Tag: France

  • फ्रांस के जंगल में लगी भीषण आग के बाद मिले वर्ल्ड वॉर-2 के 400 से ज्यादा गोले और अन्य विस्फोट

    फ्रांस के जंगल में लगी भीषण आग के बाद मिले वर्ल्ड वॉर-2 के 400 से ज्यादा गोले और अन्य विस्फोट


    पेरिस
    । फ्रांस (France) के दक्षिण-पश्चिम (South-west) में बसे ले पोर्ज (Le Porge) गांव में जंगल की भीषण आग के बाद एक बड़ा खुलासा हुआ है. यहां 400 से ज्यादा वर्ल्ड वॉर 2 (World War II) के गोले और दूसरे विस्फोटक मिले हैं. जुलाई में लगी आग के दौरान गांव के करीब 3,500 लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े थे. आग शांत होने के बाद जब अधिकारी इलाके की जांच कर रहे थे, तब जमीन के नीचे दबा यह गोला-बारूद मिला. अधिकारियों का कहना है कि आग की तेज गर्मी की वजह से कुछ गोले फट गए और तभी उनके बारे में पता चला।

    आग लगने के दौरान गांव के पास कई धमाकों की आवाज भी सुनाई दी थी. इसके बाद बम निरोधक टीम मौके पर पहुंची. पहले एक खेत से 75 गोले मिले. फिर पूरे इलाके की जांच की गई, जिसमें 400 से ज्यादा गोले और दूसरे विस्फोटक बरामद हुए. लोगों की सुरक्षा को देखते हुए कुछ समय के लिए इस इलाके में आने-जाने पर रोक लगा दी गई।


    आग की गर्मी से मिला सुराग

    अधिकारियों के मुताबिक, मिले गोलों में फ्रांस और जर्मनी दोनों के मोर्टार शेल शामिल हैं. माना जा रहा है कि ये वर्ल्ड वॉर 2 के समय के हैं. ये गोले कई सालों से जमीन के नीचे दबे थे. जंगल की आग के दौरान जमीन बहुत ज्यादा गर्म हो गई. इसी गर्मी की वजह से कुछ गोले फट गए और अधिकारियों को उनका पता चल गया।

    अधिकारियों ने कहा कि इन पुराने गोलों में अब भी धमाका होने का खतरा था. अगर इनमें विस्फोट होता, तो इनके टुकड़े काफी दूर तक जा सकते थे और लोगों को नुकसान पहुंचा सकते थे. इसलिए पहले पूरे इलाके को सुरक्षित किया गया. इसके बाद बम निरोधक टीम ने सभी गोले और दूसरे विस्फोटकों को हटाया। जांच पूरी होने के बाद लोगों को अपने घर लौटने की इजाजत दे दी गई।


    इस साल फ्रांस में रिकॉर्ड जंगल की आग

    इस साल फ्रांस में जंगल की आग ने 1.6 लाख हेक्टेयर (160,000 हेक्टेयर) से ज्यादा जमीन जला दी है. यह देश में अब तक की सबसे बड़ी जंगल की आग मानी जा रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से यूरोप में जंगल की आग पहले से ज्यादा बड़ी और तेजी से फैल रही है. बढ़ती गर्मी, लंबे समय तक सूखा और तेज हवाएं ऐसी आग को और खतरनाक बना रही हैं।

    वर्ल्ड वॉर 2 खत्म हुए 80 साल से ज्यादा हो चुके हैं. इसके बाद भी यूरोप के कई इलाकों में आज भी पुराने बम और गोले जमीन के नीचे दबे मिल जाते हैं. कई बार निर्माण का काम, सूखा या जंगल की आग जैसी घटनाओं के बाद ये सामने आ जाते हैं. हाल ही में हंगरी में डेन्यूबे नदी का पानी कम होने पर भी वर्ल्ड वॉर 2 के कई बम दिखाई दिए थे।

  • निवेश और तकनीक साझेदारी को मिलेगी नई रफ्तार, वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति होगी मजबूत

    निवेश और तकनीक साझेदारी को मिलेगी नई रफ्तार, वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति होगी मजबूत

    नई दिल्ली ।भारत, फ्रांस और अरब देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। देश के प्रमुख उद्योग संगठन एसोचैम ने अंतरराष्ट्रीय कारोबारी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बिजनेस फ्रांस और भारत एवं अरब देशों के वाणिज्य, उद्योग एवं कृषि मंडल के साथ रणनीतिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों का उद्देश्य व्यापार विस्तार, निवेश को प्रोत्साहन, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक बाजारों में भारतीय कंपनियों की पहुंच को मजबूत करना है।

    एसोचैम के अनुसार, इन समझौतों के माध्यम से विभिन्न देशों के उद्योगों और संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाएगा। इसके तहत व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों के आदान-प्रदान, निवेश के अवसरों की पहचान, नई तकनीकों के उपयोग और संयुक्त कारोबारी परियोजनाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा।

    बिजनेस फ्रांस के साथ हुए समझौते में भारत और फ्रांस की कंपनियों के बीच व्यापार एवं निवेश के नए अवसर विकसित करने की योजना बनाई गई है। दोनों संस्थाएं तकनीकी सहयोग, संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा देने, बाजार से जुड़ी जानकारियों के आदान-प्रदान और व्यापारिक आयोजनों के संयुक्त संचालन में सहयोग करेंगी।

    समझौते के तहत व्यापार मेलों, प्रदर्शनियों, सम्मेलनों और अन्य कारोबारी गतिविधियों के जरिए दोनों देशों के उद्यमों को एक-दूसरे के करीब लाने का प्रयास किया जाएगा। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों को भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

    एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि वैश्विक बाजारों में भारत की बढ़ती भागीदारी उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा कर रही है। उन्होंने कहा कि फ्रांस और अरब देशों के साथ हुई ये साझेदारियां मजबूत संस्थागत संबंध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इससे कंपनियों को नए बाजार तलाशने, निवेश बढ़ाने और लंबे समय तक टिकाऊ आर्थिक विकास को गति देने में मदद मिलेगी।

    बिजनेस फ्रांस के कृषि निर्यात प्रभाग के प्रमुख वियानी मेनिएर ने इस साझेदारी को भारत और फ्रांस के कारोबारी संबंधों को मजबूत करने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि इससे दोनों देशों की कंपनियों, संस्थानों और निवेशकों के बीच सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे।

    भारत एवं अरब देशों के वाणिज्य, उद्योग एवं कृषि मंडल के कार्यवाहक महासचिव डॉ. वाइल एस. एच. अव्वाद ने कहा कि यह समझौता भारत और अरब क्षेत्र के बीच व्यापारिक संवाद को बढ़ाने में मदद करेगा। इसके जरिए निवेश साझेदारियों को प्रोत्साहन मिलेगा और दोनों क्षेत्रों के बीच आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिलेगी।

    इस समझौते के तहत व्यापारिक सूचनाओं का साझा उपयोग, निवेश संबंधी अवसरों की पहचान, संयुक्त परियोजनाओं को बढ़ावा देना और तकनीकी हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जाएगा। इससे भारतीय कंपनियों को नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

    भारत, फ्रांस और अरब देशों के बीच यह पहल ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर व्यापारिक साझेदारियां तेजी से बदल रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के समझौते भारतीय उद्योगों को विदेशी बाजारों से जोड़ने, निवेश आकर्षित करने और नई तकनीकों तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • राफेल सौदे पर तकनीकी अड़चनें बरकरार, सोर्स कोड और रडार तकनीक साझा करने पर फ्रांस अब भी सतर्क

    राफेल सौदे पर तकनीकी अड़चनें बरकरार, सोर्स कोड और रडार तकनीक साझा करने पर फ्रांस अब भी सतर्क

    नई दिल्ली । भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत होता रहा है, लेकिन राफेल लड़ाकू विमान से जुड़ी उन्नत तकनीकों के हस्तांतरण का मुद्दा अब भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। भारतीय वायुसेना के लिए 114 बहुउद्देश्यीय राफेल लड़ाकू विमानों की संभावित खरीद को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है, हालांकि विमान के सोर्स कोड और रडार से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों के विषय पर सहमति बनने में अभी समय लग सकता है।

    भारत लंबे समय से ऐसी तकनीकी पहुंच चाहता है, जिससे भविष्य में राफेल विमानों में स्वदेशी हथियारों और नई प्रणालियों का एकीकरण स्वतंत्र रूप से किया जा सके। इसी उद्देश्य से रक्षा मंत्रालय विमान के इंटरफेस डेटा और आवश्यक तकनीकी जानकारी प्राप्त करने पर जोर दे रहा है। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को घरेलू तकनीक के साथ राफेल प्लेटफॉर्म को बेहतर ढंग से अनुकूलित करने में मदद मिल सकती है।

    जानकारी के अनुसार, भारत ने इस वर्ष मई में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए औपचारिक अनुरोध भेजा था। अब फ्रांस की ओर से उसके जवाब का इंतजार किया जा रहा है। जवाब मिलने के बाद दोनों पक्ष कीमत, तकनीकी सहयोग, उत्पादन व्यवस्था और अन्य व्यावसायिक शर्तों पर विस्तृत चर्चा करेंगे। प्रस्तावित समझौते में देश के भीतर बड़े पैमाने पर विनिर्माण को भी प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे रक्षा उत्पादन क्षमता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सके।

    बताया जा रहा है कि प्रस्तावित परियोजना में अधिकांश निर्माण कार्य भारत में ही किए जाने की योजना है। इसके तहत स्थानीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यह पहल रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को गति देने और आधुनिक तकनीक के साथ भारतीय उद्योग को जोड़ने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

    हालांकि तकनीकी स्तर पर दो प्रमुख चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। पहली चुनौती राफेल में इस्तेमाल होने वाले अत्याधुनिक एईएसए रडार से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकारों की है। इन अधिकारों के कारण भारत को रडार प्रणाली में स्वतंत्र बदलाव या नई क्षमताओं के समावेश में सीमाएं आ सकती हैं। दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण चुनौती विमान के सोर्स कोड तक पहुंच की है, जिसे फ्रांस अत्यंत संवेदनशील रणनीतिक तकनीक मानता है।

    राफेल का सोर्स कोड विमान के मिशन कंप्यूटर, सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और कई महत्वपूर्ण डिजिटल प्रणालियों का आधार माना जाता है। यही कारण है कि इस तकनीक को फ्रांस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण संपत्ति के रूप में देखता है और इसके पूर्ण हस्तांतरण को लेकर सावधानी बरत रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर की तकनीक साझा करने का निर्णय केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी पहलुओं से भी जुड़ा होता है।

    भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में अस्त्र जैसी स्वदेशी हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, रुद्रम जैसी एंटी-रेडिएशन मिसाइलों तथा अन्य घरेलू हथियार प्रणालियों को राफेल में आसानी से एकीकृत करने की आवश्यकता होगी। यदि आवश्यक तकनीकी पहुंच उपलब्ध नहीं होती है तो प्रत्येक बड़े उन्नयन या एकीकरण के लिए मूल निर्माता पर निर्भरता बनी रह सकती है।

    रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को देखते हुए बातचीत आगे बढ़ने की संभावना बनी हुई है। आने वाले दौर की वार्ताओं में तकनीकी सहयोग, उत्पादन साझेदारी और संचालन संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना सबसे बड़ी चुनौती रहेगा। यदि इन मुद्दों पर सहमति बनती है तो यह समझौता भारतीय वायुसेना की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को भी नई दिशा दे सकता है।

  • यूएन मानवाधिकार प्रमुख के पुनर्नियुक्ति विवाद पर अमेरिका का कड़ा विरोध, फ्रांस के भाषण के दौरान छोड़ी बैठक

    यूएन मानवाधिकार प्रमुख के पुनर्नियुक्ति विवाद पर अमेरिका का कड़ा विरोध, फ्रांस के भाषण के दौरान छोड़ी बैठक

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क के दूसरे कार्यकाल को लेकर अमेरिका और फ्रांस के बीच गंभीर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। यह विवाद उस समय और गहरा गया जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक के दौरान फ्रांस के प्रतिनिधि के संबोधन की शुरुआत होते ही अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल विरोध दर्ज कराते हुए बैठक से बाहर निकल गया। कूटनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को दोनों पारंपरिक सहयोगी देशों के रिश्तों में बढ़ते तनाव का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    यह पूरा विवाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए उस मतदान के बाद शुरू हुआ, जिसमें वोल्कर टर्क को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में दूसरा कार्यकाल दिया गया। मतदान में उन्हें 144 देशों का समर्थन मिला, जबकि 10 देशों ने विरोध किया और 13 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। अमेरिका और रूस ने उनके पुनर्नियुक्ति का विरोध किया, लेकिन पर्याप्त समर्थन मिलने के कारण उनका दूसरा कार्यकाल सुनिश्चित हो गया। भारत ने भी उनके पक्ष में मतदान किया, जबकि मतदान प्रक्रिया से जुड़े कुछ अन्य प्रस्तावों पर उसने हिस्सा नहीं लिया।

    मानवाधिकार प्रमुख के चयन को लेकर पैदा हुए मतभेद सुरक्षा परिषद की बैठक तक पहुंच गए। यूक्रेन से जुड़े मुद्दे पर आयोजित बैठक में जैसे ही फ्रांस के स्थायी प्रतिनिधि ने अपना वक्तव्य शुरू किया, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बैठक छोड़कर बाहर चला गया। अमेरिकी अधिकारियों ने इस कदम को फ्रांस की राजनीतिक टिप्पणी और उसके रवैये के विरोध के रूप में प्रस्तुत किया।

    अमेरिकी पक्ष का कहना है कि फ्रांस लगातार मानवाधिकार के मुद्दों पर नैतिक श्रेष्ठता दिखाने की कोशिश करता है और अन्य देशों को उपदेश देने की नीति अपनाता है। अमेरिका ने यह भी आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने लोकतांत्रिक देशों की अपेक्षा अधिक आलोचना की है, जबकि कई दमनकारी शासन के मामलों में अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया गया। इसी कारण वोल्कर टर्क के दूसरे कार्यकाल का अमेरिका ने खुलकर विरोध किया।

    विवाद उस समय और बढ़ गया जब फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र मिशन की ओर से सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी साझा की गई, जिसमें अमेरिका के मतदान रुख पर सवाल उठाए गए। इसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से फ्रांस की आलोचना की और कहा कि वह अपने मतदान को सही ठहराने के लिए राजनीतिक बयानबाजी कर रहा है। अमेरिका ने फ्रांस पर सुरक्षा परिषद की गरिमा के अनुरूप व्यवहार नहीं करने का भी आरोप लगाया।

    दूसरी ओर, वोल्कर टर्क के समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में विभिन्न देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर समान रूप से टिप्पणी की है। हालांकि अमेरिका और रूस दोनों का आरोप है कि उनके कार्यालय ने कई मामलों में राजनीतिक पक्षपात दिखाया है। रूस ने भी उनके पुनर्नियुक्ति का विरोध करते हुए कहा कि मानवाधिकार के नाम पर भू-राजनीतिक हितों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    महासभा की प्रक्रिया के दौरान अमेरिका ने मतदान टालने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। इसके बाद रूस ने सुझाव दिया कि नए महासचिव के कार्यभार संभालने के बाद मानवाधिकार प्रमुख का चुनाव कराया जाए, लेकिन यह प्रस्ताव भी बहुमत हासिल नहीं कर सका। दोनों प्रस्ताव असफल रहने के बाद वोल्कर टर्क का दूसरा कार्यकाल तय हो गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली, मानवाधिकार एजेंडे और प्रमुख वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते वैचारिक मतभेदों को भी उजागर करता है। सुरक्षा परिषद में अमेरिका का वॉकआउट इसी व्यापक कूटनीतिक तनाव का प्रतीक माना जा रहा है, जिसका प्रभाव भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग और संवाद की दिशा पर भी पड़ सकता है।

  • फीफा वर्ल्ड कप में इंग्लैंड ने जीता ब्रॉन्ज मेडल 10 गोलों वाले रोमांचक मुकाबले में फ्रांस को 6-4 से हराया

    फीफा वर्ल्ड कप में इंग्लैंड ने जीता ब्रॉन्ज मेडल 10 गोलों वाले रोमांचक मुकाबले में फ्रांस को 6-4 से हराया


    नई दिल्ली । फीफा वर्ल्ड कप 2026 के तीसरे स्थान के मुकाबले में इंग्लैंड ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फ्रांस को 6-4 से हराकर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम कर लिया। दोनों टीमों के बीच खेला गया यह मुकाबला गोलों की बारिश और रोमांच से भरपूर रहा। पूरे मैच में कुल 10 गोल हुए जो विश्व कप इतिहास में लंबे समय बाद देखने को मिला। वर्ष 1982 के बाद यह पहला अवसर है जब विश्व कप के किसी एक मुकाबले में दोनों टीमों ने मिलकर 10 गोल किए।

    इंग्लैंड ने मैच की शुरुआत बेहद आक्रामक अंदाज में की और शुरुआती मिनटों से ही फ्रांस की रक्षा पंक्ति पर दबाव बनाए रखा। मुकाबले के तीसरे मिनट में डेक्लान राइस ने शानदार लंबी दूरी के शॉट से गोल कर इंग्लैंड को शुरुआती बढ़त दिला दी। इसके बाद 18वें मिनट में एजरी कोन्सा ने कॉर्नर किक पर बेहतरीन हेडर लगाकर स्कोर 2-0 कर दिया।

    पहले हाफ में इंग्लैंड का दबदबा पूरी तरह कायम रहा। बुकायो साका ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीसरा गोल दागा और फिर 43वें मिनट में अपना दूसरा गोल कर टीम की बढ़त 4-0 तक पहुंचा दी। पहले हाफ के अंत तक ऐसा लग रहा था कि मुकाबला पूरी तरह इंग्लैंड के नियंत्रण में है।

    दूसरे हाफ में फ्रांस ने जोरदार वापसी की। कोच द्वारा किए गए बदलावों का असर तुरंत देखने को मिला। 48वें मिनट में कप्तान किलियन एम्बाप्पे ने गोल कर फ्रांस का खाता खोला। इसके बाद 58वें मिनट में ब्रैडली बारकोला ने गोल कर अंतर घटाकर 4-2 कर दिया। कुछ ही देर बाद एम्बाप्पे ने अपना दूसरा गोल दागते हुए स्कोर 4-3 कर दिया और मुकाबले को फिर से रोमांचक बना दिया।

    फ्रांस की वापसी के बीच इंग्लैंड ने धैर्य बनाए रखा। मैच के 87वें मिनट में मिले पेनल्टी अवसर को बुकायो साका ने सफलतापूर्वक गोल में बदलकर अपनी हैट्रिक पूरी की और इंग्लैंड को 5-3 की बढ़त दिला दी। हालांकि इंजरी टाइम में उस्मान डेम्बेले ने गोल कर फ्रांस की उम्मीदें एक बार फिर जगा दीं और स्कोर 5-4 हो गया।

    लेकिन अंतिम क्षणों में जूड बेलिंगहम ने शानदार गोल कर इंग्लैंड की जीत पर मुहर लगा दी। उनके गोल के साथ ही इंग्लैंड ने 6-4 से मुकाबला अपने नाम किया और विश्व कप में तीसरे स्थान के साथ अभियान का शानदार समापन किया।

    यह उपलब्धि इंग्लैंड के लिए बेहद खास मानी जा रही है। वर्ष 1966 में विश्व कप जीतने के बाद यह टूर्नामेंट में टीम का अब तक का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन माना जा रहा है। इस जीत ने इंग्लैंड के युवा खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को भी नई ऊंचाई दी है और भविष्य के बड़े टूर्नामेंटों के लिए टीम को मजबूत संदेश दिया है।

  • फीफा वर्ल्ड कप 2026: फ्रांस को 6-4 से हराकर इंग्लैंड ने जीता ब्रॉन्ज… बुकायो साका ने लगाई हैट्रिक

    फीफा वर्ल्ड कप 2026: फ्रांस को 6-4 से हराकर इंग्लैंड ने जीता ब्रॉन्ज… बुकायो साका ने लगाई हैट्रिक


    नई दिल्ली
    , फीफा वर्ल्ड कप 2026 (FIFA World Cup 2026) में फैंस को इतिहास का सबसे रोमांचक और हाई-स्कोरिंग मुकाबला (High-scoring match) देखने को मिला. सेमीफाइनल की निराशा को पीछे छोड़ते हुए इंग्लैंड की टीम (England team) ने फ्रांस (France) को एक रोमांच से भरपूर मैच में 6-4 से हराकर वर्ल्ड कप ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया. 1966 में विश्व विजेता बनने के बाद वर्ल्ड कप के इतिहास में इंग्लैंड का यह अब तक का सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

    मैच में एक समय इंग्लैंड 4-0 से आगे था, लेकिन दूसरी हाफ में फ्रांस के स्टार फॉरवर्ड किलियन एम्बाप्पे के तूफान ने इंग्लैंड के खेमे में खलबली मचा दी. हालांकि, बुकायो साका की शानदार हैट्रिक और जूड बेलिंगहैम के आखिरी मिनट के जादुई गोल की बदौलत इंग्लैंडने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम कर लिया।

    मैच की शुरुआत से पहले किसी को भी इतने बड़े स्कोर की उम्मीद नहीं थी. इंग्लैंड ने अपनी शुरुआती प्लेइंग इलेवन में कप्तान हैरी केन और स्टार मिडफील्डर जूड बेलिंगहैम को आराम दिया था, जबकि गोलकीपर जॉर्डन पिकफोर्ड की जगह डीन हेंडरसन को मौका मिला. कप्तान की आर्मबैंड पहने डेक्लान राइस (Declan Rice) ने मैच के शुरू होने के महज ढाई मिनट (2.5 मिनट) के भीतर पहला गोल दागकर फ्रांस को स्तब्ध कर दिया।

    इसके बाद 18वें मिनट में एजरी कोन्सा ने एक शानदार हेडर के जरिए बढ़त को 2-0 कर दिया. इसके बाद शुरू हुआ बुकायो साका का शो, जिन्होंने पहले हाफ के खत्म होने से ठीक पहले दो बैक-टू-बैक गोल दागकर फ्रांस के डिफेंस को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया और इंग्लैंड को 4-0 की विशाल बढ़त दिला दी।


    दूसरा हाफ: एम्बाप्पे का तूफान

    हाफ-टाइम के बाद मैदान पर पासा पूरी तरह पलट गया. फ्रांसीसी टीम एक नई ऊर्जा के साथ उतरी. दूसरे हाफ के शुरुआती मिनटों में ही किलियन एम्बाप्पे ने इंग्लैंड के डिफेंस को भेदकर फ्रांस का पहला गोल दागा. इसके ठीक बाद 54वें मिनट में ब्रैडली बारकोला ने गेंद को नेट में पहुंचाकर स्कोर 4-2 कर दिया।

    मैच के 66वें मिनट में एम्बाप्पे ने एक और ऐतिहासिक गोल दागा. इस गोल के साथ ही एम्बाप्पे फीफा वर्ल्ड कप के इतिहास में सर्वकालिक सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए हैं. उन्होंने दिग्गज लियोनेल मेसी को पीछे छोड़ दिया है. इस टूर्नामेंट में यह एम्बाप्पे का 10वां गोल था, जिसके साथ ही वे गोल्डन बूट की रेस में सबसे आगे निकल गए हैं. स्कोर अब 4-3 हो चुका था और फ्रांस बराबरी के बेहद करीब था।


    साका की हैट्रिक और बेलिंगहैम का ‘विनिंग टच’

    जब फ्रांस मैच को पेनल्टी शूटआउट की तरफ ले जाने के लिए लगातार हमले कर रहा था, तभी 87वें मिनट में इंग्लैंड को एक पेनल्टी मिली. दबाव के इस बेहद नाजुक क्षण में बुकायो साका ने गेंद को गोल पोस्ट के दाहिने कोने में डालते हुए अपनी शानदार हैट्रिक पूरी की और इंग्लैंड को 5-3 से आगे कर दिया।

    इंजरी टाइम में फ्रांस के ओस्मान डेम्बेले ने एक बेहतरीन फिनिश के जरिए गोल दागकर स्कोर 5-4 कर दिया और मैच में रोमांच चरम पर पहुंच गया. लेकिन आखिरी मिनटों में मैदान पर उतरे जूड बेलिंगहैम ने एक बेहद खूबसूरत मैदानी गोल दागकर इंग्लैंड की 6-4 से जीत पक्की कर दी।

  • फीफा वर्ल्ड कप 2026 में फ्रांस सबसे मजबूत दावेदार ओलिवर कान बोले संतुलित टीम ही बनाएगी चैंपियन

    फीफा वर्ल्ड कप 2026 में फ्रांस सबसे मजबूत दावेदार ओलिवर कान बोले संतुलित टीम ही बनाएगी चैंपियन


    नई दिल्ली । फीफा वर्ल्ड कप 2026 अपने निर्णायक दौर में पहुंच चुका है और सेमीफाइनल मुकाबलों से पहले फुटबॉल जगत की निगाहें चारों दावेदार टीमों पर टिकी हुई हैं। इसी बीच जर्मनी के महान गोलकीपर ओलिवर कान ने टूर्नामेंट को लेकर बड़ी भविष्यवाणी करते हुए फ्रांस को विश्व चैंपियन बनने का सबसे प्रबल दावेदार बताया है। कान का मानना है कि फ्रांस के पास संतुलित टीम गहराई से भरा स्क्वॉड और हर परिस्थिति में मुकाबला जीतने की क्षमता है जो उसे बाकी टीमों से थोड़ा आगे खड़ा करती है।

    फ्रांस का मुकाबला 15 जुलाई को डलास स्टेडियम में स्पेन से होने वाले पहले सेमीफाइनल में होगा। यह मुकाबला टूर्नामेंट के सबसे बड़े और रोमांचक मुकाबलों में गिना जा रहा है। विश्व कप के नॉकआउट चरण में दोनों टीमें दूसरी बार आमने सामने होंगी। इससे पहले वर्ष 2006 के राउंड ऑफ 16 में फ्रांस ने स्पेन को 3 1 से हराकर बाहर का रास्ता दिखाया था। अब एक बार फिर दोनों यूरोपीय दिग्गज विश्व कप के फाइनल का टिकट हासिल करने के लिए आमने सामने होंगे।

    ओलिवर कान ने कहा कि यदि अब तक के प्रदर्शन के आधार पर किसी एक टीम को चुनना हो तो उनकी पहली पसंद फ्रांस होगी। उनके अनुसार फ्रांस की सबसे बड़ी ताकत उसका संतुलन है। टीम के पास मजबूत डिफेंस रचनात्मक मिडफील्ड और तेज आक्रमण करने वाले खिलाड़ी मौजूद हैं। इसके साथ ही बेंच स्ट्रेंथ भी बेहद मजबूत है जिससे किसी भी समय मैच का रुख बदला जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि सेमीफाइनल में पहुंची चारों टीमें खिताब जीतने की पूरी क्षमता रखती हैं और उनके बीच बहुत कम अंतर है।

    कान के अनुसार स्पेन और फ्रांस के बीच होने वाला मुकाबला रणनीति और धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा होगा। स्पेन अपनी तेज पासिंग और गेंद पर नियंत्रण रखने वाली शैली के लिए जाना जाता है जबकि फ्रांस की सबसे बड़ी ताकत उसका तेज पलटवार है। ऐसे में जो टीम मिडफील्ड पर नियंत्रण बनाए रखेगी और विपक्षी टीम की रणनीति को सफल नहीं होने देगी वही फाइनल का टिकट हासिल कर सकती है।

    उन्होंने कहा कि स्पेन के लिए फ्रांस की मजबूत रक्षापंक्ति को तोड़ना आसान नहीं होगा। स्पेन को लगातार धैर्य के साथ आक्रमण करना होगा तेज पासिंग करनी होगी और मैदान के अहम हिस्सों में अतिरिक्त खिलाड़ियों की मौजूदगी बनाए रखनी होगी। साथ ही उसे अपने डिफेंस को भी मजबूत रखना होगा क्योंकि फ्रांस दुनिया की सबसे खतरनाक काउंटर अटैक करने वाली टीमों में शामिल है और छोटी सी गलती भी मैच का परिणाम बदल सकती है।

    कान ने यह भी कहा कि बड़े मुकाबलों का फैसला अक्सर छोटे छोटे पलों से होता है। केवल लगातार दबाव बनाना ही काफी नहीं होता बल्कि सही समय पर समझदारी से प्रेसिंग करना और मिडफील्ड में नियंत्रण बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है। जो टीम विपक्षी को खुलकर खेलने का मौका नहीं देगी उसके जीतने की संभावना अधिक होगी।

    अपने लंबे गोलकीपिंग अनुभव को साझा करते हुए ओलिवर कान ने आधुनिक फुटबॉल में गोलकीपर की बदलती भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज का गोलकीपर केवल गोल बचाने वाला खिलाड़ी नहीं रह गया है बल्कि वह टीम के आक्रमण की शुरुआत करने वाला पहला खिलाड़ी और अंतिम रक्षक दोनों की भूमिका निभाता है। गोलकीपर का एक सही फैसला मैच जितवा सकता है जबकि एक छोटी सी गलती पूरी टीम की मेहनत पर पानी फेर सकती है।

    उन्होंने कहा कि विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में वही टीमें सफल होती हैं जो दबाव के बीच भी शांत रहती हैं अपने गेम प्लान पर कायम रहती हैं और भावनाओं के बजाय सही समय पर सही फैसले लेती हैं। यही विशेषताएं फ्रांस की टीम में साफ दिखाई देती हैं और यही वजह है कि वह इस बार विश्व कप ट्रॉफी जीतने की सबसे मजबूत दावेदार नजर आती है।

  • फ्रांस सेमीफाइनल में, मोरक्को को 2-0 से हराकर वर्ल्ड कप में लगातार तीसरी बार अंतिम चार में पहुंचा

    फ्रांस सेमीफाइनल में, मोरक्को को 2-0 से हराकर वर्ल्ड कप में लगातार तीसरी बार अंतिम चार में पहुंचा


    नई दिल्ली । फीफा वर्ल्ड कप 2026 के क्वार्टर फाइनल में फ्रांस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मोरक्को को 2-0 से हराकर सेमीफाइनल में जगह पक्की कर ली। इस जीत के साथ फ्रांस लगातार तीसरी बार विश्व कप के अंतिम चार में पहुंच गया, जबकि मोरक्को का अभियान क्वार्टर फाइनल में ही समाप्त हो गया।

    मैच की शुरुआत से ही फ्रांस ने आक्रामक खेल दिखाया और मोरक्को के गोल पर लगातार दबाव बनाया। पांचवें मिनट में दायोट उपामेकानो के हेडर को गोलकीपर यासीन बुनू ने शानदार बचाव करते हुए गोल में जाने से रोक दिया। इसके बाद फ्रांस को पेनल्टी भी मिली, लेकिन कप्तान किलियन एम्बाप्पे उसे गोल में नहीं बदल सके। बुनू ने बेहतरीन सेव कर अपनी टीम को शुरुआती झटका लगने से बचाया।

    पहले हाफ में फ्रांस ने कई मौके बनाए, लेकिन मोरक्को का मजबूत डिफेंस और गोलकीपर लगातार दीवार बने रहे। नतीजतन शुरुआती 45 मिनट तक दोनों टीमें गोल नहीं कर सकीं।

    दूसरे हाफ में फ्रांस ने अपनी रफ्तार और तेज कर दी। मैच के 60वें मिनट में कप्तान एम्बाप्पे ने शानदार कर्लिंग शॉट के जरिए गोल दागकर फ्रांस को 1-0 की बढ़त दिलाई। यह इस विश्व कप में उनका आठवां गोल रहा। इसके सिर्फ छह मिनट बाद उस्मान डेम्बेले ने एम्बाप्पे के सटीक पास पर गोल करते हुए बढ़त को 2-0 कर दिया।

    दो गोल की बढ़त मिलने के बाद फ्रांस ने पूरे मैच पर नियंत्रण बनाए रखा और मोरक्को को वापसी का कोई मौका नहीं दिया। मजबूत डिफेंस और बेहतरीन मिडफील्ड खेल के दम पर फ्रांस ने आसानी से जीत दर्ज करते हुए सेमीफाइनल का टिकट कटाया।

    फ्रांस अब 15 जुलाई को सेमीफाइनल मुकाबले में मैदान पर उतरेगा। टीम की नजर लगातार दूसरी बार विश्व कप फाइनल में पहुंचने और एक बार फिर खिताब जीतने पर होगी। वहीं मोरक्को का अभियान समाप्त होने के बावजूद टीम ने पूरे टूर्नामेंट में अपने जुझारू प्रदर्शन से फुटबॉल प्रशंसकों का दिल जीता।

  • फीफा विश्व कप 2026: सैबारी की चोट ने मोरक्को को दिया झटका, फ्रांस के खिलाफ नहीं उतरेंगे मैदान में

    फीफा विश्व कप 2026: सैबारी की चोट ने मोरक्को को दिया झटका, फ्रांस के खिलाफ नहीं उतरेंगे मैदान में


    नई दिल्ली । फीफा विश्व कप 2026 के क्वार्टर फाइनल मुकाबले से पहले मोरक्को की टीम को बड़ा झटका लगा है। टीम के प्रमुख फॉरवर्ड इस्माइल सैबारी हैमस्ट्रिंग चोट के कारण फ्रांस के खिलाफ होने वाले अहम मुकाबले में नहीं खेल पाएंगे। उनकी गैरमौजूदगी मोरक्को के लिए बड़ा नुकसान मानी जा रही है, क्योंकि मौजूदा टूर्नामेंट में उन्होंने लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए टीम की सफलता में अहम भूमिका निभाई है।

    मोरक्को के मुख्य कोच मोहम्मद ओआबी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सैबारी के बाहर होने की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि कनाडा के खिलाफ राउंड ऑफ-16 मुकाबले के दौरान सैबारी की हैमस्ट्रिंग में चोट लगी थी। मेडिकल टीम की कोशिशों के बावजूद वह समय पर पूरी तरह फिट नहीं हो सके। हालांकि कोच ने उम्मीद जताई कि यदि मोरक्को सेमीफाइनल में जगह बनाता है तो 25 वर्षीय खिलाड़ी वापसी कर सकते हैं।

    ओआबी ने कहा कि सैबारी फिलहाल खेलने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन उन्हें विश्वास है कि उनका विश्व कप अभियान यहीं खत्म नहीं होगा और वह आगे टीम के लिए उपलब्ध हो सकते हैं।

    सैबारी इस विश्व कप में मोरक्को के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में शामिल रहे हैं। उन्होंने ग्रुप चरण के तीनों मुकाबलों में गोल दागे, जबकि नॉकआउट दौर में नीदरलैंड के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में निर्णायक गोल कर टीम को क्वार्टर फाइनल तक पहुंचाने में अहम योगदान दिया। ऐसे में उनके बाहर होने से फ्रांस के खिलाफ मोरक्को के आक्रमण की धार कमजोर पड़ सकती है और टीम को अधिक रक्षात्मक रणनीति अपनानी पड़ सकती है।

    इस मुकाबले से पहले रेफरी नियुक्ति को लेकर भी चर्चा तेज है। फीफा ने फ्रांस और मोरक्को के क्वार्टर फाइनल के लिए पूरी तरह अर्जेंटीना के अधिकारियों की टीम नियुक्त की है। मौजूदा विश्व कप में यह पहला मौका है जब किसी मैच का संचालन एक ही देश के रेफरी पैनल द्वारा किया जाएगा। हालांकि मोरक्को के कोच ने इस पर किसी तरह की चिंता जताने से इनकार किया।

    उन्होंने कहा कि अनुभवी रेफरी बड़े मुकाबलों को संभालना जानते हैं और उनकी टीम पूरी तरह अपने प्रदर्शन पर ध्यान दे रही है। ओआबी ने कहा कि रेफरी का काम निष्पक्ष फैसले लेना है और उन्हें भरोसा है कि मैच का संचालन भी उसी स्तर पर होगा।

    फ्रांस और मोरक्को के बीच अब तक छह अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले गए हैं। इनमें फ्रांस ने चार मैच जीते हैं, एक मुकाबला ड्रॉ रहा है, जबकि मोरक्को को सिर्फ एक जीत मिली है। दोनों टीमें 2022 फीफा विश्व कप के सेमीफाइनल में भी आमने-सामने थीं, जहां फ्रांस ने 2-0 से जीत दर्ज कर फाइनल में प्रवेश किया था। ऐसे में इस बार मोरक्को के पास पुरानी हार का हिसाब चुकता करने का मौका होगा, हालांकि सैबारी की अनुपस्थिति उसके लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

  • फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…

    फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…


    नई दिल्ली। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल फ्रांस पर बढ़ता सार्वजनिक कर्ज चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते प्रभावी वित्तीय सुधार नहीं किए, तो आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में आ सकती है। बढ़ती उधारी लागत और राजनीतिक अनिश्चितता को लेकर निवेशकों और अर्थशास्त्रियों ने भी चिंता जताई है।

    फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज फिलहाल करीब 3.5 ट्रिलियन यूरो तक पहुंच चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियों के कारण राजकोषीय सुधारों की संभावना कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में कर्ज का बोझ और बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।

    ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ से बढ़ सकती है मुश्किल
    अर्थशास्त्रियों ने फ्रांस के सामने ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ का खतरा बताया है। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है, जब सरकारी बॉन्ड पर चुकाई जाने वाली ब्याज दर आर्थिक विकास की गति से अधिक हो जाती है। इससे सरकार का कर्ज लगातार बढ़ता जाता है और अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में उसका बोझ तेजी से बढ़ने लगता है। यदि सरकार लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष (प्राइमरी सरप्लस) हासिल नहीं कर पाती, तो इस स्थिति से बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है।

    2050 तक GDP के 203% तक पहुंच सकता है कर्ज
    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मौजूदा हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ तो फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज वर्ष 2050 तक उसकी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 203 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह चेतावनी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के महासचिव मैथियास कोरमैन के हालिया बयान के आधार पर दी गई है। अनुमान है कि वर्ष 2029 तक केवल ब्याज भुगतान का खर्च ही लगभग 100 अरब यूरो तक पहुंच सकता है।

    निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों की बढ़ी चिंता
    क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सारा कार्लसन ने भी कहा है कि सार्वजनिक कर्ज पर बढ़ता ब्याज भुगतान फ्रांस के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक बन सकता है। वहीं निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली ने वित्तीय जोखिमों का हवाला देते हुए अपने ग्राहकों को फ्रांसीसी सरकारी कर्ज में निवेश कम करने की सलाह दी है।

    कोविड के बाद भी कम नहीं हुआ कर्ज
    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष की पहली तिमाही में फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज 3.5 ट्रिलियन यूरो (करीब 4 ट्रिलियन डॉलर) से अधिक हो गया, जो देश की GDP का 117.5 प्रतिशत है। फ्रांस की ऑडिट संस्था कोर्ट डेस कॉम्प्टेस के मुताबिक यह स्तर कोविड-19 महामारी के दौरान बने रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है। संस्था का कहना है कि यूरोजोन में फ्रांस ऐसा प्रमुख देश है, जिसने महामारी के बाद अपने कर्ज के बोझ को उल्लेखनीय रूप से कम नहीं किया।

    ब्याज भुगतान बना सबसे बड़ा खर्च
    वर्ष 2025 में फ्रांस ने अपने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए करीब 66 अरब यूरो खर्च किए, जो शिक्षा और रक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बजट से भी अधिक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2029 तक यह राशि बढ़कर 100 अरब यूरो तक पहुंच सकती है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेज आर्थिक विकास या लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष के जरिए इस संकट से बाहर निकला जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसे संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट डेस कॉम्प्टेस की वरिष्ठ अधिकारी कैरिन कैम्बी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो फ्रांस कर्ज के ब्याज के बढ़ते बोझ तले दब सकता है और इस स्थिति से बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं।

    चुनाव से पहले बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
    बढ़ता सार्वजनिक कर्ज अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले फ्रांस की राजनीति का भी अहम मुद्दा बन गया है। प्रमुख सेंट्रिस्ट नेता एडुआर्ड फिलिप और गैब्रियल अट्टल ने इसे अपने चुनावी एजेंडे का प्रमुख हिस्सा बनाया है। वहीं सांसद केविन मौविएक्स का कहना है कि कर्ज का बढ़ता स्तर गंभीर चेतावनी है और यदि सुधार में देर की गई तो इसके परिणाम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।