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  • खाद्य सुरक्षा पर सवाल, देश में 1.85 लाख नमूने फेल, राजस्थान में सिर्फ 31 मामलों में दोषियों को सजा

    खाद्य सुरक्षा पर सवाल, देश में 1.85 लाख नमूने फेल, राजस्थान में सिर्फ 31 मामलों में दोषियों को सजा

    नई दिल्ली ।देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मिलावट रोकने के लिए की जा रही कार्रवाई के आंकड़े खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती दिखाते हैं। वर्ष 2025-26 में देशभर में 2,23,808 खाद्य नमूनों की जांच की गई। इनमें 40,023 नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके बावजूद दोषियों को सजा मिलने वाले मामलों की संख्या 1,918 रही। यानी जांच में खामियां सामने आने के मुकाबले सजा तक पहुंचने वाले मामले काफी कम हैं।

    पिछले पांच वर्षों के आंकड़े भी इसी स्थिति की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच देशभर में 8.86 लाख खाद्य नमूनों की जांच हुई। इनमें 1,85,780 नमूने फेल पाए गए। इन मामलों में 1,39,507 का निपटारा जुर्माना लगाकर किया गया, जबकि केवल 6,203 मामलों में दोषियों को सजा सुनाई गई। इससे स्पष्ट होता है कि खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई के अलग-अलग परिणाम सामने आए हैं।

    सजा की दर में पिछले वर्षों के दौरान कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन यह अब भी पांच प्रतिशत से कम है। वर्ष 2021-22 में 32,935 नमूने फेल हुए और 671 मामलों में सजा हुई। अगले वर्ष 44,626 नमूनों के फेल होने पर 1,188 मामलों में दोषियों को सजा मिली। वर्ष 2023-24 में सजा की दर 3.4 प्रतिशत और 2024-25 में 3.7 प्रतिशत रही। वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई।

    राजस्थान के आंकड़े विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं। वर्ष 2025-26 में राज्य में 17,325 खाद्य नमूनों की जांच की गई, जिनमें 4,594 नमूने फेल पाए गए। यह कुल जांचे गए नमूनों का 26.5 प्रतिशत है। फेल नमूनों की संख्या के मामले में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर रहा। हालांकि, राज्य में केवल 31 मामलों में दोषियों को सजा मिली। फेल नमूनों की संख्या के मुकाबले यह दर एक प्रतिशत से भी कम है।

    मध्य प्रदेश में भी स्थिति में सुधार की जरूरत दिखाई देती है। वर्ष 2025-26 के दौरान राज्य में फेल हुए खाद्य नमूनों के करीब चार प्रतिशत मामलों में ही सजा हुई। यह राष्ट्रीय औसत 4.8 प्रतिशत से कम है। ऐसे में राज्य में खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच, कानूनी प्रक्रिया और दोषियों को सजा दिलाने की व्यवस्था पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

    छत्तीसगढ़ में इसी अवधि के दौरान 2,065 खाद्य नमूनों की जांच हुई। इनमें 214 नमूने फेल पाए गए, जो कुल नमूनों का लगभग 10.4 प्रतिशत है। हालांकि, नमूनों के फेल होने की दर अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी आवश्यक बनी रहती है।

    दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में खाद्य नमूनों के फेल होने का आंकड़ा काफी अधिक रहा। वर्ष 2025-26 में वहां 39,519 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 20,427 फेल मिले। यह कुल नमूनों का 51.7 प्रतिशत है। इसके बावजूद राज्य में 342 मामलों में ही सजा हुई। हरियाणा में 31 प्रतिशत और झारखंड में 27.8 प्रतिशत नमूने फेल हुए। महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 17.4 प्रतिशत और पंजाब में 13.2 प्रतिशत रहा।

    कुछ राज्यों में दोषियों को सजा मिलने की दर बेहतर दर्ज की गई। तमिलनाडु में 3,984 फेल नमूनों के मुकाबले 857 मामलों में सजा हुई, जबकि केरल में 1,863 फेल नमूनों के मुकाबले 330 मामलों में दोषियों को सजा मिली। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, झारखंड, गोवा, असम, बिहार और पुडुचेरी में दिए गए आंकड़ों के अनुसार किसी मामले में सजा दर्ज नहीं हुई।

    दूध और डेयरी उत्पादों की जांच भी चिंता का विषय है। वर्ष 2025-26 में इनके 39,351 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 14,668 फेल मिले। यानी लगभग 37.3 प्रतिशत नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। दूध रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तु है, इसलिए इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

    खाद्य सुरक्षा कानून, 2006 के तहत नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने और जेल का प्रावधान है। असुरक्षित खाद्य पदार्थ से गंभीर नुकसान होने पर छह साल तक की कैद और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यदि असुरक्षित भोजन से किसी की मौत होती है, तो उम्रकैद और कम से कम 10 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।

    हालांकि, हर फेल नमूना मिलावट का मामला नहीं होता। इसमें असुरक्षित खाद्य पदार्थ, निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले उत्पाद और गलत लेबल वाले सामान भी शामिल हो सकते हैं। सरकार के मुताबिक, करीब 98 प्रतिशत खाद्य कारोबारी राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

    खाद्य पदार्थों की निगरानी के लिए वर्ष 2025-26 में देशभर में 5,20,566 निरीक्षण किए गए। वर्ष 2024-25 में 4,01,391 और 2023-24 में 3,57,072 निरीक्षण हुए थे। पिछले पांच वर्षों में 4,461 लाइसेंस निलंबित और 11,493 लाइसेंस रद्द किए गए। इन आंकड़ों के बीच सबसे अहम चुनौती यह है कि जांच में खामी मिलने के बाद मामलों का प्रभावी निपटारा हो और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ समय पर कानूनी कार्रवाई हो।

  • दूध-दही से स्नैक्स तक ऑनलाइन बिक्री पर FSSAI की सख्ती, प्रोडक्ट दावों और धतूरे की बिक्री पर उठे सवाल

    दूध-दही से स्नैक्स तक ऑनलाइन बिक्री पर FSSAI की सख्ती, प्रोडक्ट दावों और धतूरे की बिक्री पर उठे सवाल

    नई दिल्ली ।घर बैठे किराने का सामान और खाने-पीने की चीजें मंगाने वाले ग्राहकों के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कार्रवाई सामने आई है। खाद्य सुरक्षा और मानक से जुड़े मामलों की निगरानी करने वाली संस्था FSSAI ने Amazon, Flipkart, Zepto, Swiggy Instamart और BigBasket के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई शुरू की है। इन प्लेटफॉर्म पर कुछ खाद्य उत्पादों से जुड़े दावों को नियमों के अनुरूप नहीं पाए जाने और एक मामले में धतूरे के फल तथा बीज की ऑनलाइन बिक्री से संबंधित मामला सामने आया है।

    FSSAI की कार्रवाई Happilo Premium Date Bites Zesty Orange से जुड़े मामले में पांचों प्लेटफॉर्म तक पहुंची है। जानकारी के अनुसार इस उत्पाद पर किए गए कुछ दावों को निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं माना गया और उन्हें भ्रामक बताया गया। यह उत्पाद Amazon, Flipkart, Zepto, Swiggy Instamart और BigBasket पर उपलब्ध था। इसी वजह से इस मामले में सभी पांच प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है।

    इसके अलावा Milky Mist के कुछ डेयरी उत्पादों को लेकर भी आपत्ति सामने आई है। इनमें Fresh Low Fat Cream, Farm Fresh Curd और Greek Yoghurt शामिल हैं। इन उत्पादों से जुड़े मामलों में Swiggy Instamart और BigBasket के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है।

    पूरे मामले में धतूरे के फल और बीज की ऑनलाइन बिक्री से जुड़ा प्रकरण भी सामने आया है। धतूरा खाने की वस्तु नहीं है और इसके फल तथा बीज जहरीले माने जाते हैं। FSSAI ने इसे प्रतिबंधित खाद्य पदार्थों की श्रेणी में रखा है।

    FSSAI के अनुसार Amazon, Swiggy Instamart और BigBasket पर धतूरे के फल और बीज को ऑनलाइन प्रदर्शित करने तथा बेचने से जुड़े मामले सामने आए हैं। इसी आधार पर इन तीनों प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है।

    प्लेटफॉर्म के हिसाब से देखें तो BigBasket और Swiggy Instamart पर तीन तरह के मामले सामने आए हैं। इनमें Happilo उत्पाद से जुड़ा मामला, Milky Mist के उत्पादों से संबंधित आपत्ति और धतूरे की ऑनलाइन बिक्री का मामला शामिल है। Amazon पर Happilo उत्पाद और धतूरे से जुड़े मामलों में कार्रवाई शुरू की गई है। वहीं Flipkart और Zepto के खिलाफ फिलहाल Happilo उत्पाद से जुड़े मामले में कार्रवाई शुरू होने की जानकारी है।

    इस कार्रवाई का असर सीधे तौर पर ऑनलाइन खरीदारी करने वाले ग्राहकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। अब ग्राहक किराने के सामान के साथ दूध, दही, पनीर, स्नैक्स और दूसरी खाद्य वस्तुएं भी ऑनलाइन मंगाते हैं। ऐसे में खरीदारी के दौरान वे अक्सर ऑनलाइन लिस्टिंग में दी गई जानकारी और उत्पाद की पैकिंग पर लिखे दावों पर निर्भर करते हैं।

    FSSAI की कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि ऑनलाइन माध्यम से खाद्य उत्पादों की बिक्री करने वाले प्लेटफॉर्म भी खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियमों के दायरे में आते हैं। ऑनलाइन उपलब्ध किसी उत्पाद की लिस्टिंग में दी गई जानकारी और उसके दावों को लेकर भी नियामकीय कार्रवाई हो सकती है।

    हालांकि इस मामले में अभी अंतिम जुर्माने या दंड की जानकारी सामने नहीं आई है। FSSAI ने फिलहाल दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने की बात कही है, इसलिए प्रक्रिया अभी जारी है और अंतिम निर्णय आना बाकी है।

    साथ ही इस कार्रवाई को संबंधित उत्पादों और ऑनलाइन लिस्टिंग से जुड़े मामलों के रूप में देखा जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे संबंधित कंपनियों के खिलाफ अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता, क्योंकि कार्रवाई की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

  • दूध खरीदने से पहले ऐसे पहचानें संभावित मिलावट, बुलबुले और झाग देखकर शुरुआती जांच करने का तरीका जानिए

    दूध खरीदने से पहले ऐसे पहचानें संभावित मिलावट, बुलबुले और झाग देखकर शुरुआती जांच करने का तरीका जानिए

    नई दिल्ली । दूध भारतीय खानपान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक बड़ी संख्या में लोग रोजाना दूध या उससे बने उत्पादों का सेवन करते हैं। दूध को कैल्शियम और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है, लेकिन बाजार में मिलावट की चिंता के कारण इसकी गुणवत्ता को लेकर सावधानी बरतना भी जरूरी है। पानी के अलावा कुछ मामलों में दूध में डिटर्जेंट जैसे पदार्थ मिलाए जाने की आशंका भी सामने आती रही है।

    दूध में मिलावट होने पर उसकी बनावट, स्वाद और झाग बनने के तरीके में अंतर दिखाई दे सकता है। हालांकि केवल देखने या स्वाद से किसी दूध को मिलावटी घोषित करना सही नहीं है। इसी वजह से खाद्य सुरक्षा से जुड़ी संस्था ने दूध में डिटर्जेंट की संभावित मौजूदगी का शुरुआती संकेत पाने के लिए एक आसान घरेलू तरीका बताया है। इस जांच के लिए किसी महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं होती।

    घरेलू स्तर पर जांच करने के लिए सबसे पहले एक साफ छोटे गिलास में करीब 5 से 10 मिलीलीटर दूध लें। इसके बाद गिलास में मौजूद दूध को अच्छी तरह और तेजी से हिलाएं। कुछ देर तक दूध को हिलाने के बाद उसके ऊपर बनने वाले झाग और बुलबुलों को ध्यान से देखें। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि झाग कितनी मात्रा में बन रहा है और कितनी देर तक बना रहता है।

    यदि दूध को हिलाने के बाद थोड़े बुलबुले बनते हैं और वे जल्दी खत्म हो जाते हैं तो इसे सामान्य स्थिति का संकेत माना जा सकता है। दूसरी ओर, यदि दूध को हिलाने पर काफी मात्रा में झाग बनता है और वह लंबे समय तक बना रहता है तो डिटर्जेंट या किसी अन्य सर्फैक्टेंट की मौजूदगी की आशंका हो सकती है। ऐसे पदार्थ दूध में झाग को ज्यादा स्थिर बना सकते हैं।

    इसका कारण दूध और डिटर्जेंट के रासायनिक गुणों में अंतर है। सामान्य दूध को हिलाने पर हवा के छोटे बुलबुले बन सकते हैं, लेकिन वे अपेक्षाकृत जल्दी टूट जाते हैं। डिटर्जेंट में मौजूद सर्फैक्टेंट सतही तनाव को कम कर सकते हैं। इसके कारण बुलबुलों के आसपास एक स्थिर परत बन सकती है और झाग अपेक्षाकृत अधिक समय तक दिखाई दे सकता है।

    फिर भी इस घरेलू तरीके को अंतिम या प्रमाणित मिलावट जांच नहीं माना जाना चाहिए। दूध को हिलाने पर झाग बनने की मात्रा कई अन्य परिस्थितियों से भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए यदि इस परीक्षण के बाद दूध की गुणवत्ता को लेकर संदेह बना रहता है तो उसे प्रयोगशाला जांच के लिए भेजना अधिक भरोसेमंद तरीका है। घरेलू परीक्षण को केवल शुरुआती संकेत के रूप में देखना चाहिए।

    दूध खरीदते समय भी कुछ सावधानियां बरतकर मिलावट या खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद से बचने की कोशिश की जा सकती है। पैकेट वाला दूध खरीदते समय पैकिंग की सील, लेबल, निर्माण और उपयोग की तारीख तथा अन्य जरूरी जानकारी जरूर देखें। पैकेट फटा हुआ हो, सील से छेड़छाड़ दिखाई दे या पैकिंग असामान्य लगे तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है।

    दूध को खरीदने के बाद निर्धारित तापमान पर रखना भी जरूरी है। पैकेट पर दिए गए भंडारण संबंधी निर्देशों का पालन करें और उपयोग से पहले उसकी स्थिति जांच लें। भरोसेमंद विक्रेता या निर्धारित मानकों का पालन करने वाले उत्पाद को प्राथमिकता देना भी सुरक्षित विकल्प हो सकता है। दूध की शुद्धता को लेकर गंभीर संदेह होने पर घरेलू जांच पर निर्भर रहने के बजाय प्रमाणित खाद्य जांच सुविधा से परीक्षण कराना सबसे उचित तरीका है।

  • SC की फटकार के बाद FSSAI का बड़ा कदम… खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर लिखी होगी चीनी-नमक की मात्रा

    SC की फटकार के बाद FSSAI का बड़ा कदम… खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर लिखी होगी चीनी-नमक की मात्रा


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) ने पैक फूड (Packaged food) पर शिंकजे की तैयारी शुरू कर दी है। जिन खाद्य पदार्थों में चीनी (Sugar), फैट और नमक की मात्रा तय मानक से अधिक होगी, उनके पैकेट या डिब्बे के ऊपरी हिस्से पर हाई शुगर, हाई फैट और हाई सॉल्ट के रूप में चेतावनी लाल रंग में अंकित करना अनिवार्य किया जा सकता है।

    भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) (Food Safety and Standards Authority of India – FSSAI) ने जस्टिस जेबी पारदीवाला की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पीठ के समक्ष दाखिल छह पन्नों के हलफनामे में यह जानकारी दी। कोर्ट को बताया गया कि इससे जुड़ा प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। एफएसएसएआई ने कहा कि यह चेतावनी तस्वीर (षट्भुजाकार) के रूप में अंकित होगी, ताकि ग्राहक आसानी से पहचान सकें कि किन खाद्य पदार्थ में नमक या चीनी जैसे पदार्थ अधिक ‌मात्रा में हैं। इसका फॉन्ट साइज पैकेट के पीछे न्यूट्रिशन की जानकारी देने वाली टेबल में इस्तेमाल होने वाले फॉन्ट साइज से एक पॉइंट बड़ा होगा।


    जनहित याचिका पर सुनवाई

    एफएसएसएआई ने यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में लगाई गई फटकार के बाद दाखिल किया है। कोर्ट गैर सरकारी संस्था ‘3एस एंड आवर हेल्थ सोसाइटी’ की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रहा है।


    दो चरणों में लागू होगा

    प्रस्तावित नियम दो चरण में लागू किए जाएंगे, ताकि इंडस्ट्री को उत्पाद दोबारा तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिले। पहले चरण में उन उत्पादों पर नियम लागू होंगे, जिनमें दो या अधिक विशिष्ट पोषक तत्व एडेड फैट, एडेड शुगर या नमक अधिक मात्रा में हों। दूसरे चरण में वे उत्पाद शामिल होंगे, जिनमें एक पोषक तत्व अधिक मात्रा में हो।


    इन उत्पादों को छूट मिलेगी

    हलफनामे में एफएसएसएआई ने कहा है कि सिंगल-इंग्रीडिएंट यानी एक ही चीज से बने खाद्य पदार्थों और उन चीजों को प्रस्तावित नियम से छूट दी जाएगी, जिनमें प्राकृतिक रूप से वसा, चीनी या नमक अधिक होता है। जैसे घी, खाद्य तेल, गुड़ और शहद आदि। हालांकि, खाद्य सुरक्षा, लेबलिंग के बाकी नियमों से छूट नहीं मिलेगी।

  • स्वास्थ्य और पोषण दावों पर सख्ती के बाद कई कंपनियों ने उत्पाद लेबल सुधारे, ऑनलाइन लिस्टिंग हटाईं और अनुपालन रिपोर्ट दी

    स्वास्थ्य और पोषण दावों पर सख्ती के बाद कई कंपनियों ने उत्पाद लेबल सुधारे, ऑनलाइन लिस्टिंग हटाईं और अनुपालन रिपोर्ट दी

    नई दिल्ली ।भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की ओर से खाद्य उत्पादों पर भ्रामक स्वास्थ्य, पोषण, व्यापारिक और उत्पाद संबंधी दावों के खिलाफ जारी नोटिस के बाद कई कंपनियों ने अपने स्तर पर सुधारात्मक कार्रवाई की है। कंपनियों ने उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले दावों को हटाने, विज्ञापन वापस लेने, ऑनलाइन उत्पाद लिस्टिंग हटाने और पैकेजिंग में बदलाव करने जैसे कदम उठाए हैं।

    नियामक ने स्पष्ट किया है कि खाद्य उत्पादों के लेबल, पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में ऐसे दावे नहीं किए जा सकते, जिनसे उपभोक्ताओं को उत्पाद की प्रकृति, गुणवत्ता, पोषण संबंधी विशेषताओं या अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को लेकर गलत धारणा बन सकती है। कार्रवाई का उद्देश्य खाद्य बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और उपभोक्ताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराना है।

    मोंडेलेज इंडिया फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के कुछ उत्पादों के संबंध में स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े तुलनात्मक दावों को लेकर आपत्ति दर्ज की गई थी। नोटिस के बाद कंपनी ने संबंधित दावों और विज्ञापन सामग्री को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से हटाने की कार्रवाई की। इसके साथ ही नियमों के अनुरूप आवश्यक संशोधन भी किए गए।

    एक अन्य मामले में सैपियंस लैब्स को भी भ्रामक दावे से संबंधित नोटिस दिया गया था। इसके बाद कंपनी ने नियामक को अपना जवाब सौंपा और उत्पाद से जुड़े संबंधित दावों तथा प्रचार सामग्री को वापस लेने की जानकारी दी। इससे यह संकेत मिलता है कि नोटिस के बाद संबंधित कंपनियां अपने विपणन दावों की समीक्षा कर रही हैं।

    विची एग्रो प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े एक मामले में विपणन किए जा रहे उत्पाद और मिसेज जानकी जय बारोट यानी जेजे फूड्स द्वारा प्रसंस्कृत एवं पैक किए गए उत्पाद के व्यापारिक नाम को लेकर आपत्ति सामने आई। नियामकीय हस्तक्षेप के बाद संबंधित ऑनलाइन उत्पाद लिस्टिंग को हटाने की कार्रवाई की गई।

    एमवे इंडिया एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड के मामले में उत्पाद के नाम में 100 परसेंट प्योर कोकोनट ऑयल शब्दावली के इस्तेमाल पर सवाल उठाया गया। नियामक के अनुसार नाम में 100 परसेंट शब्द का उपयोग खाद्य सुरक्षा कानून, विज्ञापन एवं दावे संबंधी नियमों और इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल को रोकने संबंधी परामर्श के अनुरूप नहीं था।

    नोटिस मिलने के बाद एमवे इंडिया ने अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की। कंपनी ने बताया कि उसने अपने उत्पाद की पैकेजिंग और प्रचार सामग्री से 100 परसेंट शब्द स्वेच्छा से हटा दिया है। कंपनी ने पुराने स्टॉक की बिक्री रोकने और संशोधित पैकेजिंग के साथ नए उत्पाद बाजार में उपलब्ध कराने की भी पुष्टि की।

    एफएसएसएआई की कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापन में इस्तेमाल होने वाली भाषा पर नियामकीय निगरानी बढ़ाई जा रही है। खासतौर पर स्वास्थ्य, पोषण, गुणवत्ता और उत्पाद की विशेषताओं से जुड़े दावों को लेकर कंपनियों को अधिक सावधानी बरतनी होगी।

    नियामक का जोर इस बात पर है कि उपभोक्ताओं को उत्पाद खरीदने से पहले लेबल और प्रचार सामग्री के माध्यम से स्पष्ट तथा तथ्यात्मक जानकारी मिले। भ्रामक दावों से उपभोक्ता की खरीद संबंधी धारणा प्रभावित हो सकती है, इसलिए ऐसे मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    एफएसएसएआई ने संकेत दिया है कि उपभोक्ता हितों की सुरक्षा और खाद्य बाजार में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए भ्रामक दावों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। इससे खाद्य कंपनियों के लिए पैकेजिंग, विज्ञापन और ऑनलाइन बिक्री सामग्री को निर्धारित नियमों के अनुरूप रखना और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

  • डेयरी, ड्रिंक्स, तेल और घी समेत कई खाद्य कंपनियां जांच के घेरे में, नियम उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द होने का खतरा

    डेयरी, ड्रिंक्स, तेल और घी समेत कई खाद्य कंपनियां जांच के घेरे में, नियम उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द होने का खतरा

    नई दिल्ली । खाद्य उत्पादों के विज्ञापन और लेबलिंग में किए जाने वाले दावों को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने बड़ी कार्रवाई की है। खाद्य नियामक ने हाल के महीनों में 150 से अधिक फूड ब्रांड्स और खाद्य कारोबार से जुड़े प्रतिष्ठानों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। यह कार्रवाई मुख्य रूप से भ्रामक विज्ञापनों, बिना पर्याप्त आधार किए गए दावों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर की गई है।

    नियामक की कार्रवाई में कई बड़े और जाने-पहचाने ब्रांड्स के नाम भी सामने आए हैं। इनमें नेस्ले इंडिया, पेप्सिको, एबॉट इंडिया, रेड बुल इंडिया, डैनोन इंडिया, मॉन्स्टर एनर्जी इंडिया, हेल एनर्जी, मोंडेलेज इंडिया, कोका-कोला इंडिया, डियाजियो, पेरनोड रिकार्ड, फेरेरो इंडिया और केनव्यू जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि नोटिस जारी होना अपने आप में किसी कंपनी को दोषी ठहराने के बराबर नहीं है। संबंधित कंपनियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।

    FSSAI की नजर ऐसे विज्ञापनों पर है जिनमें खाद्य और पेय उत्पादों को लेकर ऐसे दावे किए जाते हैं, जिन्हें पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण या निर्धारित नियमों के आधार पर साबित करना जरूरी होता है। इनमें उत्पाद को 100 प्रतिशत प्राकृतिक बताना, किसी तरह की मिलावट नहीं होने का दावा करना, वजन घटाने में प्रभावी बताना या प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने जैसे दावे शामिल हो सकते हैं।

    खाद्य उत्पादों के प्रचार में किए जाने वाले स्वास्थ्य संबंधी दावों का उपभोक्ताओं के फैसले पर सीधा असर पड़ता है। इसी वजह से नियामक ने कंपनियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि विज्ञापन और पैकेजिंग पर दी गई जानकारी वास्तविक, स्पष्ट और निर्धारित मानकों के अनुरूप हो।

    इस कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लेबलिंग से जुड़ा है। पैकेट पर उत्पाद की सामग्री, पोषण संबंधी जानकारी और अन्य जरूरी विवरण उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। यदि लेबल पर दी गई जानकारी नियमों के अनुरूप नहीं है या उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकती है, तो नियामकीय कार्रवाई की जा सकती है।

    FSSAI ने केवल कंपनियों के पारंपरिक विज्ञापनों तक अपनी निगरानी सीमित नहीं रखी है। खाद्य उत्पादों के प्रचार के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, फूड डिलीवरी ऐप और प्रभावशाली लोगों यानी इंफ्लुएंसर्स के माध्यम से किए जाने वाले दावों को भी जांच के दायरे में रखा गया है। इसका उद्देश्य विज्ञापन के अलग-अलग माध्यमों में उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाली जानकारी की निगरानी करना है।

    नियामक के अनुसार, खाद्य सुरक्षा कानून और संबंधित मानकों के गंभीर उल्लंघन के मामलों में आगे भी कार्रवाई की जा सकती है। यदि नोटिस के जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाते हैं और उल्लंघन साबित होता है, तो संबंधित कारोबारियों पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। गंभीर मामलों में विनिर्माण लाइसेंस के निलंबन या रद्द किए जाने जैसी कार्रवाई भी संभव है।

    इस कार्रवाई से खाद्य कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए यह संकेत स्पष्ट है कि उत्पाद की गुणवत्ता के साथ उसके विज्ञापन और पैकेजिंग में दी जाने वाली जानकारी भी नियामकीय निगरानी के दायरे में है। वहीं उपभोक्ताओं के लिए भी यह जरूरी है कि वे खाद्य उत्पाद खरीदते समय पैकेट पर लिखी जानकारी और स्वास्थ्य संबंधी दावों को सावधानी से देखें।

    FSSAI की कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है जब खाद्य और पेय कंपनियां अपने उत्पादों को स्वास्थ्य, पोषण और जीवनशैली से जोड़कर बड़े पैमाने पर प्रचारित कर रही हैं। ऐसे में वैज्ञानिक प्रमाण और नियमों के अनुरूप दावे करना कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। आने वाले समय में नियामक की निगरानी और कार्रवाई से खाद्य विज्ञापनों में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।

  • कर्नाटक सरकार ने एनालॉग पनीर की बिक्री, भंडारण, आपूर्ति और इस्तेमाल पर एक साल के लिए रोक लगाई, अब तय मानकों वाला दूध से बना पनीर ही बिकेगा

    कर्नाटक सरकार ने एनालॉग पनीर की बिक्री, भंडारण, आपूर्ति और इस्तेमाल पर एक साल के लिए रोक लगाई, अब तय मानकों वाला दूध से बना पनीर ही बिकेगा

    नई दिल्ली । कर्नाटक सरकार ने पनीर की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए एनालॉग पनीर की बिक्री पर बड़ा फैसला लिया है। राज्य में दूध से तैयार नहीं होने वाले ऐसे पनीर उत्पादों की बिक्री, भंडारण, आपूर्ति और इस्तेमाल पर एक साल के लिए रोक लगा दी गई है। यह आदेश 17 अगस्त 2026 से प्रभावी हो चुका है। अब कर्नाटक में पनीर के नाम से वही उत्पाद बेचा जा सकेगा, जो निर्धारित खाद्य मानकों के अनुसार दूध से तैयार किया गया हो।

    सरकार का यह कदम ऐसे समय में आया है, जब बाजार में पारंपरिक डेयरी पनीर के अलावा कई तरह के नॉन-डेयरी और एनालॉग उत्पाद भी उपलब्ध हैं। अधिकारियों के अनुसार, खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ताओं को सही जानकारी के साथ उत्पाद उपलब्ध कराने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है। जांच के दौरान लिए गए कुछ नमूनों में मिलावट नहीं पाए जाने के बावजूद नॉन-डेयरी पनीर के स्वरूप और उसकी बिक्री को लेकर नियामकीय स्तर पर यह कार्रवाई की गई है।

    एनालॉग पनीर और सामान्य पनीर में मुख्य अंतर उनके इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का है। पारंपरिक पनीर मुख्य रूप से दूध से तैयार किया जाता है, जिसमें दूध के प्रोटीन और वसा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दूसरी ओर, एनालॉग पनीर बनाने में दूध की जगह या दूध के साथ वनस्पति तेल, वनस्पति वसा और अन्य गैर-डेयरी सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे उत्पादों को पनीर के नाम से बाजार में बेचे जाने पर अब कर्नाटक में रोक रहेगी।

    नए नियम के तहत खाद्य कारोबारियों, दुकानदारों और अन्य संबंधित प्रतिष्ठानों को ऐसे एनालॉग पनीर को बेचने के साथ-साथ उसका भंडारण, वितरण, आपूर्ति या इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी। इसका सीधा असर उन कारोबारियों पर पड़ेगा, जो गैर-डेयरी सामग्री से तैयार पनीर जैसे उत्पादों को सामान्य पनीर के तौर पर बाजार में उपलब्ध कराते हैं।

    हालांकि, सरकार की ओर से लगाई गई यह रोक हर तरह के नॉन-डेयरी खाद्य उत्पाद पर लागू नहीं होगी। जिन उत्पादों के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई की ओर से पहले से अलग खाद्य मानक निर्धारित हैं, वे इस प्रतिबंध के दायरे से बाहर रहेंगे। इनमें फ्रोजन डेजर्ट, प्रोसेस्ड चीज और मिक्स्ड फैट स्प्रेड जैसे उत्पाद शामिल हैं। इन वस्तुओं को उनके निर्धारित मानकों और लेबलिंग नियमों के तहत बेचा जा सकेगा।

    इस फैसले के बाद कर्नाटक में खाद्य कारोबारियों के लिए उत्पाद की सही पहचान और लेबलिंग का महत्व और बढ़ गया है। पनीर के नाम पर ऐसे उत्पादों की बिक्री नहीं की जा सकेगी, जो निर्धारित दूध आधारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं। सरकार का उद्देश्य बाजार में उपलब्ध खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर स्पष्टता बढ़ाना और उपभोक्ताओं को वास्तविक उत्पाद की जानकारी उपलब्ध कराना है।

    राज्य में यह प्रतिबंध फिलहाल एक वर्ष के लिए लागू किया गया है। इस दौरान खाद्य सुरक्षा विभाग की निगरानी और जांच के जरिए नियमों के पालन पर नजर रखी जाएगी। कर्नाटक का यह कदम ऐसे उत्पादों को लेकर बढ़ती नियामकीय सख्ती का संकेत माना जा रहा है, जिनके नाम और स्वरूप को लेकर उपभोक्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

  • FSSAI खाद्य सुरक्षा जांच, खाद्य उत्पाद लेबलिंग, FSSAI नोटिस कंपनियां, खाद्य पैकेजिंग नियम, भ्रामक खाद्य दावे

    FSSAI खाद्य सुरक्षा जांच, खाद्य उत्पाद लेबलिंग, FSSAI नोटिस कंपनियां, खाद्य पैकेजिंग नियम, भ्रामक खाद्य दावे

    नई दिल्ली । भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की ओर से भ्रामक दावों, गैर-मानकीकृत उत्पादों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर जारी नोटिसों के बाद कई खाद्य कारोबारियों ने सुधारात्मक कदम उठाए हैं। नियामक की ओर से रविवार को बताया गया कि नोटिस मिलने के बाद संबंधित कंपनियों ने अपने उत्पादों और पैकेजिंग में आवश्यक बदलाव शुरू किए हैं।

    खाद्य नियामक के अनुसार, सुधारात्मक कार्रवाई में उत्पादों के लेबल पर किए गए भ्रामक दावों को हटाना, उत्पादों के नाम में बदलाव करना और पैकेजिंग को लागू नियमों के अनुरूप बनाना शामिल है। इन कदमों का उद्देश्य उपभोक्ताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराना और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना है।

    कुछ कंपनियों को भ्रामक ट्रेडमार्क के इस्तेमाल को लेकर नोटिस जारी किए गए थे। इनमें ऑनेस्ट इनोवेशन फॉर यू प्राइवेट लिमिटेड और हेलियोस्टोन स्पेशलिटीज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। नोटिस मिलने के बाद दोनों कंपनियों ने अपने संबंधित उत्पादों के नाम में बदलाव किया।

    राजस्थान एग्रो एंड जनरल इंडस्ट्रीज के मामले में भी भ्रामक ट्रेडमार्क से जुड़ी आपत्ति सामने आई थी। कंपनी ने नियामकीय निर्देशों के अनुरूप उत्पादों से जुड़े भ्रामक दावों को हटाया। इसके अलावा उत्पादों से संबंधित संचार में पीपीएम शब्द का इस्तेमाल भी बंद कर दिया गया।

    एक अन्य मामले में आयोटा नैनोटेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड को गैर-मानकीकृत उत्पाद से संबंधित नियमों के उल्लंघन के लिए चिन्हित किया गया। कंपनी ने संबंधित उत्पाद के लेबल से भ्रामक दावों को हटाने के साथ गैर-मानकीकृत पानी का उत्पादन भी बंद कर दिया।

    पंचामृत इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड को इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक से जुड़े मामले में नोटिस जारी किया गया था। नियामकीय कार्रवाई के बाद कंपनी ने संबंधित उत्पाद को अपनी वेबसाइट से हटा दिया। यह कदम कंपनी की ओर से नोटिस के बाद की गई सुधारात्मक कार्रवाई का हिस्सा रहा।

    लिव्योर वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के उत्पाद ‘लिव्योर रोस्टेड एडामे बीन्स’ के लेबल पर किए गए ‘वीगन’ और ‘हेल्थी’ दावों को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। कंपनी ने इन दावों को नियमों के अनुरूप नहीं होने की बात स्वीकार करते हुए सुधारात्मक कदम उठाए।

    कंपनी के अनुसार, लागू नियमों की जानकारी के अभाव में ये दावे अनजाने में उत्पाद के लेबल पर दर्ज हो गए थे। कंपनी ने इस मामले पर खेद जताते हुए माफी मांगी और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं होने का आश्वासन दिया।

    इसके साथ ही कंपनी ने संशोधित लेबल भी तैयार किया। नियमों का उल्लंघन करने वाले दावों वाली मौजूदा पैकेजिंग सामग्री को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात भी कही गई। कंपनी ने अपने उत्पादों के लेबल की समीक्षा और संशोधन का काम भी शुरू कर दिया है।

    खाद्य उत्पादों के लेबल पर लिखी जानकारी उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण होती है। उत्पाद की प्रकृति, दावे और संबंधित विवरण में किसी तरह की गलत या भ्रामक जानकारी उपभोक्ता के फैसले को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में नियामकीय निगरानी का उद्देश्य कंपनियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप कारोबार करने के लिए बाध्य करना है।

    नोटिसों के बाद कंपनियों की ओर से किए गए बदलाव यह दिखाते हैं कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में नियमों के पालन पर निगरानी बढ़ रही है। आने वाले समय में कंपनियों के लिए लेबलिंग दावों की सटीकता और नियामकीय अनुपालन पहले से अधिक महत्वपूर्ण रहने की संभावना है।

  • मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    नई दिल्ली ।भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तीन खाद्य व्यवसाय संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। नियामक ने मेघालय की ए.बी. एंटरप्राइज तथा ओडिशा की जाइका ऑर्गेनिक्स और नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के खाद्य कारोबार लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं।

    नियामक के अनुसार इन कंपनियों के खिलाफ निरीक्षण के दौरान खाद्य सुरक्षा नियमों के गंभीर उल्लंघन सामने आए। इनमें भ्रामक स्वास्थ्य संबंधी दावे, खराब स्वच्छता व्यवस्था, अनुचित भंडारण, कीट नियंत्रण की कमियां और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन से जुड़ी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन नहीं करना शामिल है।

    ए.बी. एंटरप्राइज के मामले में उत्पादों के लेबल और प्रचार सामग्री पर स्वास्थ्य लाभ से जुड़े ऐसे दावे पाए गए, जिन्हें खाद्य सुरक्षा एवं मानक विज्ञापन और दावे संबंधी नियमों का उल्लंघन माना गया। जांच में यह भी पाया गया कि कंपनी आवश्यक विनिर्माण स्वीकृति के बिना खाद्य उत्पादों का कारोबार कर रही थी।

    कंपनी को सुधार नोटिस जारी करने के साथ अपना पक्ष रखने के लिए व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर भी दिया गया था। हालांकि, नियामक के मुताबिक कंपनी की ओर से कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके बाद खाद्य कारोबार से जुड़ी सभी गतिविधियों को अगले आदेश तक रोकने का निर्देश दिया गया।

    ओडिशा स्थित जाइका ऑर्गेनिक्स के संयंत्र में निरीक्षण के दौरान स्वच्छता और सैनिटेशन से संबंधित कई गंभीर कमियां सामने आईं। खाद्य पदार्थों के निर्माण, पैकेजिंग और भंडारण की परिस्थितियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।

    निरीक्षण में खराब हाउसकीपिंग, कीट नियंत्रण की समस्याएं, जंग लगे उपकरण, कच्चे माल और तैयार उत्पादों का अनुचित भंडारण तथा उत्पादन प्रक्रिया में आवश्यक नियंत्रण की कमी पाई गई। कुछ उत्पादों और सामग्रियों पर निर्माण तिथि, बैच नंबर और उपयोग की अंतिम तिथि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां भी अंकित नहीं थीं।

    अनुपालन मूल्यांकन में जाइका ऑर्गेनिक्स को 90 में से केवल 10 अंक मिले। 12 प्रतिशत के इस स्कोर के आधार पर कंपनी को गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया। नियामक ने कहा कि ऐसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और जैविक जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के उत्पादन परिसर में भी स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन व्यवस्था में गंभीर कमियां पाई गईं। निरीक्षण के दौरान प्रसंस्करण और भंडारण क्षेत्रों में मक्खियां, मकड़ी के जाले, कीटों के प्रवेश के रास्ते और जल स्रोतों के आसपास शैवाल की मौजूदगी दर्ज की गई।

    इसके अलावा जंग लगे उपकरण, खाद्य सामग्री के पास कचरे का जमाव और तैयार उत्पादों के अनुचित भंडारण जैसी कमियां भी सामने आईं। कंपनी के रिकॉर्ड में खाद्य सुरक्षा प्रशिक्षण और नियंत्रण नमूनों से संबंधित आवश्यक दस्तावेजों का भी अभाव पाया गया।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज को अनुपालन मूल्यांकन में 80 में से 20 अंक मिले, यानी कंपनी का स्कोर 25 प्रतिशत रहा। इसे भी गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया और लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

    खाद्य नियामक ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। नियमों का उल्लंघन करने वाले खाद्य कारोबारियों के खिलाफ निरीक्षण और नियामकीय कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।