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  • ईरान-अमेरिका समझौते के बहाने कांग्रेस का मोदी सरकार पर प्रहार, जयराम रमेश ने विदेश नीति और पाकिस्तान पर उठाए सवाल

    ईरान-अमेरिका समझौते के बहाने कांग्रेस का मोदी सरकार पर प्रहार, जयराम रमेश ने विदेश नीति और पाकिस्तान पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते की खबरों के बीच देश में राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। इस घटनाक्रम का स्वागत करते हुए कांग्रेस ने एक ओर जहां क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक व्यापार के लिए इसे सकारात्मक कदम बताया, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार की विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठाए हैं।

    कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और होर्मुज जलडमरूमध्य के सामान्य रूप से खुलने की संभावना भारत के लिए राहत भरी खबर हो सकती है। उनका मानना है कि इस समुद्री मार्ग के सुचारु संचालन से ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ने वाले दबाव में कमी आ सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इससे देश की अर्थव्यवस्था के सामने पहले से मौजूद संरचनात्मक चुनौतियां स्वतः समाप्त नहीं हो जाएंगी।

    उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था कई ऐसे मुद्दों का सामना कर रही है जो पश्चिम एशिया में हालिया तनाव शुरू होने से पहले से मौजूद थे। उनके अनुसार रुपये पर लंबे समय से दबाव बना हुआ है और विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग तथा उपलब्धता के बीच अंतर लगातार बढ़ता गया है। ऐसे हालात में केवल वैश्विक परिस्थितियों में सुधार से घरेलू आर्थिक चुनौतियों का समाधान संभव नहीं माना जा सकता।

    कांग्रेस नेता ने निवेश के मोर्चे पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में निवेश की गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। उनके अनुसार वास्तविक मजदूरी वृद्धि में ठहराव, विनिर्माण क्षेत्र पर दबाव और व्यापारिक अनिश्चितताओं ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन से होने वाले आयात पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने के कारण व्यापार घाटा बढ़ा है, जिसका असर घरेलू उद्योगों पर भी पड़ा है।

    जयराम रमेश ने कारोबारी माहौल को लेकर भी सरकार की आलोचना की। उनका कहना था कि नियामकीय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़ी चुनौतियों ने निवेशकों के विश्वास को प्रभावित किया है। उन्होंने दावा किया कि उद्योग जगत को अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद वातावरण की आवश्यकता है ताकि दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहन मिल सके।

    विदेश नीति के मुद्दे पर कांग्रेस ने पाकिस्तान और चीन के बढ़ते सामरिक संबंधों का उल्लेख किया। जयराम रमेश ने कहा कि पाकिस्तान, जिसे वर्षों पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की दिशा में भारत को सफलता मिली थी, अब क्षेत्रीय और वैश्विक मंचों पर पहले की तुलना में अधिक सक्रिय दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की रणनीतिक संरचना में चीन की गहरी भागीदारी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक चुनौती बनकर उभरी है।

    कांग्रेस नेता ने पश्चिम एशिया के संदर्भ में भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित संतुलित और बहुआयामी विदेश नीति की मांग करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार इस दिशा में अपेक्षित संतुलन प्रदर्शित नहीं कर सकी है। साथ ही उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति, मानवीय सरोकारों और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी बड़ी शक्ति के लिए आवश्यक होता है।

    ईरान-अमेरिका समझौते की संभावनाओं के बीच कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों पर दुनिया की नजर बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में इस समझौते के वास्तविक प्रभाव और क्षेत्रीय राजनीति पर इसके परिणामों को लेकर देश के भीतर भी बहस जारी रह सकती है।

  • भारत-यूरोप संबंधों को नई दिशा, पीएम मोदी की पांच देशों की यात्रा से खुल सकते हैं विकास के नए रास्ते

    भारत-यूरोप संबंधों को नई दिशा, पीएम मोदी की पांच देशों की यात्रा से खुल सकते हैं विकास के नए रास्ते


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच देशों की लंबी और महत्वपूर्ण विदेश यात्रा पूरी करने के बाद गुरुवार को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली लौट आए। इस यात्रा को भारत की विदेश नीति और वैश्विक संबंधों के विस्तार की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा किया, जहां विभिन्न देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ व्यापक चर्चा हुई।

    यात्रा के अंतिम चरण में इटली में प्रधानमंत्री मोदी और वहां की प्रधानमंत्री के बीच हुई बैठक विशेष रूप से चर्चा में रही। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने पर सहमति जताते हुए उन्हें ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक ले जाने का फैसला किया। यह कदम आने वाले समय में दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग को नई गति देने वाला माना जा रहा है।

    इस मुलाकात के दौरान कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर विस्तार से बातचीत हुई, जिनमें रक्षा, ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, विज्ञान और प्रौद्योगिकी शामिल रहे। दोनों देशों ने आगामी वर्षों में व्यापारिक संबंधों को कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। इसके साथ ही शिक्षा, संस्कृति और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है।

    इस यात्रा के दौरान वैश्विक परिस्थितियों पर भी विचार-विमर्श हुआ, जिसमें पश्चिम एशिया की स्थिति और रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे विषय प्रमुख रहे। इन चर्चाओं के जरिए भारत ने अपने संतुलित और स्पष्ट कूटनीतिक दृष्टिकोण को एक बार फिर दुनिया के सामने रखा है। यह दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर केवल दर्शक नहीं बल्कि एक सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

    दिल्ली लौटने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी का कार्यक्रम भी काफी व्यस्त रहा। राजधानी पहुंचते ही उन्होंने शाम को एक उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें सरकार के कामकाज की समीक्षा और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की गई। इस बैठक को नीति निर्माण और प्रशासनिक सुधारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस पांच देशों की यात्रा से भारत को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है। एक ओर जहां विदेशी निवेश और व्यापारिक अवसरों में बढ़ोतरी की संभावना है, वहीं दूसरी ओर तकनीकी सहयोग और ऊर्जा क्षेत्र में नई संभावनाएं खुल सकती हैं। यूरोपीय देशों और पश्चिम एशिया के साथ मजबूत होते संबंध भारत की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करेंगे।

    इसके अलावा, इस यात्रा से भारतीय उद्योगों और स्टार्टअप्स के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ने से रोजगार के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है और देश की आर्थिक वृद्धि को भी गति मिल सकती है।

  • भारत–बांग्लादेश रिश्तों में सुधार की बड़ी पहल: वीजा सेवाएं फिर से पटरी पर लौटने लगीं

    भारत–बांग्लादेश रिश्तों में सुधार की बड़ी पहल: वीजा सेवाएं फिर से पटरी पर लौटने लगीं


    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बाद अब रिश्तों में सुधार के संकेत साफ दिखने लगे हैं। दोनों देशों ने वीजा सेवाओं को फिर से सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, जिससे आपसी सहयोग और यात्रा व्यवस्था दोबारा मजबूत होने की उम्मीद है।

    वीजा बहाली की दिशा में अहम कदम
    ढाका ने हाल ही में सभी श्रेणियों के लिए भारतीय नागरिकों को वीजा सेवाएं दोबारा शुरू कर दी हैं। वहीं भारत भी आने वाले हफ्तों में धीरे-धीरे अपनी वीजा सेवाओं को पूरी तरह बहाल करने की तैयारी में है। पिछले महीनों में दोनों देशों के बीच कांसुलर गतिविधियों में तेजी देखी गई है।

    पिछले तनाव के बाद सुधार की शुरुआत
    अगस्त 2024 में बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया था। हालांकि अब स्थिति बदलती दिख रही है और दोनों पक्ष कूटनीतिक संवाद को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। वीजा सेवाओं की बहाली को इसी प्रक्रिया का पहला बड़ा कदम माना जा रहा है।

    भारत के वीजा केंद्र फिर सक्रिय
    बांग्लादेश के सभी प्रमुख भारतीय वीजा केंद्र नई दिल्ली उच्चायोग और कोलकाता, अगरतला, मुंबई व चेन्नई स्थित कार्यालय अब पहले की तरह काम कर रहे हैं। ढाका को उम्मीद है कि भारत भी जल्द पूरी तरह सेवाएं शुरू कर देगा।

    उच्च स्तरीय बैठकों की संभावना
    सूत्रों के अनुसार, आने वाले समय में दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय राजनीतिक मुलाकातें भी हो सकती हैं। इससे आर्थिक सहयोग, ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।

    व्यापार और यात्रा में राहत
    हाल के महीनों में भारत ने बांग्लादेश को ऊर्जा जरूरतों में सहयोग के तौर पर डीजल भी उपलब्ध कराया है। वीजा प्रक्रिया आसान होने से दोनों देशों के नागरिकों, व्यापारियों और मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी।

    भविष्य की दिशा
    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह सकारात्मक रुख जारी रहता है तो भारत और बांग्लादेश के रिश्ते एक नए स्थिर और सहयोगी दौर में प्रवेश कर सकते हैं। यह बदलाव क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए भी अहम माना जा रहा है।