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  • गणपति विसर्जन को लेकर MP में हाई अलर्ट, इंदौर में रात तक चलेंगी झांकियां, घाटों पर तैनात रहेगा भारी फोर्स

    गणपति विसर्जन को लेकर MP में हाई अलर्ट, इंदौर में रात तक चलेंगी झांकियां, घाटों पर तैनात रहेगा भारी फोर्स


    इंदौर । अनंत चतुर्दशी के मौके पर शुक्रवार को मध्यप्रदेश के प्रमुख शहरों में गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ भव्य झांकियों और चल समारोह की रौनक देखने को मिलेगी। इंदौर में 103 साल पुरानी झांकी परंपरा के तहत शाम 6 बजे से 9 किलोमीटर से ज्यादा लंबे मार्ग पर झांकियां निकलेंगी। इसके साथ ही अखाड़ों के उस्ताद और खलीफा पारंपरिक खेलों तथा युद्ध कलाओं के करतब दिखाएंगे। प्रदेश के अन्य बड़े शहरों में भी विसर्जन को लेकर घाटों और कृत्रिम कुंडों पर विशेष इंतजाम किए गए हैं।

    इंदौर में चल समारोह मिल क्षेत्र से शुरू होकर मजदूर मैदान एमजी रोड कृष्णपुरा नंदलालपुरा जवाहर मार्ग नृसिंह बाजार गोराकुंड खजूरी बाजार होते हुए राजवाड़ा तक पहुंचेगा। शाम 6 बजे खजराना गणेश की झांकी के साथ समारोह की शुरुआत होगी और देर रात तक झांकियां तथा अखाड़े निकलते रहेंगे। सुरक्षा को देखते हुए झांकियों में धारदार हथियार और नशे पर रोक रहेगी। डीजे के इस्तेमाल को भी नियंत्रित किया गया है। झांकी पर अधिकतम दो स्पीकर लगाने की अनुमति होगी। हाथी और ऊंट को भी समारोह में शामिल करने पर रोक रहेगी। दोपहर 3 बजे से झांकी मार्ग और आसपास के इलाकों में यातायात डायवर्ट किया जाएगा।

    इंदौर में इस बार कई धार्मिक और सामाजिक संदेश देने वाली झांकियां आकर्षण का केंद्र रहेंगी। देशी मिल की झांकियों में दुर्गा माता और महिषासुर वध के साथ भगवान शंकर और माता सती से जुड़ा प्रसंग दिखाया जाएगा। एक झांकी में नशामुक्ति का संदेश भी दिया जाएगा। कल्याण मिल की झांकी में भगवान जगन्नाथ की पहली रथ यात्रा का प्रसंग और दूसरी झांकी में नारी शक्ति को प्रमुखता दी जाएगी। होप टेक्सटाइल मिल की झांकियों में गणेशजी की आराधना और भगवान शिव की बारात को धार्मिक प्रसंगों के आधार पर प्रस्तुत किया जाएगा।

    भोपाल में भी गणेश विसर्जन को लेकर व्यापक तैयारी की गई है। प्रेमपुरा रानी कमलापति बैरागढ़ खटलापुरा हथाईखेड़ा और शाहपुरा प्रमुख विसर्जन स्थलों में शामिल हैं। छोटी प्रतिमाओं के लिए वार्ड और जोन स्तर पर कृत्रिम कुंड बनाए गए हैं जबकि बड़ी प्रतिमाओं के लिए क्रेन की व्यवस्था की गई है। घाटों पर पुलिस गोताखोर फायर ब्रिगेड और सीसीटीवी के जरिए निगरानी की जाएगी। प्रमुख मार्गों पर यातायात डायवर्जन लागू रहेगा।

    उज्जैन में चल समारोह रात 10 बजे से शुरू होगा। इसके बाद प्रतिमाओं को रामघाट और सुनहरी घाट समेत निर्धारित स्थानों तक ले जाया जाएगा। शाम से ही कई मार्गों पर यातायात प्रतिबंध और डायवर्जन लागू रहेगा। ग्वालियर में सागरताल पर बनाए गए अस्थायी कुंड में गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन कराया जाएगा। पुलिस प्रशासन के साथ नगर निगम की टीम मौजूद रहेगी और ड्रोन से निगरानी की जाएगी।

    जबलपुर में भी विसर्जन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। बड़ी प्रतिमाओं के लिए नर्मदा जल से भरा कृत्रिम कुंड बनाया गया है जहां क्रेन की मदद से विसर्जन कराया जाएगा। गौरीघाट तिलवारा घाट अधारताल खमरिया रांझी और गोकलपुर समेत कई स्थानों पर व्यवस्थाएं की गई हैं। तीन पत्ती चौक से गौरीघाट जाने वाले मार्ग पर पुलिस बल तैनात रहेगा और जरूरत के अनुसार यातायात डायवर्ट किया जाएगा।

    अनंत चतुर्दशी पर प्रदेशभर में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। प्रमुख घाटों और चल समारोह वाले मार्गों पर पुलिस बल के साथ फायर ब्रिगेड गोताखोर और अन्य आपात सेवाओं की तैनाती रहेगी। कई स्थानों पर ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी की जाएगी। प्रशासन का फोकस भीड़ नियंत्रण सुरक्षित विसर्जन और यातायात व्यवस्था बनाए रखने पर रहेगा।

  • गणपति बप्पा की विदाई का समय आ गया 25 सितंबर को होगा विसर्जन नोट कर लें शुभ मुहूर्त और जरूरी नियम

    गणपति बप्पा की विदाई का समय आ गया 25 सितंबर को होगा विसर्जन नोट कर लें शुभ मुहूर्त और जरूरी नियम


    नई दिल्ली। गणेश उत्सव के बाद अब गणपति बप्पा की विदाई का समय आ गया है। इस साल गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर 2026 को मनाया गया था और इसके साथ ही घरों तथा पंडालों में गणपति प्रतिमाओं की स्थापना हुई थी। अब अनंत चतुर्दशी के अवसर पर भगवान गणेश की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। गणेश विसर्जन की तारीख को लेकर कई लोगों के मन में 24 और 25 सितंबर को लेकर असमंजस है। ऐसे में जानना जरूरी है कि बप्पा की विदाई किस दिन की जाएगी और इसके लिए कौन से शुभ मुहूर्त बताए गए हैं।

    द्रिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर की रात 11 बजकर 18 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 25 सितंबर की रात 11 बजकर 6 मिनट पर होगा। तिथि के आधार पर इस साल गणेश विसर्जन 25 सितंबर 2026 शुक्रवार को किया जाएगा। इस दिन भक्त विधि विधान से गणपति की पूजा करने के बाद उन्हें श्रद्धापूर्वक विदाई देंगे।

    गणेश विसर्जन के लिए दिनभर में कई शुभ चौघड़िया मुहूर्त बताए गए हैं। सुबह का चर लाभ अमृत मुहूर्त 6 बजकर 11 मिनट से 10 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। दोपहर में शुभ मुहूर्त 12 बजकर 13 मिनट से 1 बजकर 43 मिनट तक बताया गया है। इसके बाद शाम का चर मुहूर्त 4 बजकर 44 मिनट से 6 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। रात में लाभ का मुहूर्त 9 बजकर 14 मिनट से 10 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा रात 12 बजकर 13 मिनट से 26 सितंबर की सुबह 4 बजकर 42 मिनट तक शुभ अमृत चर मुहूर्त रहेगा।

    विसर्जन के दिन सबसे पहले घर में स्थापित गणपति की विधिवत पूजा करनी चाहिए। श्रद्धालु भगवान गणेश को नारियल शमी पत्र धूप और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर सकते हैं। पूजा के बाद गणपति की आरती की जाती है और परिवार की सुख शांति स्वास्थ्य तथा मंगल की कामना की जाती है। इसके बाद प्रतिमा को सम्मानपूर्वक विसर्जन स्थल तक ले जाया जाता है।

    धार्मिक परंपराओं में विसर्जन के दौरान श्रद्धा और शुद्धता का विशेष ध्यान रखने की बात कही गई है। कई स्थानों पर भक्त नंगे पैर गणपति को विसर्जन के लिए ले जाने की परंपरा का पालन करते हैं। चमड़े से बनी वस्तुओं से भी परहेज किया जाता है। वहीं पर्यावरण की दृष्टि से मिट्टी और प्राकृतिक सामग्री से बनी प्रतिमाओं का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है। ऐसी प्रतिमाओं का विसर्जन भी निर्धारित स्थानों पर ही किया जाना चाहिए।

    25 सितंबर को गणेश विसर्जन के साथ अनंत चतुर्दशी का पर्व भी मनाया जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं और अनंत सूत्र बांधते हैं। अलग-अलग परिवारों में व्रत और पूजा की परंपराएं अलग हो सकती हैं इसलिए इन्हें अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करना उचित माना जाता है।

    इस तरह 25 सितंबर को गणपति बप्पा की विदाई के साथ गणेश उत्सव का समापन होगा। भक्त इस अवसर पर प्रार्थना करेंगे कि गणपति के साथ उनके जीवन के दुख संकट और बाधाएं भी दूर हों और परिवार में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहे।

  • गणपति उत्सव सिर्फ मूर्ति स्थापना तक सीमित नहीं कहीं गौरी पूजन तो कहीं खास सजावट जानिए राज्यों के अनुसार गणेश चतुर्थी की अनोखी परंपराएं

    गणपति उत्सव सिर्फ मूर्ति स्थापना तक सीमित नहीं कहीं गौरी पूजन तो कहीं खास सजावट जानिए राज्यों के अनुसार गणेश चतुर्थी की अनोखी परंपराएं


    नई दिल्ली । गणेश चतुर्थी का पर्व भारत में भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में बेहद श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर 2026 से शुरू होगा। गणपति स्थापना के साथ देशभर में कई दिनों तक पूजा अर्चना भजन कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। हालांकि इस पर्व की खासियत सिर्फ इसकी भव्यता नहीं बल्कि अलग अलग राज्यों में इससे जुड़ी स्थानीय परंपराएं भी हैं। महाराष्ट्र से लेकर गोवा कर्नाटक तमिलनाडु और अन्य राज्यों तक गणेश उत्सव मनाने का तरीका काफी अलग दिखाई देता है।

    महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव सबसे ज्यादा लोकप्रिय और भव्य रूप में दिखाई देता है। यहां घरों के साथ सार्वजनिक पंडालों में भी गणपति की स्थापना की जाती है। कई स्थानों पर विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और पूरे उत्सव के दौरान विशेष पूजा आरती सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा भजन का आयोजन होता है। मुंबई और पुणे जैसे शहरों में गणेश उत्सव की रौनक देखते ही बनती है। परिवारों में गणपति को घर का सदस्य मानकर श्रद्धा के साथ उनका स्वागत किया जाता है।

    गोवा में गणेश चतुर्थी को चवथ के नाम से जाना जाता है। यहां इस पर्व का स्वरूप काफी पारिवारिक और पारंपरिक होता है। गणपति स्थापना के साथ माटोली सजाने की खास परंपरा निभाई जाती है। माटोली में फल सब्जियां पत्तियां फूल और जंगल से मिलने वाली कई प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना भी माना जाता है। गणपति पूजा के दौरान मोदक के अलावा कई स्थानीय पकवान भी तैयार किए जाते हैं।

    कर्नाटक में गणेश चतुर्थी के दौरान भगवान गणेश के साथ गौरी पूजन की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। कई परिवारों में गौरी देवी का विशेष स्वागत किया जाता है और महिलाओं द्वारा पूजा अर्चना की जाती है। गणेश और गौरी की पूजा को परिवार की सुख समृद्धि और मंगल से जोड़कर देखा जाता है। घरों में सजावट के साथ पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

    तमिलनाडु में गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। यहां भगवान गणेश की पूजा में पारंपरिक दक्षिण भारतीय रीति रिवाजों की झलक दिखाई देती है। घरों और मंदिरों में गणपति की प्रतिमा स्थापित कर विशेष पूजा की जाती है। भगवान गणेश को अलग अलग प्रकार के प्रसाद चढ़ाए जाते हैं और भक्त श्रद्धा के साथ मंत्र जाप तथा आरती करते हैं।

    देश के अन्य हिस्सों में भी गणेश चतुर्थी स्थानीय संस्कृति के रंग में रंगी दिखाई देती है। कहीं बड़े सार्वजनिक आयोजन होते हैं तो कहीं परिवार के लोग घर में छोटी प्रतिमा स्थापित कर पूरे विधि विधान से पूजा करते हैं। कई जगहों पर पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए मिट्टी की प्रतिमाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।

    गणेश चतुर्थी की यही विविधता भारत की सांस्कृतिक एकता को दर्शाती है। पूजा की विधि और परंपराएं भले ही अलग हों लेकिन हर जगह भगवान गणेश से सुख शांति समृद्धि और विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना की जाती है। यही वजह है कि गणपति उत्सव धार्मिक आस्था के साथ साथ भारत की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता का भी खूबसूरत उदाहरण बन जाता है।

  • बुध की कमजोरी से लेकर केतु के प्रभाव तक, गणेश चतुर्थी पर ये आसान उपाय बदल सकते हैं आपकी किस्मत का रुख

    बुध की कमजोरी से लेकर केतु के प्रभाव तक, गणेश चतुर्थी पर ये आसान उपाय बदल सकते हैं आपकी किस्मत का रुख


    नई दिल्ली । भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा कर लोग सुख समृद्धि बुद्धि और सफलता की कामना करते हैं। वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी। महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में इस पर्व का विशेष उत्साह देखने को मिलता है। घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति की प्रतिमा स्थापित की जाती है और विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूजनीय देव माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी की पूजा से करने पर कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

    ज्योतिषीय मान्यताओं में भगवान गणेश का संबंध बुध और केतु से भी जोड़ा जाता है। बुध को बुद्धि वाणी तर्क शिक्षा व्यापार और निर्णय क्षमता का कारक ग्रह माना जाता है। वहीं केतु को आध्यात्मिकता ज्ञान वैराग्य और जीवन में अचानक आने वाले बदलावों से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता के अनुसार यदि कुंडली में बुध कमजोर हो या केतु का अशुभ प्रभाव महसूस हो रहा हो तो गणेश जी की आराधना को लाभकारी माना जाता है।

    केतु के साथ भगवान गणेश का संबंध धार्मिक कथाओं से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काटने के बाद उन्हें हाथी का सिर प्रदान किया था। ज्योतिषीय प्रतीकवाद में केतु को बिना सिर वाले ग्रह के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में गणेश जी की उपासना को केतु से जुड़ी बाधाओं को शांत करने वाला उपाय माना गया है। जब व्यक्ति को बार बार भ्रम की स्थिति का सामना करना पड़े काम अटकते रहें या बिना स्पष्ट कारण के परेशानियां बढ़ती महसूस हों तो गणेश आराधना करने की सलाह दी जाती है।

    बुध ग्रह से जुड़ी मान्यताओं में भी गणेश पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान गणेश को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है और बुध ग्रह का संबंध भी बुद्धि वाणी तथा तर्क से है। इसलिए बुधवार के दिन गणपति की पूजा करना ज्योतिषीय उपायों में शामिल किया जाता है। पूजा के दौरान गणेश जी को हरी दूर्वा अर्पित करना विशेष शुभ माना जाता है। धार्मिक परंपरा में 21 दूर्वा अर्पित करने का भी उल्लेख मिलता है। इसके साथ गणपति को मोदक या लड्डू का भोग लगाया जा सकता है।

    बुधवार की सुबह स्नान के बाद भगवान गणेश की विधि पूर्वक पूजा करें और श्रद्धा के साथ दूर्वा अर्पित करें। इस दौरान ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप किया जा सकता है। बुध ग्रह से संबंधित ज्योतिषीय मान्यता रखने वाले लोग ॐ बुं बुधाय नमः मंत्र का जाप भी करते हैं। हरी मूंग का दान और हरे रंग के वस्त्र धारण करना भी बुध से जुड़े पारंपरिक उपायों में बताया जाता है।

    गणेश चतुर्थी के अवसर पर भगवान गणेश की पूजा केवल ज्योतिषीय उपाय के तौर पर ही नहीं बल्कि श्रद्धा और सकारात्मकता के पर्व के रूप में भी की जाती है। मान्यता है कि विघ्नहर्ता की आराधना व्यक्ति को धैर्य विवेक और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देती है। हालांकि ज्योतिषीय उपाय धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचार नहीं माना जाता।

  • गणेश उत्सव से पहले उज्जैन में अनोखी पहल स्कूलों में बच्चों को सिखा रहे मिट्टी के गणेश बनाना

    गणेश उत्सव से पहले उज्जैन में अनोखी पहल स्कूलों में बच्चों को सिखा रहे मिट्टी के गणेश बनाना


    उज्जैन । गणेश चतुर्थी से पहले उज्जैन में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक खास पहल शुरू की गई है। शहर के स्कूलों में बच्चों को मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसका उद्देश्य बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने के साथ गणेश उत्सव में मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देना है। इसी अभियान के तहत गुरुवार को ढांचा भवन स्थित मॉडल स्कूल में गणेश प्रतिमा निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई जिसमें बड़ी संख्या में छात्र छात्राओं ने हिस्सा लिया।

    कार्यशाला में बच्चों ने अपने हाथों से मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं तैयार कीं। इस दौरान उज्जैन के विधायक अनिल जैन कालूखेड़ा और एसपी प्रदीप शर्मा भी बच्चों के साथ प्रतिमा बनाने में शामिल हुए। जनप्रतिनिधि और पुलिस अधिकारी को बच्चों के साथ बैठकर मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाते देख विद्यार्थियों में खास उत्साह नजर आया। बच्चों ने पूरी रुचि के साथ प्रतिमा निर्माण की बारीकियां सीखीं और आकर्षक गणेश प्रतिमाएं तैयार कीं।

    इस अभियान का आयोजन लोकमान्य तिलक गणेशोत्सव महाआयोजन समिति की ओर से किया जा रहा है। समिति पिछले 12 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण और शास्त्रोक्त पूजन परंपरा को बढ़ावा देने के लिए अलग अलग गतिविधियां संचालित कर रही है। समिति के सहसंयोजक जगदीश पांचाल ने बताया कि समिति संयोजक विधायक अनिल जैन कालूखेड़ा के मार्गदर्शन में स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से बच्चों और आम लोगों को मिट्टी के गणेश बनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

    विधायक अनिल जैन कालूखेड़ा ने कहा कि मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा पर्यावरण और जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। गणेश उत्सव के दौरान प्रतिमा विसर्जन के बाद मिट्टी पानी में आसानी से घुल जाती है। इससे जलस्रोतों में प्रदूषण का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने बच्चों से भी पर्यावरण हितैषी तरीके से त्योहार मनाने की अपील की।

    एसपी प्रदीप शर्मा ने भी अभियान की सराहना की। उन्होंने कहा कि जब बच्चे खुद अपने हाथों से गणेश प्रतिमा तैयार करेंगे तो उनमें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी मजबूत होगी। कार्यशाला के बाद बच्चे इन्हीं प्रतिमाओं का पूजन करेंगे और विसर्जन के समय भी पर्यावरण संरक्षण का संदेश लोगों तक पहुंचेगा।

    इससे पहले बुधवार को इंदिरा नगर स्थित नूतन कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भी प्रतिमा निर्माण कार्यशाला का शुभारंभ किया गया था। अभियान को आगे शहर के अन्य स्कूलों तक ले जाने की तैयारी है। आयोजकों का कहना है कि बच्चों को शुरुआत से ही पर्यावरण के अनुकूल परंपराओं से जोड़ना जरूरी है ताकि आने वाले समय में त्योहारों के साथ प्रकृति की सुरक्षा का संदेश भी मजबूत हो सके।

  • संकटों को दूर करने वाला विकट गणेश व्रत, जानिए दिन का शुभ मुहूर्त और समय

    संकटों को दूर करने वाला विकट गणेश व्रत, जानिए दिन का शुभ मुहूर्त और समय


    नई दिल्ली । हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विकट संकष्टी का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व 5 अप्रैल रविवार को पड़ रहा है। भगवान गणेश के अष्टविनायक रूपों में से एक विकट स्वरूप की इस दिन विशेष पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि विकट गणेश अपने भक्तों को सभी प्रकार के ज्ञात और अज्ञात भय रोग शोक और दुर्घटनाओं से सुरक्षित रखते हैं।

    भक्तों का विश्वास है कि यह व्रत न केवल व्यक्ति को निर्भीक बनाता है बल्कि विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करने का साहस भी प्रदान करता है। घोर संकटों में भी भक्तों की रक्षा करने वाले विकट गणेश अपराजेयता का वरदान देते हैं। इसलिए इस दिन व्रत और पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

    इस वर्ष 5 अप्रैल को चतुर्थी तिथि दोपहर 11 बजकर 59 मिनट से शुरू होकर अगले दिन तक रहेगी। व्रत रखने वाले भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को चंद्रमा के उदय के बाद पूजा और चंद्र दर्शन के साथ व्रत का पारण करते हैं।

    दिन का समय भी इस पूजा और व्रत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्योदय सुबह 6 बजकर 7 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 41 मिनट पर होगा। चंद्रोदय रात 9 बजकर 58 मिनट पर है। शुभ मुहूर्त के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 35 मिनट से 5 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 49 मिनट तक है। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 20 मिनट तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 40 मिनट से 7 बजकर 3 मिनट तक रहेगा। वहीं अमृत काल दोपहर 2 बजकर 24 मिनट से 4 बजकर 10 मिनट तक रहेगा जिसे अत्यंत शुभ समय माना जाता है।

    वहीं अशुभ समयों से बचना भी आवश्यक है। राहुकाल शाम 5 बजकर 7 मिनट से 6 बजकर 41 मिनट तक यमगण्ड दोपहर 12 बजकर 24 मिनट से 1 बजकर 58 मिनट तक और गुलिक काल दोपहर 3 बजकर 33 मिनट से 5 बजकर 7 मिनट तक रहेगा। दुर्मुहूर्त शाम 5 बजकर 1 मिनट से 5 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। भद्रा सुबह 6 बजकर 7 मिनट से दोपहर 11 बजकर 59 मिनट तक रहेगा।

    इस प्रकार विकट संकष्टी चतुर्थी 5 अप्रैल को भगवान गणेश की विशेष आराधना और व्रत रखने का दिन है। इस दिन की पूजा न केवल मानसिक और आध्यात्मिक बल बढ़ाती है बल्कि जीवन में आने वाले संकटों और परेशानियों से सुरक्षा का भी मार्ग प्रशस्त करती है। शुभ मुहूर्त और समय का पालन कर भक्त इस दिन की विशेष महत्ता का लाभ उठा सकते हैं और अपने जीवन में सुख शांति और सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।