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  • नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार में बॉलीवुड सितारों की गैरमौजूदगी पर भड़के प्रवीण तारडे, बोले- नाना से बड़ा नहीं बॉलीवुड

    नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार में बॉलीवुड सितारों की गैरमौजूदगी पर भड़के प्रवीण तारडे, बोले- नाना से बड़ा नहीं बॉलीवुड


    नई दिल्ली:
    नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार में बॉलीवुड के कई कलाकारों की गैरमौजूदगी को लेकर मराठी अभिनेता और निर्देशक प्रवीण तारडे ने नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि जो लोग नाना पाटेकर को अपना दोस्त मानते थे, उन्हें उनके अंतिम संस्कार में जरूर पहुंचना चाहिए था। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिल्मी सितारों के नहीं आने से नाना पाटेकर की महानता कम नहीं होती। उनके मुताबिक, अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में किसानों का शामिल होना इस बात का प्रमाण था कि अभिनेता का जुड़ाव केवल फिल्मी दुनिया तक सीमित नहीं था।

    नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को गोवा में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत में शोक की लहर फैल गई। उनका अंतिम संस्कार पुणे के पास स्थित उनके पैतृक गांव डोणजे में उनके फार्महाउस पर किया गया। इस दौरान परिवार के सदस्यों, राजनीतिक हस्तियों, सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों और मनोरंजन जगत की कुछ हस्तियों ने उन्हें अंतिम विदाई दी। हालांकि, बॉलीवुड के कई चर्चित कलाकारों की सीमित मौजूदगी चर्चा का विषय बन गई।

    प्रवीण तारडे ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि नाना पाटेकर का कद किसी फिल्म उद्योग या सितारों की उपस्थिति से तय नहीं होता। उन्होंने अंतिम संस्कार में पहुंचे किसानों का विशेष रूप से उल्लेख किया। उनके अनुसार, महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों से किसान नाना को अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। तारडे ने किसानों के पसीने और मिट्टी से जुड़े जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उनके लिए किसानों का सम्मान फिल्मी दुनिया के बड़े नामों से भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने नाना के ग्रामीण जीवन और किसानों के साथ उनके संबंधों को उनकी पहचान का अहम हिस्सा बताया।

    तारडे ने कहा कि नाना पाटेकर ने खुद को केवल बॉलीवुड के अभिनेता के रूप में पेश नहीं किया। वह अपनी पहचान किसान के रूप में भी बताते थे। इसी वजह से उनके अंतिम संस्कार में किसानों की बड़ी संख्या में मौजूदगी को तारडे ने खास महत्व दिया। उन्होंने कहा कि नाना का लोगों से जुड़ाव और उनके प्रति सम्मान उनकी वास्तविक विरासत को दर्शाता है। उनके मुताबिक, अभिनेता की लोकप्रियता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि अंतिम संस्कार में कितने फिल्मी सितारे पहुंचे।

    हालांकि, प्रवीण तारडे ने बॉलीवुड के कुछ लोगों की गैरमौजूदगी पर शिकायत भी जताई। उन्होंने कहा कि कम से कम उन लोगों को जरूर आना चाहिए था, जिन्हें नाना अपना दोस्त मानते थे। उन्होंने जैकी श्रॉफ और सुरेश वाडकर का उल्लेख करते हुए बताया कि ये दोनों नाना को अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। तारडे ने मुंबई में किसी कम चर्चित कलाकार के निधन पर लोगों के बड़ी संख्या में पहुंचने और नाना के अंतिम संस्कार में सीमित बॉलीवुड मौजूदगी के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए।

    नाना पाटेकर का अभिनय करियर हिंदी और मराठी सिनेमा में लंबे समय तक प्रभावशाली रहा। फिल्मों के अलावा वह किसानों और ग्रामीण समुदायों से जुड़े सामाजिक कार्यों के लिए भी पहचाने जाते थे। उनके अंतिम संस्कार में किसानों की बड़ी मौजूदगी ने उनके इस जुड़ाव को फिर चर्चा में ला दिया। प्रवीण तारडे की नाराजगी के बावजूद उनका कहना था कि बॉलीवुड के सितारों की गैरमौजूदगी से नाना का सम्मान कम नहीं होता। उनके लिए अभिनेता को अंतिम विदाई देने पहुंचे किसान ही उनकी लोकप्रियता और लोगों के साथ उनके गहरे संबंधों की महत्वपूर्ण तस्वीर थे।

  • नाना पाटेकर ने सालों पहले कर ली थी अंतिम संस्कार की तैयारी, 12 मन सूखी लकड़ी को बताया था अपनी ‘फाइनल प्रॉपर्टी’

    नाना पाटेकर ने सालों पहले कर ली थी अंतिम संस्कार की तैयारी, 12 मन सूखी लकड़ी को बताया था अपनी ‘फाइनल प्रॉपर्टी’

    नई दिल्ली: दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके घर पर निधन हो गया। वह 75 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर से फिल्म जगत और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर है। नाना पाटेकर के निधन के बाद उनके वर्षों पुराने एक बयान की चर्चा भी हो रही है, जिसमें उन्होंने अपने अंतिम संस्कार को लेकर अपनी इच्छा के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें पता है कि एक दिन उन्हें दुनिया से जाना है और उनके अंतिम संस्कार के लिए 12 मन लकड़ी पर्याप्त होगी। अभिनेता ने इसे अपनी आखिरी संपत्ति तक बताया था।

    नाना पाटेकर ने सितंबर 2023 में एक इंटरव्यू के दौरान मौत और अंतिम संस्कार को लेकर खुलकर बात की थी। उन्होंने कहा था कि वह मौत में विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि एक दिन उन्हें जाना ही होगा। अपने अंतिम संस्कार के बारे में उन्होंने बेहद साधारण अंदाज में कहा था कि उन्हें 12 मन लकड़ी की जरूरत पड़ेगी। उन्होंने कहा था कि यही उनकी ‘फाइनल प्रॉपर्टी’ है और इसके साथ ही वह दुनिया से चले जाएंगे। उनके इस बयान से यह स्पष्ट था कि वह जीवन के अंतिम पड़ाव को लेकर व्यावहारिक सोच रखते थे।

    अभिनेता ने यह भी बताया था कि उन्होंने अपने अंतिम संस्कार के लिए 12 मन लकड़ी पहले से ही जमा करके रखी है। उन्होंने खास तौर पर इच्छा जताई थी कि उनके अंतिम संस्कार में सूखी लकड़ी का इस्तेमाल किया जाए। उनका कहना था कि जो लकड़ी उन्होंने जमा कर रखी है, वह सूखी है और उसी से उनका अंतिम संस्कार किया जाए। उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि गीली लकड़ी का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। नाना पाटेकर की यह बात उनके सहज और अलग अंदाज को भी दिखाती है, जिसमें उन्होंने गंभीर विषय को भी अपने खास हास्य के साथ सामने रखा था।

    सूखी लकड़ी के इस्तेमाल को लेकर नाना पाटेकर ने मजाकिया अंदाज में इसकी वजह भी बताई थी। उन्होंने कहा था कि अगर गीली लकड़ी का इस्तेमाल किया गया तो आंखों में आंसू आ सकते हैं। ऐसे में मरते समय यह गलतफहमी हो सकती है कि लोग उनके लिए रो रहे हैं। उन्होंने कहा था कि कम से कम मरते समय ऐसी गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। उनके इस बयान में मौत जैसे गंभीर विषय के बीच उनका चिर-परिचित हास्य नजर आया था।

    नाना पाटेकर के आखिरी समय की बात करें तो गुरुवार सुबह गोवा में उनके घर पर अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। मणिपाल हॉस्पिटल के डॉ. शेखर सालकर के अनुसार, रात करीब 2:30 बजे नाना पाटेकर ने एक दोस्त से कहा था कि उन्हें अच्छा महसूस नहीं हो रहा है और सीने के बाईं ओर दर्द हो रहा है। इसके बाद उनका दोस्त डोना पाउला स्थित घर पहुंचा, जहां उन्हें तकलीफ में पाया गया। इसके बाद केयरटेकर को बुलाया गया और एम्बुलेंस भी बुलाई गई।

    नाना पाटेकर को सुबह करीब 4:20 बजे मणिपाल हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की कोशिश की। हालांकि, सुबह करीब 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनकी मौत कार्डियक अरेस्ट की वजह से होने की बात सामने आई है। मौत की सही वजह का पता लगाने के लिए पोस्टमार्टम किया जाएगा। अभिनेता के निधन के बाद उनके पुराने बयान में कही गई अंतिम संस्कार की इच्छा भी चर्चा में आ गई है।

  • शमशान घाट जाने की थी तैयारी, तभी आया फोन- अंतिम संस्कार रोक दीजिए; एंबुलेंस के झटके के बाद जिंदा मिला शख्स

    शमशान घाट जाने की थी तैयारी, तभी आया फोन- अंतिम संस्कार रोक दीजिए; एंबुलेंस के झटके के बाद जिंदा मिला शख्स


    ऋषिकेश।
    उत्तराखंड के ऋषिकेश में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे परिवार को अचानक हैरान कर दिया। जिस व्यक्ति को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था, उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाते समय परिजनों ने एंबुलेंस में अचानक सांसें चलने की बात कही। इसके बाद अंतिम संस्कार की तैयारियां रोक दी गईं और व्यक्ति को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

    यह मामला ऋषिकेश के गीता नगर गली नंबर-5 निवासी साईं राम से जुड़ा है। परिजनों के मुताबिक, डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किए जाने के बाद वे अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट गए थे। मुक्तिधाम सेवा समिति से अंतिम यात्रा के लिए वाहन भी बुक करा लिया गया था।

    श्मशान ले जाते समय एंबुलेंस का पहिया गड्ढे में गया

    बताया गया कि साईं राम के शव को एंबुलेंस से अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था। जब वाहन श्यामपुर रेलवे फाटक के पास पहुंचा, तभी सड़क पर बने एक गहरे गड्ढे में एंबुलेंस का पहिया चला गया।

    परिजनों के अनुसार, वाहन को जोरदार झटका लगा। इसी दौरान साईं राम के शरीर में हलचल हुई और उन्होंने आंखें खोल दीं। परिजनों ने सांसें चलने की बात कही, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाने का फैसला किया गया।

    अंतिम यात्रा वाहन की बुकिंग भी हो चुकी थी

    मुक्तिधाम सेवा समिति के पंकज गुप्ता के मुताबिक, दोपहर में साईं राम के अंतिम संस्कार के लिए वाहन की बुकिंग कराई गई थी। इसके बाद वाहन और चालक की व्यवस्था कर दी गई थी।

    उन्होंने बताया कि करीब 2:30 बजे परिवार की ओर से फोन आया और अंतिम यात्रा वाहन की बुकिंग रद्द करने को कहा गया। जब इसकी वजह पूछी गई तो परिजनों ने बताया कि एंबुलेंस के गड्ढे में जाने के बाद लगे झटके के दौरान साईं राम की सांसें चलने लगी हैं।

    दो बार हार्ट अटैक और किडनी फेल होने की बात

    परिजनों के अनुसार, साईं राम की तबीयत काफी खराब थी। डॉक्टरों ने उनके गुर्दे फेल होने और दो बार हार्ट अटैक आने की बात कही थी और उन्हें मृत घोषित कर दिया था।

    हालांकि, बाद में सांसें चलने की सूचना के बाद उन्हें उपचार के लिए एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया। फिलहाल उनका इलाज चल रहा है।

    घटना ने खड़े किए कई सवाल

    इस घटना की जानकारी सामने आने के बाद इलाके में इसकी चर्चा हो रही है। हालांकि, एंबुलेंस के गड्ढे में जाने से लगे झटके और साईं राम के शरीर में दोबारा सांस चलने के बीच चिकित्सकीय संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    मामले ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि किसी मरीज को मृत घोषित किए जाने की प्रक्रिया में किन चिकित्सकीय मानकों का पालन किया गया था। फिलहाल साईं राम की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति और उन्हें मृत घोषित किए जाने की परिस्थितियां ही इस पूरे मामले को स्पष्ट करने में अहम होंगी।

  • 15 साल का साथ एक ही दिन हुआ खत्म, मालिक के निधन के बाद अंतिम यात्रा में डॉग ने भी तोड़ा दम, भावुक विदाई की अनोखी मिसाल

    15 साल का साथ एक ही दिन हुआ खत्म, मालिक के निधन के बाद अंतिम यात्रा में डॉग ने भी तोड़ा दम, भावुक विदाई की अनोखी मिसाल

    मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से इंसान और उसके पालतू साथी के बीच अटूट प्रेम और वफादारी की एक ऐसी भावुक घटना सामने आई है, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। शहर के सिविल लाइन क्षेत्र निवासी 67 वर्षीय प्रदीप जैन का बीमारी के दौरान निधन हो गया। उनके निधन के बाद परिवार के 15 साल पुराने पालतू डॉग ‘डुग्गू’ ने जिस तरह अपने मालिक का अंतिम समय तक साथ निभाया, उसने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया। अंतिम यात्रा के दौरान मालिक की अर्थी के पीछे-पीछे चल रहे डुग्गू ने भी कुछ दूरी तय करने के बाद दम तोड़ दिया।

    जानकारी के अनुसार, प्रदीप जैन पिछले कई दिनों से बीमार थे और उनका उपचार भोपाल स्थित एम्स अस्पताल में चल रहा था। करीब आठ दिनों तक इलाज के बाद उनका निधन हो गया। इसके बाद उनका पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए बैतूल लाया गया, जहां परिजन, रिश्तेदार और परिचित अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। इस दौरान डुग्गू लगातार अपने मालिक के पार्थिव शरीर के पास जाने की कोशिश करता रहा। परिवार के सदस्यों ने उसे अलग कमरे में रखा, लेकिन वह पूरी रात बेचैन रहा और लगातार आवाजें निकालता रहा, मानो उसे अपने प्रिय मालिक के बिछड़ने का एहसास हो गया हो।

    अगले दिन जब प्रदीप जैन की अंतिम यात्रा निकाली गई तो डुग्गू भी अर्थी के पीछे-पीछे चल पड़ा। वह पूरी श्रद्धा और लगाव के साथ अपने मालिक की अंतिम विदाई में शामिल रहा। कुछ दूरी तक चलने के बाद अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई और वहीं उसकी सांसें थम गईं। यह दृश्य देखकर अंतिम यात्रा में शामिल सभी लोग भावुक हो गए। कई लोगों की आंखों से आंसू छलक पड़े और हर कोई इस अनोखे रिश्ते की चर्चा करता नजर आया।

    परिजनों ने प्रदीप जैन का अंतिम संस्कार पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ किया। वहीं डुग्गू को भी सम्मानपूर्वक गंज मोक्षधाम परिसर के समीप दफनाया गया। परिवार का कहना है कि डुग्गू केवल एक पालतू जानवर नहीं, बल्कि घर का सदस्य था। उसने अपने पूरे जीवन में परिवार के साथ गहरा जुड़ाव बनाए रखा और विशेष रूप से प्रदीप जैन के प्रति उसका लगाव बेहद खास था।

    प्रदीप जैन के छोटे भाई दिलीप जैन ने बताया कि डुग्गू पिछले 15 वर्षों से परिवार के साथ रह रहा था। जैसे ही प्रदीप जैन घर लौटते, वह दौड़कर उनका स्वागत करता था। जब भी उनकी तबीयत खराब होती, डुग्गू भी उदास रहने लगता था और उनके आसपास ही बना रहता था। परिवार का मानना है कि मालिक के बिछड़ने का दुख वह सहन नहीं कर सका और आखिर तक उनका साथ निभाते हुए उसने भी दुनिया को अलविदा कह दिया।

    यह घटना केवल एक पालतू जानवर की वफादारी की कहानी नहीं, बल्कि इंसान और बेजुबान के बीच विश्वास, अपनापन और निस्वार्थ प्रेम के उस रिश्ते की मिसाल बन गई है, जिसे देखकर हर कोई भावुक हो उठा।

  • ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई, बेटों की मौजूदगी के बीच सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की गैरहाजिरी पर तेज हुई चर्चाएं

    ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई, बेटों की मौजूदगी के बीच सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की गैरहाजिरी पर तेज हुई चर्चाएं

    नई दिल्ली । ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को शनिवार को तेहरान में पूरे राजकीय और धार्मिक सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। अंतिम संस्कार में देश के शीर्ष राजनीतिक, सैन्य और धार्मिक नेतृत्व की मौजूदगी रही, जबकि सबसे अधिक चर्चा मौजूदा सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की सार्वजनिक गैरमौजूदगी को लेकर हुई। सुरक्षा कारणों के चलते उनके समारोह में खुलकर शामिल न होने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

    अंतिम नमाज के दौरान अली खामेनेई के परिवार के कई सदस्य मौजूद रहे। उनके बेटों मसूद, मेयसाम और मुस्तफा ने अंतिम रस्मों में हिस्सा लिया और अपने पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की। वहीं, देश के कई वरिष्ठ अधिकारी और धार्मिक नेता भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। समारोह के दौरान बड़ी संख्या में नागरिकों ने भी अपने पूर्व सर्वोच्च नेता को अंतिम विदाई दी।

    ईरानी प्रशासन के अनुसार, अंतिम नमाज का नेतृत्व वरिष्ठ धार्मिक नेता आयतुल्ला जाफर सोभानी ने किया। उनके साथ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ, न्यायपालिका प्रमुख गुलामहुसैन मोहसनी एजेई तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। कुद्स फोर्स के कमांडर इस्माइल क़ानी सहित कई प्रमुख सैन्य अधिकारी भी समारोह का हिस्सा बने।

  • सांप से भिड़ गया कुत्ता, गंवाई जान, लेकिन मासूम छात्रों को बचा लिया; गांववालों ने किया अंतिम संस्कार

    सांप से भिड़ गया कुत्ता, गंवाई जान, लेकिन मासूम छात्रों को बचा लिया; गांववालों ने किया अंतिम संस्कार

    मयूरभंज। ओडिशा के मयूरभंज जिले में एक कुत्ते की बहादुरी की खूब चर्चा हो रही है। इसने अपनी जान पर खेलकर स्कूल में पढ़ने वाले 30 मासूम छात्रों की जान बचाई है। असल में यहां पर एक विषैला सांप निकल आया था। लेकिन यह कुत्ता, सांप से भिड़ गया और सभी बच्चों को बचा लिया। उसकी इस बहादुरी से प्रेरित होकर गांव के लोगों ने उसे काली नाम दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला ढिराकुला गांव का है और घटना सुबह 8.30 बजे हुई।
    छात्रों के बीच जा पहुंचा सांप
    जानकारी के मुताबिक श्री जगन्नाथ शिशु विद्या मंदिर में किंडरगार्टन स्कूल में छात्र, परिसर के बाहर जुटे हुए थे। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि इसी दौरान एक विषैला सांप वहां पहुंचा, जहां पर छात्र बैठे हुए थे। अभी वहां मौजूद लोग सोच ही रहे थे कि वहां बैठे मासूम छात्रों को कैसे बचाया जाए, तभी यह कुत्ता वहां पहुंच गया। इसके बाद उसने मोर्चा संभाल लिया और छात्रों को बचा लिया। वहां पर मौजूद लोगों ने बताया कि सांप के बार-बार हमले के बावजूद काली डरा नहीं और मोर्चे पर डटा रहा।

    सांप की हो गई मौत
    इस दौरान कुत्ता के हमलों से सांप की मौत हो गईं। वहीं, कुत्ता को भी सांप ने मुंह में काट लिया था। इसके चलते बाद में कुत्ता की मौत हो गई। जगहों पर काट लिया था। स्थानीय लोग काली की वीरता से काफी ज्यादा प्रभावित हुए। तमाम लोगों ने बताया कि इससे पहले इस कुत्ता को किसी ने देखा नहीं था। घटना के बाद सबने जुटकर उसे अंतिम विदाई दी। काली के शव को सफेद कपड़ों से ढंका गया और चारों तरफ फूल बिखेरे गए। इसके बाद उसके शव को एक ट्रॉली पर रखकर गांव में घुमाया गया।

  • हरीश की 13 साल के संघर्ष की जंग खत्म… दिल्ली के ग्रीन पार्क में हुआ अंतिम संस्कार, नम आंखों से दी गई अतिम विदाई

    हरीश की 13 साल के संघर्ष की जंग खत्म… दिल्ली के ग्रीन पार्क में हुआ अंतिम संस्कार, नम आंखों से दी गई अतिम विदाई


    Harish
    गाजियाबाद/दिल्ली।
    इच्छा मृत्यु के बाद बुधवार को हरीश राणा (Harish Rana) को अंतिम विदाई दी कई। ग्रीन पार्क (Green Park.) में सुबह नौ बसे उनका अंतिम संस्कार (Last rites) किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद और हरीश राणा को नमन किया।

    भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia.) की अनुमति पाने वाले हरीश राणा पहले शख्स रहे। मंगलवार को उनका निधन हो गया था। वह पिछले 13 वर्षों से कोमा जैसी अवस्था में थे और इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पूरी की गई। हरीश के पिता अशोक राणा के करीबी मित्र दीपांशु मित्तल ने बताया कि हरीश का जीवन जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक संघर्ष भरा रहा। दिल्ली में जन्मे हरीश पढ़ाई के दौरान चंडीगढ़ में हादसे का शिकार हुए। बीते 13 वर्षों का उनका संघर्ष शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है।


    कब क्या हुआ

    -20 अगस्त 2013: हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल
    -वर्ष 2022: माता-पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की
    -8 जुलाई 2024: हाई कोर्ट ने इच्छामृत्यु याचिका खारिज की
    -15 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
    -11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी
    -14 मार्च 2026: हरीश को एम्स, दिल्ली में भर्ती कराया गया
    -24 मार्च 2026: एम्स में निधन

    हर दिल में एक ही सवाल, क्या यही अंत था उस लंबी पीड़ा का
    हरीश राणा के निधन ने राज एंपायर सोसायटी में ऐसा ही सन्नाटा छोड़ दिया है, जहां आंसू और राहत दोनों एक साथ महसूस किए जा रहे हैं। एक ओर एक युवा जीवन के चले जाने का गम है तो दूसरी ओर उस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति की राहत, जिसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं। मंगलवार को हरीश के निधन की खबर मिलते ही सोसायटी का माहौल बदल गया। हर घर में शोक की परछाई दिखाई दी और लोग एक-दूसरे से सवाल करते नजर आए कि आखिर यह संघर्ष इतने लंबे समय तक क्यों चला और क्या इसका अंत इसी रूप में होना तय था।


    एक परिवार नहीं, पूरे समाज की पीड़ा

    स्थानीय निवासी दीपांशु मित्तल ने कहा कि यह केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज की पीड़ा है। उनके अनुसार, हरीश के माता-पिता ने जो सहा है, उसे शब्दों में बयां करना संभव नहीं। एक अभिभावक होने के नाते वह इस दर्द को गहराई से महसूस करते हैं। उन्होंने कहा कि इस कठिन समय में पूरी सोसायटी परिवार के साथ खड़ी है।


    पिता का संघर्ष एक योद्धा जैसा

    सोसायटी में रहने वाले तेजस चतुर्वेदी ने इस घटना को असाधारण त्रासदी बताया। उन्होंने कहा कि किसी पिता का अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगना ही बताता है कि पीड़ा कितनी गहरी रही होगी। उनके अनुसार, अशोक राणा का संघर्ष किसी योद्धा से कम नहीं था, जो वर्षों तक अपने बेटे के लिए लड़ते रहे। उन्होंने कहा कि हरीश भले ही अब इस दुनिया में न हों, लेकिन उनकी कहानी लोगों के जेहन में लंबे समय तक जीवित रहेगी।


    समर्पण की मिसाल बने पिता

    सोसायटी निवासी सचिन शर्मा ने इसे एक पिता के समर्पण की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि हरीश के पिता ने अपने बेटे के लिए जो कुछ किया, वह असाधारण है। अंतिम समय तक उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और हर संभव प्रयास किया। उन्होंने यह भी कहा कि नवरात्र के दौरान हरीश का जाना इस घटना को और अधिक भावुक बना देता है।

  • भिंड के शहीद हवलदार की अंतिम विदाई: 6 साल के बेटे ने दी मुखाग्नि, पत्नी ने रोना-धोना बंद करने की दी हिम्मत

    भिंड के शहीद हवलदार की अंतिम विदाई: 6 साल के बेटे ने दी मुखाग्नि, पत्नी ने रोना-धोना बंद करने की दी हिम्मत

    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में सर्चिंग ऑपरेशन के दौरान हुए हादसे में शहीद हुए भिंड के हवलदार शैलेंद्र सिंह भदौरिया का शनिवार सुबह उनके पैतृक गांव चितावली (अटेर) में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान शहीद के 6 वर्षीय बेटे भावेश ने पिता को मुखाग्नि दी, वहीं शहीद की पत्नी शिवानी ने अदम्य साहस दिखाते हुए लोगों से कहा, “रोना-धोना बंद करो, कुछ नहीं होगा।”

    जब शहीद का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, तो अंतिम दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।

    सेना के जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर सलामी दी। डोडा में सेना का वाहन खाई में गिरने से शैलेंद्र सिंह समेत 10 जवान शहीद हुए थे।

    पत्नी का दर्दनाक लेकिन साहसी रुख
    शहीद की पत्नी शिवानी ने अपने पति के शव के पास बैठकर बार-बार बलाएं लेकर अपने पति के गाल चूमा और सभी को हिम्मत दी। उनका यह साहस देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। उन्होंने बताया कि 21 जनवरी की रात शैलेंद्र से आखिरी कॉल पर शैलेंद्र ने कहा था कि उन्हें डर लग रहा है। उन्होंने सपना देखा था कि उनकी बेटियाँ पढ़ाई के बावजूद सफल नहीं हो रही हैं, और परिवार शादी के लिए परेशान है। शिवानी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि रिटायरमेंट के बाद प्लॉट बेचकर बेटियों की शादी कर देंगे, लेकिन शैलेंद्र ने कहा, “मुझे बहुत डर लग रहा है, कुछ होने वाला है।”

    इसके बाद उनकी शहादत की खबर आई।

    परिवार की शौर्य गाथा: दादा भी थे शहीद
    शैलेंद्र के पिता हनुमत सिंह ने गर्व और आंसूओं के साथ बताया कि उनके तीनों बेटे सेना में हैं और शैलेंद्र उनके दूसरे बेटे थे। उन्होंने कहा कि उनका दादा भी 1972 में शहीद हुए थे, और आज उनका बेटा भी देश के लिए शहीद हुआ है।

    शहीद के बड़े भाई देव सिंह ने कहा कि परिवार को दुख है, लेकिन फौजी होने पर गर्व भी है। उन्होंने बताया कि वे तीनों भाई सेना में सेवा कर चुके हैं और देश रक्षा में शैलेंद्र की शहादत पर उन्हें गर्व है।

    अंतिम यात्रा में भावुक माहौल
    अंतिम यात्रा के दौरान लोगों ने फूलों की वर्षा की और “शैलेंद्र सिंह भदौरिया अमर रहें” के नारे लगाए। शमशान घाट पर जब मासूम भावेश ने पिता का शव देखा तो वह फूट-फूटकर रो पड़ा और मुखाग्नि देने से पहले पिता से लिपट गया। इस मौके पर मेजर अक्षय कुमार, एसडीएम शिवानी अग्रवाल, तहसीलदार जगन सिंह कुशवाहा सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

    ब्रिगेडियर अमित वर्मा ने कहा कि पूरा आर्मी परिवार शहीद के परिजनों के साथ खड़ा है और परिवार को मिलने वाली सभी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।

  • सूरत में अजीब मामला, श्मशान में अंतिम संस्कार से रोका, शव लेकर अस्पताल लौटे परिजन

    सूरत में अजीब मामला, श्मशान में अंतिम संस्कार से रोका, शव लेकर अस्पताल लौटे परिजन


    नई दिल्‍ली । गुजरात(Gujarat) के सूरत में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने न सिर्फ आम लोगों को बल्कि अस्पताल प्रशासन (Administration)और श्मशान घाट कर्मचारियों को भी हैरानी में डाल दिया. दरअसल एक महिला की मौत के बाद उसका शव अंतिम संस्कार के लिए श्मशान(crematorium) घाट ले जाया गया, लेकिन वहां से बिना दाह-संस्कार के ही शव को दोबारा अस्पताल वापस लाना पड़ा.

    अर्थी पर शव लेकर फिर अस्पताल पहुंचे परिजन
    मामला सूरत के पांडेसरा इलाके के शिव नगर में रहने वाली 57 साल की सुनीता देवी बृजनंदन तांती से जुड़ा है. परिजनों के अनुसार, सुनीता देवी लंबे समय से बीमार थीं और उन्हें पैरालिसिस की समस्या थी. 13 दिसंबर की सुबह करीब 10 बजे उन्होंने अपने घर में अंतिम सांस ली. मौत के बाद परिजन शव को अंतिम संस्कार के लिए उमरा श्मशान घाट लेकर पहुंचे.

    श्मशान घाट पहुंचने पर वहां के संचालकों ने मृतक महिला का मृत्यु प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज मांगे. परिजनों के पास ये कागजात मौजूद नहीं थे, जिसके कारण श्मशान घाट प्रशासन और परिजनों के बीच विवाद हो गया. नियमों के अनुसार कागजात के अभाव में अंतिम संस्कार से इनकार कर दिया गया.

    मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना अस्पताल पहुंचे थे परिजन
    मामला बढ़ने पर पुलिस को भी सूचना दी गई. पुलिस मौके पर पहुंची और परिजनों को समझाया कि मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना अंतिम संस्कार संभव नहीं है. इसके बाद प्रशासन की सलाह पर परिजन शव को सूरत के न्यू सिविल अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां महिला की मौत हुई थी.

    न्यू सिविल अस्पताल में अर्थी के रूप में सजे शव को स्ट्रेचर पर लाया गया. शव पर अंतिम संस्कार के वस्त्र और फूल माला देख अस्पताल का स्टाफ, डॉक्टर और नर्सिंग कर्मचारी भी चौंक गए. अस्पताल के इतिहास में यह शायद पहला मामला था जब शव श्मशान घाट से वापस जांच के लिए अस्पताल लाया गया.

    शव की दोबारा जांच
    अस्पताल में महिला डॉक्टर ने शव की दोबारा जांच की और औपचारिक रूप से मृत घोषित किया. इसके बाद मृत्यु प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी कागजात तैयार किए गए. इस पूरी प्रक्रिया में करीब 8 से 10 घंटे का समय लग गया.

    दस्तावेज मिलने के बाद परिजन शव को फिर से उमरा श्मशान घाट लेकर पहुंचे, जहां विधिवत अंतिम संस्कार किया गया.. मृतका के पड़ोसी आनंद कुमार जायसवाल ने बताया कि नियमों और कागजी प्रक्रिया की जानकारी न होने के कारण यह स्थिति बनी.