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  • जजों की नियुक्ति में सरकार के आगे नरम पड़ जाते थे पूर्व CJI चंद्रचूड़; SC के पूर्व जज कौल का दावा

    जजों की नियुक्ति में सरकार के आगे नरम पड़ जाते थे पूर्व CJI चंद्रचूड़; SC के पूर्व जज कौल का दावा


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के पूर्व न्यायाधीश (Former Judge) जस्टिस संजय किशन कौल (Justice Sanjay Kishan Kaul) ने अपनी आत्मकथा विदाउट फियर ऑफ फेवर (Without Fear of Favour) में कई दावे किए हैं। इस किताब ने देश की शीर्ष न्यायपालिका और सरकार के रिश्तों पर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जस्टिस कौल का दावा है कि जजों की नियुक्ति के मामलों में पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ (DY Chandrachud) का सरकार की तरफ झुकाव रहता था। डीवाई चंद्रचूड़ कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले ही सरकार से अनौपचारिक सहमति लेने की कोशिश करते थे।

    दिसंबर 2023 में रिटायर हुए जस्टिस कौल के अनुसार, सरकार के साथ संबंधों को संभालने को लेकर उनके और तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ के बीच गंभीर मतभेद थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस कौल ने अपनी किताब में लिखा है कि कॉलेजियम की चर्चा से पहले सरकार की सहमति लेना एक गलत संदेश देता है। जब भी न्यायपालिका सरकार को मौका देगी तो राजनीतिक वर्ग अपनी बात मनवाने की कोशिश करेगा।

    जस्टिस कौल ने अपनी किताब में कॉलेजियम से जुड़ी एक घटना का जिक्र किया है। जजों के छह खाली पदों को भरा जाना था। कॉलेजियम के सदस्य पहले ही पांच नामों पर सहमत हो चुके थे। कौल लिखते हैं, “बैठक में जाते समय सीजेआई ने एक छठा नाम सुझाया। बाकी जजों ने इसका विरोध किया। मुझे शक हुआ कि यह नाम सरकार के कहने पर सुझाया गया है। इसके बाद CJI उन्हें एक तरफ ले गए और सोचने लगे कि क्या उन्हें सरकार का रुख जानने के लिए फोन करना चाहिए।”

    कौल आगे लिखते हैं, “मेरा शक सही निकला और मैंने उनसे समझदारी से काम लेने को कहा। कॉलेजियम की बैठक के बीच वे ऐसा नहीं कर सकते थे।”

    एक अल्पसंख्यक समुदाय के जज उम्मीदवार की नियुक्ति के समय सरकार ने उनकी जाति और धार्मिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए। जस्टिस कौल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह के सवाल बेतुके थे। जब चंद्रचूड़ ने सरकार के रुख को साझा किया तो जस्टिस कौल इतने नाराज हो गए कि उन्होंने फाइल बंद की और कॉलेजियम की बैठक से वॉकआउट कर दिया। बाद में सरकार ने अपना रुख बदला और उस जज की नियुक्ति हो गई।


    ‘रीढ़ की हड्डी’ वाले जजों का सम्मान करती है सरकार

    आत्मकथा में जस्टिस कौल ने लिखा, “मेरा अनुभव रहा है कि सरकार उन जजों का बहुत अधिक सम्मान करती है जिनमें रीढ़ की हड्डी यानी कि दृढ़ता होती है। जब न्यायपालिका मजबूती से अपनी बात रखती है तो सरकार को पीछे हटना पड़ता है।” उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट का काम सरकार के साथ संतुलन बनाना है न कि विपक्ष की भूमिका निभाना। 2015 में रद्द किए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को तुरंत खारिज करने के बजाय एक मौका दिया जाना चाहिए था।

    उन्होंने राफेल लड़ाकू विमान मामले का भी जिक्र किया, जिसमें उनकी बेंच ने इस सौदे को दी गई चुनौती को खारिज कर दिया था। उन्होंने लिखा, “जो लोग मौजूदा सरकार का विरोध करते हैं वे उम्मीद करते हैं कि अदालत उनकी मदद के लिए आगे आएगी। लेकिन अदालत का काम यह नहीं है।”


    जस्टिस चंद्रचूड़ क्या बोले?

    जस्टिस कौल के इन दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “मैंने अभी किताब नहीं पढ़ी है, इसलिए संदर्भ जाने बिना टिप्पणी करना कठिन है। हालांकि, मेरे कार्यकाल में कॉलेजियम की बैठकें बेहद सम्मानजनक और सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई हैं। मुझे ऐसी किसी घटना की याद नहीं है जब जस्टिस कौल कॉलेजियम की बैठक से वॉकआउट कर गए हों। सरकार के साथ संवाद एक सामान्य प्रक्रिया है क्योंकि जजों की नियुक्ति का वारंट राष्ट्रपति ही जारी करते हैं।”


    कॉलेजियम की कमियों पर सवाल

    जस्टिस कौल ने अपनी किताब में उस न्यायिक प्रणाली की भी आलोचना की है जिसमें उन्होंने 22 वर्षों तक सेवा दी। उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली को अत्यधिक अपारदर्शी और कमियों से भरी बताया, जिसमें अनौपचारिक चैनलों के जरिए सरकारी दबाव की गुंजाइश बनी रहती है। इसके अलावा उन्होंने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में कुछ महत्वपूर्ण मामलों के उनके बेंच से हटाए जाने और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामांकन को टाले जाने पर भी अपनी निराशा व्यक्त की है।

  • नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर पूर्व CJI की चेतावनी,इनोसेंस को गिल्ट न बनाएं प्री-ट्रायल जेल सजा नहीं हो सकती

    नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर पूर्व CJI की चेतावनी,इनोसेंस को गिल्ट न बनाएं प्री-ट्रायल जेल सजा नहीं हो सकती


    जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने न्याय व्यवस्था, बेल सिस्टम और भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की। ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में उमर खालिद के मामले से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि वे अब जज के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर बोल रहे हैं।

    पूर्व CJI ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्धि से पहले जमानत मिलना अधिकार का विषय है, क्योंकि भारतीय कानून ‘इनोसेंस की पूर्वधारणा’ यानी निर्दोषता की धारणा पर आधारित है।उन्होंने कहा,प्री-ट्रायल बेल कभी सजा नहीं हो सकती।

    अगर कोई व्यक्ति 5–7 साल अंडरट्रायल रहकर अंत में बरी हो जाए, तो उसके खोए हुए समय की भरपाई कैसे होगी?

    बेल कब रोकी जा सकती है, सरल उदाहरण से समझाया
    चंद्रचूड़ ने बेल डिनाय करने की स्थितियों को आसान भाषा में समझाते हुए कहा कि बेल न देने के तीन क्लासिक एक्सेप्शन होते हैं
    आरोपी छूटने के बाद अपराध दोहरा सकता हो (जैसे सीरियल रेप या मर्डर केस)
    आरोपी भाग जाने की आशंका हो। आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता होउन्होंने स्पष्ट कहा,अगर ये तीनों परिस्थितियां मौजूद नहीं हैं, तो बेल नियम है, अपवाद नहीं।

    नेशनल सिक्योरिटी कानूनों पर चिंता
    पूर्व CJI ने कहा कि आज की बड़ी समस्या यह है कि नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े कानून ‘निर्दोषता’ की जगह ‘दोष’ की धारणा को बैठा देते हैं।

    उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अदालतों को यह जांचना चाहिए कि, क्या वाकई नेशनल सिक्योरिटी का मामला बनता हैक्या डिटेंशन प्रोपोर्शनल है। वरना लोग सालों तक जेल में सड़ते रहते हैं।

    स्पीडी ट्रायल नहीं तो आर्टिकल 21 का उल्लंघन
    चंद्रचूड़ ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रायल समय पर पूरे नहीं होते।अगर ट्रायल रीजनेबल टाइम में खत्म नहीं होता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्पीडी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। भले ही कोई कानून बेल से मना करे, लेकिन संविधान सर्वोच्च है।

    उमर खालिद का जिक्र
    उन्होंने कहा कि उमर खालिद को करीब 5 साल जेल में हो चुके हैं।मैं अपनी कोर्ट की आलोचना करने में झिझक रहा हूं, क्योंकि कुछ समय पहले तक मैं इसी संस्थान का नेतृत्व कर रहा था।

    लेकिन सिद्धांत साफ हैंअगर ट्रायल आगे नहीं बढ़ सकता, तो बेल ही नियम है, शर्तें लगाई जा सकती हैं।

    जिला अदालतों में बेल न देने की प्रवृत्ति चिंताजनकपूर्व CJI ने कहा कि हाईकोर्ट और जिला अदालतों में बेल न देने की आदत बन गई है, जो चिंता का विषय है।उन्होंने बताया कि जिला अदालतें न्याय प्रणाली का पहला इंटरफेस हैं, लेकिन वहां जज बेल देने से डरते हैं।जजों को लगता है कि बेल दी तो उनकी नीयत पर सवाल उठेंगेखासतौर पर फाइनेंशियल फ्रॉड जैसे मामलों में। नतीजा यह है कि केस सीधे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में हर साल करीब 70 हजार मामले आ रहे हैं।

    जजों पर नैतिक दबाव से डर का माहौल
    चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि कोई जिला जज गलत बेल देता है, तो उसे कानूनी तरीके से रिवर्स किया जाना चाहिए, लेकिन मोरल प्रेशर नहीं बनाना चाहिए।

    हाईकोर्ट की छोटी-सी टिप्पणी भी किसी जज का करियर तबाह कर सकती है। प्रमोशन रुक जाता है। इससे ऐसा इकोसिस्टम बनता है, जहां जज डर के माहौल में काम करते हैं।

    करप्शन पर स्पष्ट संदेश
    पूर्व CJI ने अंत में कहा, मैं भ्रष्टाचार को जस्टिफाई नहीं कर रहा, लेकिन सच यह है कि जज भी उसी समाज से आते हैं, जहां करप्शन है।हालांकि जज से समाज से कहीं ऊंचे नैतिक मानदंडों की अपेक्षा की जाती है। करप्शन रोकने के लिए जवाबदेही तय करने वाला प्रभावी सिस्टम जरूरी है।गलत फैसले को तुरंत करप्ट कह देना आसान है, लेकिन सच को समझना ज्यादा जरूरी है।”