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  • पश्चिम एशिया संकट पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने पीएम मोदी की चुप्पी पर उठाए सवाल

    पश्चिम एशिया संकट पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने पीएम मोदी की चुप्पी पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव और लेबनान में इजराइली सैन्य कार्रवाई को लेकर भारत की विदेश नीति पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि मौजूदा वैश्विक घटनाक्रमों पर भारत का स्पष्ट रुख सामने आना चाहिए, क्योंकि ये सीधे तौर पर देश की आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्रभावित करते हैं।

    जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत पश्चिम एशिया में संभावित शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार, यदि दोनों देशों के बीच किसी प्रकार का समझौता होता है तो होर्मुज स्ट्रेट के संचालन में स्थिरता आएगी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे ऊर्जा-आधारित आयातक देश के लिए यह स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि इस कूटनीतिक प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा लेबनान में इजराइल की सैन्य कार्रवाई है। उन्होंने दावा किया कि इस सैन्य गतिविधि के कारण क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो रही है और शांति वार्ता पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। जयराम रमेश ने यह भी उल्लेख किया कि कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस कार्रवाई की आलोचना की गई है और वैश्विक स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है।

    अपने बयान में जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र और वैश्विक शक्ति को इन घटनाओं पर स्पष्ट और संतुलित प्रतिक्रिया देनी चाहिए, खासकर तब जब ये घटनाएं सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर रही हों। उन्होंने कटाक्ष करते हुए यह भी कहा कि विदेश नीति में स्पष्टता की कमी सवाल खड़े करती है।

    कांग्रेस का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला की अनिश्चितता भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकती है। ऐसे में सरकार की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका और स्पष्ट रुख आवश्यक माना जा रहा है।

    वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान आने वाले समय में विदेश नीति को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर सकते हैं। विपक्ष लगातार सरकार से अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक पारदर्शिता और सक्रियता की मांग कर रहा है, जबकि सरकार का रुख अक्सर संतुलित और रणनीतिक कूटनीति पर आधारित माना जाता है।

    कुल मिलाकर यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका जैसे महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है, जिससे विदेश नीति को लेकर बहस और गहराने की उम्मीद है।

  • नई दिल्ली में बड़ा कूटनीतिक कदम, भारत और साइप्रस बने रणनीतिक साझेदार, पीएम मोदी ने बताया निवेश बढ़ाने का रोडमैप

    नई दिल्ली में बड़ा कूटनीतिक कदम, भारत और साइप्रस बने रणनीतिक साझेदार, पीएम मोदी ने बताया निवेश बढ़ाने का रोडमैप


    नई दिल्ली। भारत की विदेश नीति में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है, जहां भारत और साइप्रस ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के रूप में औपचारिक रूप दे दिया है। यह निर्णय उच्चस्तरीय बैठक के दौरान लिया गया, जिसमें दोनों देशों ने आपसी सहयोग को नई दिशा देने और भविष्य में आर्थिक तथा कूटनीतिक संबंधों को और अधिक मजबूत करने पर सहमति जताई। इस साझेदारी को दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक सहयोग का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    इस अवसर पर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं को और मजबूत बनाने पर जोर दिया गया। बातचीत के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि भारत और साइप्रस के रिश्ते केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह साझा मूल्यों, लोकतांत्रिक परंपराओं और पारस्परिक सम्मान पर आधारित हैं। यही वजह है कि यह संबंध समय के साथ और अधिक गहरे और स्थिर होते गए हैं।

    प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर बताया कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेष रूप से साइप्रस से भारत में निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो पिछले दशक में लगभग दोगुना हो चुका है। इसी सकारात्मक रुझान को देखते हुए दोनों देशों ने अगले पांच वर्षों में इस निवेश को फिर से दोगुना करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यापार, वित्तीय सहयोग और निवेश के नए क्षेत्रों को विकसित करने पर सहमति बनी है।

    बैठक में यह भी माना गया कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच मजबूत साझेदारी और स्थिर निवेश माहौल बेहद जरूरी है। इसी कारण दोनों देशों ने मिलकर ऐसे नए अवसरों की पहचान करने पर जोर दिया है, जो भविष्य में आर्थिक विकास को नई गति दे सकें। इसमें तकनीकी सहयोग और व्यापार विस्तार को भी महत्वपूर्ण भूमिका दी जाएगी।

    दोनों देशों ने वैश्विक मुद्दों पर भी विचार साझा किए और अंतरराष्ट्रीय शांति तथा स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए संवाद और सहयोग सबसे प्रभावी माध्यम हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी सहमति बनी, ताकि वे बदलते वैश्विक परिदृश्य में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें।

    इस रणनीतिक साझेदारी के साथ भारत और साइप्रस ने अपने संबंधों को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां सहयोग केवल वर्तमान आवश्यकताओं तक सीमित न रहकर भविष्य की संभावनाओं को भी ध्यान में रखकर आगे बढ़ेगा। यह साझेदारी दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और साझा विकास की मजबूत दिशा को दर्शाती है।

  • बांग्लादेश पासपोर्ट विवाद: “Except Israel” शर्त की वापसी, राजनीतिक प्रतीकों को हटाने की तैयारी

    बांग्लादेश पासपोर्ट विवाद: “Except Israel” शर्त की वापसी, राजनीतिक प्रतीकों को हटाने की तैयारी




    नई दिल्ली। बांग्लादेश एक बार फिर अपने पासपोर्ट नीति में बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। ढाका से सामने आई रिपोर्टों के अनुसार देश के पासपोर्ट में “Except Israel” यानी “इजरायल को छोड़कर” वाला वाक्यांश फिर से शामिल किया जाएगा। यह वही प्रावधान है जिसे 2020 में शेख हसीना सरकार के दौरान हटाया गया था, हालांकि उस समय भी इजरायल में पासपोर्ट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लागू था।

    रिपोर्टों के मुताबिक अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व वाली सरकार इस वाक्यांश को दोबारा शामिल करने की दिशा में काम कर रही है। कहा जा रहा है कि यह कदम देश की विदेश नीति और फिलिस्तीन मुद्दे पर लंबे समय से चले आ रहे रुख को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है।

    इसी के साथ पासपोर्ट डिज़ाइन और वॉटरमार्क में भी बड़े बदलाव की तैयारी है। प्रस्ताव के अनुसार, बांग्लादेश के ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रतीकों से जुड़े कई चिन्ह हटाए जा सकते हैं, जिनमें बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान से जुड़े स्थल और स्मारक भी शामिल हैं। इसमें धनमंडी 32 स्थित उनका आवास, तुंगीपारा स्थित मकबरा और अन्य राष्ट्रीय पहचान से जुड़े प्रतीक शामिल बताए जा रहे हैं।

    सूत्रों के अनुसार यह बदलाव पहले चरण में नए जारी होने वाले पासपोर्ट पर लागू होगा, जबकि पुराने पासपोर्ट को तुरंत बदलने की कोई योजना नहीं है। जैसे-जैसे पुराने पासपोर्ट की अवधि समाप्त होगी, नए नियमों के अनुसार ही दस्तावेज जारी किए जाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और वैचारिक दिशा में भी बड़ा संकेत है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि नई सरकार अपनी विदेश नीति और घरेलू राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठा रही है, जिसमें फिलिस्तीन के समर्थन और इजरायल विरोधी रुख को दोबारा मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है।

  • भारत से दोस्ती, पाकिस्तान से नजदीकी! जानिए बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान की नई ‘बैलेंस’ रणनीति

    भारत से दोस्ती, पाकिस्तान से नजदीकी! जानिए बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान की नई ‘बैलेंस’ रणनीति



    नई दिल्ली। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की विदेश नीति इन दिनों चर्चा में है। बांग्लादेश की नई सरकार एक तरफ India के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ भी नजदीकियां बनाए रखना चाहती है। अमेरिकी भू-राजनीतिक विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने इसे “बैलेंसिंग स्ट्रेटेजी” बताया है।

    विश्लेषकों के मुताबिक बांग्लादेश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भारत के साथ बेहतर संबंध बेहद जरूरी हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत के साथ मजबूत व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ते ढाका के लिए आर्थिक फायदे ला सकते हैं। साथ ही सीमा सुरक्षा, बिजली साझेदारी और साझा नदियों जैसे मुद्दों पर सहयोग भी बांग्लादेश के हित में माना जा रहा है।

    पाकिस्तान से दूरी भी नहीं चाहता ढाका
    रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश पाकिस्तान के साथ भी रिश्तों में गर्मजोशी बनाए रखना चाहता है। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच वीजा नियमों में ढील और यात्रा संपर्क बढ़ाने जैसे कदम उठाए गए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय सहयोग के लिए दक्षिण एशियाई संघ यानी सार्क को मजबूत करने, “ग्लोबल साउथ” के साथ जुड़ाव बढ़ाने और तुर्की जैसी मध्यम ताकतों के साथ तालमेल जैसे मुद्दों पर ढाका और इस्लामाबाद की सोच काफी हद तक मिलती है।

    भारत विरोधी भावना का भी असर
    विश्लेषक माइकल कुलेगमैन का कहना है कि बांग्लादेश की राजनीति में भारत विरोधी भावना रखने वाला एक बड़ा वर्ग मौजूद है। ऐसे में पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाए रखना घरेलू राजनीति में भी तारिक रहमान सरकार को फायदा पहुंचा सकता है।हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर ढाका वास्तव में भारत के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है तो पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना जोखिम भरा कदम हो सकता है।

    ‘दोनों से फायदा’ चाहती है बांग्लादेश सरकार
    रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश ऐसी विदेश नीति अपनाना चाहता है जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ संबंध बने रहें और किसी भी पक्ष को नाराज न किया जाए। ढाका का फोकस आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय संतुलन और रणनीतिक फायदे हासिल करने पर है।विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में बांग्लादेश की यही संतुलन नीति दक्षिण एशिया की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकती है।

  • सरमा के बयान से भड़का कूटनीतिक विवाद: बांग्लादेश ने भारत के उच्चायुक्त को तलब कर जताया कड़ा विरोध

    सरमा के बयान से भड़का कूटनीतिक विवाद: बांग्लादेश ने भारत के उच्चायुक्त को तलब कर जताया कड़ा विरोध


    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक रिश्तों में एक नया तनाव उभरकर सामने आया है, जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयान पर ढाका ने कड़ी आपत्ति जताई। गुरुवार को बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारतीय कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बाधे को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और इस तरह की टिप्पणियों को ‘काउंटरप्रोडक्टिव’ बताया।

    विवाद की जड़ 26 अप्रैल को दिया गया वह बयान है, जिसमें हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया था कि असम में पकड़े गए 20 विदेशी नागरिकों को ‘पुश बैक’ कर बांग्लादेश भेज दिया गया। इस बयान के सामने आते ही बांग्लादेश की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। ढाका ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक बयानबाजी से दोनों देशों के बीच भरोसे पर असर पड़ सकता है और द्विपक्षीय संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा होता है।

    बांग्लादेश के अधिकारियों ने भारतीय प्रतिनिधि के समक्ष यह भी कहा कि सीमा, प्रवासन और नागरिकता जैसे विषय बेहद संवेदनशील होते हैं, जिन पर दोनों देशों के बीच पहले से स्थापित कूटनीतिक तंत्र के जरिए ही बातचीत होनी चाहिए। सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान न केवल गलतफहमी बढ़ाते हैं, बल्कि सहयोग की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है, जब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से मजबूत होने के बावजूद कुछ मुद्दों को लेकर संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर अब तक दोनों देशों ने सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में करीबी सहयोग बनाए रखा है। हालांकि अवैध प्रवासन, सीमा प्रबंधन और राजनीतिक बयानबाजी जैसे विषय समय-समय पर तनाव की वजह बनते रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया विवाद भले ही बयानबाजी तक सीमित हो, लेकिन इसका असर कूटनीतिक संवाद पर पड़ सकता है। ऐसे में दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे संवाद और संयम के जरिए इस तरह के मुद्दों को सुलझाएं, ताकि लंबे समय से बने भरोसे और साझेदारी को नुकसान न पहुंचे।

    फिलहाल, यह मामला इस बात का संकेत है कि पड़ोसी देशों के बीच रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल नीतियां ही नहीं, बल्कि नेताओं की भाषा और सार्वजनिक बयान भी उतने ही अहम होते हैं

  • भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर

    भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर


    नई दिल्ली ।
    भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 19 और 20 अप्रैल 2026 को दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर श्रीलंका जाएंगे। यह दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह उपराष्ट्रपति के रूप में उनका पहला द्विपक्षीय श्रीलंका दौरा होगा और इससे दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    इस दौरे के दौरान उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके और प्रधानमंत्री डॉ हरिनी अमरसूर्या से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा वह अन्य वरिष्ठ नेताओं अधिकारियों और श्रीलंका में रह रहे भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी संवाद करेंगे।

    भारत और श्रीलंका के संबंध ऐतिहासिक सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद मजबूत रहे हैं। श्रीलंका भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” और “विजन महासागर” नीति का एक महत्वपूर्ण साझेदार है। ऐसे में यह दौरा हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठकों के बाद द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देने का अवसर प्रदान करेगा।

    इस बीच वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की स्थिति ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसका असर श्रीलंका पर भी पड़ा जहां ईंधन संकट की स्थिति बनने लगी थी। ऐसे समय में भारत ने आगे बढ़कर मदद करते हुए 38 000 मीट्रिक टन ईंधन की आपूर्ति की जिससे श्रीलंका को राहत मिली।

    भारत की इस सहायता के लिए श्रीलंका के नेताओं ने आभार व्यक्त किया। सांसद नमल राजपक्षे ने भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति की सराहना करते हुए कहा कि भारत संकट के समय हमेशा श्रीलंका के साथ खड़ा रहा है। उन्होंने श्रीलंका सरकार को भारत की आर्थिक नीतियों विशेष रूप से फ्यूल टैक्स एडजस्टमेंट मॉडल को अपनाने की सलाह भी दी।

    वहीं राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने भी भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनकी प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत हुई थी जिसमें उन्होंने ईंधन संकट की स्थिति साझा की थी और भारत ने तुरंत सहायता उपलब्ध कराई। कुल मिलाकर उपराष्ट्रपति का यह दौरा न केवल कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह दोनों देशों के बीच सहयोग विश्वास और साझेदारी को और गहरा करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

  • सीजफायर के बाद कूटनीति तेज, ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव पर अमेरिका से होगी अहम वार्ता

    सीजफायर के बाद कूटनीति तेज, ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव पर अमेरिका से होगी अहम वार्ता


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्ते के सीज़फायर के बाद अब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने पुष्टि की है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुक्रवार, 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में शुरू होगी। ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को एक विस्तृत 10 बिंदुओं वाला प्रस्ताव भेजा है, जिस पर अब बातचीत की जाएगी। ईरानी मीडिया के अनुसार, इस प्रस्ताव में कई अहम शर्तें शामिल हैं।

    ईरान के 10 प्रमुख प्रस्ताव इस प्रकार हैं:

    1. अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता
    2. होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण बरकरार रखना
    3. यूरेनियम संवर्धन की अनुमति
    4. सभी प्राथमिक प्रतिबंधों को समाप्त करना
    5. द्वितीयक प्रतिबंधों को भी हटाना
    6. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी प्रस्तावों को खत्म करना
    7. बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के प्रस्तावों को समाप्त करना
    8. ईरान को मुआवजा देना
    9. क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी
    10. लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम

    ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, प्रस्ताव में विशेष रूप से होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण, प्रतिबंधों में ढील और क्षेत्र से अमेरिकी सेनाओं की वापसी जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया है। हालांकि, ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने साफ किया है कि इस पहल का मतलब जमीनी स्तर पर तनाव पूरी तरह खत्म होना नहीं है। उनका कहना है कि यह युद्ध का अंत नहीं है और किसी भी गलती का कड़ा जवाब दिया जाएगा।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब ईरान ने दो हफ्ते के सीज़फायर को स्वीकार किया है, जिसे उसने अपनी “जीत” बताया है। यह सीज़फायर पाकिस्तान की मध्यस्थता से संभव हुआ है। इस्लामाबाद में होने वाली यह वार्ता करीब 15 दिनों तक चल सकती है और जरूरत पड़ने पर इसे आगे बढ़ाया भी जा सकता है। इसका उद्देश्य एक व्यापक समझौते की दिशा में रूपरेखा तैयार करना है।

    ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि इस दौरान समुद्री मार्गों पर सीमित सहयोग किया जाएगा और होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित आवाजाही ईरानी सशस्त्र बलों के समन्वय से सुनिश्चित की जा सकती है।वहीं, व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा है कि सीज़फायर औपचारिक रूप से तभी लागू माना जाएगा, जब ईरान वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोल देगा।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि तेहरान ने अमेरिका-इजराइल तनाव के बीच पाकिस्तान के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने भी अंतिम समय में हस्तक्षेप कर तनाव कम करने की अपील की थी।

    इसी बीच, ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने सीज़फायर को मंजूरी दे दी है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने कहा कि यदि ईरान पर हमले रुकते हैं तो वे भी जवाबी कार्रवाई रोक देंगे और दो हफ्तों तक होर्मुज स्ट्रेट में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने सीज़फायर को लागू कराने में भूमिका निभाने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के प्रति आभार भी जताया।

  • IRIS DENA पर मोदी सरकार की चुप्पी से भड़के खरगे, कहा-देश की विदेश नीति को बर्बाद कर रहे…

    IRIS DENA पर मोदी सरकार की चुप्पी से भड़के खरगे, कहा-देश की विदेश नीति को बर्बाद कर रहे…

    नई दिल्‍ली। इजरायल और अमेरिका द्वारा मिलकर ईरान पर किए गए हमले ने वैश्विक राजनीति के साथ-साथ भारत की घरेलू राजनीति को भी तेज कर दिया है। ईरानी जहाज को हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा डुबोए जाने पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर विपक्ष ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि हिंद महासागर में हुई इस घटना पर पीएम नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की चुप्पी से साफ है कि देश के रणनीतिक और राष्ट्रीय हितों की घोर उपेक्षा की जा रही है। यह न सिर्फ भारत के राष्ट्रीय सिद्धांतों का अपमान है, बल्कि हमारी उस विदेश नीति का भी अपमान है, जिसे तमाम सरकारों ने बड़ी मेहनत से बनाया और अपनाया है।

    सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखे एक पोस्ट में खरगे ने मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “ईरान का जो जहाज टारपीडो की चपेट में आने से डूबा है यह जहाज बिना सैन्य साजो सामान के था और भारत में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 से लौट रहा था।

    ईरानी नौसेना का जहाज ईरिस डेना भारत का आमंत्रित अतिथि था और यह विशाखापत्तनम में 15 से 26 फरवरी तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 में शामिल हुआ था। इस आयोजन में 70 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं शामिल हुईं थीं।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि आश्चर्य की बात यह है कि इस अतिथि के डूबने पर भारत की तरफ से कोई चिंता या संवेदना व्यक्त नहीं की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर चुप हैं। पीएम मोदी पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि जब आप अपने ही आंगन में हो रही घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं दे सकते हैं तो हमें महासागर सिद्धांतों और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ होने के सिद्धांतों पर उपदेश क्यों दे रहे हैं।
    होर्मुज की खाड़ी में फंसे 1100 भारतीय नाविक: खरगे

    कांग्रेस अध्यक्ष ने इस युद्ध की वजह से होर्मुज की खाड़ी में फंसे भारतीयों को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि होर्मुज की खाड़ी में 38 भारतीय ध्वज वाले जहाज और 1100 नाविक फंसे हुए हैं।

    प्टन आशीष कुमार समेत दो भारतीय नाविकों की कथित तौर पर मौत हो गई है। समुद्री बचाव या राहत अभियान क्यों नहीं चलाया जा रहा है? पीएम मोदी कहते हैं कि कच्चे तेल और अन्य तेल का भंडार केवल 25 दिनों के लिए बचा है। तेल की बढ़ती कीमतों के बीच, हमारी ऊर्जा संबंधी इमरजेंसी योजना क्या है, खासकर भारत सरकार द्वारा रूसी तेल का आयात रोकने की मांग को लगभग स्वीकार करने के बाद। खाड़ी देशों के साथ अन्य प्रमुख वस्तुओं के व्यापार का क्या होगा।
    विदेश नीति को बर्बाद कर रहे हैं: खरगे

    कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए और कहा कि विदेश मंत्रालय के 3 मार्च के बयान के अनुसार, “कुछ भारतीय नागरिकों की जान चली गई है या वे लापता हैं”। खाड़ी देशों में एक करोड़ भारतीय रहते हैं। मेडिकल छात्र मदद की गुहार लगाते हुए हताश वीडियो संदेश जारी कर रहे हैं।

    भारत सरकार उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर रही है? क्या प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को निकालने की कोई योजना बनाई गई है? उन्होंने कहा कि इन सब स्थितियों के बीच “स्पष्ट रूप से, मोदी जी का आत्मसमर्पण राजनीतिक और नैतिक दोनों है। यह भारत के मूल राष्ट्रीय हितों का अपमान करता है और हमारी उस विदेश नीति को खत्म कर रहा है, जिसे वर्षों से लगातार सरकारों द्वारा सावधानीपूर्वक और मेहनत से बनाया और अपनाया गया है।”

    गौरतलब है कि इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के साथ शुरू हुई यह जंग अब पश्चिम एशिया से आगे बढ़कर हिंद महासागर में पहुंच गई है।

    भारत में फ्लीट रिव्यू कार्यक्रम के तहत आए ईरानी युद्धपोत को अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के करीब डुबो दिया। इस घटना में 80 से ज्यादा ईरानी नौसैनिकों के मारे जाने की आशंका है। बाकियों को श्रीलंकाई नेवी से बचाव अभियान के तहत बचाया था। फिलहाल यह सैनिक श्रीलंका में मौजूद हैं।
  • ट्रंप ने यूक्रेन और ईरान वार्ता की कमान अपने दामाद और दोस्त के हाथों में सौंपी

    ट्रंप ने यूक्रेन और ईरान वार्ता की कमान अपने दामाद और दोस्त के हाथों में सौंपी


    वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दामाद जेरेड कुश्नर और पुराने मित्र स्टीव विटकॉफ को दुनिया के दो सबसे बड़े संकटों यूक्रेन युद्ध और ईरान के तनाव को संभालने की जिम्मेदारी दी है। गुरुवार को दोनों ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अलग-अलग बैठकों में इन मुद्दों पर चर्चा की।

    जिनेवा में व्यस्त कूटनीतिक दौरा
    कुश्नर और विटकॉफ ने अपने जिनेवा दौरे की शुरुआत ओमान के राजदूत के आवास से की जहां उन्होंने ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की। इसका उद्देश्य तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर एक समझौते पर मुहर लगाना और अमेरिका तथा इजरायल द्वारा संभावित हमलों को रोकना था। इसके कुछ ही घंटों बाद दोनों ने इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में यूक्रेनी अधिकारियों से बैठक की। रूसी आक्रमण अब अपने पांचवें वर्ष में है इसलिए यह वार्ता बेहद अहम मानी जा रही थी। इसके बाद फोर सीजन्स होटल में रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधियों से अलग-अलग मंजिलों पर मुलाकात की गई। शाम तक दोनों फिर से ओमान के राजदूत के आवास लौटे और गुरुवार देर रात अमेरिका के लिए रवाना हुए।

    गाजा शांति समझौते में भूमिका

    कुश्नर और विटकॉफ की जिम्मेदारी केवल यूरोप या ईरान तक सीमित नहीं है। एक सप्ताह से भी कम समय पहले उन्होंने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उद्घाटन बैठक में हिस्सा लिया था। यह संस्था गाजा पट्टी में हमास और इजरायल के बीच युद्धविराम सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।

    ट्रंप की कूटनीतिक रणनीति
    ट्रंप की यह कवायद उनकी कूटनीतिक रणनीति को साफ दर्शाती है। वे अमेरिकी सरकार के पारंपरिक तंत्र पर भरोसा करने की बजाय अपनी सबसे अहम प्राथमिकताओं के लिए भरोसेमंद सहयोगियों दामाद और मित्र पर निर्भर हैं।

    विशेषज्ञों की चिंता और वाइट हाउस का बचाव

    कई विशेषज्ञों ने कहा है कि तीन बड़े और जटिल मुद्दों को केवल दो लोग संभालना चुनौतीपूर्ण है। ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के वरिष्ठ फेलो आरोन डेविड मिलर ने कहा कि हर वार्ता स्वयं में कई जटिल विवरणों का महासागर है। वहीं वाइट हाउस के एक अधिकारी ने इनका बचाव करते हुए कहा कि कुश्नर और विटकॉफ का सफलता का ट्रैक रिकॉर्ड और समय प्रबंधन उन्हें इन जिम्मेदारियों के लिए सक्षम बनाता है। दोनों को नियमित रूप से खुफिया ब्रीफिंग भी दी जाती है।

    व्यावसायिक हितों पर उठ रहे सवाल

    दोनों के बड़े व्यावसायिक हितों के कारण उनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। जेरेड कुश्नर की निवेश फर्म ‘एफिनिटी पार्टनर्स’ अरबों डॉलर का प्रबंधन करती है जिसमें कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड का पैसा शामिल है। स्टीव विटकॉफ की क्रिप्टो फर्म ‘वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल’ में हिस्सेदारी है जो अबू धाबी सरकार से जुड़े फंड्स के साथ मध्य पूर्व में सौदे कर रही है। इसके अलावा विटकॉफ और रूस के वार्ताकार किरिल दिमित्रीव ने युद्ध के बाद आर्थिक समझौतों पर चर्चा की। रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने कहा कि ये अच्छे व्यापारी हो सकते हैं लेकिन सीनेट की मंजूरी या सरकारी निगरानी के अधीन नहीं हैं।

    यूक्रेन का नजरिया

    यूक्रेन ने कुश्नर और विटकॉफ की भागीदारी का स्वागत किया है। मार्च की शुरुआत में रूसी अधिकारियों के साथ अगली त्रिपक्षीय चर्चा की उम्मीद है जिससे राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की और व्लादिमीर पुतिन की बैठक का रास्ता साफ हो सके। अमेरिका में यूक्रेन की राजदूत ओल्गा स्टेफनिशिना ने कहा कि सीधे राष्ट्रपति ट्रंप से संपर्क होने की वजह से वे दोनों उनके लिए उपयोगी हैं। हालांकि ट्रंप के पहले कार्यकाल में यूक्रेन वार्ता के विशेष दूत रहे कर्ट वोल्कर ने माना कि सीधा संपर्क सकारात्मक है लेकिन कुश्नर और विटकॉफ को इन मुद्दों की पूरी गहन समझ नहीं है।

  • मलेशिया में पीएम मोदी का संबोधन: भारत मलेशिया संबंधों को नई ऊँचाई पर ले जाना हमारी प्राथमिकता

    मलेशिया में पीएम मोदी का संबोधन: भारत मलेशिया संबंधों को नई ऊँचाई पर ले जाना हमारी प्राथमिकता


    नई दिल्ली । मलेशिया की राजधानी में प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में दोनों देशों के बीच गहरे और गतिशील संबंधों पर जोर दिया। उन्होंने अनवर इब्राहिम के स्वागत के लिए हृदय से आभार जताया और कहा कि मलेशिया ने अपनी परंपराओं और जीवन शैली को बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत किया जो उन्हें हमेशा याद रहेगा। उन्होंने मित्रता की ऊँचाई और गहराई का अनुभव करने की बात कही और इस विशेष स्वागत के लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद दिया।

    पीएम मोदी ने कहा कि यह उनके लिए सौभाग्य की बात है कि प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें तीसरी बार मलेशिया आने का अवसर मिला है और अनवर इब्राहिम के कार्यकाल में उन्हें चौथी बार मिलने का मौका मिल रहा है। यह दोनों देशों के बीच बढ़ती सक्रियता और सहयोग की गति का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों ने जो गति और गहराई हासिल की है वह प्रेरणादायक है और इसके लिए उन्होंने मलेशिया के प्रधानमंत्री के योगदान को सराहा।

    संबोधन में उन्होंने कहा कि आज भारत और मलेशिया का सहयोग कृषि विनिर्माण क्लीन एनर्जी और सेमीकंडक्टर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गहरा हुआ है। इसके साथ ही स्किल डेवलपमेंट और क्षमता निर्माण कैपेसिटी बिल्डिंग में भी दोनों देश अहम साझेदार बन चुके हैं। रक्षा और सुरक्षा सहयोग भी लगातार मजबूत हो रहा है जो क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

    पीएम मोदी ने मलेशिया को आसियान की सफल अध्यक्षता के लिए बधाई दी और कहा कि मलेशिया के सहयोग से भारत आसियान संबंध और अधिक गहरे होंगे और विस्तार पाएंगे। उन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों की असली ताकत पीपल टू पीपल टाई को बताया। भारतीय मूल के लगभग 30 लाख मलेशियाई नागरिक दोनों देशों के बीच एक जीवंत पुल लिविंग ब्रिज हैं। पीएम मोदी ने कहा कि उन्हें मलेशिया में डाइस्पोरा से मिलने का अवसर मिला जहां उन्होंने देखा कि लोगों का प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान और प्रेम कितना गहरा है जो उनके लिए गर्व का विषय था।

    सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मित्र देशों का साथ महत्वपूर्ण है यह भी उन्होंने कहा। वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भारत और मलेशिया दोनों मेरिटाइम नेबर्स हैं और उन्हें अपने संबंधों की पूरी क्षमता का उपयोग करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि उनकी यात्रा का मूल संदेश यही है कि भारत मलेशिया के साथ मिलकर द्विपक्षीय संबंधों को नए स्तर पर ले जाना चाहता है और हर क्षेत्र में सहयोग को और अधिक प्रगाढ़ बनाना चाहता है। अंत में उन्होंने एक बार फिर स्वागत के लिए मलेशियाई प्रधानमंत्री और उनकी टीम का आभार व्यक्त किया।