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  • होर्मुज की सुरक्षा पर फ्रांस का बड़ा कदम, माइनहंटर युद्धपोत तैनात, ब्रिटेन-ओमान के साथ मिलकर संभालेगा मोर्चा

    होर्मुज की सुरक्षा पर फ्रांस का बड़ा कदम, माइनहंटर युद्धपोत तैनात, ब्रिटेन-ओमान के साथ मिलकर संभालेगा मोर्चा


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में हालिया कूटनीतिक घटनाक्रम के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित समुद्री आवागमन सुनिश्चित करने के लिए फ्रांस ने बड़ा कदम उठाया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने जानकारी दी कि उनके देश ने क्षेत्र में बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय करने वाले विशेष युद्धपोत (माइन काउंटरमेजर्स) तैनात किए हैं। साथ ही ब्रिटेन और फ्रांस ने ओमान के सहयोग से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने और आवश्यकता पड़ने पर बहुराष्ट्रीय मिशन तैनात करने की प्रतिबद्धता जताई है।

    राष्ट्रपति मैक्रों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बताया कि फ्रांस ने पश्चिम एशिया में दो माइनहंटर जहाज भेजे हैं। इनके साथ दो फ्रिगेट और एक मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट भी तैनात किया गया है। उन्होंने कहा कि ये सभी संसाधन सहयोगी देशों के साथ मिलकर होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित नौवहन बहाल करने और समुद्री यातायात की सुरक्षा मजबूत करने का काम करेंगे।

    मैक्रों के अनुसार, 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन को क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उनका कहना है कि इस समझौते से होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता को मजबूती मिली है।

    फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने बताया कि ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल सईद से बातचीत के बाद फ्रांस ने अपनी सैन्य तैनाती में बदलाव किया है। इसके तहत एयरक्राफ्ट कैरियर शार्ल द गॉल को उसके होम पोर्ट टूलों वापस भेजा जा रहा है, जबकि माइन काउंटरमेजर्स जहाज और उनके साथ मौजूद सुरक्षा बल क्षेत्र में तैनात रहेंगे तथा जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई के लिए तैयार रहेंगे।

    उधर, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और राष्ट्रपति मैक्रों ने शुक्रवार को जारी संयुक्त बयान में कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है और यहां सभी देशों के जहाजों की सुरक्षित आवाजाही पूरी दुनिया के हित से जुड़ा विषय है।

    संयुक्त बयान के अनुसार, ओमान ने अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर काम करने पर सहमति जताई है। दोनों देशों ने यह भी दोहराया कि वे क्षेत्रीय स्थिरता, सभी देशों की संप्रभुता के सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

  • चार दिवसीय फ्रांस दौरे पर रवाना हुईं निर्मला सीतारमण, द्विपक्षीय साझेदारी पर होगा फोकस

    चार दिवसीय फ्रांस दौरे पर रवाना हुईं निर्मला सीतारमण, द्विपक्षीय साझेदारी पर होगा फोकस


    नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर बुधवार को फ्रांस के लिए रवाना हो गईं। इस दौरे का उद्देश्य भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना, आर्थिक सहयोग को नई गति देना तथा निवेश, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में संबंधों को और विस्तार देना है।

    यात्रा के दौरान वित्त मंत्री कई उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठकों में भाग लेंगी। इस दौरे का प्रमुख आकर्षण भारत-फ्रांस आर्थिक एवं वित्तीय संवाद (Economic and Financial Dialogue-EFD) होगा, जिसकी सह-अध्यक्षता वह फ्रांस के अर्थव्यवस्था, वित्त तथा औद्योगिक एवं ऊर्जा संप्रभुता मंत्री रोलैंड लेस्क्योर के साथ ऐक्स-एन-प्रोवेंस में करेंगी। इस बैठक में दोनों देश आर्थिक सहयोग के नए अवसरों और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर विचार-विमर्श करेंगे।

    निर्मला सीतारमण वैश्विक कंपनियों के प्रमुख अधिकारियों (सीईओ) के साथ अलग-अलग बैठकें भी करेंगी। इसके अलावा वह प्रमुख उद्योगपतियों के साथ आयोजित एक राउंडटेबल चर्चा में शामिल होकर भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति, जारी संरचनात्मक सुधारों, निवेश की संभावनाओं और दीर्घकालिक विकास के अवसरों को प्रस्तुत करेंगी।

    वित्त मंत्रालय के अनुसार, वित्त मंत्री यूरोप के प्रतिष्ठित वार्षिक मंच ‘लेस रेन्कॉन्ट्रेस इकोनॉमिक्स डी’एक्स-एन-प्रोवेंस’ में “नए मध्यम वर्ग के विकास को कैसे बढ़ावा दें” विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में भी हिस्सा लेंगी। इस सम्मेलन में दुनिया भर के नीति-निर्माता, केंद्रीय बैंक प्रमुख, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, अर्थशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विशेषज्ञ वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर विचार साझा करेंगे।

    अपने दौरे के दौरान सीतारमण फ्रांस के कैडाराश स्थित इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (ITER) परियोजना का भी दौरा करेंगी। यह परमाणु संलयन (न्यूक्लियर फ्यूजन) ऊर्जा से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परियोजनाओं में शामिल है, जिसमें भारत और फ्रांस सहित 30 से अधिक देशों की भागीदारी है।

    इसके अलावा वित्त मंत्री ‘कैंपस साइबर’ का भी दौरा करेंगी, जो फ्रांस में साइबर सुरक्षा, अनुसंधान, नवाचार और कौशल विकास का प्रमुख केंद्र है। इस यात्रा के जरिए दोनों देशों के बीच साइबर सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में अनुभवों एवं सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान की उम्मीद है।

    यात्रा के दौरान सीतारमण प्रोवेंस-आल्प्स-कोटे डी’अजूर (PACA) क्षेत्र के अध्यक्ष रेनॉड म्यूसेलियर से भी मुलाकात करेंगी। इस बैठक में निवेश, स्वच्छ ऊर्जा, नवाचार, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी।

    अपने चार दिवसीय दौरे के अंतिम चरण में वित्त मंत्री फ्रांस में रह रहे भारतीय समुदाय के सदस्यों के साथ आयोजित एक सामुदायिक कार्यक्रम में भी हिस्सा लेंगी।

  • यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    नई दिल्ली । यूरोप इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है, जहां कई देशों में रिकॉर्ड स्तर का तापमान दर्ज किया जा रहा है। लगातार बढ़ती गर्मी ने स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली व्यवस्था और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर गंभीर दबाव पैदा कर दिया है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जबकि कई स्थानों पर अत्यधिक तापमान के कारण सामान्य जनजीवन भी प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का स्पष्ट संकेत है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। संगठन के अनुसार महाद्वीप का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। वर्तमान हीटवेव से लगभग 15 करोड़ लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं। कई देशों में स्कूलों के संचालन पर असर पड़ा है और बिजली की मांग अचानक बढ़ने से ऊर्जा प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है।

    जर्मनी में अत्यधिक गर्मी का असर परिवहन व्यवस्था पर भी दिखाई दिया। लीपज़िग में तेज तापमान के कारण ट्राम की पटरियों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आईं, जिससे सेवाएं प्रभावित हुईं। वहीं राजधानी बर्लिन में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पानी का छिड़काव किया गया। कई शहरों में प्रशासन ने लोगों से दोपहर के समय घरों में रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है।

    फ्रांस में स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह के दौरान सामान्य से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। अंतिम संस्कार से जुड़े संस्थानों पर भी काम का दबाव बढ़ा है। पेरिस सहित कई क्षेत्रों में श्मशान और कब्रिस्तानों की क्षमता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की बात सामने आई है। स्थानीय प्रशासन स्थिति पर लगातार निगरानी रखे हुए है और आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

    युद्धग्रस्त यूक्रेन में यह हीटवेव नई चुनौती बनकर उभरी है। पहले से क्षतिग्रस्त ऊर्जा ढांचे पर बढ़ती बिजली मांग का दबाव बढ़ गया है। कई इलाकों में बिजली आपूर्ति को संतुलित रखने के लिए आपातकालीन कटौती लागू की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध और भीषण गर्मी का संयुक्त प्रभाव देश की बिजली व्यवस्था के लिए गंभीर परीक्षा साबित हो रहा है।

    यूरोप के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। कई स्थानों पर सड़कें, रेल ढांचा और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं भीषण गर्मी से प्रभावित हुई हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक तापमान से जुड़ी अनेक तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, हालांकि प्रशासन लोगों से अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा न करने और केवल आधिकारिक सलाह का पालन करने की अपील कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती हीटवेव केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का गंभीर संकेत है। अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, ऊर्जा, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए दीर्घकालिक स्तर पर जलवायु अनुकूल नीतियों, हरित ऊर्जा के विस्तार और शहरी ढांचे को अत्यधिक तापमान के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में इस तरह की चरम मौसमी घटनाएं और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं।

  • फिलाडेल्फिया में फ्रांस का जलवा एम्बाप्पे के दो गोल से नॉकआउट में एंट्री

    फिलाडेल्फिया में फ्रांस का जलवा एम्बाप्पे के दो गोल से नॉकआउट में एंट्री


    नई दिल्ली। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में फ्रांस ने एक बार फिर अपना दमखम दिखाते हुए इराक को 3 0 से हराकर नॉकआउट राउंड में जगह पक्की कर ली। फिलाडेल्फिया में खेले गए इस मुकाबले में बारिश और खराब मौसम भी खेल का रोमांच कम नहीं कर सके और पूरे मैच में फ्रांस का दबदबा बना रहा। इस जीत के सबसे बड़े हीरो रहे Kylian Mbappé जिन्होंने दो गोल दागकर टीम को आसान जीत दिलाई।

    मैच की शुरुआत से ही फ्रांस ने आक्रामक खेल दिखाया। एम्बाप्पे ने 14वें मिनट में पहला गोल कर टीम को बढ़त दिला दी। इसके बाद इराक की टीम संभलने की कोशिश करती रही लेकिन फ्रांस का दबाव लगातार बढ़ता गया। दूसरे हाफ में 54वें मिनट में एम्बाप्पे ने एक और गोल कर स्कोर 2 0 कर दिया। यह गोल इराकी डिफेंडर की गलती का फायदा उठाकर किया गया, जिसमें एम्बाप्पे ने अपनी तेज रफ्तार और सटीक फिनिशिंग का बेहतरीन प्रदर्शन किया।

    इसके बाद उस्मान डेम्बेले ने तीसरा गोल कर फ्रांस की जीत पर मुहर लगा दी। इस जीत के साथ फ्रांस ने न केवल नॉकआउट राउंड में जगह बनाई बल्कि यह भी साबित कर दिया कि वह इस टूर्नामेंट की सबसे मजबूत दावेदार टीमों में शामिल है।

    यह मुकाबला मौसम की वजह से भी चर्चा में रहा। पहले हाफ के बाद तेज बारिश और तूफान की चेतावनी के चलते मैच को करीब दो घंटे तक रोकना पड़ा। मैदान पर पानी भर जाने के कारण खेल दोबारा शुरू कराना चुनौतीपूर्ण रहा लेकिन ग्राउंड स्टाफ की मेहनत के बाद मैच फिर से शुरू हुआ और फ्रांस ने अपनी लय बनाए रखी।

    इस मुकाबले में एम्बाप्पे के लिए यह और भी खास रहा क्योंकि यह उनका 100वां अंतरराष्ट्रीय मैच था। अपने करियर के इस अहम पड़ाव पर उन्होंने दो गोल कर इसे यादगार बना दिया। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने विश्व कप में अपने गोलों की संख्या 16 तक पहुंचा दी और कई दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया।

    एम्बाप्पे ने इस उपलब्धि के साथ जर्मनी के मिरोस्लाव क्लोज की बराबरी कर ली और ब्राजील के दिग्गज रोनाल्डो को पीछे छोड़ दिया। अब उनसे आगे केवल अर्जेंटीना के कप्तान लियोनेल मेसी हैं जिनके नाम 18 विश्व कप गोल दर्ज हैं।

    इराक की टीम के लिए यह मैच निराशाजनक रहा। टीम के प्रमुख स्ट्राइकर अयमेन हुसैन चोट के कारण मैदान छोड़ने को मजबूर हुए जिससे टीम की आक्रामक क्षमता कमजोर पड़ गई। इराक के लिए यह विश्व कप में सिर्फ दूसरा ही मौका था और इस हार के बाद उनका आगे का सफर काफी मुश्किल हो गया है।

    दूसरी ओर ग्रुप I से नॉर्वे ने भी नॉकआउट में जगह बना ली है। इस ग्रुप में मुकाबला बेहद रोमांचक रहा जिसमें नॉर्वे ने सेनेगल को 3 2 से हराया। नॉर्वे की जीत में एर्लिंग हालैंड ने दो गोल दागे जबकि मार्कस पेडरसन ने एक गोल किया। सेनेगल की ओर से इस्माइला सार ने दोनों गोल किए।

    इस तरह फ्रांस और नॉर्वे दोनों ने नॉकआउट में प्रवेश कर लिया है और अब आगे के मुकाबलों में खिताब की दौड़ और भी दिलचस्प हो गई है।

  • भारत की डिजिटल ताकत का फ्रांस में प्रदर्शन, गैलरीज लाफायेट में यूपीआई सेवा शुरू; पीयूष गोयल बोले- वैश्विक पहुंच का बड़ा पड़ाव

    भारत की डिजिटल ताकत का फ्रांस में प्रदर्शन, गैलरीज लाफायेट में यूपीआई सेवा शुरू; पीयूष गोयल बोले- वैश्विक पहुंच का बड़ा पड़ाव


    नई दिल्ली ।
    भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति को और मजबूत करते हुए फ्रांस के प्रमुख रिटेल केंद्रों में प्रवेश कर लिया है। फ्रांस के नीस मैसेना स्थित प्रतिष्ठित गैलरीज लाफायेट में यूपीआई सेवा की शुरुआत के साथ भारतीय डिजिटल भुगतान नेटवर्क को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक नई पहचान मिली है। इस अवसर पर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने इसे भारत की डिजिटल क्षमताओं और तकनीकी नवाचार की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

    यूपीआई सेवा शुरू होने के बाद अब भारतीय पर्यटक और ग्राहक फ्रांस के इस प्रसिद्ध रिटेल स्टोर में सीधे यूपीआई के माध्यम से भुगतान कर सकेंगे। इससे न केवल भुगतान प्रक्रिया अधिक आसान और सुरक्षित होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय डिजिटल इकोसिस्टम की स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल सीमापार डिजिटल लेनदेन को सरल बनाने और वैश्विक भुगतान प्रणाली में भारत की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

    पीयूष गोयल ने इस अवसर पर कहा कि फ्रांस के प्रमुख रिटेल गंतव्यों में से एक गैलरीज लाफायेट में यूपीआई का लॉन्च होना भारत की तकनीकी प्रगति और विश्वस्तरीय डिजिटल भुगतान समाधान की क्षमता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि यूपीआई के वैश्विक विस्तार की यात्रा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगी और इससे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी।

    इस पहल को सफल बनाने में डिजिटल भुगतान क्षेत्र की कंपनियों और तकनीकी साझेदारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सरकार का मानना है कि इस प्रकार की साझेदारियां वैश्विक स्तर पर सहज, सुरक्षित और इंटरऑपरेबल भुगतान व्यवस्था विकसित करने में मदद करेंगी। साथ ही इससे विदेशी बाजारों में भारतीय फिनटेक समाधानों के लिए नए अवसर भी पैदा होंगे।

    भारत और फ्रांस के बीच बढ़ते आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग के संदर्भ में भी इस पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक, औद्योगिक, तकनीकी और नवाचार आधारित सहयोग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यूपीआई का विस्तार इसी मजबूत होते संबंध का एक नया उदाहरण माना जा रहा है।

    फ्रांस दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री ने विभिन्न उद्योग प्रतिनिधियों, निवेशकों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों के साथ भी संवाद किया। इस दौरान उन्होंने भारत में उपलब्ध निवेश अवसरों, डिजिटल परिवर्तन और नवाचार आधारित विकास मॉडल पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने फ्रांसीसी उद्योग जगत से भारत की विकास यात्रा में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान भी किया।

    यात्रा के दौरान मंत्री ने यूरोप के प्रमुख विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र Sophia Antipolis का भी दौरा किया। यह केंद्र शोध, तकनीक और उद्योग के समन्वय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है, जहां हजारों तकनीकी कंपनियां अत्याधुनिक क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे नवाचार केंद्र भविष्य की अर्थव्यवस्था को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूपीआई का अंतरराष्ट्रीय विस्तार भारतीय डिजिटल भुगतान प्रणाली को वैश्विक मान्यता दिलाने के साथ-साथ पर्यटन, व्यापार और सीमा-पार वित्तीय लेनदेन को भी नई गति देगा। आने वाले वर्षों में अन्य देशों और प्रमुख वैश्विक बाजारों में भी यूपीआई की पहुंच बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

  • भारत-फ्रांस तकनीकी साझेदारी को नई रफ्तार, इनोवेशन और निवेश के जरिए वैश्विक विकास का साझा रोडमैप तैयार

    भारत-फ्रांस तकनीकी साझेदारी को नई रफ्तार, इनोवेशन और निवेश के जरिए वैश्विक विकास का साझा रोडमैप तैयार


    नई दिल्ली ।
    भारत और फ्रांस के बीच तकनीक, नवाचार और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में संबंध लगातार मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने फ्रांस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के नेतृत्व में द्विपक्षीय संबंधों ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय गति प्राप्त की है और अब यह साझेदारी भविष्य की प्रौद्योगिकियों तथा नवाचार आधारित विकास पर केंद्रित होती जा रही है।

    फ्रांस में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों और बैठकों के दौरान गोयल ने उद्योग जगत, अनुसंधान संस्थानों, शिक्षाविदों और नवाचार क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के साथ विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत और फ्रांस के बीच सहयोग केवल व्यापारिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उभरती तकनीकों, अनुसंधान, स्टार्टअप विकास और सतत आर्थिक प्रगति जैसे क्षेत्रों तक विस्तारित हो चुका है। दोनों देशों के बीच बढ़ती भागीदारी वैश्विक चुनौतियों के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    अपने दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री ने यूरोप के प्रमुख विज्ञान और तकनीकी केंद्र सोफिया एंटीपोलिस का भी भ्रमण किया। उन्होंने इसे यूरोप की सिलिकॉन वैली बताते हुए कहा कि यह केंद्र इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार अनुसंधान, प्रतिभा और उद्योग एक साथ मिलकर नवाचार को बढ़ावा दे सकते हैं। यहां हजारों कंपनियां अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत हैं और वैश्विक स्तर पर नई तकनीकों के विकास में योगदान दे रही हैं।

    गोयल ने कहा कि भारत आज दुनिया के सबसे तेजी से उभरते नवाचार और विनिर्माण केंद्रों में शामिल हो चुका है। देश का स्टार्टअप इकोसिस्टम लगातार विस्तार कर रहा है और नई तकनीकों के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ है। उन्होंने फ्रांसीसी कंपनियों और निवेशकों को भारत में निवेश बढ़ाने, तकनीकी सहयोग स्थापित करने और संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं में भागीदारी करने का निमंत्रण दिया।

    मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत का नवाचार ढांचा वैश्विक भागीदारी को प्रोत्साहित कर रहा है। उन्होंने कहा कि नई तकनीकों के विकास, ज्ञान साझेदारी और अनुसंधान सहयोग के माध्यम से दोनों देश न केवल अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत कर सकते हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सकारात्मक प्रभाव छोड़ सकते हैं। उनके अनुसार, तकनीकी क्षेत्र में संयुक्त प्रयास आने वाले वर्षों में नई संभावनाओं के द्वार खोलेंगे।

    फ्रांस के शहर नीस में आयोजित बैठकों के दौरान भी भारत और फ्रांस के बीच नवाचार तथा निवेश सहयोग को विस्तार देने पर चर्चा हुई। इस दौरान स्थानीय प्रशासन, उद्योग जगत, निवेश संस्थानों और नवाचार क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ विभिन्न संभावित साझेदारियों पर विचार-विमर्श किया गया। इन बैठकों का उद्देश्य दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग को व्यावहारिक परियोजनाओं में बदलना और दीर्घकालिक निवेश अवसरों को बढ़ावा देना था।

    नीस में आयोजित ‘भारत इनोवेट्स 2026’ कार्यक्रम ने भी व्यापक ध्यान आकर्षित किया। इस आयोजन में देश के विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों से जुड़े स्टार्टअप और प्रमुख संस्थानों ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में वैश्विक निवेशकों और वेंचर कैपिटल प्रतिनिधियों की भागीदारी ने यह संकेत दिया कि भारत का नवाचार और स्टार्टअप क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से विश्वास अर्जित कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और फ्रांस के बीच बढ़ता तकनीकी सहयोग भविष्य में आर्थिक विकास, अनुसंधान साझेदारी और वैश्विक नवाचार नेटवर्क को नई मजबूती प्रदान कर सकता है।

  • अमेरिकी हमले में 3 भारतीयों की मौत पर घिरी सरकार, उधर ट्रंप से पीएम मोदी की होनी है मुलाकात, क्या-क्या होगा?

    अमेरिकी हमले में 3 भारतीयों की मौत पर घिरी सरकार, उधर ट्रंप से पीएम मोदी की होनी है मुलाकात, क्या-क्या होगा?

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच 17 जून को होने वाली प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक ऐसे समय में आयोजित होने जा रही है, जब ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नागरिकों की मौत का मामला राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चा के केंद्र में है। इस घटना के बाद देश के भीतर सरकार पर दबाव बढ़ा है और विपक्ष लगातार अमेरिका से जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग कर रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं की यह मुलाकात सामान्य राजनयिक बैठक से कहीं अधिक महत्व रखती है।

    फ्रांस में आयोजित होने वाले जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रस्तावित इस बैठक पर अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों स्तरों पर नजरें टिकी हुई हैं। भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा संबंधों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने द्विपक्षीय संबंधों के सामने एक संवेदनशील चुनौती भी खड़ी कर दी है।

    ओमान की खाड़ी में हुई सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नागरिकों की मौत के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से अधिक सक्रिय और स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है। राजनीतिक दलों का कहना है कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मामलों में सरकार को ठोस जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। विपक्ष का तर्क है कि यह केवल विदेश नीति का नहीं बल्कि भारतीय नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा का भी प्रश्न है।

    इस बीच भारत की ओर से राजनयिक स्तर पर इस मुद्दे को उठाए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि अमेरिकी पक्ष की ओर से अब तक कोई सार्वजनिक खेद या विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसी वजह से मोदी-ट्रंप वार्ता में इस विषय के शामिल होने की संभावना को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय नेतृत्व इस मामले को संवेदनशीलता और संतुलन के साथ उठाने का प्रयास कर सकता है।

    बैठक का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से जुड़ा हुआ है। दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही है। उम्मीद की जा रही है कि दोनों नेता वार्ता की प्रगति की समीक्षा करेंगे और भविष्य के आर्थिक सहयोग की दिशा पर चर्चा करेंगे। हालांकि तत्काल किसी अंतिम समझौते की संभावना कम मानी जा रही है, फिर भी यह बैठक आगे की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी साझेदारी, आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी संभावित एजेंडे का हिस्सा मानी जा रही हैं। पश्चिम एशिया की बदलती स्थिति, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े मुद्दे भी दोनों देशों के बीच चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं। विशेष रूप से ओमान की खाड़ी और उससे जुड़े समुद्री मार्गों का महत्व वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुलाकात केवल विदेश नीति का विषय नहीं है, बल्कि इसका घरेलू राजनीतिक प्रभाव भी पड़ सकता है। विपक्ष पहले से ही सरकार के रुख पर सवाल उठा रहा है और वह इस बैठक के परिणामों को बारीकी से देखेगा। यदि भारतीय नागरिकों की मौत का मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता है, तो यह सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण संदेश माना जाएगा।

    आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों देशों के बीच वार्ता किन ठोस निष्कर्षों तक पहुंचती है। फिलहाल इतना तय है कि जी-7 सम्मेलन के दौरान होने वाली मोदी-ट्रंप बैठक भारत-अमेरिका संबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा और भारतीय नागरिकों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के कारण विशेष महत्व रखती है।

  • राफेल डील में निर्णायक मोड़ की उम्मीद, मैक्रों-मोदी वार्ता में भारत की ‘सोर्स कोड एक्सेस’ मांग पर टिकी रणनीतिक साझेदारी की नजर

    राफेल डील में निर्णायक मोड़ की उम्मीद, मैक्रों-मोदी वार्ता में भारत की ‘सोर्स कोड एक्सेस’ मांग पर टिकी रणनीतिक साझेदारी की नजर

    नई दिल्ली । भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने वाली प्रस्तावित 114 राफेल लड़ाकू विमानों की डील एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की हालिया मुलाकात को इस सौदे के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेष रूप से भारतीय वायु सेना की उस प्रमुख मांग पर सभी की नजरें टिकी हैं, जिसके तहत भारत राफेल विमान के कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी इंटरफेस और सिस्टम तक अधिक पहुंच चाहता है, ताकि भविष्य में स्वदेशी हथियारों और तकनीकों का बेहतर एकीकरण किया जा सके।

    भारत पहले ही राफेल लड़ाकू विमानों को अपनी वायु शक्ति का अहम हिस्सा बना चुका है। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन और स्वदेशी हथियार प्रणालियों के बढ़ते उपयोग को देखते हुए केवल विमान खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करने की है कि देश में विकसित मिसाइलों और अन्य उन्नत हथियारों को राफेल प्लेटफॉर्म पर अपेक्षाकृत स्वतंत्र तरीके से एकीकृत किया जा सके।

    यही कारण है कि इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स और संबंधित तकनीकी पहुंच का मुद्दा इस डील में विशेष महत्व रखता है। ये तकनीकी दस्तावेज विमान के विभिन्न सिस्टमों के बीच संचार और संचालन की संरचना को परिभाषित करते हैं। इनके अभाव में किसी भी नए हथियार या सिस्टम को विमान में शामिल करने के लिए मूल निर्माता की तकनीकी स्वीकृति और सहयोग की आवश्यकता पड़ सकती है। भारत लंबे समय से ऐसी व्यवस्था चाहता है जिससे स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को अधिक गति मिल सके।

    फ्रांस ने अब तक राफेल के कुछ अत्यंत संवेदनशील एवियोनिक्स और मिशन सिस्टम से जुड़े पूर्ण सोर्स कोड साझा करने में सावधानी बरती है। इन प्रणालियों में उन्नत रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और मिशन कंप्यूटर जैसे महत्वपूर्ण घटक शामिल हैं। रक्षा क्षेत्र में इन तकनीकों को किसी भी लड़ाकू विमान की सबसे संवेदनशील और रणनीतिक संपत्तियों में गिना जाता है। यही वजह है कि इस विषय पर दोनों देशों के बीच विस्तृत तकनीकी और रणनीतिक बातचीत जारी है।

    प्रस्तावित नई डील की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका विनिर्माण मॉडल है। योजना के अनुसार शुरुआती सीमित संख्या में विमान सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि अधिकांश विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा। यदि यह व्यवस्था अंतिम रूप लेती है तो पहली बार राफेल लड़ाकू विमान का बड़े पैमाने पर निर्माण फ्रांस के बाहर होगा। इससे भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलने के साथ-साथ रोजगार, तकनीकी कौशल और औद्योगिक क्षमता में भी वृद्धि होने की संभावना है।

    भारत इस परियोजना में अधिक स्वदेशी भागीदारी और स्थानीय सामग्री के उपयोग पर भी जोर दे रहा है। सरकार का उद्देश्य केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक तकनीकी साझेदारी और रक्षा आत्मनिर्भरता को मजबूत करना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तकनीकी पहुंच और स्थानीय उत्पादन से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनती है तो यह सौदा भारत-फ्रांस रणनीतिक संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है।

    आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच होने वाली चर्चाएं इस बात को तय करेंगी कि रक्षा सहयोग का यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल रक्षा और रणनीतिक समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत की प्रमुख तकनीकी मांगों पर कितना सकारात्मक समाधान निकल पाता है।

  • FCAS प्रोग्राम के टूटने के बाद फ्रांस का बड़ा दांव, 2040 तक अकेले विकसित करेगा छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान

    FCAS प्रोग्राम के टूटने के बाद फ्रांस का बड़ा दांव, 2040 तक अकेले विकसित करेगा छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान

    नई दिल्ली । यूरोप की महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजनाओं में शामिल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम के बंद होने के बाद वैश्विक रक्षा क्षेत्र में नए समीकरण उभरते दिखाई दे रहे हैं। फ्रांस ने अब स्पष्ट संकेत दिया है कि वह छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास का काम अपने दम पर आगे बढ़ाएगा। इस निर्णय को केवल एक रक्षा परियोजना का पुनर्गठन नहीं बल्कि यूरोपीय सैन्य उद्योग में बदलते शक्ति संतुलन के रूप में भी देखा जा रहा है।

    कई वर्षों से फ्रांस, जर्मनी और स्पेन संयुक्त रूप से FCAS कार्यक्रम पर काम कर रहे थे। इस परियोजना का उद्देश्य वर्ष 2040 के आसपास ऐसी उन्नत लड़ाकू विमान प्रणाली विकसित करना था जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता, मानव रहित सहयोगी प्लेटफॉर्म और अत्याधुनिक स्टेल्थ तकनीकों से लैस हो। हालांकि परियोजना में जिम्मेदारियों, तकनीकी नियंत्रण और औद्योगिक हिस्सेदारी को लेकर लगातार मतभेद सामने आते रहे।

    फ्रांसीसी नेतृत्व ने अब संकेत दिया है कि पिछले वर्षों में किए गए अरबों यूरो के निवेश और अनुसंधान कार्य को आधार बनाकर देश अपने स्वतंत्र कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा। फ्रांस का मानना है कि अब तक विकसित की गई तकनीकी क्षमताएं उसे अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान निर्माण की दिशा में आत्मनिर्भर रूप से आगे बढ़ने में सक्षम बनाती हैं। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट पहले से ही राफेल जैसे सफल लड़ाकू विमान का निर्माण कर चुकी है, जिससे इस परियोजना को तकनीकी आधार मिलने की उम्मीद है।

    दूसरी ओर जर्मनी ने भी अपने सहयोगी औद्योगिक समूहों के साथ अलग रास्ता अपनाने का संकेत दिया है। कई प्रमुख रक्षा और एयरोस्पेस कंपनियों ने मिलकर एक नया औद्योगिक गठबंधन तैयार किया है, जिसका उद्देश्य भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रम को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाना है। इससे स्पष्ट है कि यूरोप अब एक साझा मंच के बजाय समानांतर सैन्य विमानन परियोजनाओं की ओर बढ़ सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और फ्रांस के बीच पिछले एक दशक में रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद और नौसैनिक सहयोग ने दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई दी है। ऐसे में फ्रांस यदि अपने नए लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की तलाश करता है तो भारत एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में सामने आ सकता है।

    हालांकि संभावित साझेदारी का रास्ता आसान नहीं होगा। भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है। किसी भी संयुक्त कार्यक्रम में भारत की प्राथमिकता केवल खरीददार की भूमिका निभाने के बजाय सह-विकास और सह-उत्पादन की होगी। उन्नत इंजन तकनीक, मिशन सिस्टम, सोर्स कोड और महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा तक पहुंच जैसे मुद्दे किसी भी संभावित समझौते के केंद्र में रहेंगे।

    इसके साथ ही भारत पहले से ही अपने स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम पर तेजी से काम कर रहा है। ऐसे में नीति निर्माताओं को यह तय करना होगा कि भविष्य की जरूरतों के लिए स्वदेशी परियोजना को प्राथमिकता दी जाए या किसी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के माध्यम से छठी पीढ़ी की तकनीकों तक तेजी से पहुंच बनाई जाए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फ्रांस की नई रणनीति और भारत की रक्षा आवश्यकताओं के बीच कई साझा अवसर उभर सकते हैं। हालांकि किसी भी संभावित सहयोग का अंतिम स्वरूप तकनीकी हस्तांतरण, लागत, औद्योगिक भागीदारी और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर निर्भर करेगा। फिलहाल FCAS कार्यक्रम का अंत एक अध्याय का समापन जरूर है, लेकिन इससे भविष्य की नई रक्षा साझेदारियों के लिए कई संभावनाएं भी खुलती दिखाई दे रही हैं।

  • भारत इनोवेट्स 2026 में आईआईटी मद्रास की बड़ी मौजूदगी, 15 स्टार्टअप्स और अत्याधुनिक शोध परियोजनाएं होंगी प्रदर्शित

    भारत इनोवेट्स 2026 में आईआईटी मद्रास की बड़ी मौजूदगी, 15 स्टार्टअप्स और अत्याधुनिक शोध परियोजनाएं होंगी प्रदर्शित

    नई दिल्ली । भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास वैश्विक स्तर पर भारतीय तकनीकी नवाचारों और स्टार्टअप इकोसिस्टम की क्षमता को प्रदर्शित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। फ्रांस में आयोजित होने वाले ‘भारत इनोवेट्स 2026’ कार्यक्रम में संस्थान अपने डीप-टेक अनुसंधान, उभरती प्रौद्योगिकियों और नवाचार आधारित स्टार्टअप्स को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करेगा। इस आयोजन को भारत और फ्रांस के बीच तकनीकी सहयोग तथा नवाचार साझेदारी को मजबूत करने के एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

    यह कार्यक्रम 14 से 16 जून के बीच आयोजित किया जाएगा, जिसमें भारत के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों और तकनीकी संगठनों से जुड़े नवाचारों को वैश्विक समुदाय के सामने रखा जाएगा। आयोजन का उद्देश्य उभरती तकनीकों और स्टार्टअप्स को निवेशकों, नीति निर्माताओं, उद्योग विशेषज्ञों, शोध संस्थानों और तकनीकी साझेदारों से जोड़ना है, ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के अवसर मिल सकें।

    आईआईटी मद्रास इस कार्यक्रम में प्रमुख भूमिका निभाते हुए दो महत्वपूर्ण विषयगत क्षेत्रों का नेतृत्व करेगा। संस्थान अपने साथ जुड़े 15 स्टार्टअप्स को भी प्रदर्शित करेगा, जो विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों में अभिनव समाधान विकसित कर रहे हैं। इसके अलावा पांच प्रमुख शोध परियोजनाओं को भी प्रदर्शित किया जाएगा, जो भारत की स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं और अनुसंधान आधारित विकास को रेखांकित करेंगी।

    प्रदर्शित की जाने वाली प्रमुख तकनीकों में हाइपरलूप परिवहन प्रणाली, लैब-ग्रोन डायमंड तकनीक, स्वदेशी 5जी और 6जी संचार समाधान, स्मार्ट पोर्ट ऑटोमेशन तथा कम कंप्यूटिंग संसाधनों पर आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल शामिल हैं। ये सभी परियोजनाएं भविष्य की तकनीकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विकसित की जा रही हैं और इनमें वैश्विक स्तर पर उपयोग की संभावनाएं देखी जा रही हैं।

    संस्थान के अनुसार, हाइपरलूप तकनीक भारत की अगली पीढ़ी की परिवहन व्यवस्था को नई दिशा दे सकती है। इसी प्रकार स्वदेशी 5जी और 6जी समाधान देश को दूरसंचार क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। वहीं, कम कंप्यूटिंग क्षमता पर कार्य करने वाले एआई मॉडल्स को ऐसे क्षेत्रों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जहां संसाधन सीमित हैं लेकिन डिजिटल समाधान की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है।

    कार्यक्रम में ब्लू इकोनॉमी से जुड़े नवाचारों को भी विशेष स्थान मिलेगा। समुद्री और ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विकसित स्वायत्त प्रणालियां, अंडरवॉटर निरीक्षण तकनीकें और समुद्री शैवाल आधारित टिकाऊ उत्पाद इस क्षेत्र की प्रमुख आकर्षण परियोजनाओं में शामिल होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीकें पर्यावरणीय स्थिरता और औद्योगिक दक्षता दोनों को बढ़ावा दे सकती हैं।

    आईआईटी मद्रास के नेतृत्व का मानना है कि यह आयोजन केवल तकनीकी प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत और फ्रांस के बीच शोध, नवाचार, स्टार्टअप सहयोग और प्रतिभा आदान-प्रदान के नए अवसर भी पैदा करेगा। विशेष रूप से दूरसंचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण और सतत विकास से जुड़े क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

    तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भारतीय संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी देश के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को नई पहचान दिला रही है। आईआईटी मद्रास की भागीदारी इस बात का संकेत है कि भारतीय अनुसंधान संस्थान अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक तकनीकी विकास और उद्योग परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    ‘भारत इनोवेट्स 2026’ जैसे आयोजन भारतीय स्टार्टअप्स और शोध परियोजनाओं को अंतरराष्ट्रीय निवेश, साझेदारी और तकनीकी सहयोग के नए अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। इससे भारत की नवाचार क्षमता को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूती मिलने की उम्मीद है।