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  • आरबीआई के सख्त विदेशी मुद्रा नियमों का असर, डॉलर के मुकाबले रुपया 95.76 पर खुला, एक प्रतिशत से ज्यादा मजबूत हुई भारतीय मुद्रा

    आरबीआई के सख्त विदेशी मुद्रा नियमों का असर, डॉलर के मुकाबले रुपया 95.76 पर खुला, एक प्रतिशत से ज्यादा मजबूत हुई भारतीय मुद्रा

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने और कारोबार को व्यवस्थित करने के लिए उठाए गए सख्त कदमों के बाद सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती के साथ खुला। शुरुआती कारोबार में रुपया एक प्रतिशत से अधिक मजबूत होकर 95.76 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ था और यह 97 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गई थी। ऐसे में केंद्रीय बैंक के नए उपायों के बाद रुपये में आई मजबूती को विदेशी मुद्रा बाजार के घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।

    रुपये की मजबूती का असर ऑफशोर कारोबार में भी दिखाई दिया। एक महीने के नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाजार में भारतीय मुद्रा एक समय 94.17 प्रति डॉलर तक पहुंच गई थी। इस स्तर पर रुपये में लगभग 2.7 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि, बाद में इसमें कुछ नरमी आई और बढ़त घटकर करीब 0.7 प्रतिशत रह गई। इससे स्पष्ट हुआ कि शुरुआती मजबूती के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहा।

    अक्टूबर की शुरुआत में आरबीआई ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन को लेकर कई नियामकीय बदलावों की घोषणा की थी। इन उपायों के तहत बिना हेजिंग वाले विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (एफईआरआर) नाम से एक नई व्यवस्था लागू की। इन कदमों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में अनियंत्रित गतिविधियों पर रोक लगाना और कारोबार को अधिक व्यवस्थित बनाना है।

    नए निर्देशों के अनुसार, अधिकृत डीलर भारतीय रुपये से संबंधित ऐसे विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध को दोबारा बुक नहीं कर सकेंगे, जिसे पहले रद्द किया जा चुका है। हालांकि, अनुबंध की निर्धारित अवधि पूरी होने पर उसके रोलओवर की अनुमति बनी रहेगी। इस व्यवस्था के जरिए पहले रद्द किए गए अनुबंधों को दोबारा बुक करने से जुड़ी गतिविधियों पर नियंत्रण रखने का प्रयास किया गया है।

    आरबीआई ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध करने वाले ग्राहकों के लिए भी नियम सख्त किए हैं। अब अधिकृत डीलरों को ग्राहकों से लिखित घोषणा लेनी होगी कि जिस मूल जोखिम से बचाव के लिए हेजिंग की जा रही है, उसके लिए किसी अन्य अधिकृत डीलर के साथ पहले से हेजिंग नहीं की गई है। इस शर्त का उद्देश्य एक ही जोखिम के लिए अलग-अलग जगहों पर दोहरी हेजिंग की संभावना को नियंत्रित करना है।

    एफईआरआर व्यवस्था के तहत 20 लाख डॉलर से अधिक मूल्य वाले कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों के लिए अधिकृत डीलरों को अनुबंध मूल्य के रुपये में समतुल्य का 20 प्रतिशत नकद रिजर्व आरबीआई के पास रखना होगा। यह रिजर्व अनुबंध की समाप्ति तक प्रतिदिन बनाए रखना अनिवार्य है। केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई उपयोगकर्ता कई लेनदेन के माध्यम से नियामकीय नियमों को दरकिनार करने का प्रयास करता है, तो इसे नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।

    शनिवार को आरबीआई ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक विशेष व्यवस्था शुरू करने समेत कई अन्य कदम उठाए थे। ये उपाय ऐसे समय में किए गए, जब रुपया 97 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया था। इससे पहले पिछले सप्ताह केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में भी बढ़ोतरी की थी और संकेत दिया था कि आवश्यकता पड़ने पर मौद्रिक नीति को और सख्त किया जा सकता है। विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की आगे की चाल पर इन उपायों का असर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर भविष्य की दिशा को निश्चित नहीं कहा जा सकता।

  • रुपये की गिरावट रोकने के लिए RBI के नए कदम, तेल कंपनियों को सीधे डॉलर और फॉरेक्स सौदों पर सख्ती

    रुपये की गिरावट रोकने के लिए RBI के नए कदम, तेल कंपनियों को सीधे डॉलर और फॉरेक्स सौदों पर सख्ती

    नई दिल्ली ।डॉलर के मुकाबले रुपये में जारी कमजोरी को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार से जुड़े कई कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य डॉलर की अतिरिक्त मांग कम करना और रुपये पर पड़ रहे दबाव को नियंत्रित करना है। इसके तहत सरकारी तेल कंपनियों को सीधे डॉलर उपलब्ध कराने की व्यवस्था के साथ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों के नियम भी सख्त किए गए हैं। इन उपायों से रुपये को राहत मिलने की उम्मीद है, हालांकि इसकी मजबूती की गारंटी नहीं दी जा सकती।

    रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे महंगे कच्चे तेल, डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी निवेशकों की ओर से भारतीय बाजार से पैसा निकालने जैसे कारण बताए गए हैं। भारत को विदेशों से कच्चा तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। ऐसे में तेल कंपनियों की डॉलर मांग का असर विदेशी मुद्रा बाजार पर पड़ सकता है। RBI की नई व्यवस्था इसी मांग को सीधे पूरा करने और बाजार में अतिरिक्त दबाव घटाने की कोशिश है।

    इस व्यवस्था के तहत इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां अपनी रोजाना की डॉलर जरूरत सीधे RBI से पूरी कर सकेंगी। यह व्यवस्था 12 अक्टूबर 2026 से लागू होने की जानकारी दी गई है। अब तक तेल कंपनियां विदेशों से कच्चा तेल खरीदने के भुगतान के लिए बाजार से डॉलर खरीदती थीं। बड़ी कंपनियों की एक साथ बढ़ी मांग से डॉलर की उपलब्धता और रुपये की विनिमय दर पर दबाव पड़ सकता है। केंद्रीय बैंक से सीधे डॉलर मिलने पर बाजार में उनकी खरीद की जरूरत कम हो सकती है।

    RBI ने विदेशी मुद्रा से जुड़े डेरिवेटिव सौदों पर भी सीमाएं सख्त की हैं। जिन सौदों के पीछे वास्तविक लेनदेन या जरूरत नहीं होती, उनमें डॉलर से जुड़ी पोजिशन लेने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है। इसके अलावा, रुपये से संबंधित कुछ रद्द किए गए विदेशी मुद्रा अनुबंधों को दोबारा बुक करने पर रोक लगाने का फैसला भी किया गया है। इन बदलावों का उद्देश्य बाजार में अनावश्यक गतिविधियों को सीमित करना है।

    विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव के कुछ सौदों के लिए बैंकों को 20 प्रतिशत राशि रिजर्व के रूप में रखने का नियम भी लागू किया गया है। यह व्यवस्था पात्र विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों पर लागू होगी। दो मिलियन डॉलर से अधिक के कुछ हेजिंग सौदे इससे प्रभावित हो सकते हैं। इससे कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचाव की लागत बढ़ने की आशंका है। स्टील, ऑटोमोबाइल, केमिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों की कंपनियों पर इसका असर पड़ सकता है।

    रुपये की आगे की चाल को लेकर कुछ बैंकर्स ने डॉलर के मुकाबले 95 से 95.50 के स्तर का अनुमान जताया है। हालांकि, यह बाजार का अनुमान है, निश्चित परिणाम नहीं। यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और डॉलर की मांग पर दबाव बना रह सकता है। इसी तरह, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने या वहां निवेश पर बेहतर रिटर्न मिलने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं। इसके विपरीत, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश बढ़ने पर डॉलर की आवक को समर्थन मिल सकता है।

    RBI रुपये को स्थिर रखने के साथ आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी प्रतिकूल असर नहीं पड़ने देना चाहता। ब्याज दरों में बड़ी बढ़ोतरी से होम लोन, कार लोन और कारोबारी कर्ज महंगे हो सकते हैं। इससे कंपनियों की लागत और लोगों के खर्च पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए केंद्रीय बैंक ने फिलहाल डॉलर की मांग और विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी को नियंत्रित करने वाले उपायों पर जोर दिया है। रुपये को स्थायी राहत कितनी मिलेगी, यह कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों के फैसलों पर निर्भर करेगा।

  • आरबीआई 12 अक्टूबर से सरकारी तेल कंपनियों के लिए खोलेगा विशेष डॉलर विंडो, रुपए को समर्थन देने के साथ विदेशी मुद्रा नियम भी सख्त

    आरबीआई 12 अक्टूबर से सरकारी तेल कंपनियों के लिए खोलेगा विशेष डॉलर विंडो, रुपए को समर्थन देने के साथ विदेशी मुद्रा नियम भी सख्त

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रुपए को समर्थन देने और सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष व्यवस्था शुरू करने की घोषणा की है। इसके तहत केंद्रीय बैंक 12 अक्टूबर 2026 से एक विशेष डॉलर विंडो खोलेगा। यह सुविधा अगले आदेश तक जारी रहेगी। आरबीआई ने मौजूदा बाजार परिस्थितियों का आकलन करने के बाद यह फैसला लिया है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सरकारी तेल विपणन कंपनियों को उनकी दैनिक जरूरत के अनुसार डॉलर उपलब्ध कराना है।

    इस विशेष सुविधा के तहत तीन सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को डॉलर की आपूर्ति की जाएगी। इनमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन शामिल हैं। आरबीआई निर्धारित बैंकों के माध्यम से इन कंपनियों को डॉलर बेचेगा। केंद्रीय बैंक ने यह कदम ऐसे समय उठाया है, जब विदेशी मुद्रा बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सरकारी तेल कंपनियों की दैनिक डॉलर जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की गई। हालांकि, इस सुविधा के तहत डॉलर की कुल मात्रा या प्रत्येक कंपनी के लिए निर्धारित सीमा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।

    विशेष डॉलर विंडो शुरू करने के साथ आरबीआई ने विदेशी मुद्रा हेजिंग सुविधाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी नियम कड़े किए हैं। केंद्रीय बैंक ने रुपए से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और एक ही जोखिम के लिए कई जगह हेजिंग करने की संभावना को रोकने के उद्देश्य से दस्तावेजीकरण संबंधी शर्तें लागू की हैं। नए नियमों के अनुसार, अधिकृत डीलरों को ऐसे उपयोगकर्ताओं से लिखित आश्वासन लेना होगा और उसे अपने रिकॉर्ड में सुरक्षित रखना होगा, जो भारतीय रुपए से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध करते हैं।

    इस लिखित आश्वासन में उपयोगकर्ता को पुष्टि करनी होगी कि संबंधित अंतर्निहित जोखिम के लिए किसी दूसरे अधिकृत डीलर के साथ हेजिंग नहीं की गई है। इस तरह एक ही जोखिम के आधार पर अलग-अलग अधिकृत डीलरों के माध्यम से हेजिंग करने पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यह दस्तावेजीकरण अधिकृत डीलरों की जिम्मेदारी होगी। उन्हें उपयोगकर्ता से आश्वासन प्राप्त करने के साथ उसे अपने पास सुरक्षित भी रखना होगा।

    विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित संचालन के लिए आरबीआई ने रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों को दोबारा बुक करने पर भी प्रतिबंध लगाया है। नए निर्देश जारी होने के बाद किसी अधिकृत डीलर के साथ रद्द किए गए रुपए से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध को दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं होगी। यह प्रतिबंध डिलीवरेबल और नॉन-डिलीवरेबल, दोनों प्रकार के अनुबंधों पर लागू होगा। अधिकृत डीलरों को अपने ग्राहकों को ऐसे अनुबंध फिर से बुक करने की अनुमति नहीं देनी होगी।

    केंद्रीय बैंक ने बिना अंतर्निहित जोखिम के किए जाने वाले विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन की सीमा भी घटा दी है। अब सभी अधिकृत डीलरों के लिए ऐसे लेनदेन की सीमा पांच मिलियन डॉलर के बराबर निर्धारित की गई है। इसके अतिरिक्त, दो मिलियन डॉलर से अधिक की नोशनल वैल्यू वाले रुपए से जुड़े सभी विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों के लिए विशेष वित्तीय प्रावधान लागू किया गया है।

    ऐसे अनुबंधों के मामले में अधिकृत डीलरों को आरबीआई के पास विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व बनाए रखना होगा। इस रिजर्व की राशि प्रत्येक लेनदेन की नोशनल वैल्यू के भारतीय रुपए में बराबर मूल्य का 20 प्रतिशत होगी। यह राशि नकद के रूप में रखनी होगी। इन उपायों के जरिए आरबीआई ने सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर जरूरतों को पूरा करने के साथ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार में हेजिंग और लेनदेन से जुड़े नियमों को अधिक सख्त बनाया है।

  • आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर

    आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर


    नई दिल्ली ।
    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 44.9 अरब डॉलर बढ़कर 785.7 अरब डॉलर हो गया है। इस तेज बढ़ोतरी के साथ भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में रूस को पीछे छोड़ दिया है और अब चीन, जापान तथा स्विट्जरलैंड के बाद दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बढ़ोतरी को मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से डॉलर आकर्षित करने के लिए शुरू की गई एफसीएनआर (बी) जमा योजना के तहत आए बड़े फंड से जोड़ा गया है।

    785.7 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भारत के लिए महत्वपूर्ण बढ़त है। इस दौरान देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 44.9 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस बढ़ोतरी ने भारत को वैश्विक स्तर पर विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाले प्रमुख देशों की सूची में रूस से आगे कर दिया है।

    विदेशी मुद्रा भंडार के अलग-अलग घटकों में हालांकि एक समान वृद्धि नहीं हुई। सप्ताह के दौरान सोने के भंडार में 2.59 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई और यह घटकर 113.81 अरब डॉलर रह गया। सोने की कीमतों में गिरावट को इसके पीछे प्रमुख कारण बताया गया है। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य हिस्से में मजबूती के कारण कुल भंडार में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए अधिक गुंजाइश मिलती है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा उपलब्ध होने से केंद्रीय बैंक जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।

    मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के कारण आरबीआई को स्पॉट और फॉरवर्ड करेंसी मार्केट में भी हस्तक्षेप करने की अधिक क्षमता मिलती है। जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर जारी करके रुपये की कीमत में तेज गिरावट को रोकने की कोशिश कर सकता है। इस तरह विदेशी मुद्रा भंडार बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में काम करता है।

    इस बीच, विदेशी मुद्रा के बड़े पैमाने पर देश में आने से बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त लिक्विडिटी जमा हुई है। आरबीआई ने इसी अतिरिक्त तरलता को कम करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ बिक्री की घोषणा की है।

    केंद्रीय बैंक यह बिक्री तीन अलग-अलग किश्तों में करेगा। पहली नीलामी 17 सितंबर को होगी, जिसमें 50,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज बेची जाएंगी। इसके बाद 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये और 28 सितंबर को शेष 25,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की बिक्री की जाएगी।

    आरबीआई के अनुसार, इन नीलामियों को मल्टी-सिक्योरिटी नीलामी के माध्यम से मल्टीपल-प्राइस मेथड के तहत किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य विदेशी मुद्रा के भारी इनफ्लो से बैंकिंग सिस्टम में बनी अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम करना है।

    विदेशी मुद्रा भंडार में हुई 44.9 अरब डॉलर की साप्ताहिक बढ़ोतरी के बाद भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है। रूस को पीछे छोड़कर चौथे स्थान पर पहुंचना देश के विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बड़ी वृद्धि को दर्शाता है।

  • आरबीआई के कदमों से भारत का भुगतान संतुलन मजबूत, वित्त वर्ष 2027 में 75 अरब डॉलर तक अधिशेष का अनुमान

    आरबीआई के कदमों से भारत का भुगतान संतुलन मजबूत, वित्त वर्ष 2027 में 75 अरब डॉलर तक अधिशेष का अनुमान

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने और घरेलू मुद्रा पर दबाव कम करने के लिए उठाए गए कदमों का असर भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति पर दिखाई दे सकता है। एक रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में देश का भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट 65 से 75 अरब डॉलर के अधिशेष में रह सकता है।

    रिपोर्ट के अनुसार सेवा निर्यात और विदेशों से आने वाली रेमिटेंस में मजबूती भारत के चालू खाते को सहारा देगी। इसके चलते वित्त वर्ष 2027 में चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के करीब 1 से 1.25 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान है। इससे बाहरी क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    विदेशी मुद्रा को देश में आकर्षित करने के लिए आरबीआई ने कई योजनाएं शुरू की हैं। इन उपायों के तहत कुल 136.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आने का अनुमान है। इस बढ़े हुए प्रवाह ने देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के साथ रुपये के अवमूल्यन पर दबाव कम करने में भी मदद की है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की बढ़ोतरी महत्वपूर्ण रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में 47.9 अरब डॉलर की वृद्धि हुई और देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 729.3 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।

    आरबीआई की ओर से जून में शुरू की गई विदेशी मुद्रा आकर्षित करने वाली योजनाओं में एफसीएनआर यानी विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमा की अहम भूमिका रही। इन जमा के जरिए करीब 127.2 अरब डॉलर जुटाए गए, जो कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह का 90 प्रतिशत से अधिक है।

    इसके अलावा विदेशी मुद्रा में विदेशी कर्ज यानी ओएफसीबी के माध्यम से करीब 5.3 अरब डॉलर और बाह्य वाणिज्यिक उधारी यानी ईसीबी के जरिए 3.9 अरब डॉलर जुटाए गए। इस तरह विदेशी मुद्रा जुटाने के अलग-अलग माध्यमों ने देश की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में योगदान दिया।

    एफसीएनआर जमा को आकर्षक बनाने के लिए कई बैंकों ने तीन से पांच वर्ष की अवधि वाली जमा पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की। इन दरों को करीब 2 से 4 प्रतिशत के स्तर से बढ़ाकर 6 से 7 प्रतिशत तक किया गया। इससे एनआरआई के लिए भारत में विदेशी मुद्रा जमा रखने की आकर्षकता बढ़ी और बैंकों को अतिरिक्त विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद मिली।

    आरबीआई ने बाजार में अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के लिए भी कदम उठाए हैं। इसके तहत 6 अगस्त से 2 सितंबर के बीच कुल 53.5 लाख करोड़ रुपये की वीआरआरआर यानी वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो नीलामियों की घोषणा की गई। इसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी का प्रबंधन करना है।

    इन उपायों की पृष्ठभूमि में बाहरी क्षेत्र पर बढ़े दबाव को भी देखा जा सकता है। मध्य पूर्व में संघर्ष और उससे जुड़े घटनाक्रम के कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां बढ़ाई थीं। महंगे तेल से आयात बिल बढ़ने और डॉलर की मांग बढ़ने के कारण रुपये पर दबाव बना था।

    हालांकि रिपोर्ट का आकलन है कि मजबूत सेवा निर्यात, रेमिटेंस और विदेशी मुद्रा प्रवाह ने भारत को इन बाहरी झटकों से निपटने के लिए पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य पूर्व की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार और बाहरी वित्तीय स्थिति में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था की लचीलापन क्षमता मजबूत हुई है।

  • आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार अधिकृत डीलर बैंकों ने केंद्रीय बैंक की विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत 21 अगस्त 2026 तक कुल 72.848 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है। इसमें सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा गैर-निवासी बैंक यानी एफसीएनआर(बी) जमा के जरिए आया है। इस माध्यम से बैंकों ने 65.397 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है।

    आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक विशेष स्वैप सुविधा के तहत बाह्य वाणिज्यिक उधारी यानी ईसीबी और विदेशी मुद्रा उधारी ओएफसीबी के माध्यम से भी 7.451 अरब डॉलर की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है। इस तरह दोनों माध्यमों से आने वाला कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह 72.848 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

    केंद्रीय बैंक ने 8 जून 2026 को एफसीएनआर(बी) जमा, ईसीबी और ओएफसीबी से आने वाली विदेशी मुद्रा के लिए विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी। इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य घरेलू वित्तीय प्रणाली में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाना और रुपये पर पड़ने वाले दबाव को कम करना था।

    योजना के तहत एफसीएनआर(बी) जमा के लिए सुविधा 31 अगस्त 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं ईसीबी और ओएफसीबी से जुड़ी स्वैप सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। आरबीआई ने पहले एफसीएनआर(बी) योजना की अंतिम तारीख 30 सितंबर निर्धारित की थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 31 अगस्त कर दिया गया।

    केंद्रीय बैंक ने समयसीमा में बदलाव का कारण योजना को मिली बेहतर प्रतिक्रिया और विदेशी मुद्रा जुटाने की तेज गति को बताया था। बैंकों ने विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए एफसीएनआर(बी) खातों पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की, जिससे इस योजना के तहत डॉलर प्रवाह को गति मिली।

    एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि एफसीएनआर(बी) योजना के तहत निर्धारित विदेशी मुद्रा जुटाने का लक्ष्य काफी हद तक पहले ही हासिल हो चुका है। रिपोर्ट में यह संभावना भी जताई गई थी कि अगस्त के बाकी दिनों में 25 से 30 अरब डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह आ सकता है। ऐसे में कुल विदेशी मुद्रा संग्रह लगभग 85 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक स्वैप सुविधा की लागत को भी बड़ी बाधा नहीं माना गया है। अनुमान के अनुसार योजना की कुल लागत करीब 10.5 अरब डॉलर या जुटाई गई कुल राशि का लगभग 15 प्रतिशत हो सकती है। हालांकि इस लागत को देश के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार के संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी हाल के सप्ताहों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 14 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 9.905 अरब डॉलर बढ़कर 716.90 अरब डॉलर हो गया। इससे पिछले सप्ताह भी भंडार में 14.1 अरब डॉलर की वृद्धि हुई थी।

    एफसीएनआर(बी) योजना के जरिए आई विदेशी मुद्रा ने बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थिति को मजबूत करने के साथ रुपये को भी सहारा दिया है। इसके अलावा बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार से भारत की बाहरी आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता बेहतर होती है। आने वाले दिनों में एफसीएनआर(बी) योजना के तहत होने वाली अतिरिक्त जमा और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

  • भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार मजबूत होता जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 682.2354 अरब डॉलर पर पहुंच गया। लगातार दूसरे सप्ताह दर्ज हुई इस वृद्धि को देश की बाहरी आर्थिक स्थिति के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    इससे पहले 17 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। लगातार दो सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में हुई वृद्धि से यह संकेत मिल रहा है कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी भारत की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी हुई है और विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार का क्रम जारी है।

    केंद्रीय बैंक के अनुसार, इस दौरान स्वर्ण भंडार के मूल्य में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। समीक्षा अवधि में गोल्ड रिजर्व 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर पर पहुंच गया। वहीं विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा मानी जाने वाली विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां भी 4.873 अरब डॉलर बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गईं। यह बढ़ोतरी देश की समग्र वित्तीय मजबूती का संकेत देती है।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में केवल अमेरिकी डॉलर ही नहीं बल्कि यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है। इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाले बदलाव वैश्विक मुद्रा बाजार की गतिविधियों से भी प्रभावित होते हैं।

    हालांकि इस अवधि में स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (एसडीआर) में मामूली गिरावट दर्ज की गई। यह 5.3 करोड़ डॉलर घटकर 18.617 अरब डॉलर रह गया। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य प्रमुख घटकों में हुई वृद्धि के कारण कुल भंडार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली।

    वर्ष 2026 की शुरुआत में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना था। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते रुपये पर भी दबाव देखा गया, जिसके बाद बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया था। इसके कारण कुछ सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में कमी दर्ज की गई थी।

    उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.494 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। उसके बाद आई गिरावट से अब धीरे-धीरे उबरने का क्रम जारी है और हाल के सप्ताहों में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है।

    आरबीआई का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखना नहीं है, बल्कि केवल बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना है। आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होता है। इससे आयात भुगतान, बाहरी ऋण दायित्वों का निर्वहन और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के दौरान वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है। हालिया बढ़ोतरी को भारत की मजबूत व्यापक आर्थिक स्थिति और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता के रूप में देखा जा रहा है।