारत न केवल दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है बल्कि यहां के लोगों में टैलेंट और क्रिएटिव सोच की भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

    राजदूत कॉसिनो ने कहा कि जब भारत सरकार ने पाबंदियां, सीमाएं और अनावश्यक रेगुलेशन हटाए तो भारतीय लोगों की क्षमताएं खुलकर सामने आईं। यही वजह है कि पिछले दस से पंद्रह वर्षों में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसके लोग हैं और यही उसे आगे बढ़ा रही है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण पर बात करते हुए अर्जेंटीना के राजदूत ने कहा कि पीएम मोदी को बड़ी सफलता मिली है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में छह से आठ प्रतिशत की दर से बढ़ी है। उन्होंने इसे आर्थिक नीति और विनियमन में ढील का सफल उदाहरण बताया।

    कॉसिनो ने यह भी साझा किया कि जब प्रधानमंत्री मोदी अर्जेंटीना गए थे तब उन्हें राष्ट्रपति जेवियर माइली के साथ हुई बैठक में शामिल होने का अवसर मिला था। इस दौरान विनियमन में ढील अनावश्यक नियमों को हटाने और लोगों को कम से कम सरकारी हस्तक्षेप के साथ आगे बढ़ने का मौका देने जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी।भारत में विदेशी निवेश को लेकर पूछे गए सवाल पर राजदूत ने कहा कि वह भारत को यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि उसे क्या करना चाहिए क्योंकि यह एक घरेलू नीति का विषय है। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि जब देश अपनी अर्थव्यवस्था खोलते हैं और ज्यादा उत्पादों को आने की अनुमति देते हैं तो इसका फायदा उपभोक्ताओं और घरेलू खपत दोनों को मिलता है।

    उन्होंने आगे कहा कि भारत इस दिशा में अच्छा काम कर रहा है और अर्जेंटीना भारत की खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा में और अधिक योगदान देने के लिए तैयार है। उनके अनुसार भारत और अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के लिए पूरक हैं और यह रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सकती है।

  • ग्रीनलैंड तनाव में नरमी से बाजार को राहत, रुपये में स्थिरता की उम्मीद: डीबीएस बैंक रिपोर्ट

    ग्रीनलैंड तनाव में नरमी से बाजार को राहत, रुपये में स्थिरता की उम्मीद: डीबीएस बैंक रिपोर्ट


    नई दिल्ली।
    ग्रीनलैंड से जुड़े वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव में कमी आने के संकेतों ने वित्तीय बाजारों को राहत दी है। गुरुवार को जारी डीबीएस बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटनाक्रम से निवेशकों की धारणा में सुधार हुआ है और इसका सीधा असर मुद्रा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में रुपये में उतार-चढ़ाव बना रहेगा, लेकिन उसकी गिरावट की रफ्तार अब पहले जैसी तेज नहीं रहने की संभावना है।इसका शुरुआती असर गुरुवार के कारोबार में ही दिखा, जब रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर से संभलता नजर आया। शुरुआती सत्र में रुपया करीब 15 पैसे मजबूत होकर 91.50 के स्तर पर पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार निवेशकों के बढ़ते भरोसे का संकेत है, हालांकि वैश्विक कारकों पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।

    डीबीएस बैंक की कार्यकारी निदेशक और वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव ने रिपोर्ट में बताया कि पिछले एक साल से रुपये पर दबाव बना हुआ था। इसके पीछे वैश्विक और घरेलू दोनों तरह के कारण जिम्मेदार रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक वीआईएक्स इंडेक्स में आई तेज बढ़ोतरी यह दिखाती है कि बाजार के लगभग सभी संकेतक कमजोरी के दौर से गुजर रहे थे। प्रतिकूल भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उछाल ने इस दबाव को और बढ़ाया। ऐसे माहौल में ग्रीनलैंड से जुड़े तनाव में नरमी के संकेत बाजार के लिए बड़ी राहत के रूप में सामने आए हैं।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि यूरोपीय संघ के साथ एक बड़े व्यापार समझौते को लेकर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं और इसकी औपचारिक घोषणा अगले सप्ताह हो सकती है। इसके साथ ही विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता को लेकर भी उत्साहजनक माहौल बना है। इन घटनाओं से बाजार में दोबारा उम्मीद जगी है और निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है।घरेलू मोर्चे पर देखा जाए तो रुपये पर दबाव ऐसे समय में बना, जब देश की आर्थिक स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। चालू वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में औसत आर्थिक वृद्धि दर करीब 8 प्रतिशत रही है। आने वाले वित्त वर्ष में भी इसके 7.5 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूती से आगे बढ़ रही है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर रुपया निर्यातकों को कुछ हद तक राहत देता है खासकर तब जब वैश्विक स्तर पर मांग में उतार-चढ़ाव हो। हालांकि इससे आयात महंगा होने और अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में असंतुलन की स्थिति भी पैदा हुई है।डीबीएस बैंक के अनुसार, देश का चालू खाता घाटा फिलहाल नियंत्रण में है और यह जीडीपी के 1.0 से 1.2 प्रतिशत के बीच रह सकता है। असली चिंता विदेशी पूंजी प्रवाह को लेकर है। वर्ष 2025 में शुद्ध पूंजी निकासी के बाद चालू वर्ष में इक्विटी बाजार से लगभग 3 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है। बॉन्ड बाजार में भी विदेशी निवेशकों की रुचि कमजोर बनी हुई है।

    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्थिति पिछले साल के मुकाबले बेहतर जरूर हुई है, लेकिन विदेशी कंपनियों द्वारा मुनाफा वापस ले जाने के कारण शुद्ध निवेश में अभी भी अंतर बना हुआ है। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि आने वाले केंद्रीय बजट में सरकारी खर्च का असर साफ दिखाई देगा, क्योंकि वित्त वर्ष 2027 तक केंद्र और राज्यों का कुल उधार बढ़ने की संभावना है।कुल मिलाकर ग्रीनलैंड से जुड़े तनाव में कमी ने बाजार को तात्कालिक राहत दी है और रुपये में स्थिरता की उम्मीद जगी है, लेकिन लंबी अवधि में वैश्विक घटनाक्रम और पूंजी प्रवाह की दिशा पर ही बाजार की चाल निर्भर करेगी।

  • डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, जानिए गिरावट की बड़ी वजहें और बचाव के उपाय

    डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, जानिए गिरावट की बड़ी वजहें और बचाव के उपाय


    नई दिल्ली
    /भारतीय रुपया इन दिनों गंभीर दबाव में है और डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 91 के पार चला गया जिसने सरकार रिजर्व बैंक निवेशकों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह गिरावट किसी एक वजह से नहीं बल्कि घरेलू और वैश्विक कारकों के संयुक्त असर से हुई है। सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली माना जा रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशक FII भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से तेजी से पैसा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से करीब 18 अरब डॉलर से अधिक निकाल चुके हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपये की मांग कमजोर पड़ी है जिसका सीधा असर मुद्रा विनिमय दर पर दिख रहा है।

    दूसरा अहम कारण डॉलर की वैश्विक मजबूती है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों और मजबूत आर्थिक संकेतों के चलते डॉलर दुनियाभर की मुद्राओं के मुकाबले मजबूत बना हुआ है। जब अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न बढ़ता है तो वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका की ओर रुख करते हैं। इसका असर भारत जैसे देशों की मुद्रा पर पड़ता है।भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर कुछ उत्पादों में ऊंची टैरिफ दरें लगाए जाने से भारतीय सामानों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा घटी है। इससे निर्यात से होने वाली डॉलर की आमद सीमित हुई है और चालू खाते के घाटे की चिंता बढ़ी है।

    रुपये की गिरावट का असर आम आदमी की जिंदगी पर भी पड़ता है। कमजोर रुपये के कारण कच्चा तेल गैस इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। इससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने और महंगाई में दोबारा तेजी आने का खतरा रहता है जिसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ता है।तेल आयात भी रुपये की कमजोरी की एक बड़ी वजह है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इससे व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है जो मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की गिरावट को थामने में भारतीय रिजर्व बैंक RBIकी भूमिका बेहद अहम है। आरबीआई जरूरत पड़ने पर बाजार में डॉलर बेचकर और तरलता का प्रबंधन कर रुपये की तेज गिरावट को रोक सकता है। हालांकि केंद्रीय बैंक आमतौर पर बहुत ज्यादा हस्तक्षेप से बचता है ताकि बाजार में अस्थिरता न बढ़े।लंबी अवधि में रुपये को स्थिर रखने के लिए सिर्फ मौद्रिक हस्तक्षेप काफी नहीं होगा। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश FDIऔर दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह को बढ़ावा देना होगा। मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से डॉलर की स्थायी आमद होगी।

    निर्यात बढ़ाना भी रुपये को सहारा देने का एक अहम तरीका है। आईटी फार्मा इंजीनियरिंग और सेवा क्षेत्र के निर्यात में मजबूती आने से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हो सकता है। इसके साथ ही अमेरिका और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ संतुलित और स्पष्ट व्यापार समझौते विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ा सकते हैं।महंगाई पर नियंत्रण भी रुपये की स्थिरता के लिए जरूरी है। अगर महंगाई काबू में रहती है तो आरबीआई को नीतिगत समर्थन बनाए रखने में आसानी होती है और ब्याज दरों पर दबाव कम रहता है। मध्यम से लंबी अवधि में नीतिगत सुधार निवेश अनुकूल माहौल और निर्यात को बढ़ावा देने वाली रणनीतियां रुपये की गिरावट पर ब्रेक लगा सकती हैं।